एक तुच्छ सी किरिच का क्या भाग्य लिखा था!


अरविंदो आश्रम, पॉण्डिचेरी या रतलाम की स्मृतियों में कई बार ऐसी कथाएँ निकल आती हैं जो मन में यूं घुमड़ती हैं कि छोड़ती ही नहीं। डॉ. हीरालाल माहेश्वरी ऐसे ही साधक थे, जिनकी बातें बार बार हम – मैं और मेरी पत्नीजी – याद करते हैं। आज उनकी याद करते पत्नीजी ने उनकी बताई एकContinue reading “एक तुच्छ सी किरिच का क्या भाग्य लिखा था!”

महराजगंज के बलदाऊ दुबे, उम्र 98 वर्ष


मैं इन दिनों महराजगंज के पुराने बाज़ार की परतें खोलने की कोशिश कर रहा हूँ। हाट, सराय, बनियों का जमाव, और वह शुरुआती कस्बाई हलचल — इन्हें समझने के लिये जीवित साक्षियों को खोजना पड़ता है। उनकी स्मृति ही असली दस्तावेज़ है। आखिर गजेटियर या कोई आर्काइव तो है नहीं खंगालने को! इसी खोज मेंContinue reading “महराजगंज के बलदाऊ दुबे, उम्र 98 वर्ष”

क्यों धुँधला जाती है यह ऊष्मा? कृष्ण-दृष्टि से देखें जीजा–फूफा के रिश्ते


भारतीय परिवारों की गर्माहट जितनी जल्दी पैदा होती है, उतनी ही जल्दी कभी-कभी धुँधली भी होने लगती है। कुछ रिश्ते शुरुआत में पूरे जोश, सम्मान, सहजता और नयी-नयी आत्मीयता के साथ फूल जाते हैं—जीजा, फूफा, समधी जैसी भूमिकाएँ इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। विवाह के शुरुआती सालों में इन पात्रों को एक तरह का “समारोह-प्रधानContinue reading “क्यों धुँधला जाती है यह ऊष्मा? कृष्ण-दृष्टि से देखें जीजा–फूफा के रिश्ते”

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