आज का आत्मबोध


वह तो भला हो कि ब्लॉग और सोशल मीडिया पर; आप कितना भी साधारण लिखें, लोग प्रशंसा कर देते हैं। थोड़ी बहुत ईगो मसाज हो जाता है। अन्यथा, गांवदेहात में, ससुराल में घर बना कर रहना वैसा ही है मानो बत्तीस दांतों के बीच फंसी निरीह जीभ होना।

मटकी पुर के अंजनी दुबे और चैटजीपीटी


ग्रामीण जीवन को – अगर लोग मेहनती हैं – एआई बेहतर ही बनायेगा। उनके काम को अपग्रेड करेगा और शहराती लोगों से कहीं बेहतर तरीके से वे जी सकेंगे। अंजनी कुमार का भविष्य बेहतर ही होगा।

विराटनगर से भामोद और लू लगने से अस्वस्थता


लू लगने से बुखार में तपता आदमी 925 किमी की यात्रा करे बस और कार में! मेरे ख्याल से निहायत पागलपन है। पर पूरा भारत भ्रमण बिना संसाधन, महादेव के सहारे, पैदल करने वाला उन्हीं के गण जैसा ही तो होगा!

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