जल का क्लोरीनेशन और अन्य समस्याओं पर विचार



पिछली बुधवासरीय अतिथि पोस्ट में श्री पंकज अवधिया ने भूमिगत जल और उसके प्रदूषण पर विस्तृत जानकारी दी थी। आज के उनके इस लेख में भी जल पर और कोणों से चर्चा है। विशेषत: उन्होने क्लोरीनेशन के विषय में आम अल्पज्ञता के बारे में प्रकाश डाला है।

उनके पुराने लेख आप पंकज अवधिया के लेबल सर्च से देख सकते हैं।

आप लेख पढ़ें:


इस बार पिछली पोस्ट की चर्चा को आगे बढ़ाते हुये जल पर ही बात करेंगे। आम तौर पर जिस पेय जल की आपूर्ति की जाती है घरो में, उसे शुद्ध करने के लिये क्लोरीन का प्रयोग होता है। बरसात के दिनो मे क्लोरीन की मात्रा बढ़ा दी जाती है। स्वीमिंग पूल मे भी पानी को शुद्ध रखने के लिये क्लोरीन का प्रयोग होता है। क्या कभी आपके मन मे यह बात आयी कि क्लोरीन शरीर के लिये लाभप्रद है या नुकसानदायक? लगातार क्लोरीन का प्रयोग कहीं हमे बीमार तो नही कर रहा है? पिछ्ले दिनो नेट पर सर्फिंग के दौरान मेरी नजर इस चेतावनी पर पड़ी:


“Chlorine is the greatest crippler and killer of modern times. While it prevented epidemics of one disease, it was creating another. Two decades ago, after the start of chlorinating our drinking water in 1904, the epidemic of heart trouble, cancer and senility began.”
(….. क्लोरीनेशन ने एक महामारी खतम की पर दूसरी सृजित कर दी। क्लोरीनेशन के १९०४ में प्रारम्भ करने के दो दशक बाद हृदय रोग, केंसर और जल्दी बुढ़ाने की महामरियां शुरू हो गयीं।)
SAGINAW HOSPITAL
J.M. Price, MD
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“Scientists found there was a higher incidence of cancer of the esophagus, rectum, breast, and larynx and of Hodgkins Disease among those drinking chlorinated surface waters.”

“Volatile organics can evaporate from water in a shower or bath.”
“Conservative calculations indicate that inhalation exposures can be as significant as exposure from drinking the water, that is, one can be exposed to just as much by inhalation during a shower as by drinking 2 liters of water a day.”
“People who shower frequently could be exposed through ingestion, inhalation and/or dermal absorption.”
IS YOUR WATER SAFE TO DRINK?
Consumer Reports Books

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Chlorinated Drinking Water Linked to Cancer

November 21, 1999 The Toronto Star
Task force to conduct tests in hundreds of communities
Ottawa (CP) – A new federal analysis concludes that chlorinated drinking water may pose a cancer risk to humans, particularly the risk of bladder cancer.

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One of the most effective ways to reduce concentrations of the chemicals is to use filtration.

But many communities, especially smaller ones, don’t have up-to-date filtration systems.
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यदि आप विश्व में इस विषय पर उपलब्ध सामग्री को देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि बहुत से विशेषज्ञों ने पीने के पानी को क्लोरीन से उपचारित करने पर आपत्ति दर्ज की है। दुनिया भर मे इसकी चर्चा भी हो रही है। पर भारत मे कभी भी इस पर आम चर्चा नहीं हुयी। आज हमारे देश मे भ्रष्टाचार का जहर सब जगह फैल रहा है। जिन लोगों पर पानी को साफ रखने का जिम्मा है क्या वे अपना कार्य सही तरीके से निभा रहे हैं? कहीं कमीशन के नाम पर घटिया क्लोरीन तो नही मिलायी जा रही? क्या सही मात्रा मे क्लोरीन मिलायी जा रही है? क्या उन्हे पता है कि अधिक क्लोरीन जानलेवा भी बन सकती है? पिछले दिनों मै क्लोरीन मिलाने का कार्य करने वाले लोगो से मिला तो उनके विचार सुनकर ढंग रह गया। उन्हे तो पता ही नही है कि अधिक मात्रा मे क्लोरीन नुकसानदायक है। वे कहते है जितनी अधिक क्लोरीन उतना अधिक शुद्ध पानी। पूरे देश मे यही स्थिति है।

क्लोरीन के प्रयोग से विशेष प्रकार के सूक्ष्मजीव नष्ट होते है। दशकों से ऐसा माना जा रहा है। कहीं इसके नियमित प्रयोग से सूक्ष्मजीवो मे प्रतिरोध तो विकसित नहीं हो गया जैसा कि खेती के क्षेत्र मे हम देखते-सुनते रहते हैं? क्या क्लोरीन इन अधिक प्रतिरोधक क्षमता वाले सूक्ष्मजीवों को मार पा रहा है या फिर हम क्लोरीन भी पी रहे है सूक्ष्मजीवों के साथ?

पिछले दशकों मे स्वास्थ्य सुविधाओं मे जबरदस्त इजाफा हुआ है पर रोग और रोगी कम होने की बजाय बढ़ रहे हैं। आयोडीन वाले नमक का ही उदाहरण लें। पहले सबको आयोडीन युक्त नमक खिलाया और अब जिसे देखो थायराइड की समस्या हो रही है। आज थाइराइड की दवाओं का जबरदस्त बाजार बन गया है भारत। किसी ने ठीक ही कहा है पहले दर्द दिया फिर दवा की।

मै एक छोटे से किट की उम्मीद वैज्ञानिकों से करता हूँ जिससे कि आम आदमी चन्द मिनटों मे जान सके कि पानी पीने लायक है या नहीं। यदि नही है तो वह इस किट के आधार पर शिकायत दर्ज करा सके। पर यह किट बनायेगा कौन? एक कम्प्यूटर प्रोग्राम बनाना है तो ढेरो लोग मिलेंगे आपको इस देश में। कम्प्यूटर के सिवा किसी और विषय मे विशेषज्ञ मुश्किल से मिलेंगे। आगे स्थिति और भयावह होने वाली है। होशियार बच्चे मैनेजमेंट और आई.टी. मे ही जाना चाहते हैं। भूजल विज्ञान, वनस्पति विज्ञान जैसे विभाग सूने पडे हैं। कौन भूजल की चिंता करेगा? कौन वनस्पतियों को बचायेगा आने वाले दिनो में? फिर अपने देश के साधनो से पढकर विदेश चले जाना और वहाँ से देश के उत्थान की बात करने की गलत परम्परा चल पड़ी है।

जैसा पाठकों ने अपनी टिप्पणियों मे लिखा कि जल से जुडी समस्याओं का समाधान खोजना जरुरी है। यह आम आदमी के जीवन से जुड़ी समस्या है। खली पर लोगो का समय बर्बाद कर रहे टीवी चैनलो से इन समस्याओं पर पहल की उम्मीद बेमानी है। फिल्मी गाने मे मगन रेडियो चैनल की मदद भी नही मिल सकती। लेखक इस पर लिख कर अलख जगा सकते हैं। पर देश मे निष्पक्ष लेखकों का टोटा है। लेखक राजनीतिक पार्टियो की तरह खेमों मे बँटे है। वे केन्द्र की सरकार को दोषी बतायेंगे और जब सरकार बदलेगी तो विपक्ष के लेखक नयी सरकार को दोष देंगे। ये नही करेंगे समस्याओ का समाधान। गैर-सरकारी संगठनों के पास खुद का पैसा नही होता। जो पैसा देता है उसी का काम वे करते हैं। मुझे लगता है कि मुठ्ठी भर ही सही पर आम लोग ही यह कठिन कार्य कर सकने का बीड़ा उठा सकते हैं। आम लोगो को समस्या की विकरालता बताने की जरुरत है। उन्हे कुछ डराने की भी जरुरत है।

मै आपको नियमगिरि का उदाहरण देना चाहूंगा। यहाँ बाक्साइट का खनन होना है। जाहिर है जंगल बरबाद होंगे। लोगो ने खूब शोर मचाया पर असर नहीं हुआ फिर किसी विशेषज्ञ ने बताया कि इस पर्वत मे कई नदियों का उदगम है जो कि उडीसा और आन्ध्र प्रदेश की कई बड़ी नदियो मे जल के स्तर को बनाये रखती हैं। खनन से इन नदियों पर असर होगा। नदी पर असर मतलब पीने के पानी की कमी और फिर खेती के लिये पानी की कमी। आम लोगों और राजनेताओ के कान खड़े हो गये। इस सरल व्याख्या से वे भी खनन के विरोध मे आ खड़े हुये।

वनस्पतियो पर लिखते हुये मै पानी पर आ गया। यह तो ज्ञान जी का आशीर्वाद है कि पानी पर पिछली पोस्ट को उन्होने अच्छे से प्रस्तुत किया और मुझे एक और पोस्ट लिखने का साहस दिया। पाठको ने पिछले लेख को पसन्द किया। आशा है यह लेख भी आप लोगो को पसन्द आयेगा।

पंकज अवधिया

© लेख पर सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है।


क्लोरीन की अधिकता जल को अप्रिय बनाती है – यह अहसास मुझे था। पर वह हृदय रोग, केंसर और जल्दी बुढ़ाने की महामरियां प्रारम्भ करने में सक्षम है – यह मुझे नहीं ज्ञात था। वाराणसी में रेलवे अस्पताल के डॉक्टर कॉलोनी और मण्डल के अन्य स्टेशनों के जल के सेम्पल ले कर मेरे पास रिपोर्ट भेजते थे और यह प्रमाणित करने का प्रयास करते थे कि पेट के रोगों के मामले बढ़ने का मुख्य कारण क्लोरीनेशन का अभाव है। पर क्लोरीनेशन के कारण होने वाली समस्या पर उन्होने कभी ध्यान आकर्षित नहीं कराया।

यह पोस्ट मेरे अपने लिये एक न्यूज वैल्यू रखती है। मैं सामान्यत: यात्रा नहीं करता; पर कभी बरसात के महीने में यात्रा करते समय पानी की शुद्धता के लिये क्लोरीन टेबलेट/कंसंट्रेट ले कर चलने का विचार मन में अवश्य आया था। अब मैं दुबारा सोचूंगा। काफी समय तक टैप में जीरो-बी फिल्टर अटैचमेण्ट का प्रयोग किया था, जिसका कार्ट्रिज 10-12 महीने पर बदलते थे हम। अब तो घर में सादे दो कण्टेनर वाले फिल्टर का प्रयोग भर होता है, जिसके पोरस केण्डल समय समय पर साफ कर लेते हैं।


विक्तोर फ्रेंकल का साथी कैदियों को सम्बोधन – 2.



अपनी पुस्तक – MAN’S SEARCH FOR MEANING में विक्तोर फ्रेंकलसामुहिक साइकोथेरेपी की एक स्थिति का वर्णन करते हैं। यह उन्होने साथी 2500 नास्त्सी कंसंट्रेशन कैम्प के कैदियों को सम्बोधन में किया है। मैने पुस्तक के उस अंश के दो भाग कर उसके पहले भाग का अनुवाद कल प्रस्तुत किया था।

(आप कड़ी के लिये मेरी पिछली पोस्ट देखें)

यह है दूसरा और अंतिम भाग:


…..
पर मैने (अपने सम्बोधन में) केवल भविष्य और उसपर पसरे आवरण की ही चर्चा नहीं की। मैने भूतकाल की भी बात की। यह भी याद दिलाया कि भूतकाल की खुशियां अभी भी आज के अन्धेरे में हमें रोशनी दिखाती हैं। मैने एक कवि को भी उधृत किया – “आपने जो भी जिया है, धरती की कोई ताकत आपसे वह छीन नहीं सकती”। न केवल हमारे अनुभव; पर हमने जो कुछ भी किया है; जो भी उच्च विचार हमारे मन में आये हैं; वे समाप्त नहीं हो सकते। वह भले ही हमारे अतीत का हिस्सा हों; पर वह सब हमने इस विश्व में सृजित किया है और वह हमारी ठोस उपलब्धि है।

जब भी नैराश्य मुझे घेरता है, विक्तोर फ्रेंकल (1905-1997) की याद हो आती है. नात्सी यातना शिविरों में, जहां भविष्य तो क्या, अगले एक घण्टे के बारे में कैदी को पता नहीं होता था कि वह जीवित रहेगा या नहीं, विक्तोर फ्रेंकल ने प्रचण्ड आशावाद दिखाया. अपने साथी कैदियों को भी उन्होने जीवन की प्रेरणा दी. उनकी पुस्तक “मैंस सर्च फॉर मीनिंग” उनके जीवन काल में ही 90 लाख से अधिक प्रतियों में विश्व भर में प्रसार पा चुकी थी. यह पुस्तक उन्होने मात्र 9 दिनों में लिखी थी.

तब मैने यह चर्चा की कि जीवन के बारे में सार्थक अर्थों में सोचने से कितनी सम्भावनायें खुल जाती हैं। मैने साथियों को (जो चुपचाप सुन रहे थे, यद्यपि बीच में कोई आह या खांसी की आवाज सुनने में आती थी) बताया कि मानव जीवन, किसी भी दशा में, कभी निरर्थक नहीं हो जाता। और जीवन में अनंत अर्थ हैं। उन अर्थों में झेलना, भूख, अभाव और मृत्यु भी हैं। मैने उन निरीह लोगों से, जो मुझे अन्धेरे में पूरी तन्मयता से सुन रहे थे, अपनी स्थिति से गम्भीरता से रूबरू होने को कहा। वे आशा कदापि न छोड़ें। अपने साहस को निश्चयात्मक रूप से साथ मे रखें। इस जद्दोजहद की लम्बी और थकाऊ यात्रा में जीवन अपने अभिप्राय और अपनी गरिमा न खो दें। मैने उनसे कहा कि कठिन समय में कहीं कोई न कोई है – एक मित्र, एक पत्नी, कोई जिन्दा या मृत, या ईश्वर – जो हमारे बारे में सोच रहा है। और वह नहीं चाहेगा कि हम उसे निराश करें। वह पूरी आशा करेगा कि हम अपनी पीड़ा में भी गर्व से – दीनता से नहीं – जानें कि जिया और मरा कैसे जाता है।

और अंत में मैने हमारे सामुहिक त्याग की बात की। वह त्याग जो हममें से हर एक के लिये महत्वपूर्ण था।1 यह त्याग इस प्रकार का था जो सामान्य दशा में सामान्य लोगों के लिये कोई मायने नहीं रखता। पर हमारी हालत में हमारे त्याग का बहुत महत्व था। जो किसी धर्म में विश्वास रखते हैं, वे इसे सरलता से समझ सकते हैं। मैने अपने एक साथी के बारे में बताया। वे कैम्प में आने के बाद ईश्वर से एक समझौते (पेक्ट) के आधार पर चल रहे हैं। उस समझौते के अनुसार वे जो वेदना/पीड़ा और मौत यहां झेलेंगे, वह उस व्यक्ति को, जिससे वे प्यार करते हैं, वेदना और दुखद अंत से बचायेगी। इस साथी के लिये पीड़ा और मृत्यु का एक प्रयोजन था – एक मतलब। वह उनके लिये उत्कृष्टतम त्याग का प्रतिमान बन गयी थी। वे निरर्थक रूप से नहीं मरना चाहते थे। हममें से कोई नहीं चाहता।

मेरे शब्दों का आशय यह था कि हमें अपने जीवन का अभिप्राय, वहां, उसी कैम्प की झोंपड़ी की बदहाल अवस्था में, समझना और आत्मसात करना था। मैने देखा कि मेरा यत्न सार्थक रहा। मेरे बुझे-बुझे से मित्र धीरे-धीरे मेरी ओर आये और अश्रुपूरित नयनों से मुझे धन्यवाद देने लगे।

लेकिन मैं यह स्वीकारोक्ति करना चाहूंगा। वह एक विरल क्षण था, जब मैं आंतरिक शक्ति जुटा पाया। मैं अपने साथियों को चरम वेदना की दशा में सम्बोधित कर पाया। यह करना मैं पहले कई बार चूक गया था।


1. उस दिन सभी 2500 कुपोषित कैदियों को भोजन नहीं मिला था। एक भूख से व्याकुल कैदी द्वारा आलू चुराने के मामले में उस कैदी को अधिकारियों के हवाले करने की बजाय सबने यह सामुहिक दण्ड स्वीकार किया था। अन्यथा उस कैदी को सेंधमारी के अपराध में फांसी दे दी जाती।

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यह प्रकरण विदर्भ के किसानों की घोर निराशा और उससे उपजी आत्महत्याओं पर सोच से प्रारम्भ हुआ और यहां इस पोस्ट के साथ समाप्त हुआ। विदर्भ के किसानों की समस्या में आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और भौगोलिक पहलू होंगे। कई घटक होंगे उसके। पर यह पोस्टें तो मैने अपनी मानसिक हलचल के तहद बनाई हैं। विदर्भ समस्या पर कोई पाण्डित्य प्रदर्शन का ध्येय नहीं है।


विक्तोर फ्रेंकल का साथी कैदियों को सम्बोधन – 1.



अपनी पुस्तक – MAN’S SEARCH FOR MEANING में विक्तोर फ्रेंकलसामुहिक साइकोथेरेपी की एक स्थिति का वर्णन करते हैं। यह उन्होने साथी 2500 नास्त्सी कंसंट्रेशन कैम्प के कैदियों को सम्बोधन में किया है। मैं पुस्तक के उस अंश के दो भाग कर उसका अनुवाद दो दिन में आपके समक्ष प्रस्तुत करने जा रहा हूं।

(आप कड़ी के लिये मेरी पिछली पोस्ट देखें)

यह है पहला भाग:


वह एक बुरा दिन था। परेड में यह घोषणा हुई थी कि अबसे हम कैदियों के कई काम विध्वंसक कार्रवाई माने जायेंगे। और विध्वंसक माने जाने के कारण उनके लिये तुरंत फांसी की सजा मिला करेगी। इन आपराधिक कामों में अपने कम्बल से छोटे छोटे टुकड़े काट लेना (जो हम अपने घुटनों के सपोर्ट के लिये करते थे) जैसे छोटे कृत्य भी शामिल थे। बहुत हल्की चोरियां भी इन विध्वंसक कामों की सीमा में ले आयी गयी थीं।

कुछ दिन पहले एक भूख से व्याकुल कैदी ने स्टोर से कुछ पाउण्ड आलू चुराये थे। इसे पता चलने पर बड़ी गम्भीरता से लिया जा रहा था। चुराने वाले को सेंधमार की संज्ञा दी जा रही थी। अधिकारियों ने हम कैदियों को आदेश दिया था कि हम उस “सेंधमार” को उनके हवाले कर दें, अन्यथा हम सभी 2500 कैदियों को एक दिन का भोजन नहीं मिलेगा। और हम सभी 2500 ने एक दिन का उपवास करना बेहतर समझा था।

जब भी नैराश्य मुझे घेरता है, विक्तोर फ्रेंकल (1905-1997) की याद हो आती है. नात्सी यातना शिविरों में, जहां भविष्य तो क्या, अगले एक घण्टे के बारे में कैदी को पता नहीं होता था कि वह जीवित रहेगा या नहीं, विक्तोर फ्रेंकल ने प्रचण्ड आशावाद दिखाया. अपने साथी कैदियों को भी उन्होने जीवन की प्रेरणा दी. उनकी पुस्तक “मैंस सर्च फॉर मीनिंग” उनके जीवन काल में ही 90 लाख से अधिक प्रतियों में विश्व भर में प्रसार पा चुकी थी. यह पुस्तक उन्होने मात्र 9 दिनों में लिखी थी.

इस दिन शाम को हम सभी भूखे अपनी झोंपड़ियों में लेटे थे। निश्चय ही हम बड़ी मायूसी में थे। बहुत कम बातें हो रही थीं। हर आदमी चिड़चिड़ा हो रहा था। ऐसे में बिजली भी चली गयी। हम लोगों की चिड़चिड़ाहट और बढ़ गयी। पर हमारे सीनियर ब्लॉक के वार्डन बुद्धिमान आदमी थे। उन्होने एक छोटी सी टॉक में उन बातों को बताया जो हम सब के मन में चल रही थीं। उन्होने पिछले दिनों बीमारी या भूख से मरे साथियों की चर्चा भी की। लेकिन वे यह बताना नहीं भूले कि मौतों का असली कारण क्या था – वह था – जीने की आशा छोड़ बैठना। सीनियर ब्लॉक वार्डन ने कहा कि कोई न कोई तरीका होना चाहिये जिससे साथी लोग इस चरम अवस्था तक न पंहुंच जायें। और उन्होने इस बारे में मुझे कुछ सलाह देने का आग्रह किया।

भगवान जानता है कि मैं अपने साथियों को उनके आत्मिक स्वास्थ्य के लिए किसी मनोवैज्ञानिक स्पष्टीकरण या उपदेश युक्त सलाह देने हेतु कतई मूड में नहीं था। मैं सर्दी और भूख से परेशान था। मुझमें थकान और चिड़चिड़ाहट थी। पर मुझे अपने को इस अभूतपूर्व स्थिति के लिये तैयार करना ही था। आज उत्साह संचार की जितनी आवश्यकता थी, उतनी शायद पहले कभी नहीं थी।

अत: मैने छोटी छोटी सुविधाओं की चर्चा से अपनी बात प्रारम्भ की। मैने बताया कि योरोप की द्वितीय विश्वयुद्ध की छठी सर्दियों में भी हमारी दशा उतनी खराब नहीं थी, जितनी हम कल्पना कर सकते हैं। मैने कहा कि हम सब सोचने का यत्न करें कि अब तक हमें कौन कौन सी क्षति हुई है, जिसे भविष्य में रिकवर न किया जा सके। मैने यह अटकल लगाई कि बहुत से लोगों के मामले में यह बहुत कम होगी। हममें से जो भी जिन्दा थे, उनके पास आशा के बहुत से कारण थे। स्वास्थ्य, परिवार, खुशियां, व्यवसायिक योग्यता, सौभाग्य, समाज में स्थान – ये सब या तो अभी भी पाये जा सकते हैं या रिस्टोर किये जा सकते हैं। आखिर अभी हमारी हड्डियां सलामत हैं। और हम जो झेल चुके हैं, वह किसी न किसी रूप में हमारे लिये भविष्य में सम्पदा (एसेट) बन सकता है। फिर मैने नीत्शे को उधृत किया – “वह जो मुझे मार नहीं डालता, मुझे सक्षमतर बनाता है”।

आगे मैने भविष्य की बात की। मैने यह कहा कि निरपेक्ष रूप से देखें तो भविष्य निराशापूर्ण ही लगता है। हममें से हर एक अपने बच निकलने की न्यून सम्भावना का अन्दाज लगा सकता है। मेरे अनुसार, यद्यपि हमारे कैम्प में क्षय रोग की महामारी नहीं फैली थी, मैं अपने बच निकलने की सम्भावना बीस में से एक की मानता हूं। पर इसके बावजूद मैं आशा छोड़ कर हाथ खड़े कर देने की नहीं सोचता। क्योंकि कोई आदमी नहीं जानता कि भविष्य उसके लिये क्या लेकर आयेगा। वह यह भी नहीं जानता कि अगले घण्टे में क्या होगा। भले ही हम अगले महीनों में किसी सनसनीखेज सामरिक घटना की उम्मीद नहीं करते, पर (कैम्प के पुराने अनुभव के आधार पर) हमसे बेहतर कौन जानता है कि व्यक्ति (इण्डीवीजुअल) के स्तर पर बड़ी सम्भावनायें अचानक प्रकटित हो जाती हैं। उदाहरण के लिये हममें से कोई किसी अच्छे ग्रुप के साथ अचानक जोड़ दिया जा सकता है, जहां काम की स्थितियां कहीं बेहतर हों। और किसी कैदी के लिये तो यह सौभाग्य ही है।…..

(शेष भाग 2 में, कल)


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