सोलर सिंचाई पम्प


वह सोलर इंटालेशन गांव की पतली सड़क से करीब 150 मीटर दूर था। आसपास भ्रमण में कोई दूसरा सोलर पैनल का इतना बड़ा सेट नहीं देखा था मैंने। मोबाइल के कुछ टावर्स की ऊर्जा देने के लिये कई जगह पैनल लगे देखे थे, पर इतने नहीं थे वे। सुना है कई पेट्रोल पम्प वाले भी लगवा रहे हैं सोलर पैनल, पर वे घूमते हुये देखने में नहीं आये।

उस सड़क से गुजरते हुये कई बार सोचा कि खेत में पैनल के पास जा कर देखूं; पर साइकिल सड़क पर बिना ताले के खड़ा कर जाना मुझे सहज नहीं लगता था।

आज साइकिल का ताला बदलवाया। पुराना वाला जंग लग कर खराब हो गया था। बंद होने पर खुलने में झंझट होती थी और आसपास से गुजरने वाले संशय की नजर से देखते थे। ताला बदल कर सड़क पर साइकिल खड़ी कर खेत में चला गया। शुरू में गेंहू के खेत थे। बाद में कंटीली तार की बाड़ नजर आयी। उन खेतों में सब्जियां उगाई गयी थीं। कैश क्रॉप के लिये किसान ने लगाया था सोलर पम्प।

शुरुआत में सोलर पम्प के पास कोई न दिखा पर जल्दी ही मालिक आ गया। एक शहराती लगते, मुंह पर मास्क लगाये व्यक्ति को चित्र लेते देख शायद मन में संशय हुआ हो। उन्होने मुझसे कुछ पूछने की बजाय मेरी जिज्ञासाओं के उत्तर दिये।

सोलर वाटर पम्प

कुल 10 सोलर पैनल लगे हैं। पांचसौ वाट का एक पैनल मानें तो 5किलोवाट का ऊर्जा स्रोत। तीन केवीए का पम्प लगाया है। सवेरे सात बजे से शाम साढ़े पांच बजे तक पानी निकलता है। दो इंच का पाइप है पानी का।

आज बादल हैं, मौसम साफ नहीं है; इसलिये शायद कम निकले पानी। अभी (सवा सात बजे सवेरे) सिस्टम ऑन नहीं किया है।

दो साल हो गये हैं पम्प लगाये। कोई ब्रेकडाउन नहीं हुआ। सब ठीकठाक चल रहा है।

सब बताने के बाद पैण्ट ऊपर मोड़ कर सोलर पैनलके पास खड़े नौजवान ने पूछा – आपको भी लगवाना है क्या?

अगर मेरे परिवार में उसके जैसे एक दो मेहनती नौजवान होते, बिना सरकारी नौकरी के और सरकारी नौकरी से ज्यादा कमाने-करने की इच्छा वाले; तो मैं जरूर लगवाता। या अब तक लगवा भी चुका होता। अपने दम पर 65 साल की उम्र में घूमने, फोटो खींचने और जानकारी लेने का खटरम तो कर सकता हूं; खेती किसानी करना शायद बूते में नहीं है।

बहुत जल्दी हथियार डाल दिये हो, तुम: जीडी!

सोलर पैनल के सामने से चित्र लेना चाहता था। पर खेत में भरे पानी और कंटीली तार की बाड़ के कारण वह सम्भव नहीं हो सका। वह फिर कभी।


गाँव के संदर्भ में लॉकडाउन क्या है?



लॉकडाउन से लोग समझ रहे हैँ अपने फ्लैट में टेलीवीजन के सामने, किचन में नये व्यंजन का प्रयोग करते, मेडिटेशन करते या किताब पढ़ते बंद लोग। फ्लैट का एक दरवाजा होता है। वह दरवाजा बंद यानी लॉकडाउन।

गांव का दृष्य : घर और बाहर की सीमायें कहां हैं?

गांव में वह दरवाजा कहां है? यहां प्रधानमंत्री आवास योजना में बने एक या दो कमरे हैं। उनसे अलग बना शौचालय। वहीं बाहर कहीं हैण्डपम्प। कमरे के बाहर गाय-बकरी – यहां तक कि घोड़ा भी बंधे हैं। उसके साथ जाती है गांव की सड़क। जिसपर अगर डामर बिछा है,या खडंजा है तो औरतें उसी पर कपड़े भी कचारती हैं। उसी किनारे उपले पाथती हैं। उपडऊर भी वहीं बना होता है मानो उपलों का शिवलिंग हो। यही नहीं, घर के आसपास खेत, जिसमें वह परिवार स्वामित्व के आधार पर या अधियरे के रूप में, खेती करता है, वह भी घर का ही एक्स्टेंशन होता है। और वह एक्स्टेंशन दूसरों के घर/एक्स्टेंशन से गुत्थमगुत्था हुआ होता है।

Continue reading “गाँव के संदर्भ में लॉकडाउन क्या है?”

आनेवाले कल की कुलबुलाहट – रीता पाण्डेय


यह रीता पाण्डेय की आज की अतिथि पोस्ट है।


लॉकडाउन का दूसरा चरण चल रहा है। बीस अप्रेल के बाद बाजार कुछ खुलने की उत्सुकता सभी के चेहरे पर दिखती है। कल स्वास्थ मंत्रालय के सचिव का टीवी पर यह बयान कि संक्रमण में 40 प्रतिशत की कमी आयी है; सभी में उत्साह का संचार कर गया है। अब लोगों के मिलने जुलने पर आगे की रणनीति, अर्थव्यवस्था की आगे की गति आदि पर चर्चा होने लगी है। आगे लोगों के व्यवहार, सामाजिक संरचना आदि में कैसा परिवर्तन आयेगा, इसपर भी मंथन शुरू हो गया है।

लॉकडाउन – इंतजार खत्म होने को है।
Continue reading “आनेवाले कल की कुलबुलाहट – रीता पाण्डेय”
Design a site like this with WordPress.com
Get started