शादियों का मौसम और लड्डू-खाझा की झांपियाँ


शादियों का मौसम है। गांवों में पहले लोग तिलक, गोद भराई और शादी की झांपियों के लिये हलवाई लगाते थे जो लड्डू, खाझा और हैसियत अनुसार अन्य मिठाई बनाता था। झांपी बांस की टोकरियों को कहा जाता है; जिन्हें मंगल कार्य अनुसार लाल-पीला रंग में रंग दिया जाता था। तिलक और गोद भराई में फल की टोकरी को सजाया जाता था और उसपर रंगबिरंगी पारदर्शक पन्नी लगाई जाती थी। यह सब काम घर पर ही होता था। घर-पट्टीदारी में एक दो लोग इस कार्य में पी.एच.डी. किये होते थे।

अब उस घरेलू उद्यम और विशेषज्ञता का स्थान बाजार ने ले लिया है। कस्बाई बाजार ने भी।

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गणतन्त्र जलेबीतन्त्र


आज गणतन्त्र दिवस की सुबह मुझे जलेबी लाने को आदेश मिला घर में। सामान्यत: साइकिल से जाता था; आज जल्दी थी और अशोक (कार ड्राइवर) उपस्थित था; सो कार से गया।

जलेबी की जिस दुकान से आम तौर पर लेता था, वहां भीड़ लगी थी। उसने बताया कि आप को आधा घण्टा इन्तजार करना पड़ेगा। इन्तजार की बजाय दूसरी दुकान तलाशना ज्यादा सही लगा मुझे।

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महराजगंज कस्बे के रेस्तराँ में चिन्ना (पद्मजा) पांड़े


विजय तिवारी जी के श्री विजया रेस्तराँ के बारे में मैं दो ब्लॉग पोस्टें लिख चुका हूं। पोस्ट 1 और पोस्ट 2 पर क्लिक कर वे देख सकते हैं। आजकल मैं अपनी साइकिल भ्रमण में बहुधा वहां जा कर कॉफी के लिये बैठने लगा हूं। गांव में रहते हुये मेरी कॉफी हाउस की चाह को यह रेस्तराँ लगभग 90 प्रतिशत पूरा कर दे रहा है।

दो-तीन बार मेरी पत्नीजी भी मेरे साथ गयी हैं – वह तब जब हम अपने वाहन से बाजार गये थे किसी सौदा-सामान के लिये। पत्नीजी को भी वह रेस्तराँ बहुत पसन्द आया है। चूंकि यह उनका अपने मायके का इलाका है – वे तिवारी जी और उनके कुटुम्ब से परिचित भी हैं। आसपास के बाभन रिश्तेदार भी होते हैं; उस तरह से भी विजय तिवारी जी रिश्ते में आते हैं – फलाने की बिटिया उनके गांव में या उस गांव की इस गांव/घर में आयी है ब्याह कर। मुझे उन सम्बन्धों में ज्यादा रुचि नहीं है। मैं तो यह देखता हूं कि विजय जी कितनी मेहनत-लगन से अपने रेस्तराँ को आकार दे रहे हैं। बतौर ब्लॉगर मेरा ध्येय यह ऑब्जर्व करना है कि यह उपक्रम कैसे विकसित होता है।

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