बखरी वाले लोग

यह गांव अगर एक ‘औसत’ गांव भर ही हो कर रह गया और इसके ढेर सारे लोग बिना कुछ किये या सिर्फ ट्रक ड्राइवरी करते रह गये तो वह इस कारण से कि वे ‘बखरी’ के खासमखास होने के परावर्तित आभामण्डल में इतराते रहे।


रवींद्रनाथ जी मुझे बताते हैं कि विक्रमपुर गांव छोटा सा गांव है। मुख्यत: चार (हिस्से के) लोगों का गांव। बखरी (अहाता), इमली के बड़े पेड़ के पास के घर – इमलिहा, पोखर के इर्दगिर्द वाले – पोखरिहा और अपने मिट्टी के घर पर चूने की छींट लगा कर सौंदर्यीकरण करने वाले – चुनहा। यही चार समूह थे – बखरी, इमलिहा, पोखरिहा और चुनहा। तीन अन्य के बारे में फिर कभी लिखूंगा। यह पोस्ट बखरी वालों पर है।

बखरी या अहाता कहा जाता था/है पण्डित देवेंद्रनाथ दुबे जी के चार बीघे की चारदीवारी वाले अहाता के घर को। देवेंद्र भाई के बाबा थे पण्डित तेजबहादुर दुबे। उनका इलाके में बहुत दबदबा था। उनके समय में ही यह घर बना था। घर की चारदीवारी शायद उनके बाद बनी।

आज बखरी में देवेंद्र भाई रहते हैं। वे, उनके तीन भाई और उनके परिवार दुमंजिले मकान और चार बीघे के अहाते में रहते हैं। मैं रेलवे लाइन के उस पार अपने मकान से अपनी जरूरत का एक लीटर दूध लेने उनके घर जाता हूं। इस प्रकार दिन में एक बार उनके यहां जाना हो ही जाता है।

Devendranath Dubey
देवेंद्रनाथ दुबे, अहाता में सवेरे की सैर करते हुये।

आज शायद देवेंद्र भाई को उठने में देर हो गयी थी। वे अपनी सवेरे की सैर, जो वे अपने अहाते के परिसर में ही करते हैं, करते दिखे। बहत्तर वर्ष की उम्र में भी वे पूरी तरह चुस्त दुरुस्त हैं। वे अपने शरीर सौष्ठव, अपने पर्सोना के बारे में बहुत सजग हैं – बहुत कुछ हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी तरह। बातचीत करने में भी वे बहुत प्रभावशाली हैं।

वे जो भी पढ़ते-सुनते हैं; उसे स्मरण रखने और उसका हाजिरजवाबी में प्रयोग करने में सिद्धहस्तता उनके पास ईश्वरप्रदत्त है। बोलने की शैली जरूर उनकी खुद की मेहनत का परिणाम है; वर्ना, जैसा मेरी पत्नीजी बताती हैं, अपनी किशोरावस्था में देवेंद्र भाई थोड़ा हकलाया करते थे। इतिहास में ऐसे कई प्रभावशाली वक्ता हुये हैं जो बचपन में stammering किया करते थे। शायद देवेंद्र भाई भी वैसे ही हैं।

गांव में गिने चुने लोग हैं जिन से पठन पाठन और पुस्तकों की बात की जा सकती है – रामायण, भागवत से इतर साहित्य की। और उनमें से एक हैं देवेंद्र भाई। या यूं कहा जाये कि इस प्रकार के वे अकेले हैं।

सत्येंद्र (मन्ना) दुबे

देवेंद्र दुबे जी के सबसे छोटे भाई हैं मन्ना (सत्येंद्र दुबे)। खेती किसानी मन्ना के जिम्मे है। हाजिरजवाबी और हास्य मन्ना में भी प्रचुर है। उनके आगे चार भाई इस दुनियाँ में आये और अपने अपने तरीके से सफल हुये; अन्यथा मन्ना अगर इकलौते होते तो भी शायद इतने ही या इससे कहींं ज्यादा प्रभावशाली होते। शायद।

गांव में एक बखरी थी/है। पर गांव का सबर्बिया बनना; गांव के एक नये प्रकार का बखरीकरण को होते देखना रोचक होगा! … बस लोग जितनी जल्दी हो, ट्रक ड्राइवरी की मीडियॉकर मनोवृत्ति से निजात पायें और कर्मठ बनें। बस! … और वे बन भी रहे हैं!

खैर, जब मैं बखरी वाले लोगों के बारे में बहुत hagiographical लिख रहा हूं; तो यह न समझा जाये कि मैं अपने ससुराल के बारे में अच्छा-अच्छा ही कहना चाहता हूं। मैंने यह भी सुना है (और ऐसा लगता भी है); कि यह गांव अगर एक ‘औसत’ गांव भर ही हो कर रह गया और इसके ढेर सारे लोग यूंही बिना कुछ किये या सिर्फ ट्रक ड्राइवरी करते रह गये; तो इसका एक कारण यह भी है कि वे ‘बखरी’ के खासमखास होने के परावर्तित आभामण्डल में इतराते रहे। अब सम्भावनायें बन रही हैं कि विक्रमपुर एक गांव से उठ कर सबर्बिया बनने जा रहा है; लोग अपनी अपनी क्षमता के अनुसार कर्म कर रहे हैं। आर्थिक आधार पर आगे के दशक अलग प्रकार के होंगे। अगर जीडीपी 8-10 परसेण्ट सालाना बढ़ी और यह गांव हाईवे के किनारे होने का लाभ ले पाया तो यहां एक नहीं यहां आधा दर्जन बखरियाँ खड़ी होने की सम्भावनायें बनती हैं। एक दो तो इसी बखरी के ऑफशूट से बनेंगी। इसी घर की अगली पीढ़ियां प्रतिभासम्पन्न हैं और उनके गांव में रीवर्स-माइग्रेट होने की सम्भावनायें भी बनती हैं। आखिर यह गांव बनारस के छोर से मात्र पच्चीस मिनट की दूरी पर है।

गांव में, रेल लाइन उस पार मेरा अपना घर। मैं बभनौटी से दूर दलित, पासी, केवट लोगों के बीच रहता हूं।

मेरे स्वसुर जी; स्वर्गीय पण्डित शिवानंद दुबे (देवेन्द्र भाई और मन्ना के चाचा) कुछ अर्थों में भविष्यदृष्टा थे। मेरी पत्नीजी बताती हैं कि वे पंचायती राज के बदलते मिजाज, गांव के बनारस के समीप आते जाने और गांव के बदलते स्वरूप के बारे में बहुत बार बहुत कहते थे और उसे मेरी पत्नी जी आश्चर्य से सुना करती थीं। उन्हीं के अंदाज में भविष्य के गांव की कल्पना करना रुचता है मुझे। और, इस इलाके के बदलते स्वरूप के प्रति मैं बहुत आशान्वित हूं।

शायद वह एक कारण है कि इस जगह को छोड़ कर कहीं और जानेवाला नहीं। 😊

गांव में एक बखरी थी/है। पर गांव का सबर्बिया (sub-urban रूपांतरण) बनना; गांव के एक नये प्रकार का बखरीकरण को होते देखना रोचक होगा! … बस लोग जितनी जल्दी हो, ट्रक ड्राइवरी की मीडियॉकर मनोवृत्ति से निजात पायें और कर्मठ बनें। बस! … और वे बन भी रहे हैं!


आज गांव और #गांवपरधानी

“नेता लोगन क बहुत कपड़ा धोवात-कलफ-प्रेस करात हयें। फुर्सत नाहीं बा (नेता लोगों के आजकल प्रधानी चुनाव के कारण बहुत कपड़े धुलाई-कलफ लगाई और प्रेस कराई के लिये मिल रहे हैं। फुर्सत नहीं मिल पा रही)।”


दूध लेने गया था मन्ना पण्डित के अहाता में। आज मिल गये। वर्ना सामान्यत: सात बजे गायों के दुहने और दूध घर में आने के बाद वे मोटरसाइकिल पर निकल चुके होते हैं। चुनाव के उस दौर में जब सीटों के आरक्षण की घोषणा नहीं हुई थी, तब वे सवेरे क्लीन शेव, कलफ लगा कुरता पायजामा और बढ़िया स्पेर्ट्स शू के साथ तैयार दिखते थे। तब उनके जिला पंचायती के वार्ड नम्बर 26 से चुनाव लड़ने के पोस्टर लगे थे।

क्षेत्र बड़ा होने के कारण दिन भर प्रचार के लिये व्यतीत करना होता था। पर वार्ड की सीट आरक्षित वर्ग के लिये हुई घोषणा ने सब गुड़ गोबर कर दिया। पोस्टर लगवाने और घूम कर प्रचार करने में फुंके पेट्रोल का खर्चा बट्टे खाते चला गया। चूंकि रसूख वाले व्यक्ति हैं; अत: उनके पोस्टर अब भी लगे हैं। किसी ने फाड़ने की गुस्ताखी नहीं की है। पर चांस तो चला ही गया!

मन्ना पण्डित

मन्ना दुबे को परधानी के परिदृष्य का जायजा लेने के लिये सवाल किया। जवाब – “सब बेकार है। सब सरये हाथ जोड़ घूमत हयें। अभी पैर छूने को कहो तो सारे के सारे दण्डवत लेट जायेंगे आपके सामने। जीत जाने पर रंगबाजी छांटेंगे।”

“तब भी, किसी को बैकिंग देने का तय तो किया होगा?”

मन्ना ने नॉन कमिटल जवाब दिया – “नाहीं जीजा। जो कोई ढंग का निकलेगा। काम करेगा। उसको देखा जायेगा। अभी मन नहीं बनाया है।”

मन्ना का अहाता बड़ा है। तीन चार बीघे की चारदीवारी है। गांव में सबसे ज्यादा रसूख-रुतबा! सभी उम्मीदवार यहां ‘आसीर्बाद’ ले कर गये ही होंगे। मन्ना खुद प्रधान रह चुके हैं। इसलिये गांव की राजनीति को समझने में उनसे बेहतर व्यक्ति कोई नहीं हो सकता। गांव की सामाजिकता और राजनीति वे ओढ़ते बिछाते हैं। पर उन्होने पत्ते नहीं खोले; सिवाय इस जनरल स्टेटमेण्ट के कि ‘सब सरये मायावती क जैजैकार करई वाले हयेन’। उन्होने यूंही, या जानबूझ कर मुलायम/अखिलेश को जैजैकारियत से नहीं जोड़ा! 🙂

पांड़े लोगों के आसपास की दीवार पर पोस्टर

इमलिहा पांड़े लोगों की दीवार पर किसी श्रीमती निर्मला सोनी का परधानी का पोस्टर लग गया था। पिछला एक उम्मीदवार का पोस्टर तो नुच गया था। अब क्या अंदाज लगाया जाये कि पंड़ान निर्मला सोनी के पाले में है? कल पण्डित रमाशंकर पांड़े मिले थे। कलकत्ता से किसी के तेरही में आये थे। फ्लाइट से आये और फ्लाइट से ही लौट गये। अब गांव में लोग बम्बई-कलकत्ता से यूं आते जाते हैं मानो बनारस-प्रयागराज से आ-जा रहे हों। हवाई जहाज अब (अपेक्षाकृत सम्पन्न) गांववासियों के डोमेन में आ चुका है। एक हम ही साइकिलहे बचे हैं!

राजेश की जलेबी – समोसा की दुकान पर रुक कर मैंने पूछा – “कोई परधानी का केण्डीडेट जलेबी-समोसा खिलवाने नहीं लाया लोगों को अभी तक?” राजेश का उत्तर नकार में था। अभी लगता है परधान लोग नाश्ता कराने की प्रतिस्पर्धा में नहीं जुटे। शायद पर्चा दाखिल होने के बाद जलेबी-समोसा जोर पकड़े। वैसे यह सुना है कि असल जोर तो बोतल, चिलम, गांधी जी वाले कागज आदि से पड़ता है। उसकी सूचना शायद मुझ जैसे कमजोर ब्लॉगर को न मिल पाये। 😆

फुलौरी-उमेश पण्डित की सरसों का खलिहान

उमेश पण्डित की सरसों खलिहान में आ गयी है। सवेरे आज फुलौरी (उनका अधियरा) नहीं था वहां। पर सरसों की खलिहान में रखी फसल का चित्र तो मैंने साइकिल रोक कर लिया। उमेश की किराना दुकान पर आज उमेश नहीं दिखे, पर भगवानदास जरूर मिले। मैंने पूछा – “कोई बाटी-चोखा खिलाने वाला आया या नहीं?”

हंसते हुये भगवानदास ने जवाब दिया – “अभी तक नहीं। इतने पोस्टर लग गये हैं, पर अभी किसी ने हामी नहीं भरी। लगता है पर्चा भराई होने पर खिलायेंगे!” भगवानदास छाप आशावाद पूरा गांव पाले हुये है।

कल गांजा गैंग का शिवरात्रि की रात का हरिनाम कीर्तन/जागरण अलबत्ता खूब बढ़िया मना। रात भर माइक पर उनकी आवाज आती रही!

मेरी पत्नीजी ने कहा था कि असल परधानी हालचाल उमेश या तूफानी की दुकान पर मिलेगा; जहां लोगों की बैठकी होती है। पर दोनो ही अपनी दुकान पर नहीं थे। तूफानी की दुकान पर राजन भाई जरूर विराजमान थे। पर मेरा आजकल का आकलन है कि उनके पास गांव की सामान्य और #गांवपरधानी हलचल की कोई झन्नाटेदार खबर नहीं होती। वे गांव की रहचह के बुझते कारतूस हैं।

लेवल क्रॉसिंग पर एक व्यक्ति लहसुन प्याज की बोरी लिये था। ट्रेन आने वाली थी। उससे भुजाली ने लहसुन का दाम पूछा तो बताया अस्सी रुपया किलो। पर मैंने पूछा तो बताया – नब्बे रुपये किलो लहसुन और तीस रुपया किलो प्याज। खरीददारी करनी हो तो मुझे अपने कपड़े और मैले, और पुराने पहनने चाहियें।

यह लहसुन प्याज वाला भी फेरी से सामान बेच रहा था।

वैसे यह लहसुन प्याज वाला भी फेरी से सामान बेच रहा था। सवेरे सात बजे महराजगंज बाजार से लहसुन प्याज ले कर निकला है और कई गांवों में घूम कर ईग्यारह बजे वापस अपने स्थान पर पंहुच जायेगा। कई प्रकार के कई सामान वाले फेरीवाले इस प्रकार सवेरे के काम से 3-4 सौ कमा ले रहे हैं। बाकी दिन कोई और काम करते हैं।

एक और नित्य का कमाई वाला काम करता दिखा। साइकिल पर बेलपत्र और दूब के गठ्ठर लादे था। यह बेलपत्र और दूब बनारस जाती है – बाबा विश्वनाथ मंदिर के लिये।

वह साइकिल पर बेलपत्र और दूब के गठ्ठर लादे था। यह बेलपत्र और दूब बनारस जाती है – बाबा विश्वनाथ मंदिर के लिये।

बेल पत्र तथा दूब तोड़ने और उसे ठीक से जमा करने, ले जाने के काम में करीब गांव के पचास लोगों की जीविका चलती है। जब सवारी ट्रेन चलती थी तो किराये की भी बचत होती थी। अभी यह ऑटो या टाटा मैजिक से जाती है बनारस। विश्वनाथ मंदिर बहुत लोगों की जीविका चलाता है।

यह एक और किशोर था बेल पत्र और दूब ले जाता हुआ।

ये फेरीवाले या बेलपत्र-दूब वाले परधानी के चुनाव से निस्पृह, अपने काम में लगे हैं। रोजी रोटी कमा रहे हैं। परधानी की चकल्लस तो हम जैसे निठल्लों के लिये मनोरंजन का साधन है।

घर वापसी के समय बसंत भी मिल गये। बसंत कनौजिया। उनके भाई सुबेदार ग्रामपंचायती के लिये खड़े होने वाले थे, पर सीट ओबीसी के पाले में चली गयी। फिलहाल बसंत भी बहुत व्यस्त हैं। “नेता लोगन क बहुत कपड़ा धोवात-कलफ-प्रेस करात हयें। फुर्सत नाहीं बा (नेता लोगों के आजकल प्रधानी चुनाव के कारण बहुत कपड़े धुलाई-कलफ लगाई और प्रेस कराई के लिये मिल रहे हैं। फुर्सत नहीं मिल पा रही)।”

तो यह था #गांवपरधानी के एक दिन का हाल। ऐसे जाने कितने दिन गुजरेंगे! विक्रमपुर टाइम्स की कई चार-छ-आठ कॉलम की हेडलाइंस की खबरें बनेंगी! इधर ही समय व्यतीत हो जा रहा है। गंगा किनारे जाना ही नहीं हो रहा! 😆