बहुजन समाज पार्टी ने शिव जी का आशिर्वाद लिया


गौतम बुद्ध, अम्बेडकर, महामाया रोड/नगर/पार्क/क्रासिंग आदि का जमाना शायद पुराना हो गया है. वोट बैंक के गणित का तकाजा ऐसा हुआ कि बसपा ने शंकर जी का आशिर्वाद सेंक्शन करा लिया.

सवेरे घूमने जाती मेरी मां ने खबर दी कि शिव कुटी के एतिहासिक मन्दिर पर बहुजन समाज पार्टी का झण्डा फहरा रहा है. चित्र देखें:

(शिव कुटी में कोटेश्वर महादेव मंदिर का कंगूरा – आयत में बसपा का ध्वज)

शिव कुटी का कोटेश्वर महादेव का मन्दिर उस स्थान पर है जहां वनवास जाते समय भगवान राम ने गंगा पार कर शिवलिंग की स्थापना कर पूजा की थी. तुलसी ने उस विषय में लिखा है:

मुदित नहाइ किन्हि सिव सेवा। पूजि जथाबिधि तीरथ देवा।

राम का शिवलिंग का कोटेश्वर महादेव के रूप में पूजन उनके एक महत अभियान का संकल्प था.

अब जब कोटेश्वर महादेव के पुरी-पुजारी गण; मुफ्त में बंटे बाटी-चोखा और अन्य माल से तृप्त; बसपा का झण्डा शिव मन्दिर पर फहरा रहे हैं, तो समय बदला जानिये मित्रों! बहन जी ने सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की वकालत कर एक मुद्दा तो झटक ही लिया है. आगे, जैसी सरकार बनाने में जरूरत पड़े, राम मन्दिर बनाने का मुद्दा भी वे भजपा से हड़प लें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये. क्या पता टेण्ट में बैठे राम लला का परमानेण्ट निवास बनाने की निमित्त बसपा बन जाये।

कौन कहता है गिरगिट ही रंग बदल सकता है।
सियासी दलों को तबियत से निहारो यारों.

शिक्षा के क्षेत्र में देश बैक फुट पर है.


सन 2005 में विश्वबैंक ने पड़ताल की थी. उसमें पता चला था कि हमारे देश में 25% प्रतिशत प्राइमरी स्कूल के अध्यापक तो काम पर जाते ही नहीं हैं. बाकी, जो जाते हैं उनमें से आधे कुछ पढ़ाते ही नहीं हैं. तनख्वाह ये पूरी उठाते हैं. यह हालत सरकारी स्कूलों की है. आप यहां पढ़ सकते हैं इस पड़ताल के बारे में. ऐसा नहीं है कि सन 2005 के बाद हालत सुधर गये हों.

मेरे काम में शिक्षकों से वास्ता नहीं पड़ता. पर समाज में मैं अनेक स्कूली अध्यापकों को जानता हूं, जिनके पास विचित्र-विचित्र तर्क हैं स्कूलों में न जाने, न पढ़ाने और पूरी तनख्वाह का हकदार होने के. उनके सामान्य ज्ञान के स्तर पर भी तरस आता है. अच्छा है कि कुछ नहीं पढ़ाते. अज्ञान बांटने की बजाय स्कूल न जाना शायद बेहतर है!

उच्च शिक्षा का भी कोई बहुत अच्छा हाल नहीं है. सामान्य विश्वविद्यालयों को छोड़ दें, तकनीकी शिक्षा के स्तर भी को भी विश्वस्तरीय नहीं कहा जा सकता. द न्यू योर्कर में छपा यह लेख आंखें खोलने वाला है. भारत में 300 से ज्यादा विश्वविद्यालय हैं पर उनमें से केवल दो ही हैं जो विश्व में पहले 100 में स्थान पा सकें. इंफोसिस वाले महसूस करते हैं कि भारत में स्किल्ड मैनपावर की बड़ी किल्लत है. पिछले साल तेरह लाख आवेदकों में से केवल 2% ही उन्हें उपयुक्त मिलें. अमेरिकी मानक लें तो भारत में हर साल 170,000 ईंजीनियर ही पढ़ कर निकलते हैं, न कि 400,000 जिनका दावा किया जाता है. कुकुरमुत्ते की तरह विश्वविद्यालय और तकनीकी संस्थान खुल रहे हैं. उनकी गुणवत्ता का कोई ठिकाना नहीं है. आवश्यकता शायद 100-150 नये आईआईटी/आईआईएम/एआईआईएमएस और खोलने की है और खुल रहे हैं संत कूड़ादास मेमोरियल ईंजीनियरिंग/मेडीकल कॉलेज! उनमें तकनीकी अध्ययन की बुनियादी सुविधायें भी नहीं हैं!

छिद्रांवेषण या दोषदर्शन के पचड़े में फंसना उचित नहीं होगा. पर समाज को बांट कर शिक्षा के क्षेत्र में राजनीति चलाने की बजाय प्राईमरी-सेकेण्डरी-उच्च सभी स्तरों पर शिक्षा में गुणवत्ता और संख्या दोनो मानकों पर बेहतर काम की जरूरत है. वर्ना अर्थ व्यवस्था की आठ-दस प्रतिशत की वृद्धि दर जारी रख पाना कठिन होगा. एक तरफ बेरोजगारों की कतार लम्बी होती चली जायेगी और दूसरी तरफ कम्पनियों को काम लायक लोग नहीं मिलेंगे.

असली खुशी की दस कुंजियां


मैं रेलवे स्टेशन पर जीने वाले बच्चों पर किये गये एक सर्वेक्षण के आंकड़ों से माथापच्ची कर रहा था.

जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा चौंकाया; वह थी कि 68% बच्चे अपनी स्थिति से संतुष्ट थे. बुनियादी जरूरतों के अभाव, रोगों की बहुतायत, पुलीस का त्रास, भविष्य की अनिश्चितता आदि के बावजूद वे अगर संतुष्ट हो सकते हैं, तो प्रसन्नता का विषय उतना सरल नहीं, जितना हम लोग मान कर चलते हैं.

अचानक मुझे याद आया कि मैने प्रसन्नता के विषय में रीडर्स डायजेस्ट में एक लेख पढ़ा था जिसमें कलकत्ता के अभाव ग्रस्त वर्गों में प्रसन्नता का इंडेक्स ऊंचा पाया गया था. मैने उस लेख का पावरप्वाइंट भी तैयार किया था. कम्प्यूटर में वह मैने ढूंढा और रविवार का सदुपयोग उसका हिन्दीकरण करने में किया.

फिलहाल आप, असली खुशी की दस कुंजियां की फाइल का अवलोकन करें. इसके अध्ययन से कई मिथक दूर होते हैं. कहीं-कहीं यह लगता है कि इसमें क्या नयी बात है? पर पहले पहल जो बात सरल सी लगती है, वह मनन करने पर गूढ़ अर्थ वाली हो जाती है. धन किस सीमा तक प्रसन्नता दे सकता है; चाहत और बुद्धि का कितना रोल है; सुन्दरता और सामाजिकता क्यों महत्वपूर्ण हैं; विवाह, धर्म और परोपकार किस प्रकार प्रभावित करते हैं और बुढ़ापा कैसे अभिशाप नहीं है यह आप इस पॉवरप्वाइण्ट में पायेंगे:

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