शिखर का एकान्त


मैं अकेले कमरे में बैठा हूं। इण्टरकॉम पर बीच बीच में ट्रेन कण्ट्रोलर खबर देता है कि गाड़ियां ठीक नहीं चल रहीं। कोहरे का असर है। एक ट्रेन दुर्घटना अभी ताजा ताजा निपटी है। स्टाफ परिचालन की उत्कृष्टता से सुरक्षा की तरफ स्विंग कर गया है। छाछ को भी फूंक कर पीने जैसा कुछ करने लगा है।

तब एक एक कर डिवीजन के अधिकारी गण अपना मन्तव्य फोन पर बताते हैं। मैं जानता हूं कि फोन पर बता कर वे राहत सा महसूस करते होंगे। “हमने बक (जिम्मेदारी) आगे पास ऑन कर दिया (we have passed the buck ahead)”| मैं भी सोचता हूं कि इस बक को आगे ठेला जाये। पर आगे ठेलने का बहुत स्पेस नहीं है। फिर भी मैं महाप्रबन्धक महोदय को एक सरकाऊ फोन करता हूं। जिनके पास यह सुविधा नहीं होती होगी, वे अन्तत हनुमान चालिसा पढ़ कर हनुमान जी पर बक ठेलते होंगे।

mountain शिखर का एकांत कितना किलर होता है जी! मैं प्रधानमंत्री जी की हालत की सोचता हूं। प्रजातंत्र में हर आदमी उनपर बक ठेलने में स्वतंत्र है। कितना एकाकी महसूस करते होंगे सरदार जी। बहुत से प्रबन्धक बहुत सी मीटिंग इसलिये करते हैं कि वे इस एकाकी भाव से भय खाते हैं। यह एकाकी भाव मानव की शारीरिक-मानसिक खिन्नता और विपन्नता का समग्र है। 

बैटर हॉफ की त्वरित टिप्पणी – पोस्ट लिखने के लिये ठीक है। पर ज्यादा मुंह बना कर न बैठो। ज्यादा सिपैथी बटोरना कोई अच्छी बात नहीं!

यह ब्लॉगिंग भी उस एकाकी भाव को खत्म करने का एक जरीया है। मुझे मालुम है आपकी अपनी समस्यायें होंगी। आपके अपने एकाकी भाव होंगे। आपमें से कुछ अपने आइसोलेशन को अभिव्यक्त करेंगे टिप्पणियों में। कुछ शायद बता पायें कि मैं यह एकाकी भाव कैसे दूर कर सकता हूं। कुछ यह भी कह सकते हैं कि “यह भी कोई पोस्ट हुई? फ्रॉड मानसिक हलचल का एक और नमूना हुआ यह”!

पर मित्रवर, चाहे आप कितने भी छोटे या बड़े शिखर पर हों, चाहे आप केवल पत्नी और एक छोटे बच्चे के दायित्व के शिखर पर हो, आप यदाकदा इस एकाकी भाव को महसूस करते होंगे। मैं तो आज वही कर रहा हूं।

(नोट यह पोस्ट कल लिखी गयी थी।)   


पिछली पोस्ट पर कुछ पाठकों ने भर्तृहरि के नीति, शॄंगार और वैराज्ञ शतक की उपलब्धता के बारे में जिज्ञासा व्यक्त की है। सुमन्त मिश्र कात्यायन जी ने बताया है कि यह चौखम्बा प्रकाशन, वाराणसी ने पब्लिश किये हैं और सरलता से उपलब्ध हैं।


Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

34 thoughts on “शिखर का एकान्त

  1. सर जी.. आप भी सुबुक सुबुकवादी लेखन की तरफ अग्रसर हो रहे है… कही ‘भीगी पलके’ ब्लॉग शुरू करने का मान तो नही बना लिया.. खैर आप जो भी लिखे.. हम तो पढ़ते रहेंगे.. आपकाचण्ट चिठेरा

    Like

  2. जिनके पास यह सुविधा नहीं होती होगी, वे अन्तत हनुमान चालिसा पढ़ कर हनुमान जी पर बक ठेलते होंगे।सही कह रहे हैं….हमारे ऊपर भी सिर्फ़ एम्.डी हैं जिनके पास हजारों समस्याएं हैं मैं कभी अपनी समस्या उन्हें बता कर उसमें और इजाफा नहीं करता इसीलिए वो मुझसे बहुत प्रसन्न रहते हैं…लेकिन मेरे मातहत अपनी परेशानियाँ मुझ पे डाल प्रसन्न हो जाते हैं…मुझे तो हनुमान चालीसा भी नहीं आता बतईये क्या करूँ?बक कहाँ ठेलूं? इसिलिये अपनी भड़ास अपनी ग़ज़लों में निकाल प्रसन्न हो लेता हूँ…नीरज

    Like

  3. हम्म, बक पास करने की अपनी आदत नहीं रही। पिछली नौकरी में बॉस के इतना तकनीकी व्यक्ति न होने के कारण बक पास करना संभव न था, टीम लीडर होने के कारण बाकी लोग मेरे पर सरका देते!! :( मौजूदा नौकरी में बॉस थोड़ा तकनीकी व्यक्ति है इसलिए कभी-कभार बक पास करने का मजा ले लेते हैं!! ;) :D

    Like

  4. शायद इसी बात के डर से अटल बिहारी ने लिखा था ऊंचे पहाडों पर पेड़ नही उगते पौधे नही उगते न घास ही जमती है जमती है तो सिर्फ़ बर्फ जो कफ़न की तरह सफ़ेद और मौत की तरह ठंडी होती है.चलिए सच में अब सिम्पैथी बटोरना छोडिये शिखर पर सिर्फ़ अकेलापन ही नही होता जगह भी कम होती है ठेल दिए जायेंगे तो फ़िर सीधे नीचे .इसलिए हाथ पैर जमा के बैठिये

    Like

  5. मुझे लगता है, जब आप शिखर पर होते हैं, आपमें एक नन्हा सा देवव्रत भिष्म पैदा होता है. जो एकांकिपन से घबराते है, शिखर पर बैठने से बचते है. वहाँ जिम्मेदारी होती है. अच्छी मानसिक हलचल रही.

    Like

  6. सरगर्भीत चर्चा छेड़ने के लिए आप का अभिवादन. शिखर पर रहें या रसातल में, स्थितियाँ संभवतः समान ही रहेंगी. आभार.

    Like

  7. शिखर का एकांत एक ऐसी खामोशी, एक अकेलेपन का अंतहीन दायरा , क्षितिज के पार तक का सूनापन …..शायद…”regards

    Like

आपकी टिप्पणी के लिये खांचा:

Discover more from मानसिक हलचल

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading

Design a site like this with WordPress.com
Get started