रतलाम की सड़क पर


रतलाम स्टेशन का अन्दरूनी दृष्य। फुट ओवर ब्रिज स्टेशन के आरपार जाता है। पहले यह प्लेटफार्म पर नहीं उतरता था, अब यह उतरता है!

हमारे पास एक डेढ़ घण्टे का समय था और एक वाहन। सड़क पर घूमते हुये रतलाम का नौ वर्ष बाद का अहसास लेना था। आसान काम नहीं था – जहां चौदह-पन्द्रह साल तक पैदल अनन्त कदम चले हों वहां वाहन में डेढ़ घण्टे से अनुभूति लेना कोई खास मायने नहीं रखता। पर जैसे पकते चावल का एक टुकड़ा देख-दबा कर समूचे पतीले का अन्दाज लगाया जाता है, हमने वही करने का यत्न किया।

रतलाम स्टेशन पहले की तुलना में अधिक साफ और सुविधा सम्पन्न लगा। यह भी हो सकता है कि हमने भीड़ के समय प्लेटफार्म पर चहलकदमी नहीं की, अन्यथा गन्दगी दीखती। पहले छप्पनियां (५६अप) या मामा-रेल (१३०/१२९ पेसेन्जर) के समय भील लोगों की उपस्थिति में बहुत भीड़ होती थी। रात में भील लोग प्लेटफार्म पर ही सोते-जागते दीखते थे। अब जब स्टेशन देखा, तो साफ और रंग-रोगन से चमकता दीखा। स्टॉल भी पहले की अपेक्षा अधिक सामान के साथ और साफ नजर आये। प्लेटफार्म पर गाय बैल बकरी नहीं थे, जो पहले हुआ करते थे। यद्यपि स्टेशन के बाहर जरूर दीखे – सांड़ भी थे जो बनारस के टच की कमी मालवा के रतलाम में पूरी कर रहे थे।

स्टेशन के घोड़े (सज्जन सिंह बहादुर की चौराहे की घोड़े पर सवारी करती प्रतिमा) तक सड़क पहले की अपेक्षा ज्यादा चौड़ी और साफ थी। फ्रीगंज की सड़क भी पहले की अपेक्षा चौड़ी और साफ नजर आयी। मुझे बताया गया कि रेलवे मालगोदाम के ट्रक अब फ्रीगंज से आते जाते हैं – सो स्टेशन की सड़क पहले से ज्यादा खुली और हवादार लगी। कन्हैया (वाहन चालक) ने बताया कि कभी एक गार्ड साहब को एक ट्रक ने जख्मी कर दिया था। उसी के बाद मालगोदाम के ट्रक स्टेशन रोड से बन्द कर दिये गये। भला हो उन गार्ड साहब का…

कालिका माता मन्दिर का परिसर तो बहुत ही शानदार था, पहले की तुलना में। मन्दिर के पास का कुण्ड – जिसमें कभी सड़ते पानी की बदबू आया करती थी, अब स्वच्छ जल युक्त था और उसमें बीचोबीच फौव्वारा भी चल रहा था। बच्चों के मैरी-गो-राउण्ड और खिलौना गाड़ियां भी पहले से ज्यादा चमकदार लगे। एक परिवार कालिकामाता मन्दिर के सामने अपनी नयी मोटर साइकल की पूजा करवा रहा था। माता का आशीर्वाद उनकी मोटरसाइकल और उन्हे सुरक्षित रखे…

हम तीन दुकानों पर गये – एक था मेवाड़ स्टोर। यहां मुस्लिम दुकानदार और उनका लड़का बन्धेज के सूट के कपड़े बेंचते हैं। अधेड़ दुकानदार मेरी पत्नीजी को पहचान गये और मुझे भी। बार बार पूछ भी रहे थे कि मैं वापस यहीं पदस्थ हो कर आ गया हूं, क्या? वे और उनका लड़का बार बार कह रहे थे कि हम में कोई खास फर्क नहीं देखते वे उम्र के प्रभाव का (मेरे ख्याल से वे सही नहीं थे, पर हमने इसे कॉम्प्लीमेण्ट की तरह लिया)। मेवाड़ स्टोर वाले अपना बंधेज का सामान जोधपुर से लाते हैं। वहां उनके रिश्तेदार हैं। इस हिसाब से स्टोर को तो मारवाड़ स्टोर होना चाहिये था…

उमेश किराना स्टोर, जहां से हम किराने का सामान लिया करते थे और मैं पैदल चलते हुये वहां जाया करता था, एक छोटी सी दुकान है। उमेश मिल गये। उनका वजन पहले से बढ़ा हुआ था। वे हमें देख बहुत प्रसन्न हुये। बार बार आग्रह करने लगे कि शाम का भोजन उनके घर पर लें हम। बड़ी कठिनायी से हमने उन्हे मनाया कि भोजन तो मेरी अस्वस्थता के कारण हम कहीं कर नहीं पायेंगे। आतिथ्य के रूप में उमेश से हमने इलायची और टॉफी ग्रहण की। उनकी दुकान से चलते समय मेरी आंख का कोई कोना नम था…

जलाराम की दुकान से हमने दो महीने के लिये पर्याप्त नमकीन, मेथी की पूरी, सींगदाना आदि खरीदे। रतलाम में रहते हुये नमकीन हम उन्ही की दुकान से लिया करते थे। दुकान पहले से दुगनी बड़ी हो गयी थी। सर्वानन्द का जनरल स्टोर भी अब दो मंजिला हो गया है। उसमें एक चक्कर लगाने का मन था, पर समयाभाव के कारण वह टाल दिया।

डाट की पुलिया से रतलाम रहते रोज गुजरना हुआ करता था। सर्दियों के मौसम में मैं एक अमरूद खरीद कर खाते खाते पैदल दफ्तर आया जाया करता था – तब मेरे साथ के सभी अफसर वाहन से आते जाते थे। अत: डाट की पुलिया से मैं शायद सबसे ज्यादा पैदल गुजरने वाला अफसर हो सकता हूं। डाट की पुलिया यथावत दीखी। कन्हैया ने बताया कि पुलिया का एक और बुगदा (सुरंग) बनाने का प्लान था, पर वह हुआ नहीं। आगे शायद बन जाये। शायद न भी बने – बनने के लिये मुझे आस पास ज्यादा जमीन नजर नहीं आती।

हम रेलवे कालोनी के अन्त तक गये। चौदह नम्बर की सड़क के किनारे नमकीन मिठाई की दुकान देखने का मन था – जहां पहले एक मोटी तोंद और छोटी बनियान वाला काला भुजंग बद शक्ल हलवाई हुआ करता था और जिसकी दुकान से बहुत जलेबी हमने खाई थी। वह दुकान या तो बन्द थी, या गायब। उसके पास महू बेकरी जरूर दिखी।

कालोनी की सड़क पहले से कहीं अच्छी दशा में थी। कालोनी के अन्त में परफेक्ट पॉटरीज की बन्द फैक्टरी अभी भी कायम थी – उसकी जमीन की प्लॉटिंग हो कर रिहायशी क्षेत्र नहीं बढ़ा था और उसके दरवाजे पर विशाल बरगद का पेड़ अब भी कायम था।

रेलवे कालोनी में जब हम रहते थे, तो बच्चों के खेलने के पार्क की अधूरी योजना बरसों से चल रही थी। अब मैने एक अच्छा पार्क बने देखा।

समय काफी लग गया था। हम जल्दी स्टेशन वापस लौटे। रास्ते में स्टेशन रोड पर खण्डेलवाल की रतलामी सेव की दुकान यथावत चल रही थी, जिसपर नमकीन झारने वाला कारीगर वैसे ही काम कर रहा था, जैसा मै यहां से स्थानान्तरण के समय छोड कर गया था।

रतलाम वैसा ही है – रतलामी सेव अनवरत बनाता। पर पहले से ज्यादा साफ सुथरा। मन होता है यहीं एक फ्लैट ले कर रिटायरमेण्ट के बाद रहा जाये। पर मन की क्या चलती है?

[यह १६ जुलाई के दिन का भ्रमण था। बारिश का मौसम होने के कारण रतलाम की धूल और वातावरण में कम नमी नहीं मिली, अन्यथा वहां मैं श्वांस की समस्या से परेशान रहता था।

उसके बाद कल हम इलाहाबाद लौट आये।

हम लोग सन १९८५-१९९५ और फिर १९९८-२००३ के बीच रतलाम रहे थे।]

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कारू मामा की कचौरी


कल सवेरे मंसूर अली हाशमी जी रतलाम स्टेशन पर मिलने आये थे, तो स्नेह के साथ लाये थे मिठाई, नमकीन और रतलाम की कचौरियां। मैं अपनी दवाइयों के प्रभाव के कारण उदर की समस्या से पीड़ित था, अत: वह सब खोल कर न देखा। शाम के समय जब विष्णु बैरागी जी मिले तो उन्होने अपने “बतरस” में मुझे स्पष्ट किया कि हाशमी जी कारू राम जी की कचौरियां दे गये हैं और जानना चाहते हैं कि मुझे कैसी लगीं?

मंसूरअली हाशमी जी मुझसे मिलने आये। उनके मोबाइल से लिया चित्र जो मैने फेसबुक से डाउनलोड कर टच-अप किया है।

कारूराम जी की कचौरियों के बारे में उन्होने बताया कि रतलाम में कसारा बाजार में कारू राम जी की साधारण सी दुकान है। कारूराम जी (कारूमामा या कारू राम दवे) समाजवादी प्राणी थे। उन्हे लोगों को बना कर खिलाने में आनन्द आता था। सत्तर के दशक की घटना बैरागी जी बता रहे थे कि २५ कचौरियां-समोसे मांगने पर कारूमामा ने तेज स्वरों में उनको झिड़क दिया था – “देख, ये जो कचोरियां रखी हैं न, वे एक दो कचौरी लेने वाले ग्राहकों के लिये हैं, पच्चीस एक साथ ले जाने वाले ग्राहक के लिये नहीं। तू भाग जा!”

हाशमी जी की लाई कारू मामा की कचौरी और समोसा।

अनुमान लगाया जा सकता है कि कारू मामा कैसे दुकानदार रहे होंगे। बैरागी जी ने बताया कि अब कारू मामा की अगली पीढ़ी के लोग उन्ही उसूलों पर अपनी दुकान चला रहे हैं। उनकी दुकान पर जा कर लगता है कि पच्चीस पचास साल पीछे चले गये हैं काल-खण्ड में।

कैसे रहे होंगे कारू मामा? बैरागी जी की मानें तो अक्खड़ थे, कड़वा भी बोलते थे, पर लोग उस कड़वाहट के पीछे सिद्धान्तों पर समर्पण और स्नेह समझते थे। पैसा कमाना उनका ध्येय नहीं था – वे आटे में नमक बराबर कमाई के लिये दुकान खोले थे – दुकान से घाटा भी नहीं खाना था, पर दुकान से लखपति (आज की गणना में करोड़पति) भी नहीं बनना था।

अच्छा हुआ, मंसूर अली हाशमी जी कारू मामा की कचौरी (और समोसे) ले कर आये। अन्यथा इतने वर्षों रतलाम में रहने पर भी उन जैसी विभूति के बारे में पता नहीं चला था और अब भी न चलता…

कचौरी कैसी थीं? मेरी पत्नीजी का कहना है कि रतलाम में बहुत दुकानों की कचौरियां खाई हैं। यह तो उन सबसे अलग, सब से बढ़िया थीं। भरे गये मसाले-पीठी में कुछ बहुत खास था…

मुझसे शाम के समय मिलने आये श्री विष्णु बैरागी जी।

प्रयाग फाटक का मोची


मैं उससे मिला नहीं हूं। पर अपने दफ्तर आते जाते नित्य उसे देखता हूं। प्रयाग स्टेशन से जब ट्रेन छूटती है तो इस फाटक से गुजर कर फाफामऊ जाती है। फाटक की इमारत से सटी जमीन पर चबूतरा बना कर वह बैठता है।

सवेरे जाते समय कई बार वह नहीं बैठा होता है। शाम को समय से लौटता हूं तो वह काम करता दिखता है। थोड़ा देर से गुजरने पर वह अपना सामान संभालता दिखता है। पता नहीं, अकेला रहता है या परिवार है इलाहाबाद में। अकेला रहता होगा तो शाम को यहां से जाने के बाद अपनी रोटियां भी बनाता होगा!

वह  जूते मरम्मत/व्यवस्थित करता है, मैं माल गाड़ियों की स्थिति ले कर उनका चलना व्यवस्थित करता हूं। शाम होने पर मुझे भी घर लौटने की रहती है। बहुत अन्तर नहीं है मुझमें और उसमें। अन्तर उसी के लिये है जो अपने को विशिष्ट जताना चाहे और उसकी पहचान बचा कर रखना चाहे।

अन्यथा, उसके आसपास से ट्रेनें गुजरती हैं नियमित। मेरे काम में ट्रेनों का लेखा-जोखा है, नियमित। मुझे तो बहुत समय तक सीटी न सुनाई दे ट्रेन की, तो अजीब लगता है। इस प्रयाग फाटक के मोची को भी वैसा ही लगता होगा।

मेरे जैसा है प्रयाग फाटक का मोची। नहीं?

प्रयाग फाटक का मोची

प्रयाग फाटक का मोची जुलाई ५ को सवेरे पौने दस बजे बैठा मिला। बारिश (या धूप?) की आशंका से तिरपात लगाये था।

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