जन प्रतिनिधि


लगभग दो दशक की बात है – मालवा, मध्यप्रदेश में एक सांसद महोदय मेघनगर में राजधानी एक्सप्रेस के ठहराव की मांग करते हुये कह रहे थे – बेचारे “गरीब आदिवासी जनों के लिये” मेघनगर में राजधानी एक्सप्रेस रुकनी चाहिये।

मेघनगर में अगर राजधानी एक्स्प्रेस रुकती तो वहां चढ़ने-उतरने वाले वही भर होते। वही गरीब आदिवासी जन। 🙂

… तब मुझे लगता था कि उनमें में जनता के लिये वास्तविक मुद्दे उठाने की न काबलियत है, न इच्छा शक्ति। पता नहीं कितना गलत या सही सोचता था मैं। पर मुझे लगता था संसदीय क्षेत्र को वे अपनी जागीर की तरह देखते थे।

अब क्या समय बदला है?


“जन प्रतिनिधि सामान्यत: अपनी सुविधा आवरण को परिपुष्ट करना चाहते हैं। जन सेवा तो बाई-प्रॉडक्ट भर है। इस समय भी, जब सरकार विकास के मुद्दे पर प्रचण्ड मत से जीती है। जन प्रतिनिधियों में परिवर्तन और विकास के मुद्दे पर न बहुत उत्साह दीखता है, न ललक। पूर्वांचल में वह उत्साह और ललक बहुत जरूरी है!” 


उस दिन हम शिवगंगा एक्स्प्रेस के वाराणसी की बजाय मण्डुआडीह से ओरीजिनेट होने के बाद ट्रेन के समय पर प्लेटफार्म पर चहल कदमी कर यह देखने का प्रयास कर रहे थे कि यात्री सरलता से स्टेशन पर आ कर गाड़ी में बैठ सकें, उसके लिये क्या और कुछ होना चाहिये। दक्षिण-पश्चिम छोर पर देखा तो लगा कि स्टेशन के दूसरी तरफ लहरतारा की ओर से और विश्वविद्यालय की ओर से यातायात आने के लिये दो फ्लाई ओवर हैं और एक रोड ओवर ब्रिज निकट भविष्य में भी बन जायेगा जो लेवल क्रासिंग गेट का शहर की ओर से ट्रेफिक जाम दूर कर देगा। अत: मण्डुआडीह में दूसरी ओर प्लेटफार्म और सर्क्यूलेटिंग एरिया बने तो बड़ा महत्वपूर्ण विकास हो ट्रेन चलाने में।

हम लोग चर्चा ही कर रहे थे कि एक सांसद महोदय आते दिखे प्लेटफार्म पर। उनसे दुआ-सलाम होने के बाद हमने सोचा कि वे जनता के भले के लिये कोई सुझाव बतायेंगे शिवगंगा एक्स्प्रेस के सुगम चालन के लिये। पर उन्होने कहा – अच्छा है यह गाड़ी मण्डुआडीह से चलने लगी। अब एक वी.आई.पी. लाउंज बन जाना चाहिये प्लेटफार्म पर।  

सांसद महोदय अपने प्रकार के यात्री के हिसाब से सोच रहे थे वी.आई.पी. लाउंज की बात करते समय – वैसे ही, जैसे दो दशक पहले के सांसद महोदय गरीब, आदिवासी जन के लिये मेघनगर में राजधानी का हॉल्ट मांग रहे थे।

जन प्रतिनिधि सामान्यत: अपनी सुविधा आवरण को परिपुष्ट करना चाहते हैं। जन सेवा तो बाई-प्रॉडक्ट भर है। इस समय भी, जब सरकार विकास के मुद्दे पर प्रचण्ड मत से जीती है। जन प्रतिनिधियों में परिवर्तन और विकास के मुद्दे पर न बहुत उत्साह दीखता है, न ललक। पूर्वांचल में वह उत्साह और ललक बहुत जरूरी है!

(मैं यह लिख रहा हूं; यद्यपि एक सांसद श्री रवीन्द्र पाण्डेय मेरे समधी हैं। वे जमीन से जुड़े होने की बात अक्सर करते हैं – भईया जो जमीन पर बैठे वो जम्मींदार!  मैं आशा करता हूं कि उनके क्षेत्र के लोग भी वैसा सोचते होंगे उनकी प्रतिबद्धता के बारे में। उनसे मेरा पारिवारिक मुद्दों से इतर वार्तालाप कम ही होता है। पर अबकी मिला तो यह चर्चा अवश्य करूंगा।)