संसाधनों की कमी से जूझते अगियाबीर के पुरातत्वविद

खुदाई अगर साधनों की कमी के कारण टलती रही तो बहुत देर नहीं लगेगी – बड़ी तेजी से खनन माफिया टीले की मिट्टी के साथ साथ सिंधु घाटी के समान्तर और समकालीन नगरीय सभ्यता मिलने की सम्भावनायें नष्ट कर जायेगा।


22 अप्रेल 2018 को फेसबुक नोट्स पर लिखी पोस्ट:-

अंगरेजों के समय में पुरातत्व अध्ययन में ईमानदारी थी, पर उनके ध्येय (शायद) भारतीय विरासत को योरोप से जोड़ने और/या उसे योरोपीय सभ्यता का कनिष्ठ अंग प्रमाणित करने के थे। आर्यों के योरोप से भारत में आगमन और सिंधु घाटी से गंगा घाटी में पलायन का सिद्धांत उसी का परिणाम प्रतीत होता है, जिसे हमारे साम्यवादी और समाजवादी/सेकुलर अभी भी गाते हैं। इससे सोच से आर्यावर्त की महत्ता कमतर होती है। और साम्यवादी वैसा ही चाहते हैं। उनकी निष्ठा देश से इतर है।


22 अप्रेल 2018 को फेसबुक नोट्स पर लिखी यह पोस्ट अब फेसबुक की नोट्स को गायब कर देने की नीति के कारण वहां से विलुप्त हो गयी है। अत: मेरे पास उसे और उस जैसी कई अन्य पोस्टों को खंगाल कर ब्लॉग पर संजोने के सिवाय कोई विकल्प नहीं बचा।

अगियाबीर विषयक कई पोस्टें इस ब्लॉग पर हैं और कुछ और आने वाली हैं, फेसबुक की नोट्स को समाप्त कर देने की नीति के कारण।

उनमें से कुछ पोस्टें पुरातत्व (आर्कियॉलॉजी) सम्बंधित हैं। सभी पोस्टें संजोने के बाद एक लिस्ट बनाऊंगा उनको तरतीबवार देखने के लिये। इसके अलावा ट्विटर पर भी कई ट्वीट्स हैं सन 2018 की अगियाबीर की खुदाई पर। वह सब भी एकाग्र करना एक बड़ा काम है! जो होगा, भविष्य में देखा जायेगा।


स्वतन्त्रता के बाद हमारी सरकारों को (पुन: मैं जोड़ूंगा शायद, चूंकि मैं अपने को पुरातत्व वालों की जमात का होने की स्वघोषणा नहीं कर सकता) सिंधु घाटी सभ्यता के क्षरण के बाद वहां से अर्बन लोगों का मध्य गंगा के स्थानों में पलायन की अटकल की बात को असत्य प्रमाणित करने के लिये मध्य गंगा क्षेत्र में जहां भी पुरातात्विक शोध सम्भव था, वहां त्वरित गति से खोज कराना होना चाहिये था।

जितना मैने पढ़ा है, उसके अनुसार लगता है कि हरप्पा के शिव और काशी के शिव में काल का अन्तराल नहीं है। काशी में उसी स्थल पर उत्तरोत्तर सभ्यतायें बसती गयी हैं। आज भी वह जीवन्त शहर है। अत: वहां हरप्पा की तरह का खनन सम्भव ही नहीं। अन्यथा सिंधु और गंगा की सभ्यतायें समान्तर रही होंगी। अन्तर अगर रहा होगा तो कृषि पर निर्भरता के स्तर का अन्तर रहा होगा।

उस समय अगर हरप्पा में गैंड़ा हुआ करता था तो वह सरयूपार के सोहगौरा और लहुरादेवा में भी था। चावल की खेती करना अपने आप में एक पर्याप्त विकसित मस्तिष्क के बल पर ही सम्भव है और गंगा घाटी में 8000बीसीई में चावल की खेती हुआ करती थी। शायद हरप्पा के समकालीन; मेरे घर के समीप के अगियाबीर में भी क्वासी-अर्बन सभ्यता रही हो! पर उसके लिये साधन सम्पन्न तरीके से पुरातत्वीय खनन तो हो!

स्वतन्त्रता के शुरुआती समय में आर्कियॉलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया को संसाधन प्रचुर मात्रा में मिले भी – ऐसा मेरे पढ़ने में आया है। मौलिक शोध के लिये विश्वविद्यालयों को भी संसाधन मुहैया हुये। भारत में कई स्थानों पर पुरातत्विक खनन हुये। पर कालान्तर में, कभी न कभी, सरकार को लगा होगा कि विरासत संजोने का काम पर्याप्त हो चुका है। उसके बाद सरकारें पुरातत्व खनन की बजाय मनरेगा छाप खनन/निर्माण की विकृतियों में लिप्त हो गयी। जनता को सबसिडी का अफीम चटाना और वोट कबाड़ना मुख्य ध्येय हो गया उत्तरोत्तर सरकारों का।

और; राष्ट्रवाद तथा भारतीय विरासत पर गर्व के नारे के साथ आयी भारतीय जनता पार्टी की सरकार में भी वह स्थिति बदली हो, ऐसा नहीं लगता।

मैं कई सप्ताह अगियाबीर की पुरातात्विक खुदाई स्थल को देखता रहा हूं। अपने मिशन के प्रति समर्पित पर अत्यन्त साधन की कमी से जूझते पुरातत्वविदों को वहां 42-43 डिग्री तापक्रम में जूझते हुये सुबह छ बजे से गोधूलि वेला तक काम पर लगे पाया है।

मैं दो सप्ताह से अगियाबीर की पुरातात्विक खुदाई स्थल को देख रहा हूं। अपने मिशन के प्रति समर्पित पर अत्यन्त साधन की कमी से जूझते पुरातत्वविदों को वहां 42-43 डिग्री तापक्रम में जूझते हुये सुबह छ बजे से गोधूलि वेला तक काम पर लगे पाता हूं।

अपने मिशन के प्रति समर्पित पर अत्यन्त साधन विपन्न पुरातत्वविदों को वहां 42-43 डिग्री तापक्रम में जूझते हुये सुबह छ बजे से गोधूलि वेला तक काम पर लगे पाता हूं।

ऐसे काम करने वाले लोगों के पास बेसिक कम्फर्ट्स देने का काम तो सरकारें – भाजपा की केन्द्र सरकार या भाजपा की प्रान्त सरकार – कर सकती थीं। पर खनन में कार्यरत उनके पास आये दिन बिजली व्यवस्था ध्वस्त हो जाती है। दिन भर चिलचिलाती धूप में काम करने के बाद रात में पंखे की हवा भी नसीब नहीं होती। एक साधारण सा रेफ्रिजरेटर और उसमें रखे शीतल जल की बोतलें तो बहुत बड़ी लग्जरी की बात होगी – वे लोग आसपास के बाजार में मिट्टी का घड़ा तलाश रहे हैं। पूरी टीम साधारण दाल-रोटी-सब्जी और शाम को चने-चबैने पर रह रही है। … पुरातत्व का खनन कोई जेसीबी मशीन से ताबड़तोड़ खनन तो है नहीं, यह बहुत धैर्य और अत्यन्त कुशल मानवीय श्रम मांगता है। दुखद यह है कि सरकारें उसे पर्याप्त फण्ड नहीं दे रहीं।

और सरकारें राष्ट्र गर्व की बात करती हैं! सब लिप-सर्विस प्रतीत होता है। मोदीजी गुजरात के मुख्य मन्त्रित्व में वहां के प्रान्त की ऑर्कियॉलॉजी में गहन रुचि लेते रहे होंगे; पर अब राष्ट के स्तर पर वह जज्बा/जनून अपनी टीम में नहीं भर सके हैं। टीम – नेता और ब्यूरोक्रेसी – दोनो स्तर पर वही कान्ग्रेस कल्चर वाली है।

बीरबाल साहनी पेलियोबॉटनी संस्थान के वैज्ञानिक डा, अनिल पोखरिया उन लोगों के लिये होटल से आते समय कोल्ड-ड्रिंक की बोतल लेते आते हैं।

मेरी पत्नीजी यदा कदा अपनी रसोई में अगियाबीर की टीम वालों के लिये कुछ बना लेती हैं। बीरबाल साहनी पेलियोबॉटनी संस्थान के वैज्ञानिक डा, अनिल पोखरिया उन लोगों के लिये होटल से आते समय कोल्ड-ड्रिंक की बोतल लेते आते हैं। अपने घर से हम स्पेयर पड़ा मिट्टी का घड़ा उनके लिये ले जाते हैं। अपने घर में बिजली-पानी की सुविधा वाला एक कमरा देने की पेशकश हम करते हैं, पर अपनी साइट से ज्यादा दूर (हमारा घर करीब तीन किलोमीटर दूर है) न रहना शायद उनके लिये बहुत आवश्यक है। वे लोग – डा, अशोक सिंह, डा. रविशंकर और अन्य – सधन्यवाद हमारा ऑफर अस्वीकार कर देते हैं। मुझे यकीन है कि इस पुरातत्व यज्ञ में वे स्वयम् न केवल अपने समर्पण और जुजून से अपनी आहुति दे रहे हैं, वरन यदाकदा अपने व्यक्तिगत आर्थिक रीसोर्सेज भी इसमें लगा देते होंगे।

तेज गर्मी और साधन हीनता में उनका एक सदस्य वाइरल बुखार से पीड़ित हो जाता है। रविशंकर (आदतन) अपने सिर पर न टोपी रखते हैं, न गमछा। दोपहर में अल्ट्रावायलेट विकीरण असामान्य रूप से अधिक होता है। उनके लिये मन में मुझे दुख होता है, पर कुछ कर नहीं सकता मैं।

अगियाबीर खुदाईस्थल पर यह छोटा मटका ले गये हम। उनकी जरूरत तो इससे बड़े और बेहतर मटके की है जो आसपास बाजार में तलाश रहे हैं वे। फ्रिज की कल्पना तो लग्जरी है।

हां, साधन-विपन्नता के लिये सरकार को जिम्मेदार ठहरा सकता हूं और वह में पूरे जोर दे कर करना चाहूंगा। वे पुरातत्व वाले समय के साथ रस्साकशी कर रहे हैं। अगियाबीर का टीला पुरातव की खुदाई के लिये बहुत सभावना-सम्पन्न टीला है। यहां नगरीय सभ्यता के प्रमाण हैं। गंगा घाटी में आबादी का सघन घनत्व होने के कारण इस प्रकार का अवसर कहीं और मिलना सम्भव नहीं। और खुदाई अगर साधनों की कमी के कारण टलती रही तो बहुत देर नहीं लगेगी – बड़ी तेजी से खनन माफिया टीले की मिट्टी के साथ साथ सिंधु घाटी के समान्तर और समकालीन नगरीय सभ्यता मिलने की सम्भावनायें नष्ट कर जायेगा।

इस सरकार से बहुत अपेक्षायें थीं। पर अपेक्षा रखना शायद पाप है। अकादमिक एक्सीलेंस की तवज्जो और फण्डिंग सरकार की प्राथमिकता में लगती नहीं।