भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
नत्तू पांड़े की भाषा में शब्द कम हैं, कारक-विशेषण-सर्वनाम पिद्दी पिद्दी से हैं। क्रियायें तो वैसी हैं जैसे ऊन बुचेड़ ली गयी भेड़ हों। पर अभिव्यक्ति बहुत है। पूरा शरीर अभिव्यक्ति का माध्यम है।
उन्हे हम गंगा किनारे ले कर गये। घर से पैदल गये नत्तू पांड़े। पहले हनूमान जी के मन्दिर पर रुके। श्रद्धा से घण्टा बजाया और मत्था टेका। टेकने के बाद जय बोली – जय जय मंकी!Continue reading “मम, जै, आगा!”
शराफत अली पर मैने एक पोस्ट लिखी थी – शराफत अली ताला चाभी वर्क्स। उसके बाद मेरे एक सहकर्मी श्री राजेश उनसे यह अनुरोध करने गये थे कि वे मुझसे मिलना स्वीकार कर लें। पर शराफत अली नहीं मिले।
मैने (बहुत कम) शराफत अली को उनकी दुकान पर देखा है। पर दफ्तर जाते हुये अपने मोबाइल का कैमरा तैयार रखता हूं, कि शायद शराफत अली को उसमें उतार सकूं। बहुधा तेज चलते वाहन में, या किसी और के बीच में आ जाने से, या कोण न बन पाने से अथवा शराफत अली के उपस्थित न होने से यह सम्भव नहीं हो सका। आज सात महीने से ऊपर हो गये, तब जा कर शराफत अली कैमरे में उतर सके!
जैसा मैने किया – सतत यत्न कर एक चित्र लेने का प्रयास करना, जो मैं कभी भी उतर कर उनसे मिल कर ले सकता था, वह क्यों होता है?
कोई उत्तर नहीं, बस एक खुराफात। शराफत अली के साथ खुराफात! :lol:
ऐसी छोटी खुराफातों से जाहिर होता है कि हम फन्ने खाँ नहीं बन सकते। हम छोटी छोटी खुराफातों के लायक ब्लॉगर भर हैं!
शराफत अली मेरा वह परिवेश है, जो चीन्हा है, पर अबूझा है। उपनिषद में अस्तित्व के अनेक स्तरों/तहों/कोषों की चर्चा है। इसी तरह अपने परिवेश के भी अनेक तह हैं। शराफत अली एक महत्वपूर्ण तह में आते हैं। एक पूरा समाज है जो मेहनत, जद्दोजहद और अपने आसपास की हार्मोनी (तारतम्यता) में जीता है। इस समाज का में दृष्टा मात्र हूं। जब इसको बूझ पाऊंगा, तो शायद एक सशक्त ब्लॉगर बन पाऊंगा। या शायद सशक्त लेखक। … पर यह सब हवाई बातें हैं। मेरी विश लिस्ट बहुत लम्बी है और लम्बोतरी होती जा रही है। :sad: :lol:
[आप कहेंगे कि फोटो साफ नहीं आयी है। वह शायद मुझे बेहतर मोबाइल खरीदने को प्रेरित करे, बनिस्पत इसके कि मैं टहलते हुये शराफत अली जी के पास जा कर उनका चित्र लूं! :-) ]
मैं उस समय अपनी रेलवे की पहली पोस्टिंग पर गया था। मेरा पद था, सहायक ऑपरेटिंग सुपरिण्टेण्डेण्ट, रतलाम। पश्चिम रेलवे पर यातायात सेवा ज्वाइन करने वाले के लिये यह बहुत प्रॉमिजिंग पोस्ट थी। मुझसे अपेक्षा की जाती थी कि मैं न केवल मेहनत करूंगा, वरन अपने काम में आउटस्टैंडिंग प्रमाणित होऊंगा। सन 1986 का प्रारम्भ था वह। रतलाम रेल मण्डल पर गोधरा-रतलाम खण्ड का विद्युतीकरण का काम हो रहा था। सिगनलिंग व्यवस्था भी बदली जा रही थी। मैं अपने पर अपने को प्रूव करने का काफी दबाव महसूस करता था।
रतलाम – गोधरा खण्ड पर पठारी इलाका होने के कारण बहुत से घुमाव और ऊंचाइयों से गुजरता है ट्रैक। यद्यपि दोहरी लाइन थी उस खण्ड में, तीन स्थानों पर भौगोलिक स्थितियां विषम होने के कारण इकहरी लाइन के छोटे टुकड़े थे। ये टुकड़े भैरोंगढ़ के पास माही नदी, पंचपिपलिया के पास सुरंग और अनास के पास अनास नदी के कारण थे। जब इन टुकड़ों पर सिगनलिंग व्यवस्था बदलने का काम होने जा रहा था तब गाड़ियों के संचालन का व्यवधान निपटने के लिये मुझे इन स्थानों पर एक एक हफ्ते से ज्यादा कैम्प करना पड़ा।
सबसे पहले अनास के पास मेघनगर में कैम्प करना पड़ा। अनास नदी पतली सी पर बहुत गहराई में बहती थी। इलाका भी आदिवासी था और गुजरात-राजस्थान के बार्डर पर था। मैं एक चार पहिये के सैलून में रहता था। यद्यपि काम में व्यस्त रहता था, पर विषमता के कारण जल्दी थक गया। मुझे याद है कि वहां से वापस आने पर मुझे एक दो दिन बुखार भी आया था।
मुझे वहां एक ही घटना याद है – अनास केबिन से रात में अकेले ही निकल गया था एक टार्च ले कर और मेरे पीछे दो सिपाही एक निरीक्षक महोदय के साथ भेजे गये थे। बताया गया कि यह भील आदिवासियों का क्षेत्र है और रात में अकेले निकलना निरापद नहीं है। सकुशल लौटने पर निरीक्षक महोदय ने मुझसे वचन लिया कि ऐसा एडवेंचर आगे नहीं करूंगा मैं!
पंचपिपलिया सुरंग के पास का प्रवास भी बहुत रोचक रहा; पर ज्यादा आनन्द आया भैरोंगढ़ में! भैरोंगढ़ माही नदी के किनारे स्टेशन है। माही नदी पर पुल से गुजरती है रेल पटरी। लगभग दस दिन वहां रहा था मैं। शाम के समय अकेले घूमने के लिये आस पास के पठारी क्षेत्र में निकल जाता था। नदी के पास तो बहुत ही आनन्द आता था। एक ओर माही में एक छोटी सी नदी – लाड़की – आकर मिलती थी। उस नदी के संगम पर बहुधा पंहुच कर मैं माही और लाड़की (छोटी सी लड़की जैसी नदी थी वह!) को निहारता था।
माही का पाट बहुत चौड़ा नहीं था। तल भी बालू वाला नहीं, पथरीला था। पुल के दूसरी ओर एक बांध/चेक डैम सा बना था, जिसे तोड़ कर माही नदी आगे बहती थी। वहां पानी पर्याप्त रुका था और लोग नहाते, मछली पकड़ते दीख जाते थे। नदी के किनारे बरगद और पीपल के पेंड़ थे। उनके झुरमुट में एक मन्दिर भी था। जमीन ऊबड़ खाबड़ थी। मृदा की बजाय कंकर-पत्थर ज्यादा थे उसमें। खेत के नाम पर आदिवासी पठार में मक्का बोते थे। आदिवासियों के घर छिटके हुये थे – दो घर कभी साथ साथ नहीं दिखे।
माही ने मुझे नदी का सौन्दय दिखाया। यद्यपि बड़ी नदियों के मुकाबले माही कोई उल्लेखनीय नदी नहीं है, पर महू/माण्डू के पास पश्चिम विन्ध्य के पठार से निकलने वाली यह नदी पूरब से पश्चिम को बहती है। बहुत कुछ ताप्ती और नर्मदा की तरह। अनास नदी भी आगे जा कर उसमें मिल जाती है। रतलाम के बाद बांसवाड़ा, राजस्थान से घुमावदार तरीके से गुजरने के बाद यह नदी लगभग 500-600 किलोमीटर की यात्रा तय कर गुजरात में खम्भात की खाड़ी में मिलती है समुद्र से। वडोदरा से अहमदाबाद जाते वासद के पास माही पर पुल मिलता है। वहां माही में बहुत विस्तार हो चुका होता है!
माही के सौन्दर्य के बाद रतलाम रेल मण्डल में रहते हुये मैने चोरल, नर्मदा, शिप्रा और कालीसिंध नदी के दर्शन किये। रतलाम महू खण्ड पर रेल की पटरी को चम्बल नदी काटती हैं तो उस समय उनका स्वरूप नाले से बड़ा नहीं है। पर नागदा के पास आते आते वे काफी विस्तार ले लेती हैं, यद्यपि उनमें पानी बरसात में ही देखने को मिलता है। यही चम्बल मैने बाद में कोटा के पास देखीं तो वृहदाकार हो गयी थीं।
नदियों से स्नेह मुझे रेल पटरियों के इर्दगिर्द ही हुआ। एक तरह से नदियाँ मुझे रेल लाइन सी दीखती हैं। इस देश में इधर उधर गुजरती हुईं और देश की लाइफलाइन सी – बहुत कुछ वैसे जैसे रेल है।
बट, इट ऑल स्टार्टेड विथ माही (लेकिन यह सब शुरू हुआ माही नदी से।)! अफसोस यह है कि उस समय मेरे पास कैमरा नहीं था। मात्र यादें हैं उस समय की, चित्र नहीं!
यह पोस्ट करने के पहले पत्नीजी ने पढ़ा। पहले तो कहा कि गंगा पर लिखते लिखते यह कहां पंहुच गये! फिर वे भी पुरानी यादों में खो गयीं। … समय कितनी जल्दी गुजरता है। कितनी जल्दी यादों की तहें जमा हो जाती हैं!
माही गर्मियों में - यह चित्र गुजरात का है, गूगल अर्थ पर श्री अजय सिन्ह सिसोदिया द्वारा अपलोड किया।