संसाधनों की कमी से जूझते अगियाबीर के पुरातत्वविद

खुदाई अगर साधनों की कमी के कारण टलती रही तो बहुत देर नहीं लगेगी – बड़ी तेजी से खनन माफिया टीले की मिट्टी के साथ साथ सिंधु घाटी के समान्तर और समकालीन नगरीय सभ्यता मिलने की सम्भावनायें नष्ट कर जायेगा।


22 अप्रेल 2018 को फेसबुक नोट्स पर लिखी पोस्ट:-

अंगरेजों के समय में पुरातत्व अध्ययन में ईमानदारी थी, पर उनके ध्येय (शायद) भारतीय विरासत को योरोप से जोड़ने और/या उसे योरोपीय सभ्यता का कनिष्ठ अंग प्रमाणित करने के थे। आर्यों के योरोप से भारत में आगमन और सिंधु घाटी से गंगा घाटी में पलायन का सिद्धांत उसी का परिणाम प्रतीत होता है, जिसे हमारे साम्यवादी और समाजवादी/सेकुलर अभी भी गाते हैं। इससे सोच से आर्यावर्त की महत्ता कमतर होती है। और साम्यवादी वैसा ही चाहते हैं। उनकी निष्ठा देश से इतर है।


22 अप्रेल 2018 को फेसबुक नोट्स पर लिखी यह पोस्ट अब फेसबुक की नोट्स को गायब कर देने की नीति के कारण वहां से विलुप्त हो गयी है। अत: मेरे पास उसे और उस जैसी कई अन्य पोस्टों को खंगाल कर ब्लॉग पर संजोने के सिवाय कोई विकल्प नहीं बचा।

अगियाबीर विषयक कई पोस्टें इस ब्लॉग पर हैं और कुछ और आने वाली हैं, फेसबुक की नोट्स को समाप्त कर देने की नीति के कारण।

उनमें से कुछ पोस्टें पुरातत्व (आर्कियॉलॉजी) सम्बंधित हैं। सभी पोस्टें संजोने के बाद एक लिस्ट बनाऊंगा उनको तरतीबवार देखने के लिये। इसके अलावा ट्विटर पर भी कई ट्वीट्स हैं सन 2018 की अगियाबीर की खुदाई पर। वह सब भी एकाग्र करना एक बड़ा काम है! जो होगा, भविष्य में देखा जायेगा।


स्वतन्त्रता के बाद हमारी सरकारों को (पुन: मैं जोड़ूंगा शायद, चूंकि मैं अपने को पुरातत्व वालों की जमात का होने की स्वघोषणा नहीं कर सकता) सिंधु घाटी सभ्यता के क्षरण के बाद वहां से अर्बन लोगों का मध्य गंगा के स्थानों में पलायन की अटकल की बात को असत्य प्रमाणित करने के लिये मध्य गंगा क्षेत्र में जहां भी पुरातात्विक शोध सम्भव था, वहां त्वरित गति से खोज कराना होना चाहिये था।

जितना मैने पढ़ा है, उसके अनुसार लगता है कि हरप्पा के शिव और काशी के शिव में काल का अन्तराल नहीं है। काशी में उसी स्थल पर उत्तरोत्तर सभ्यतायें बसती गयी हैं। आज भी वह जीवन्त शहर है। अत: वहां हरप्पा की तरह का खनन सम्भव ही नहीं। अन्यथा सिंधु और गंगा की सभ्यतायें समान्तर रही होंगी। अन्तर अगर रहा होगा तो कृषि पर निर्भरता के स्तर का अन्तर रहा होगा।

उस समय अगर हरप्पा में गैंड़ा हुआ करता था तो वह सरयूपार के सोहगौरा और लहुरादेवा में भी था। चावल की खेती करना अपने आप में एक पर्याप्त विकसित मस्तिष्क के बल पर ही सम्भव है और गंगा घाटी में 8000बीसीई में चावल की खेती हुआ करती थी। शायद हरप्पा के समकालीन; मेरे घर के समीप के अगियाबीर में भी क्वासी-अर्बन सभ्यता रही हो! पर उसके लिये साधन सम्पन्न तरीके से पुरातत्वीय खनन तो हो!

स्वतन्त्रता के शुरुआती समय में आर्कियॉलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया को संसाधन प्रचुर मात्रा में मिले भी – ऐसा मेरे पढ़ने में आया है। मौलिक शोध के लिये विश्वविद्यालयों को भी संसाधन मुहैया हुये। भारत में कई स्थानों पर पुरातत्विक खनन हुये। पर कालान्तर में, कभी न कभी, सरकार को लगा होगा कि विरासत संजोने का काम पर्याप्त हो चुका है। उसके बाद सरकारें पुरातत्व खनन की बजाय मनरेगा छाप खनन/निर्माण की विकृतियों में लिप्त हो गयी। जनता को सबसिडी का अफीम चटाना और वोट कबाड़ना मुख्य ध्येय हो गया उत्तरोत्तर सरकारों का।

और; राष्ट्रवाद तथा भारतीय विरासत पर गर्व के नारे के साथ आयी भारतीय जनता पार्टी की सरकार में भी वह स्थिति बदली हो, ऐसा नहीं लगता।

मैं कई सप्ताह अगियाबीर की पुरातात्विक खुदाई स्थल को देखता रहा हूं। अपने मिशन के प्रति समर्पित पर अत्यन्त साधन की कमी से जूझते पुरातत्वविदों को वहां 42-43 डिग्री तापक्रम में जूझते हुये सुबह छ बजे से गोधूलि वेला तक काम पर लगे पाया है।

मैं दो सप्ताह से अगियाबीर की पुरातात्विक खुदाई स्थल को देख रहा हूं। अपने मिशन के प्रति समर्पित पर अत्यन्त साधन की कमी से जूझते पुरातत्वविदों को वहां 42-43 डिग्री तापक्रम में जूझते हुये सुबह छ बजे से गोधूलि वेला तक काम पर लगे पाता हूं।

अपने मिशन के प्रति समर्पित पर अत्यन्त साधन विपन्न पुरातत्वविदों को वहां 42-43 डिग्री तापक्रम में जूझते हुये सुबह छ बजे से गोधूलि वेला तक काम पर लगे पाता हूं।

ऐसे काम करने वाले लोगों के पास बेसिक कम्फर्ट्स देने का काम तो सरकारें – भाजपा की केन्द्र सरकार या भाजपा की प्रान्त सरकार – कर सकती थीं। पर खनन में कार्यरत उनके पास आये दिन बिजली व्यवस्था ध्वस्त हो जाती है। दिन भर चिलचिलाती धूप में काम करने के बाद रात में पंखे की हवा भी नसीब नहीं होती। एक साधारण सा रेफ्रिजरेटर और उसमें रखे शीतल जल की बोतलें तो बहुत बड़ी लग्जरी की बात होगी – वे लोग आसपास के बाजार में मिट्टी का घड़ा तलाश रहे हैं। पूरी टीम साधारण दाल-रोटी-सब्जी और शाम को चने-चबैने पर रह रही है। … पुरातत्व का खनन कोई जेसीबी मशीन से ताबड़तोड़ खनन तो है नहीं, यह बहुत धैर्य और अत्यन्त कुशल मानवीय श्रम मांगता है। दुखद यह है कि सरकारें उसे पर्याप्त फण्ड नहीं दे रहीं।

और सरकारें राष्ट्र गर्व की बात करती हैं! सब लिप-सर्विस प्रतीत होता है। मोदीजी गुजरात के मुख्य मन्त्रित्व में वहां के प्रान्त की ऑर्कियॉलॉजी में गहन रुचि लेते रहे होंगे; पर अब राष्ट के स्तर पर वह जज्बा/जनून अपनी टीम में नहीं भर सके हैं। टीम – नेता और ब्यूरोक्रेसी – दोनो स्तर पर वही कान्ग्रेस कल्चर वाली है।

बीरबाल साहनी पेलियोबॉटनी संस्थान के वैज्ञानिक डा, अनिल पोखरिया उन लोगों के लिये होटल से आते समय कोल्ड-ड्रिंक की बोतल लेते आते हैं।

मेरी पत्नीजी यदा कदा अपनी रसोई में अगियाबीर की टीम वालों के लिये कुछ बना लेती हैं। बीरबाल साहनी पेलियोबॉटनी संस्थान के वैज्ञानिक डा, अनिल पोखरिया उन लोगों के लिये होटल से आते समय कोल्ड-ड्रिंक की बोतल लेते आते हैं। अपने घर से हम स्पेयर पड़ा मिट्टी का घड़ा उनके लिये ले जाते हैं। अपने घर में बिजली-पानी की सुविधा वाला एक कमरा देने की पेशकश हम करते हैं, पर अपनी साइट से ज्यादा दूर (हमारा घर करीब तीन किलोमीटर दूर है) न रहना शायद उनके लिये बहुत आवश्यक है। वे लोग – डा, अशोक सिंह, डा. रविशंकर और अन्य – सधन्यवाद हमारा ऑफर अस्वीकार कर देते हैं। मुझे यकीन है कि इस पुरातत्व यज्ञ में वे स्वयम् न केवल अपने समर्पण और जुजून से अपनी आहुति दे रहे हैं, वरन यदाकदा अपने व्यक्तिगत आर्थिक रीसोर्सेज भी इसमें लगा देते होंगे।

तेज गर्मी और साधन हीनता में उनका एक सदस्य वाइरल बुखार से पीड़ित हो जाता है। रविशंकर (आदतन) अपने सिर पर न टोपी रखते हैं, न गमछा। दोपहर में अल्ट्रावायलेट विकीरण असामान्य रूप से अधिक होता है। उनके लिये मन में मुझे दुख होता है, पर कुछ कर नहीं सकता मैं।

अगियाबीर खुदाईस्थल पर यह छोटा मटका ले गये हम। उनकी जरूरत तो इससे बड़े और बेहतर मटके की है जो आसपास बाजार में तलाश रहे हैं वे। फ्रिज की कल्पना तो लग्जरी है।

हां, साधन-विपन्नता के लिये सरकार को जिम्मेदार ठहरा सकता हूं और वह में पूरे जोर दे कर करना चाहूंगा। वे पुरातत्व वाले समय के साथ रस्साकशी कर रहे हैं। अगियाबीर का टीला पुरातव की खुदाई के लिये बहुत सभावना-सम्पन्न टीला है। यहां नगरीय सभ्यता के प्रमाण हैं। गंगा घाटी में आबादी का सघन घनत्व होने के कारण इस प्रकार का अवसर कहीं और मिलना सम्भव नहीं। और खुदाई अगर साधनों की कमी के कारण टलती रही तो बहुत देर नहीं लगेगी – बड़ी तेजी से खनन माफिया टीले की मिट्टी के साथ साथ सिंधु घाटी के समान्तर और समकालीन नगरीय सभ्यता मिलने की सम्भावनायें नष्ट कर जायेगा।

इस सरकार से बहुत अपेक्षायें थीं। पर अपेक्षा रखना शायद पाप है। अकादमिक एक्सीलेंस की तवज्जो और फण्डिंग सरकार की प्राथमिकता में लगती नहीं।


अगियाबीर की आर्कियॉलॉजिकल साइट के बबूल की छाँव

“हम लोगों के यहां आने के बाद ही एक चिड़िया दम्पति ने इस बबूल के पेड़ पर अपना घोंसला भी बनाया है। अंडे भी दिये हैं घोंसले में। उनके चूजे निकलने का समय भी आ गया है।”



अगियाबीर के टीले पर जहां पुरातत्व की खुदाई चल रही है, वहां एक बबूल का पेड़ है। तेज गर्मी में खुदाई के काम में लगे रहते हैं बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पुरातत्वविद् और उनके सहकर्मी। उनको एक मात्र छाया देने वाला वृक्ष है वह। अन्य टीलों पर कई वृक्ष हैं और बस्ती के आसपास तो महुआ के विशालकाय वृक्ष हैं। पर यहां वही भर सहारा है गर्मी में। पुरातत्व वालों ने छाया के हिसाब से खुदाई की साइट नहीं चुनी। 🙂

बबूल के पेड़ की छाया में डा. अशोक सिंह

उसी बबूल की छाया में पुरातत्व वाले अपनी कुर्सी रखते हैं और दरी बिछाते हैं। पेड़ पर अपना पीने का पानी का बर्तन टांगते हैं। सवेरे छ बजे चले आते हैं काम पर तो वहीं पेड़ के नीचे सवेरे का नाश्ता करते हैं।


अप्रेल 14, 2018 की पोस्ट जो फेसबुक नोट्स में थी और वह फेसबुक की नोट्स को फेज आउट करने की पॉलिसी के कारण विलुप्त हो गयी थी। उसे आर्काइव से निकाल कर यहां ब्लॉग पर सहेज लिया है।


मैं अपनी साइकिल स्कूल के परिसर में खड़ी कर (अपने पैरों में ऑस्टियोअर्थराइटिस के दर्द के कारण) वाकिंग स्टिक के सहारे जब टीले की साइट पर पंहुचता हूं तो डा. अशोक सिंह मेरी उम्र और मेरी रुचि को देखते हुये पेड़ के नीचे रखी अपनी कुर्सी मुझे ऑफर कर देते हैं।

बबूल के पेड़ की छाया में रसोईया किशोर महराज, ड्राफ़्ट्समैन शिवकुमार और मैं।

वह पेड़ – बबूल का तुच्छ पेड़ मुझे बहुत प्रिय प्रतीत होता है। डा. अशोक सिंह बताते हैं कि जब वे लोग डेढ महीना पहले इस स्थान पर खुदाई करने आये थे तो यह वृक्ष मृतप्राय था। बहुत कम पत्तियां थीं उसमें। वे लोग इसका थाला बना कर रोज पानी देते रहे। अब यह हरा भरा हो गया है। उनके लिये बड़ा सहारा बन गया है।

डा. रविशंकर ने कहा – “सर, इस पेड़ पर दो गिरगिट रहते हैं। हम लोग खुदाई के काम में व्यस्त रहते हैं और वे आपस में दिन भर लड़ते रहते हैं। शायद पेड़ पर वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। कल एक बाज़ एक गिरगिट पर झपटा था। मैने समय से देख लिया और बाज़ को उड़ाया अन्यथा एक गिरगिट तो उसका शिकार हो जाता। अगर एक गिरगिट बाज का शिकार हो जाता तो उनकी वर्चस्व की लड़ाई रुक जाती और हमारा मनोरंजन भी खत्म हो जाता!”

बबूल के पेड़ से लटकाया पानी का बर्तन।

रविशंकर इन्क्विजिटिव व्यक्ति हैं। अपने पुरातत्व के काम में दक्ष हैं साथ ही अपने वातावरण के बारे में सचेत भी। आगे उन्होने बताया – “हम लोगों के यहां आने के बाद ही एक चिड़िया दम्पति ने इस बबूल के पेड़ पर अपना घोंसला भी बनाया है। अंडे भी दिये हैं घोंसले में। उनके चूजे निकलने का समय भी आ गया है।”

पेड़, गिरगिट, चिड़िया और चूजे” – मैं डा. अशोक से मनोविनोद करता हूं – “आप लोगों की आर्कियालॉजिकल रिपोर्ट में इन सब की भी चर्चा होगी, कि नहीं?”

उनके न कहने पर मैं सुझाव देता हूं कि आप लोग अपने अनुभवों की डायरी रखा करें – अगियाबीरनामा!

डा. सिंह कहते हैं – हमारे लिये वह काम आप ही कर दे रहे हैं अपनी पोस्टों के लेखन में। 😊


गिरीश चंद्र त्रिपाठी जी और वामपंथ से टकराव

त्रिपाठी जी ने वामपंथ से टकराव के अनेक मामले और अनेक लोगों से मिलने के प्रसंग मुझे बताये। उनसे मिलने पर लगा कि ये वामपंथी लिबरल-वाम एजेण्डा को बड़े शातिराना ढंग से शिक्षण संस्थानों और समाज में घोलने का काम करते हैं।


एक विवाह कार्यक्रम में गया था मैं। सूबेदार गंज, प्रयागराज के रेलवे परिसर में कार्यक्रम था। पुरानी जानी पहचानी जगह। फिर भी मुझे यह लग रहा था कि मेरे परिचित कम ही लोग होंगे और मैं वहां निरर्थक हीहीहाहा किये बिना कर जल्दी लौट सकूंगा। पर वैसा हुआ नहीं। और मुझे चार पांच अच्छे लोग मिले। सार्थक हुआ वहां जाना।

मेरे बंधु ओमप्रकाश मिश्र के पुत्र का विवाह था। उन्होने मुझे कहा – भाई साहब, आपको एक महत्वपूर्ण सज्जन से मिलवाता हूं। कार्यक्रम में मेरी व्यस्तता के कारण मैं स्वयम उनके पास बैठ नहीं पाऊंगा। अत: मेरे स्थान पर आप उन्हें कम्पनी दीजिये।

श्री गिरीश चंद्र त्रिपाठी

वे सज्जन थे श्री गिरीश चंद्र त्रिपाठी। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति रह चुके हैं और वर्तमान में उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा परिषद के अध्यक्ष हैं। वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रह चुके हैं (अभी भी होंगे, शायद) और संस्कृत के भी विद्वान हैं।

मुझे अटपटा लगा। जिंदगी भर मैं ट्रेन परिचालन में थानेदारी भाषा में जूझता रहा और यह बंधु मुझे एक एकेडमिक क्षेत्र की शीर्षस्थ विभूति के साथ घंटा-डेढ़ घंटा के लिये “फंसा” रहे हैं। मेरे और उनके बीच बातचीत के कोई कॉमन मीटिंग प्वाइण्ट ही कहां होंगे?

श्री गिरीश चंद्र त्रिपाठी से सामान्य परिचय के बाद मैं उनके पास सोफे पर बैठ गया। उनसे उनके बारे में उन्ही से पता करना शायद उनकी गरिमा के अनुकूल नहीं होता; सो मैंने इण्टरनेट सर्च की शरण ली। “Girish Chandra Tripathi BHU” के नाम से सर्च करने पर न्यूज18 का यह लेख मेरे सामने था – Meet BHU VC Girish Chandra Tripathi, A ‘Proud Swayamsevak’ Who is in Eye of The Storm .

थोड़ा अंश पढ़ कर, उन्हें लगभग सुनाते हुये मैंने कहा – वाह! यह तो लिखता है कि आपने लड़कियों की हॉस्टल की मेस में मांस निषेध कर दिया था। और वहीं से अपरिचय की बर्फ पिघलनी प्रारम्भ हुई। मेरा मोबाइल ले कर त्रिपाठी जी ने वह लेख पूरा पढ़ा। फिर उन्होने बताना शुरू किया। उसके बाद सामान्यत: वे बोलने वाले और मैं सुनने वाले की भूमिका में आ गये। उनकी बातें इतनी रोचक थीं कि मुझे अपने श्रोता होने में कोई कष्ट नहीं था।

उन्होने बताया कि यह (लेख में वर्णित) संदीप पाण्डेय विश्वविद्यालय में नौकरी करते हुये भी छात्रों के बीच राजनीति करता था। जब नहीं माना तो मुझे निकाल देना पड़ा। वामपंथी है। मेगसेसे अवार्ड विजेता भी। बहुत से मेगसेसे अवार्ड पाने वाले उसी प्रकार के हैं। अपना काम करने की बजाय यह व्यक्ति विश्वविद्यालय में येन केन वाम विचारधारा का प्रसार करने और छात्रों को उकसाने में लिप्त रहता था। और वैसा आचरण बनारस हिंदू विश्वविद्यालय तथा महामना मालवीय जी की विश्वविद्यालय की परिकल्पना के अनुकूल कदापि नहीं है।

प्रो. गिरीश चंद्र त्रिपाठी

त्रिपाठी जी ने वामपंथ से टकराव के अनेक मामले और अनेक लोगों से मिलने के प्रसंग मुझे बताये। उनसे मिलने पर (जैसा मैं पहले भी महसूस करता था) लगा कि ये लोग – शैक्षणिक संस्थानों में घुसे संदीप पाण्डेय जैसे और मीडिया के एक बड़े वर्ग के लोग मसलन राजदीप सरदेसाई, रवीश कुमार या बरखा दत्त – लिबरल-वाम एजेण्डा को बड़े शातिराना ढंग से शिक्षण संस्थानों और समाज में घोलने का काम करते हैं। इसके अलावा प्रायोजित आंदोलनों में इनकी उत्तरोत्तर विघटनकारी भूमिका उजागर हो रही है। हिंदी साहित्य में भी इनकी सोची समझी पैठ है।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय स्थापित करते समय जिन आदर्शों को महामना मालवीय जी ने सामने रखा था, उनसे इन लोगों की विचारधारा का सामंजस्य नहीं है। गिरीश चंद्र त्रिपाठी जी भारतीय जीवन पद्यति, शासक के जीवन मूल्य और समाज में नारी के स्थान के बारे में विस्तार से बताने लगे। उस संदर्भ में अनेक संस्कृत के कथन भी उद्धृत किये। मैं कई बार उनसे पूछ्ता रहा – यह कहां/किस ग्रंथ में है? बाद में पढ़ने के लिये मैंने दो पुस्तकें चिन्हित कीं – कालिदास का अभिज्ञानशाकुंतल और दण्डी का दशकुमार चरित्र। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य पुस्तकें – स्वप्नवासवदत्ता, मृच्छकटिक, उत्तररामचरित्र, कुमारसम्भव, मुद्राराक्षस आदि हिंदी अनुवाद में सहजता से उपलब्ध हैं। उन सब को भी देखने पढ़ने के लिये पर्याप्त समय है मेरे पास! 🙂

“दुष्यंत मृग का पीछा करते हुये अनजाने में कण्व के आश्रम में प्रवेश कर जाते हैं। तपस्वी उन्हें चेताता है – रुको, अपना बाण नीचे करो, यह आश्रम है और यहां हरिण अवध्य है। किसी प्राणीमात्र की हत्या नहीं की जा सकती यहां।… और दुष्यंत का उसके बाद आचरण ध्यान देने योग्य है। वे रथ से उतरते हैं; अपना धनुष-बाण नीचा करते हैं। उनका सिर अपराध बोध से झुक जाता है। उन्हे पश्चाताप होता है कि वे गुरुकुल/आश्रम में प्रवेश कर गये पर अपना मुकुट उतारा नहीं! … आज के समय में इस आचरण की कल्पना की जा सकती है? आज का शासक होता तो ऐसा कहने पर बेचारे तपस्वी को तो कारागार मेंं डाल दिया जाता।… जब हम विश्वविद्यालय की सोचते हैं तो उसकी गरिमा और उसके आदर्श के रूप में यह सब सामने आता है।” – मैं श्री गिरीश चंद्र जी के शब्दों को यथावत नहीं रख पा रहा (मेरी स्मरण शक्ति उस लायक नहीं है), पर उनका आशय ऐसा ही था।

वाल्मीकि आश्रम में लव-कुश के साथ सीता। चित्र देवदत्त पटनायक की पुस्तक “सीता” से।

समाज में नारी की स्थिति के बारे में उन्होने अपने विचार रखे। राम के आदर्श की भी बात की। वनगमन के विषय में माता की बात पिता के आदेश के ऊपर थी, ऐसा उन्होने बताया। कौशल्या राम को कहती हैं – जो केवल पितु आयसु ताता; तो जिनि जाऊ जानि बड़ि माता। जो पितु मातु कहेऊं बन जाना; सो कानन सत अवध समाना। (अगर केवल पिता ने ही वनगमन का आदेश दिया है तो माता को बड़ा मान कर उनके आदेश का अनुसरण मत करो। पर अगर माता-पिता दोनो ने कहा है तो जंगल तुम्हारे लिये अवध समान है।)… माता का स्थान पिता से ऊपर है। इसी प्रकार सीता को वनवास देने के प्रसंग में राम (अपने राजधर्म की आवश्यकता के बावजूद) सीता को वन नहीं जाने देना चाहते। तब सीता उन्हें उनका राजधर्म समझाने के लिये उस कक्ष में ले कर जाती हैं, जिसमें उनके पूर्ववर्ती रघुवंशीय राजाओं के चित्र लगे हैं। सीता राम को वे चित्र दिखा कर कहती हैं – अगर वे राम के व्यक्ति को राजा के ऊपर रख कर आचरण करेंगे तो परलोक में अपने इन पूर्वजों को क्या उत्तर देंगे? … तब राम सीता के वनगमन के बारे में निश्चय कर पाते हैं।

उनके कहने में मुझे बहुत रस मिल रहा था और मैंने उन्हे बहुत नहीं टोका। एक अनुशासित श्रोता बना रहा। उनके कहने के बाद मैंने गिरीश चंद्र जी से उनके अपने लेखन की बात की; जिसे पढ़ कर मैंं उनके विचारों के विषय में और जान सकूं। उन्होने बताया कि “यह उनकी कमजोरी रही है कि उन्होने लिखा बहुत कम है”। उनसे बातचीत में लगा कि यह उनकी ही नहीं, सभी दक्षिण पन्थी विचारधारा वालों की भी कमी रही है। “दक्षिण पंथी मीडिया भी नाममात्र का है”।

श्री गिरीश चंद्र त्रिपाठी (बाँये) और मेरे मित्र श्री ओमप्रकाश मिश्र (दांये)

मैंने स्वराज्य का नाम लिया। गिरीश जी ने उस मीडिया संस्थान के विषय में भी अपना असंतोष व्यक्त किया। उनके अनुसार स्वराज्य के लोगों को भी भारतीय सोच, दर्शन, परम्पराओं और सांस्कृतिक मूल्यों की गहन समझ नहीं है। वामपंथ से जूझने के लिये यह कमजोरी है ही। … मुझे भी ऐसा लगा। मेरे दैनिक न्यूज-व्यूज और ओपीनियन खंगालने के लिये जो साइट्स हैं उनमें हैं – न्यूयॉर्क टाइम्स, गार्डियन, द टेलीग्राफ, पाकिस्तान का डॉन और भारत का द हिंदू। ये सभी वाम पंथी या लेफ्ट-ऑफ-सेण्टर की सामग्री परोसते हैं। इसके अलावा साहित्य में भी अधिकतर इसी विचारधारा का वर्चस्व दिखता है। मेरे पास ले दे कर स्वराज्य का सब्स्क्रिप्शन है, जिसे राइट या राइट ऑफ सेण्टर कहा जा सकता है।

काश गिरीश चंद्र त्रिपाठी जी जैसे विद्वान नियमित लेखन कर लोगों की विचारधारा को पुष्ट करने का बड़ा कार्य करते। यहां गांव में एकांत में रहने वाले मुझे भविष्य में गिरीश चंद्र त्रिपाठी जी का सानिध्य मिलेगा; कह नहीं सकता। उस समारोह में एक पत्रकार श्री मुनेश्वर मिश्र जी भी आये थे। उनको त्रिपाठी जी ने भविष्य मेंं बैठक/गोष्ठी आयोजित करने के लिये कहा है, जिसमें शायद गिरीश जी से मिलना सम्भव हो।

गिरीश चंद्र जी से मुलाकात के बाद मुझे यह जरूर स्पष्ट हुआ है कि मुझे भारतीय सोच/विचारधारा/दर्शन का बेहतर और विधिवत अध्ययन करना चाहिये; इधर उधर चोंच मारने और चुगने के अंदाज में नहीं। पर संस्कृत साहित्य को उसके मूल रूप में पढ़ना-समझना फिलहाल मेरे लिये सम्भव नहीं है – मेरी भाषा की सीमायें हैं। बारबार संस्कृत-हिन्दी शब्दकोष रेफर करना असम्भव तो नहीं, ऊबाउ काम है।

इसलिये फिलहाल मैंने अभिज्ञान शाकुंतल और दशकुमार चरित्र का हिंदी अनुवाद त्रिपाठी जी से मिलने के बाद ढूंढ़ कर पढ़ा। पैंसठ साल की उम्र में जीवन में पहली बार इन पुस्तकों को मैंने पहचाना। अभी आधा दर्जन अन्य संस्कृत के ग्रंथों के अनुवाद भी पढ़ने के लिये चिन्हित कर लिये हैं। इसके अलावा तुलसी के रामचरितमानस और विनयपत्रिका को एक बार फिर से पढ़ने की सोची है। इसी वर्ष मैंने राजाजी का महाभारत और इरावती कर्वे का युगांत पढ़ा है। और आगे यह सब जारी रखने के लिये प्राइम मूवर गिरीश चंद्र त्रिपाठी जी से उक्त वर्णित मुलाकात ही है।