मुसहर बस्ती के चित्र #गांवकाचिठ्ठा

करीब आठ-दस परिवार हैं। उनके प्रति हिकारत, उपेक्षा, शंका और उदासीनता का स्थायी भाव लोगों में है। उसमें कमी नहीं आयी है।


करुणा जब ज्यादा जोर मारती है तो मैं मुसहर बस्ती की ओर निकल लेता हूं। उनकी छोटी जरूरतें – कपड़ा, सर्दी में कम्बल, खाने को कुछ सामग्री – हम कुछ पूरी कर पाते हैं। वे भी लेने को तैयार रहते हैं। वहां पंहुचते ही पहले तो तोलते से दीखते हैं कि कोई उन्हें तंग करने तो नहीं चला आया। आश्वस्त होने पर आसपास आने लगते हैं।

करीब आठ-दस परिवार हैं। चेहरे मोहरे की बनावट से यह स्पष्ट लगता है कि वे पूरी तरह बनवासी नहीं रहे। आसपास की जनसंख्या ने उन्हे अवैध तरीके से ही सही, अपने गुणसूत्र दे दिये हैं। निशाचरीय सम्बंध तो बनाये होंगे, पर उनके प्रति हिकारत, उपेक्षा, शंका और उदासीनता का जो स्थायी भाव लोगों में है, उसमें कमी नहीं आयी है।

मुसहर बस्ती
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