नजीर मियाँ की खिचड़ी – रीपोस्ट

नजीर मियां का पूरा परिवार आम की रखवाली में लगा रहता था। जब आम का सीजन नहीं होता था तब वह साड़ियां बुनता था। औरतें धागे रंगती, सुखाती और चरखी पर चढ़ाती थीं। फिर आदमी लोग उसे करघे पर चढ़ा कर ताना-बाना तैयार करते।


यह मेरी पुरानी पोस्ट है। मेरे पति ने छब्बीस जनवरी 2008 को पोस्ट की थी। तब यह ब्लॉग ब्लॉगस्पॉट पर था। वे इसे अतिथि पोस्ट के रूप में टाइप किया और पब्लिश किया करते थे। ब्लॉग पर मेरी यह पहली पोस्ट है।

तब से तेरह साल होने को आये। और यह पोस्ट तो मेरी बचपन की यादों की है। जब इसे लिखा, तब से भी चार-पांच दशक पहले की बात है नजीर मियाँ की खिचड़ी चोरी-छिपे खाई थी!


मेरे पति को खिचड़ी बहुत पसंद है। या यूं कहें तो उन्हें खिचड़ी की चर्चा करना बहुत अच्छा लगता है। ऐसी किसी चर्चा पर मुझे नजीर मियां की खिचड़ी की याद आ गयी और उससे जुड़ी बचपन की बहुत सी यादें बादलों की तरह मन में घुमड़ने लगीं।

नजीर मियां मेरे ननिहाल गंगापुर में एक जुलाहा परिवार के थे। गंगापुर बनारस से १५ किलोमीटर दूर इलाहाबाद की ओर जीटी रोड से थोड़ा हट कर है। मेरा बचपन अपनी नानी के साथ बीता है। सो मैं गंगापुर में बहुत रहती थी।

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नजीर मियां मेरे नाना के लंगड़ा आम के बाग का सीजन का ठेका लेते थे। उनका पूरा परिवार आम की रखवाली के काम में लगा रहता था। जब आम का सीजन नहीं होता था तब नजीर मियां और उनका परिवार साड़ियां बुनता था। औरतें धागे रंगती, सुखाती और चरखी पर चढ़ाती थीं। फिर आदमी लोग उसे करघे पर चढ़ा कर ताना-बाना तैयार करते। बच्चे उनकी मदद करते। चार-पांच करघों पर एक साथ साड़ियां बुनते देखना और करघों की खटर-पटर संगीतमय लगती थी।

जब आम के बौर लगते थे तो बाग का सौदा तय होता था। लगभग ४०० रुपये और दो सैंकड़ा आम पर। नजीर मियां का पूरा परिवार रात में बाग में सोता था। औरतें रात का खाना बना कर घर से ले जाती थीं। उसमें होती थीं मोटी-मोटी रोटियां, लहसुन मिर्च की चटनी और मिर्च मसालों से लाल हुई आलू की सब्जी। दिन में बाग में रहने वाले एक दो आदमी वहीं ईटों का चूल्हा बना, सूखी लकड़ियां बीन, मिट्टी की हांड़ी में खिचड़ी बना लेते थे।

खिचड़ी की सुगंध हम बच्चों को चूल्हे तक खींच लाती थी। पत्तल पर मुन्नू मामा तो अक्सर खिचड़ी खाया करता था। एक आध बार मैने भी स्वाद लिया। पर मुझे सख्त हिदायत के साथ खिचड़ी मिलती थी कि यह दारोगाजी (मेरे नाना – जो पुलीस में अफसर हो गये थे, पर दारोगा ही कहे जाते थे) को पता नहीं चलना चाहिये।

और कभी पता चलता भी नहीं दारोगा जी को; पर एक दिन मेरी और मुन्नू में लड़ाई हो गयी। मुन्नू के मैने बड़े ढ़ेले से मार दिया। घर लौटने पर मुन्नू ने मेरी नानी से शिकायत कर दी। मारने की नहीं। इस बात की कि “चाची बेबी ने नजीर मियां की हंडिया से खिचड़ी खाई है”।

बाप रे बाप! कोहराम मच गया। नानी ने मेरी चोटी पकड़ कर खींचा। दो झापड़ लगाये। और खींच कर आंगन में गड़े हैण्ड पम्प के नीचे मुझे पटक दिया। धाड़ धाड़ कर हैण्ड पम्प चलाने लगीं मुझे नहला कर शुद्ध करने के लिये। चारों तरफ से कई आवाजें आने लगीं – “ननिहाल मे रह कर लड़की बह गयी है। नाक कटवा देगी। इसको तो वापस इसके मां के हवाले कर दो। नहीं तो ससुराल जाने लायक भी नहीं रहेगी!” दूसरी तरफ एक और तूफान खड़ा हुआ। बड़ी नानी मुन्नू मामा को ड़ण्डे से पीटने लगीं – “ये करियवा ही ले कर गया होगा। कलुआ खुद तो आवारा है ही, सब को आवारा कर देगा।“ मुन्नू मामा के दहाड़ दहाड़ कर रोने से घर के बाहर से नानाजी लोग अंदर आये और बीच बचाव किया। पुरुषों के अनुसार तो यह अपराध था ही नहीं।

नजीर के पिताजी, हाजी मियां सम्मानित व्यक्ति थे। हमारे घर में उठना-बैठना था। रात का तूफान रात में ही समाप्त हो गया।

मेरे पास लूडो था और मुन्नू के पास कंचे। सो दोस्ती होने में देर नहीं लगी। अगले ही दिन शाम को हम फिर नजीर मियां के पास बाग में थे। उनकी मोटी रोटी और लहसुन की चटनी की ओर ललचाती नजरों से देखते। … क्या बतायें नजीर मियां की खिचड़ी और लहसुन की चटनी की गंध तो अब भी मन में बसी है।

नजीर मियां ने शिफ़ान की दो साड़ियां मुझे बुन कर दी थीं। उसमें से एक मेरी लड़की वाणी उड़ा ले गयी। एक मेरे पास है। नजीर मियां इस दुनियां में नहीं हैं; पर उनकी बुनी साड़ी और खिचड़ी का स्वाद मन में जरूर है।


मेरे पति (ज्ञान दत्त पाण्डेय) ने सन 2008 में पोस्ट के फुट नोट में लिखा था –

गांवों में धर्म-जातिगत दीवारें थी और हैं। पर व्यक्ति की अपनी सज्जनता सब पर भारी पड़ती है। और बच्चे तो यह भेद मानते नहीं; अगर उन्हें बारबार मार-पीट कर फण्डामेण्टलिस्ट न बनाया जाये। अच्छा था कि रीता के नाना लोगों में धर्म भेद कट्टर नहीं था। तब से अब तक और भी परिवर्तन हुआ होगा।

हां, अब मुन्नू मामा भी नहीं हैं। दो साल पहले उनका असामयिक निधन हो गया था। रीता तब बहुत दुखी थी। इस पोस्ट से पता चलता है कि कितना गहरा रहा होगा वह दुख।


पद्मजा पाण्डेय के नये साल के ग्रीटिंग्स

इसमें चीनी पाण्डेय ने बहुत कुछ सीखा। अपने रोज के मिलने वाले, घर में काम करने वालों और आसपड़ोस के बच्चों से जुड़ाव सीखना एक सही बात है! गांव की समझ उससे मजबूत होती है।


पद्मजा (चीनी, चिन्ना) बहुत दिनोंं से कह रही थी नये साल को मनाने के लिये। स्कूल बंद होने से बच्चे को कोई नया करने को चाहिये। तब मैंने चीनी के साथ सोचा कि ग्रीटिंग कार्ड बनाये जायें। जब मेरे बच्चे छोटे थे तब यह सब मैं खाली समय में उनके साथ करती थी। ढाई तीन दशक बाद अब फिर मन हुआ वही सब करने के लिये अपनी पोती के साथ।

ग्रीटिंग कार्ड

महराजगंज के दुकान वाले सज्जन ने ग्रीटिंग कार्ड के बारे में पूछने पर कहा – आजकल ग्रीटिंग कौन खरीदता है मैडम ह्वाट्सएप्प के जमाने में!

स्कूल नहीं चल रहे तो दुकान में बच्चों के लिये चार्ट पेपर भी मिलना कठिन था, पर उनकी दुकान पर मोटा कागज पड़ा मिल गया। इतना मोटा भी नहीं था, पर कामचलाऊ तो था ही। दुकानदार को मैंने बताया कि घर पर ही पोती को सिखायेंगे ग्रीटिंग कार्ड बनाना।


पद्मजा के बारे में अन्य पोस्टें –

  1. स्कूल बंद हैं तो घर में ही खोला एक बच्चे के लिये स्कूल
  2. पद्मजा के नये प्रयोग
  3. चीनी पाण्डेय ने बनाई चिड़िया की कहानी
  4. कोविड19 लॉकडाउन काल में चिन्ना पांड़े – रीता पाण्डेय
  5. चिन्ना पांड़े, लॉयन और मटर पनीर
  6. पद्मजा पान्दे, चूनी धईके तान्दे…

मोटा पेपर देख कर चिन्ना बहुत उत्साहित हुई। उसने कहा कि ग्रीटिंग कार्ड बनाने हैं और वाल हेंगिंग भी। कितने बनाने हैं उसकी गिनती होने लगी। एक एक बच्चे को ग्रीटिंग कार्ड देने में संख्या बहुत बड़ी हो रही थी। इसलिये यह तय किया गया कि एक परिवार को एक कार्ड और एक चाकलेट दिया जायेगा। उसमें उस परिवार के सारे बच्चे कवर हो जायेंगे।

वाल हैंगिंग

अपनी बिटिया के साथ तो मैं सुतली की वाल हैंगिंग, रुमाल में कढ़ाई, गुड़िया बनाना, साइंस की वर्कबुक में चित्र बनाना और तरह तरह के अन्य प्रॉजेक्ट्स में व्यस्त रहती थी। ड्राइंग और क्राफ्ट उनकी पढ़ाई का जरूरी हिस्सा हुआ करता था। अब पता नहीं स्कूलों में इस तरह के क्लास हुआ करते हैं या नहीं। चिन्ना के साथ साथ आगे पता चलेगा। आखिर, बच्चों के पूरे विकास के लिये हर तरह की क्रियेटिविटी तो बहुत जरूरी है।

ड्राइवर अशोक को ग्रीटिंग देती पद्मजा

इस साल चिन्ना स्कूल बंद होने के कारण अपने बाबा के साथ घर के बगीचे में घूम घूम कर साइंस और भूगोल की जानकारी लेती रहती है। घर के पेड पौधों, जीवों, सूरज के सवेरे से शाम तक घूमने और रात में चांद तारों की पोजीशन देखने परखने से उसे बहुत कुछ समझ आ रहा है। पर यह क्राफ्ट वाली रचनात्मकता भी मेरे ख्याल से जरूरी है।

ग्रीटिंग आदान प्रदान के बाद नीलम आण्टी (पतली वाली) और कुसुम आण्टी के साथ पद्मजा । नीलम और कुसुम घर में काम करती हैं।

मेरा नाती, विवस्वान तो अब छठी कक्षा में है। वह तबला बजाना, स्केच और पेण्टिंग करना सीख चुका है। आजकल कोडिंग सीख कर एप्प बनाने लगा है। चिन्ना को भी वह सब या उसी तरह की अपनी रुचि के मुताबिक करना है। इसकी डांस में रुचि है। गांव में उसे नृत्य कैसे सिखाया जा सकता है, अभी समझ नहीं आ रहा। वह कप्यूटर पर अपने बाबा के साथ पावरप्वाइण्ट बना कर अपनी बात समझाने की कला सीख गयी है। कभी लगता है वह अच्छी टीचर बनेगी।

पेपर वाले अंकल को ग्रीटिंग देते समय पद्मजा। अखबार वाले अपने साथ सेल्फी ले रहे थे चिन्ना की!

फिलहाल हम लोगों ने ग्रीटिंग्स और वाल हैंगिंग बनाये। इसमें चीनी पाण्डेय ने बहुत कुछ सीखा। अपने रोज के मिलने वाले और घर में काम करने वालों से पारिवारिक जुड़ाव सीखना एक सही बात है! गांव की समझ उससे मजबूत होती है।

उसके अलावा आस पड़ोस के बच्चे भी आये जिनको ग्रीटिंग कार्ड में ज्यादा रुचि नहीं थी, पर जो चिन्ना की दी चॉकलेट, घर के परिसर में खेलने और झूले पर बैठने-झूलने तथा चिन्ना की साइकिल चलाने में ज्यादा उत्साहित थे। वे दिन भर आते रहे और चीनी हो भी सामाजिक व्यवहार करने के अवसर मिले। हम लोग बच्चों के शोर से ऊब गये पर चिन्ना नहीं!

और यह सब तुच्छ से कागज पर कलर पेंसिल से कुछ उकेर कर ग्रीटिंग कार्ड बनने से हो पाया।


चिड़िया का घोंसला बनाम आदमी का घर

कई दिन हो गये हैं; पर रॉबिन उस चिड़ियाघर को झांकने भी नहीं आयी। अब शायद अगले साल ही लौटने की सोचे।


सुबह की चाय पौने छ बजे बरामदे में रख दी गयी। एक ट्रे में चाय का थर्मस और चार कप। साथ में बिस्कुट का एक डिब्बा। यह चाय हमारा सवेरे का रुटीन होता है। बरामदे से उगता सूरज और उसके साथ प्रकृति कि गतिविधियां देखी जाती हैं।

चिड़िया घर से झांकती रॉबिन

पर उस रोज लगा कि कुछ खालीपन है। रॉबिन पक्षी के जोड़े ने हमारे लटकाये चिड़िया-घर में घोंसला बनाया था। उसमें उसके नवजात बच्चे आवाज किया करते थे। रॉबिन दम्पति घोंसले में तेजी से आते जाते थे और बच्चों के लिये खाना लाते थे। उस दिन लगा कि घोंसले में सन्नाटा है।

एक दिन पहले तक रॉबिन की आवाजाही इतनी ज्यादा थी कि उनपर बरबस ध्यान चला जाता था। चिड़िया घर में झांक कर देखने पर उसके बच्चे बड़े दिख रहे थे। पिछली साल भी ऐसा ही था; पर एक दिन बच्चे झांकते हुये नीचे फर्श पर टपक कर मर गये थे। उनके मर जाने से कई दिन हम सब का मन बड़ा उदास रहा था। ऐसा लग रहा था कि आगे शायद कोई चिड़िया इसमें घरोंदा बनायेगी ही नहीं। पर इस साल दोबारा उसके आने से हमारी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा!

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चीनी पाण्डेय ने बनाई चिड़िया की कहानी

“उस बाग में ढेरों चिड़ियाँ रहती थीं। वहीं एक पेड़ पर बुलबुल भी रहती थी। वह सुनहरे रंग की थी। दिन में वह अकेली रहती थी। उसके माता पिता दूर कहीं काम पर जाते थे …”


आज मैं कॉपी कलम ले कर लिखने की कोशिश कर रही थी कि मेरी पोती चीनी ने आ कर कहा – दादी, आप एक चिड़िया की कहानी लिखिये।

चीनी (पद्मजा पाण्डेय), सवेरे बगीचे में घूमते हुये।

मैंने कहा – आप बताओ, तो लिख देती हूं। तो चीनी ने एक कहानी सुनाई।

एक बहुत सुंदर बाग था। उसमें बहुत सुंदर सुंदर फूल लगे थे। कई फलों के पेड़ भी थे। आम, अनार, अमरूद और सेव। और भी बहुत सारे। उस बाग में ढेरों चिड़ियाँ रहती थीं। वहीं एक पेड़ पर बुलबुल भी रहती थी। वह सुनहरे रंग की थी। दिन में वह अकेली रहती थी। उसके माता पिता दूर कहीं काम पर जाते थे और शाम के समय उसके लिये ढेर सारा खाना ले कर आते थे।

एक शाम उसके माता पिता नहीं लौटे। सुनहरी बुलबुल बहुत परेशान थी। उसे बहुत दुख हो रहा था। अंधेरा होने पर भी उसके माता पिता नहीं लौटे। सारे पक्षी सुनहरी बुलबुल के पास बैठे थे। सारे पेड़ भी सुनहरी बुलबुल को समझा रहे थे कि शायद किसी काम में फंस गये होंगे माता पिता।

सुनहरी बुलबुल रोने लगी और रोते रोते सो गयी।

सुबह उसने देखा कि उसके मम्मी-पापा जल्दी जल्दी आ रहे हैं। उन्होने बताया कि बेटा हम तो शाम के समय घर आ रहे थे तो हम पर एक लड़के ने पत्थर मार दिया। तुम्हारी मम्मी के पंख में चोट लग गयी। इस लिये हम रात एक जामुन के पेड़ पर बैठ गये। सुबह तक चोट थोड़ी थोड़ी ठीक होने पर जल्दी जल्दी तुम्हारे पास लौटे हैं।

घर में घोंसला बनाये ग्रेट इण्डियन रॉबिन। अपने चूजों के लिये भोजन ले कर आती हुई।

कहानी सुनाने के बाद चीनी ने कहा – दादी, पक्षियों को नहीं मारना चाहिये, न?

यह कह कर वह अपने खेल मेंं लग गयी। मैने उसकी कही कहानी को कागज पर हूबहू उतार दिया। चीनी (पद्मजा पाण्डेय) छ साल की है। आजकल कोरोना काल में छुट्टियां हैं। वह घर में और पेड़-पौधों के बीच अकेली घूमती है। घूमते चिड़ियों को देखती है। कई जोड़ा बुलबुल भी हैं घर की चिड़ियों में। घर में एक इण्डियन रॉबिन दम्पति ने घोंसला बनाया है चीनी के लटकाये चिड़िया “घर” में।

चिड़िया का घोंसला, जिसे चीनी बार बार निहारती है।

यह सब देखती-घूमती वह कहानी भी बुन लेती है। कहानी कुछ कल्पना और कुछ परिवेश को देखने परखने से उपजती है।


नई पौध के लिये नर्सरी तो जाना ही है! #गांवकाचिठ्ठा

नर्सरी जा कर कुछ मोगरे के पौधे तो लाने ही हैं। यूं, कोरोना काल में बाहर निकलने का खतरा तो है। … पर सावधानी से डर को किनारे करते चलना है।


बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं। विषय की कमी हो, ऐसा तो कतई नहीं है। समय की कमी का तो प्रश्न ही नहीं है। बस, तारतम्य नहीं बना। पिछली पोस्ट 14 मई को लिखी थी, आज डेढ़ महीने बाद लिख रही हूं। इस बीच मेरे पति की पोस्टें (लगभग) आती रही हैं।

कोरोना संक्रमण गांव में चारों ओर से घेरने लगा है। आरोग्य सेतु पर पांच किलोमीटर के इलाके में तो कोरोना का कोई मरीज नहीं दिखता, पर पांच से दस किलोमीटर की परिधि में 4-5 मामले नजर में आते हैं। जो समस्या अभी बड़े शहरों में थी, और हम कहते थे कि यह बड़े जगहों की बीमारी है, वह अब गांव की तरफ न केवल आ रही है बल्कि तेजी से फैल रही है। इसके साथ साथ दिनचर्या भी, पहले की ही तरह सामान्य करने की कवायद भी चल रही है। बार बार, बहुत से लोग कह रहे हैं कि हमें इसके साथ जीने की आदत डाल लेनी चाहिये।

गांव में घर
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