बर्फी सोनकर और (सब्जी) मण्डी के बदलाव के भय

बर्फी सोनकर अपने अनुभव, नेटवर्क, सूचनाओं और इनट्यूशन की बदौलत इतना कमाते हैं, जितना कोई मध्य स्तर की कम्पनी का सीईओ कमाता होगा। उनका लड़का रंगीला, अभी सीखते हुये बतौर आढ़त एप्रेण्टिस, मजे से व्यवसाय करता है।


आजकल किसान आंदोलन के संदर्भ में सुनता हूं कि यह आंदोलन आढ़तियों द्वारा प्रायोजित है। और मुझे लगता भी है। अनाज मण्डी मैंने देखी नहीं। मेरे एक दो एकड़ में इतना अनाज होता ही नहीं कि मण्डी जाना पड़े। पर बतौर सब्जी क्रेता एक बार मण्डी अवश्य गया हूं। और वह अनुभव महत्वपूर्ण है।

सर्दियों का ही मौसम था। सन 2016 की जनवरी थी। नया नया ग्रामीण बना था और नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद एक एक दमड़ी संभल कर खर्च करने का सोच थी। किसी ने बताया कि अगर थोक में सब्जी खरीदी जाये तो बहुत सस्ती पड़ेगी। महराजगंज कस्बे के सभी सब्जी वाले कछवां सब्जी मण्डी से सवेरे सवेरे सब्जी खरीद कर लाते हैं और अपनी गुमटियों, ठेलों या फुटपाथ पर बेचते है।

मैं सीधे खरीदने के लिये कछवां सब्जी मण्डी गया। वहां व्यापारी मिले – बर्फ़ी सोनकर। उन्होने 25 साल पहले 200रु से सब्जी खरीद-बिक्री का थोक काम शुरू किया था। आज 2 लाख रोज का कारोबार (बकौल उनके) करते हैं। दो लाख का कारोबार अगर टर्नओवर भी मान लें (उन्होने यह स्पष्ट नहीं किया था कि यह उनका मुनाफा है या कुल काम का लेवल), तो उनकी आमदनी करीब तीस हजार रोज होगी। उनके आढ़त व्यवसाय का मूल आसपास (मुख्यत: गंगा किनारे के किरियात क्षेत्र) के व्यापक सब्जी उत्पादक किसानों से सही और आत्मीय तालमेल ही होगा।

बड़े अदब से मिले सोनकर जी। वैसा सत्कार किया, जैसे इलाके के सम्पन्न (?) ब्राह्मण का करते हैं। बार बार वे मुझे ‘गुरूजी’ का सम्बोधन दे रहे थे। गुरूजी विद्वान ब्राह्मण के लिये कहा जाने वाला शब्द है इस इलाके में। उन्होने मुझे अपने तख्त के पास एक कुर्सी पर बिठाया और चाय पिलाई। फिर अपने लड़के; रंगीला सोनकर को निर्देश दिया कि मण्डी से मेरी आवश्यकता अनुसार सब्जी खरीदवा दें। उनका तो ट्रकों माल आता जाता है। कई बार मण्डी को फिजिकली टच भी नहीं करता। “कलकत्ता साइड से आता है और वे उसे दाम के हिसाब से दिल्ली या और जगहों पर डायवर्ट कर देते हैं।’

मुझे बस 5-10 किलो आलू, मटर इत्यादि लेना था।

बर्फी सोनकर
उनसे बातचीत से मुझे लगा कि अपने पिता के सहायक की भूमिका के अलावा, रंगीला फुटकर काम में भी कछवां सब्जी मण्डी में 5-7 हजार रुपया रोज बना लेते होंगे। … इन्फ़ोसिस/टीसीएस छाप नौकरी ठेंगे पर। सॉफ्टवेयर से बेहतर है मटर और गोभी।

रंगीला हमको तो फुटकर खरीद के लिये उन जगहों से ले कर गुजरे जहां छोटे दुकानदार अपनी दैनिक जरूरत की खरीद कर रहे थे। मेरी जरूरत तो बर्फी और रंगीला सोनकर के स्तर की कत्तई नहीं थी। फिर भी रंगीला सोनकर हमारे साथ घूमे और उनके साथ होने से हमें सब्जी सस्ती – बहुत ही सस्ती मिली।

खैर, सब्जी खरीद का यह मॉडल सस्ता बहुत होने के बावजूद मेरे लिये व्यवहारिक नहीं था। साल में एक दो बार मिलने पर बर्फी और रंगीला हमें तवज्जो दे सकते थे; हफ्ते दर हफ्ते तो वह नहीं किया जा सकता। इसके अलावा हमारी थोड़ी सब्जी की जरूरत के लिये मण्डी तक दौड़ लगाना फायदे का सौदा नहीं। उसमें समय लगता है, कार का पेट्रोल का खर्चा भी सब्जी को उतना ही सस्ता या मंहगा बना देता है, जितना हम पास के महराजगंज में महेंदर की फुटपाथ की दुकान से खरीदते हैं।

कछवां सब्जी मण्डी का वह भाग जहां फुटकर दैनिक दुकानदार अपनी सब्जी खरीदते हैं।

कछवां सब्जी मण्डी में करीब 20 मिनट तक घूम कर रंगीला सोनकर से बातचीत हुई। वे अपने पिता बर्फ़ी सोनकर के व्यवसाय में हाथ बटाते हैं। उन्होने बताया कि सब्जी उनका पारिवारिक और पुश्तैनी व्यवसाय है। सब्जियां ट्रकों से कलकत्ता, दिल्ली, इलाहाबाद और बनारस जाती हैंं।

उनसे बातचीत से मुझे लगा कि अपने पिता के सहायक की भूमिका के अलावा, रंगीला फुटकर काम में भी कछवां सब्जी मण्डी में 5-7 हजार रुपया रोज बना लेते होंगे। … इन्फ़ोसिस/टीसीएस छाप नौकरी ठेंगे पर। सॉफ्टवेयर से बेहतर है मटर और गोभी।

रंगीला सोनकर

रंगीला सोनकर का मैने मोबाइल नम्बर लिया। यद्यपि भविष्य में कोई सम्पर्क नहीं किया तो कालांतर में वह खो गया। पर वह नौजवान अपने रोलोडेक्स में जोड़ने लायक था। और मित्र बनाने योग्य भी।

मण्डी व्यवस्था अगर सरकारी एक्ट के माध्यम से खड़बड़ा दी जाये तो कितना बड़ा भूचाल आयेगा?! वह भूचाल आजकल संसद द्वारा पारित बिलों की बदौलत अनाज मण्डी के भविष्य को लेकर आया है। अनाज के आढ़त के “बर्फी सोनकर” निश्चय ही बिलबिला रहे हैं। और अगर यह कहा जा रहा है कि किसान आंदोलन आढ़तिया प्रायोजित है तो अतिशयोक्ति नहीं।

कछवां मण्डी में मैंने एक घण्टा व्यतीत किया। जगह बड़ी थी, पर फिर भी बहुत से लोग और सामान वहां था। मैंने देखा तो नहीं है, पर जैसा पढ़ा है और वीडियो देखे हैं, फिश-मार्केट जैसा माहौल था।

वहां से चलते समय लग रहा था कि रेलवे की अफ़सरी की बजाय काश बर्फ़ी सोनकर की तरह सब्जी के आढ़त का काम किया होता!

बर्फी सोनकर अपने अनुभव, नेटवर्क, अपनी सूचनाओं और कुछ सीमा तक अपने इनट्यूशन की बदौलत इतना कमाते हैं, जितना कोई मध्य स्तर की कम्पनी का सीईओ कमाता होगा। उनका लड़का रंगीला, अभी उनसे सीखते आढ़त एप्रेण्टिस होने के बावजूद उतना कमाता होगा, जितना मैं रेल के विभागाध्यक्ष के रूप में तनख्वाह पाता था।

मण्डी व्यवस्था अगर सरकारी एक्ट के माध्यम से खड़बड़ा दी जाये तो कितना बड़ा भूचाल आयेगा?! वह भूचाल आजकल संसद द्वारा पारित बिलों की बदौलत अनाज मण्डी के भविष्य को लेकर आया है। अनाज के आढ़त के “बर्फी सोनकर” निश्चय ही बिलबिला रहे हैं। और अगर यह कहा जा रहा है कि किसान आंदोलन आढ़तिया प्रायोजित है तो अतिशयोक्ति नहीं।

देर सबेर होगा क्या? तकनीक सब्जी और अनाज के व्यवसाय में उसी तरह पैठ बनायेगी जिस तरह ओला और उबर या डोमिनो पित्जा या स्विग्गी और जोमैटो की गिग इकॉनॉमी पूरे बाजार के समीकरण पलट दे रही है! सिंघू बॉर्डर की पांय पांय उसे रोक नहीं पायेगी। बर्फी सोनकर, भले ही कछवां मण्डी के अपने तख्त पर बैठ कर बिजनेस करें या अपने घर पर; उनके आसपास स्मार्टफोन, वेब ब्राउजर, एप्प आदि जरूर आ जायेगे। ज्यादा बड़े स्तर पर बनें तो शायद वे कमॉडिटी ऑनलाइन एक्स्चेंज की तरह “बर्फीवेज पोर्टल” जैसा कोई प्लेटफार्म बना लें – अमेजन, मंत्रा स्टाइल में। 🙂

commodityonline

पर बाजार का स्टाइल तो बदलने वाला ही है। एआई (आर्टीफीशियल इण्टेलिजेंस) पैठ करेगी अनाज और सब्जी के थोक बाजार में भी और कंवेंशनल आढ़तिये का तख्ता हिलेगा ही। अभी देखता हूं तो कमॉडिटी ऑन लाइन पर गोभी की भी खरीद बिक्री हो रही है! एमसीएक्स पोर्टल भी एग्री कमॉडिटी को डील करने का सेक्शन बना रहा है और हिंदी में भी वेब पेज निर्माणाधीन है। समय बदल रहा है।

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अनाज व्यापार पांच दस साल में बहुत बदलेगा। बहुत खड़बड़ाहट होगी। कई उखड़ेंगे और कई आयेंगे, नये कई जमेंगे। अभी जो मंथन चल रहा है देश में, वह ट्रेलर है।

युवाल नोवा हरारी को पढ़ा, सुना जाये! 😆


कोरोना के बाद बेहतर समय आयेगा? – रीता पाण्डेय

वाह कोरोना! वाह लॉकडाउन! इनके चक्कर में भूले बिसरे लोग-रिश्ते जुड़ रहे हैं। न आदमी घर में बन्द होता, न अतीत की याद करता और न बचपन के सम्बन्ध खोजता।


आज रीता पाण्डेय ने लिखा, पढ़िये उनकी अतिथि-पोस्ट :-


आज दोपहर में एक फ़ोन आया। बड़े प्यार से पूछा – बेबी दीदी?

मैं अचकचा गयी। आवाज पहचान में नहीं आ रही थी। उसने हंस कर कहा – अन्दाज लगाइये। हम पड़ोस में रहते थे। मैं कोई अन्दाज न लगा सकी तो अन्त में उसने ही समाधान किया – मैं मुन्ना बोल रहा हूं।

मैं दंग रह गयी। तीन-चार दशकों बाद उसकी आवाज सुन रही थी। आश्चर्य की बात थी कि कैसे उसे मेरा मोबाइल नम्बर मिला? उसी ने बताया कि आज उसने गुड्डू भईया, टुन्नू भईया (मेरे भाई। एक बन्गलोर में रहता है, दूसरा बनारस/गांव में) आदि से भी बात की।

वाह कोरोना! वाह लॉकडाउन! इनके चक्कर में भूले बिसरे लोग-रिश्ते जुड़ रहे हैं। न आदमी घर में बन्द होता, न अतीत की याद करता और न बचपन के सम्बन्ध खोजता।


मुन्ना का परिवार मेरे बचपन की स्मृतियों से जुड़ा है। मारवाड़िन आण्टी बनारस कैण्ट में हम लोगों की पड़ोसी थीं। हमारा पूर्वांचल का गांव से आ कर वाराणसी में बसने वाला परिवार था। वे लोग मारवाड़ी थे और मारवाड़ी अपने व्यवसाय के चक्कर में किसी तरह बनारस में आये और बस गये थे। हम दोनों परिवारों की आर्थिक स्थिति एक सी थी और एक दूसरे के रहन सहन से बहुत कुछ सीखते थे हम। एक दूसरे की किचन से बहुत कुछ आदान प्रदान होता था। हम दोनों परिवार किराये के मकान में थे। कालान्तर में अपने अपने रास्ते चले गये और सम्पर्क धीरे धीरे खत्म हो गये।

मुन्ना उन आंटी जी का लड़का है।

आज मुन्ना का वह सम्पर्क रिवाइव करना बहुत भला लगा।


कुछ दिनों पहले तक आदमी रेस में लगा था। किसी को किसी से बात करने की फ़ुर्सत नहीं थी। घर में आराम से बैठा आदमी बड़ी हेय दृष्टि से देखा जाता था। समृद्धि और सम्पन्नता के लिये लोग गांव से शहर और शहर से परदेस की दौड़ लगा रहे थे। रोजगार और व्यवसाय इन्ही जगहों पर केन्द्रित हैं।

अब मन में सपने उठते हैं कि क्या सरकार उद्योगों को विकेन्द्रित कर सकेगी या करेगी? क्या उत्तर-कोरोना युग में गृह उद्योग को बढ़ावा मिलेगा?

कल रात 9 बजे रीता पाण्डेय ने दिए जलाये।

सालों पहले जब बिजली गांव गांव पंहुच गयी तो गुजरात जैसे राज्य में छोटे छोटे उद्योग धन्धे गांव में पंहुच गये। मसलन हीरे तराशने, कपड़े की रंगाई/छपाई जैसे काम।

स्विस विण्टेज घड़ी

सुनने में आता है कि स्विस घड़ियों की कोई बड़ी फेक्टरी नहीं है। उसके कलपुर्जे पूरे देश में बनते हैं। और असेम्बल हो कर पूरे विश्व में वहां की घड़ियों का डंका बजाते हैं। गिग अर्थव्यवस्था में स्विग्गी और जोमेटो इसी पद्धति पर काम करते हुये घर की किचन को पूरे बाजर तक ले जा सकते हैं।

आजकल घर में बैठे बैठे आगे आने वाले युग के लिये सपने देखने का बहुत अवसर मिलता है। मन में आस जगती है। शायद मोदी जी ऐसा कुछ करने कराने की दिशा में चलें और देश को चलायें। पिछले महीनों में बहुत कुछ अभूतपूर्व हुआ है। धारा 370 का सरलता से हटना और राममन्दिर बनने का मार्ग प्रशस्त होना तो कोई सोच भी नहीं सकता था। अब सपने देखने और उनके फ़लीभूत होने की आस पहले से कहीं ज्यादा प्रबल है। उत्तर-कोरोना युग और अच्छा, और शानदार होगा; ऐसा सपना देखने में कोई बुराई नहीं।

सपने सच होंगे, यह आस रखी जाये।