दुर्योधन इस युग में आया तो विजयी होगा क्या?


शिवकुमार मिश्र की नयी दुर्योधन की डायरी वाली पोस्ट कल से परेशान कर रही है। और बहुत से टिप्पणी करने वालों ने वही प्रतिध्वनित भी किया है। दुर्योधन वर्तमान युग के हिसाब से घटनाओं का जो विश्लेषण कर रहा है और जो रिस्पॉन्स की सम्भावनायें प्रस्तुत कर रहा है – उसके अनुसार पाण्डव कूटनीति में कहीं पास ठहरते ही नहीं प्रतीत होते।
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पर हम यह प्रिमाइस (premise – तर्क-आधार) मान कर चल रहे हैं कि पाण्डवों के और हृषीकेश के रिस्पॉन्स वही रहेंगे जो महाभारत कालीन थे। शायद आज कृष्ण आयें तो एक नये प्रकार का कूटनीति रोल-माडल प्रस्तुत करें। शायद पाण्डव धर्म के नारे के साथ बार बार टंकी पर न चढ़ें, और नये प्रकार से अपने पत्ते खेलें।

मेरे पास शिव की स्टायर-लेखन कला नहीं है। पर मैं कृष्ण-पाण्डव-द्रौपदी को आधुनिक युग में डायरी लिखते देखना चाहूंगा और यह नहीं चाहूंगा कि दुर्योधन इस युग की परिस्थितियों में हीरोत्व कॉर्नर कर ले जाये। 


Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

22 thoughts on “दुर्योधन इस युग में आया तो विजयी होगा क्या?

  1. pandav agar media ko manage kar len toabhi baat ban payegi warna media,yani shiv bhaiya to duryodhan ko badhia highlight kar rahen hain.waise aapka sawal jayaj hai ek n ek din pandavon ki or se kisi n kisi ko maidan me aana hoga.apan to naye navadiye hain,dekhte hain kaun sa paka hua aam tapakta hai

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  2. ” सत्यमेव जयते और ” सत्यम्` शिवम्` सुँदरम्` ” भी है !कई बार अँधकार सघन होता प्रतीत होता है परँतु, प्रकाश भी वहीँ से उदित होता है -लावण्या

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  3. “और यह नहीं चाहूंगा कि दुर्योधन इस युग की परिस्थितियों में हीरोत्व कॉर्नर कर ले जाये। सर जी आपकी चिंता अपनी जगह पर बिल्कुल सही है ! मैंने आपके प्रश्न पर काफी सोचा और मेरा ऐसा सोचना है की ” सत्यमेव जयते” ही होगा ! और सत्यमेव जयते का अर्थ मेरेअनुसार ” सत्य उसी का होता है जिसकी जीत होती है ” अब मेरी राय तो यही है ! रामराम !

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  4. मेरा दुर्भाग्य की शुरू से ही भाई शिवकुमार ‘मिश्रा’ जी को नही पढ़ पाया -अब नाम गिरांव उनका इतना सुन लिया है कि कुछ फुरसत के साथ उन तक जाना चाहता हूँ पर फुर्सतियै ससुरी नहीं मिल रही है -और फिर उनका अर्धांश आपमें मिल जाने के कारण भी यहीं मुंह मार कर शांत पड़ जाता हूँ .या यूँ कहें कि आप मुझे मिश्रा जी से मिलने ही नहीं देने दे रहे हैं !यह आपकी ज्यादती है -और शिव कुमार जी आतीत गमन में ऐसे मग्न हैं कि उन्हें दूसरे मिश्राओं की चिंता ही नही है -हाँ आपकी यह सोच जबर्दस्त है कि महाभारत के पात्रों को anachronistic स्टाइल में वर्तमान में आकर कुछ उपक्रम करने चाहिए .हम इस विधा का प्रयोग विज्ञान कथा में करते आए हैं .

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  5. सर जी आप ‘कृष्ण-पाण्डव-द्रौपदी’ को भी डायरी लेखन करते देखना चाहते हैं यह पढकर मन प्रसन्‍न हुआ । मुझे दुस्‍सासन की डायरी हांथ लगी पर वह किस भाषा में लिखी गई है पुरातत्‍व वाले भी समझ नहीं पा रहे हैं, शिव भईया से डिकोड करवा कर मैं भी उसे ब्‍लाग जगत में लाना चाहूंगा, सुना है महाभारत कालीन डायरियों को पब्लिक में लाने बडे फायदे हैं । शिव भईया की इस डायरी को पुस्‍तकाकार छापने के लिये दिल्‍ली के बेस्‍ट सेलर पब्लिशर लोग शिव भईया के आगे पीछे घूम रहे हैं ।

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  6. पाण्डव कोई कम कूटनीतिज्ञ नहीं रहे होंगे। ये अलग बात है कि वे अपने पत्ते ऐन मौके पर खोलते रहे होंगे। शिव बाबू धांसू लेखक हैं। आप उनके जैसा लिखने के लिये काहे परेशान हैं! अपने जैसा लिखें, लिखते रहें।

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  7. Smart Indian जी की बात से सहमति है …. कई बार लगता है कि जीत अंधेरे कि ही होगी, लेकिन अंततः ….

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  8. पाण्डव तो उस समय भी लद्दू थे। सारा फर्क कृष्ण के कारण पड़ा। कृष्ण उस समय भी कूटनीति में सर्वोत्तम थे और आज भी आयेंगे तो सर्वोत्तम ही रहेंगे।

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  9. “पाण्डव कूटनीति में कहीं पास ठहरते ही नहीं प्रतीत होते।””पांडव तो कूटनीति में तब भी कौरवों के सामने कहीं नहीं ठहरते थे” – मगर कितना भी बड़ा अचम्भा क्यों न हो आख़िर में “सत्यमेव जयते” ही होना है. कौरवों के आगे तो पांडव हमेशा ही जीतेंगे:यत्र योगेश्वरः कृष्णः यत्र पार्थो धनुर्धरः ।तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नितिर्मतिर्ममः ।।

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