इस गांव, अंचल और प्रांत की खिन्नता


ह्यूमन फ्रीडम इंडेक्स में भारत 110 वें नंबर पर है. अगर उत्तर प्रदेश एक अलग देश होता तो उसका स्थान 110 से कहीं नीचे होता.
शायद पाकिस्तान (रेंक 140) से भी नीचे. 🙁
सामंतवादी समाज, रंगदारी, लचर पुलिस और प्रशासन तथा उदासीन सी जनता – कभी कभी लगता है कि कहीं और बसना चाहिए था.

रेलवे की नौकरी का एक नफा है. व्यक्ति और परिवार लोकल झिक झिक से असंपृक्त aloof बना रह सकता है. उसकी अधिकांश जरूरतें रेल परिवार में पूरी हो जाती हैं.
पर, रिटायर होने पर, समाज और प्रांत देश की कमियां उजागर होने लगती हैं. उन्हे देख व्यक्ति, बावजूद इसके कि वह इसी समाज से निकला है, कभी कभी बहुत स्तब्ध, खिन्न और हताश होता है.
कभी कभी यह गांव, पूर्वांचल और प्रांत बहुत निराश करता है. 😳

CATO Human Freedom Index की 2018 की पुस्तिका का मुख पृष्ठ

राजकुमार उपाध्याय


मेरे पिताजी भर्ती हैं सूर्या ट्रॉमा सेंटर एंड हॉस्पिटल, औराई में. अस्पताल के बगल में चाय की एक गुमटी है. वहां मेरी पत्नीजी और मैं सवेरे सवेरे जाते हैं चाय पीने. सवेरे की पहली चाय में वह चीनी मिलाए, उससे पहले बिना चीनी की चाय मिलने की संभावना रहती है.

राजकुमार उपाध्याय और परिवार. चित्र फ़ेसबुक प्रोफाइल से.

खैर, मुद्दा यहां सवेरे की चाय का नहीं है. चाय की गुमटी के बगल में जो घर है वह उपाध्याय जी का है. उनके बारे में मुझे पता चलता है परिवार के बेटे राजकुमार उपाध्याय जी से. राजकुमार जी मेरे फेसबुक मित्र हैं. शिकागो में रहते हैं. उनके फेसबुक चित्रों से लगता है उनकी पत्नी और दो बच्चे रहते हैं उनके साथ.

राजकुमार जी सोशल मीडिया पर यह जान कि मैं पिताजी की अस्वस्थता के कारण इस अस्पताल में हूँ; मुझसे शिकागो से बात की. उसके बाद अपने भाई मनोज जी को मेरे पास अस्पताल में भेजा. किसी भी प्रकार की कोई सहायता की आवश्यकता जानने टटोलने के ध्येय से.

सोशल मीडिया की यह असल ताकत है. दुनिया के दूसरे छोर के लोग अगर आपके कहे/लिखे से प्रभावित होते हैं तो एक प्रकार से आपसे जुड़ते हैं. वह नेटवर्किंग करिश्माई होती है पुराने मानकों से. फेसबुक ट्विटर, इनस्टाग्राम और ह्वात्सेप्प आदि ने सम्बंधों की एक नयी विमा (नया डायमेंशन) सृजित कर दिया है.

आप जहां से तनिक अपेक्षा नहीं करते, वहां से सहायता अवतरित होती है. वर्ना, आसपास के कई अंतरंग (?) भी मुंह चुराते पाए जाते हैं, गाढ़े समय में.

राजकुमार जी से आमने सामने का कोई परिचय नहीं था. फिर भी उनके फोन और उनके भाई जी के आने मिलने में आत्मीयता भरपूर झलकी. मैं उनके घर हो कर आया. उनके पिताजी का कोयले और लकड़ी का व्यवसाय है. उनके मां पिताजी – दोनों ही बहुत प्रेम और सहजता से मिले. माँ जी बहुत अच्छी चाय बना कर लाईं. मध्य वित्त परिवार. लगा कि लगभग सेमी रिटायर्ड लाइफ जी रहे हैं उपाध्याय दम्पति. सुखी जीवन. पिताजी ने अपने घुटने के ऑपरेशन की बात बताई. अपने बेटे से बहुत प्रसन्न, बहुत संतृप्त लेगे उपाध्याय जी.

उनकी माँ जी ने कहा कि अपना ही घर समझूँ और कोई आवश्यकता हो, देर सबेर चाय की जरूरत हो तो वे बना कर अस्पताल भिजवा सकती हैं. यह सुनना ही बहुत सुकून वाला होता है.

उनके घर से लौटा तो दस दिन की थकान के बावजूद आत्मीयता से रीचार्ज हो कर लौटा.

आत्मीयता बरास्ते सोशल मीडिया बहुत अच्छा अनुभव था.

कितना विचित्र है – दुनियाँ तकनीकी परिवर्तन से पास आ रही है और पड़ोस जो पूर्व परिचित था, वह शुष्क होता जा रहा है!

(राज कुमार उपाध्याय और उनके परिवार के चित्र उनकी फेसबुक प्रोफाइल से. अन्यथा उनसे फेस टू फेस मुलाकात नहीं हुई है)


ऋतम बोस


ये ऋतम बोस हैं. सूर्या ट्रॉमा सेंटर के प्रबंधक. अकेले रहते हैं इस लिए चौबीस में चौदह घंटे अस्पताल के काम में समस्याएं सुलझाते, प्रबंधन करते और मरीजों – ग्राहकों से बोल बतियाते, फीडबैक लेते दिख जाते हैं.

बंगाली हैं – हावड़ा के सुसंस्कार युक्त बंगाली.

यहाँ धुर पूर्वांचल के #गांवदेहात में कैसे आए?
“झारखंड के देवघर में पढ़ाई की. वहां से बनारस आया और फिर यहां औराई में.” बोस जी ने विस्तार से नहीं बताया. पर शायद सूर्या ट्रॉमा सेंटर को उनकी और उनको इस सेंटर की जरूरत थी. दोनों परस्पर कम्पैटिबल हैं.

हल्के में बोस जी ने जोड़ा – “बंगाली कहाँ नहीं हैं, सर. बंगालीज आर एवरीह्वेयर! 😊” सही कहते हैं. बोकारो में मेरी बिटिया दामाद के घर का अस्पताल है. वहां भी अस्पताल के प्रबंधक हैं बनर्जी दादा. बसक नाथ बनर्जी. बंगाली. वे भी अपने काम के लिए 200 पर्सेंट समर्पित हैं, ऋतम बोस जी की तरह.

मुझे यहां कोई समस्या हो, उसके विघ्न हरण के लिए बोस जी का नाम सुझाया गया. यहां आते ही पिताजी के आईसीयू में होने के कारण मुझे एक कमरे की आवश्यकता थी. बोस जी ने अस्पताल के नियमों की प्रतिबद्धता का निर्वहन करते हुए भी कोई न कोई तरीका निकाल लिया और यहां एक कमरा मिल गया.

मैं बहुत से मरीजों की समस्याओं का समाधान करते देखता हूँ बोस जी को. हर समय उन्हें अस्पताल के चक्कर लगाते ही देखा है. उनके अपने दफ्तर में बैठे तो कभी कभार ही देखा है.

बोस जी जैसे लोग किसी भी संस्थान के लिए एसेट होते हैं.

ऋतम बोस, प्रबंधक, सूर्या ट्रॉमा सेंटर
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