कौन बेहतर ब्लॉगर है शुक्ल या लाल?


समीर लाल अपने टिपेरने की कला पर बेहतर फॉलोइंग रखते हैं। उनकी टिप्पणियां जबरदस्त होती हैं। पर उनकी पोस्टों का कण्टेण्ट बहुत बढ़िया नहीं है। कभी कभी तो चुकायमान सा लगता है। उनकी हिन्दी सेवा की झण्डाबरदारी यूं लगती है जैसे अपने को व्यक्ति नहीं, संस्था मानते हों!

अनूप शुक्ल की पोस्टें दमदार होती थीं, होती हैं और होती रहेंगी (सम्भावना)। चिठ्ठा-चर्चा के माध्यम से मुरीद भी बना रखे हैं ढेरों। पर उनकी हाल की झगड़े बाजी जमती नहीं। दम्भ और अभिमान तत्व झलकता है। मौज लेने की कोई लक्ष्मण रेखा तय नहीं कर पाये पण्डित।

दोनो में ब्लॉगरी की जबरदस्त सम्भावनायें हैं और कुछ कमजोरियां तो मैने ऊपर ठेल ही दी हैं।

कौन बेहतर ब्लॉगर है – शुक्ल कि लाल?!

खैर – शिवकुटी मन्दिर पर लोगों ने झण्डे चढ़ाये हैं वैशाख मलमास (अधिक-मास) में। आप वह चित्र देखें –

Jhanda


अतिक्रमण हटा; फिर?


DSC00105 (Small) गंगा तट की सीढ़ियों का अतिक्रमण हट गया।

इस काम में कई लोग लगे थे, पर हमारी ओर से लगे थे श्री विनोद शुक्ल। पुलीस वालों से और स्थानीय लोगों से सम्पर्क करना, उनको इकठ्ठा करना, समय पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई में सहायक बनना – यह उन्होने किया। मैने विनोद शुक्ल को धन्यवाद दिया। एक दिन पहले जब वे बता रहे थे कि कुछ हो नहीं पा रहा है तो वे विलेन नजर आ रहे थे। मैने उन्हे ही नहीं, जाने किन किन को कोसा था।

Gyan572 गंगा के शिवकुटी घाट की सीढ़ियों से अतिक्रमण हटने पर रीता पाण्डेय ने यह लिखा है।

अपनी उत्तेजना मुझे खुद नहीं समझ आ रही थी। न ही मैने पहली बार अतिक्रमण देखा था और न ही उसके प्रति आना-कानी या टालमटोल कोई नई बात थी। यह तो मुझे पहले पता था कि जब तक कसा न जाये, तब तक कोई सक्रिय नहीं होता – न व्यक्ति न तन्त्र। [1]

मेरे सामने यह भी स्पष्ट था कि अधिकांश लोग इस अतिक्रमण को गलत मान रहे थे। बस संगठित हो प्रतिकार नहीं कर रहे थे। मन में अकुलाहट लोगों को संगठित न कर पाने की ज्यादा थी।

हमारी ओर से ज्यादा काम तो सरकारी कुर्सी के माध्यम से हुआ। उस कुर्सी या वैगन गिनने के काम के प्रति हीन भावना न ज्ञान के मन में है, न मेरे। हीन भावना होती तो सन १९८६ से यह सतत कर नहीं रहे होते। कोने का कोई काम ले कर बैठ गये होते। शुक्ल जी यहां तो गलत ही कह रहे हैं। यह जरूर है कि यह कुर्सी सदा साथ तो रहेगी नहीं। पर फिलहाल तो खुशी है कि काम हो गया।

ऐसा नहीं है कि आगे अतिक्रमण नहीं होगा। लेकिन अगर सक्रिय होना है तो लोगों से संवाद बनाना होगा। उन्हे अपने साथ जोड़ने की क्षमता विकसित करनी होगी। पता नहीं, होगा या नहीं। पर कोशिश तो करनी ही होगी।

— रीता पाण्डेय


[1] शायद रीता ने पहले अतिक्रमण दर्शक के रूप में देखे थे, इस बार उसको हटाने में भागीदारी का भाव था, जो उत्तेजना ला रहा था। मजे की बात यह है कि अतिक्रमण हटने के बाद रीता को यह कहते भी पाया कि उस (अतिक्रमणकर्ता) बेचारे के घर के पानी की निकासी अब कैसे होगी। मन की करुणा कुपात्र-सुपात्र का भेदभाव नहीं करती!

यह संतोष की बात है कि सोशल एक्टिविस्ट के रोल में रीता अपने को देखती हैं। हमे तो बस उनके पीछे रहना है! – ज्ञानदत्त पाण्डेय।

DisQus के बारे में एक ओपीनियल पोल है बाजू की विजेट में >>>


बापीयॉटिक पोस्टों की दरकार है!


Baapi2 बापी ओडीसा जाने के बाद क्या कर रहा है? मैं सतीश पंचम जी से फॉलो-अप का अनुरोध करता हूं।

बापी वाली पोस्ट एक महत्वपूर्ण पोस्ट है हिन्दी ब्लॉगिंग की – भाषा और विषय वस्तु में नया प्रयोग। यह बिना फॉलो-अप के नहीं जाना चाहिये। अगर आपने सतीश जी की उक्त पोस्ट नहीं पढ़ी है तो कृपया पढ़ें। बापी मुम्बई की जिन्दगी की करमघसेटी को किन तर्कों के साथ तिलांजलि देता है, और किस भाषा में, वह पढ़ने की चीज है। 

रिवर्स माइग्रेशन एक स्वप्न की वस्तु नहीं है। अर्थव्यवस्था में अच्छी वृद्धि दर के साथ समृद्धि छोटे शहरों/गांवों/कस्बों में पसीजनी चाहिये। अन्यथा असमान विकास अपने को झेल नहीं पायेगा।

गांव गया था गांव से भागा
जला हुआ खलिहान देखकर
नेता का दालान देखकर
मुस्काता शैतान देखकर
घिघियाता इंसान देखकर
कहीं नहीं ईमान देखकर
बोझ हुआ मेहमान देखकर
गांव गया था गांव से भागा।
— श्री कैलाश गौतम की कविता का अंश।

बापी का रिवर्स माइग्रेशन सफल होना चाहिये। इसके अलावा और बापी होंगे। उनके बारे में भी ब्लॉगों पर आना चाहिये। अगर हिन्दी ब्लॉगर मात्र एलीट (पढ़ें खाया-पिया-अघाया) जीव नहीं है और वह सही मायने में अपने परिवेश को अवलोकन करने वाला है, तो उसे सामान्य पोस्टों से अलग ये चरित्र सामने लाने चाहियें।

कैलाश गौतम जी की कविता – गांव गया था गांव से भागा बहुत डैमेज करती है रिवर्स माइग्रेशन की सोच को। छुद्रता की सड़ांध शहर-गांव सभी को समान भंजित करती है। आप जितना बढ़िया विद्रुप लेखन शिवपालगंज पर कर सकते हैं उतना ही मालाबार हिल्स पर भी। पर आप गांव को सिरे से खारिज कर सकते हैं? शायद नहीं। मैं शायद इस लिये जोड़ रहा हूं कि कुछ सत्यापन मुझे अभी करना है।

बापी पर फॉलो-अप और बापीयॉटिक पोस्टों की दरकार है।

देख, सोचने का क्या है कि पिछला मेना (महिना) से मैं सोच रहा था कि मैं इदर बांबे में किसके लिये इतना सुबे से शाम तक मरवा रहा हूँ…….साला अकेला के लिये तो अपना ओड़ीसा में बी उतना ही कमा के रेह सकता हूँ। फिर काएको दूसरे के लव* को तेल बील लगाते बैठने का।

— सतीश पंचम की पोस्ट से।


जब मैं ब्लॉग ब्लॉगस्पॉट पर ही चला रहा हूं तो चर्चा के लिये उपयुक्त टिप्पणी यंत्र के हेतु डिस्कस (DisQus) का प्रयोग जानबूझ कर पुन: शुरू कर रहा हूं। असुविधा के लिये खेद है। और यह आशा भी है कि आप अपने ट्विटर/फेसबुक/डिस्कस अकाउण्ट से या बतौर अतिथि टिप्पणी अवश्य करेंगे।


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