गेर वाली हौ रे, साइकिल

नई बिजली वाली साइकिल लेकर इन दिनों गांव-देहात में घूम रहा हूँ। जैसे ही घर से निकलता हूँ, बारह-पंद्रह किलोमीटर का इलाका मेरी रोज़ की छोटी दुनिया बन जाता है। कच्ची सड़कें, खेतों की हवा, कहीं किसी घर से उठती उपलों  के चूल्हे की गंध—और बीच-बीच में बच्चों के चिल्लाने की आवाज़। सफ़र खुद-ब-खुद मुस्कुराने लगता है।

यह यहां की पहली ई-साइकिल है। इसलिए जहां भी साइकिल रोकिये—जिज्ञासा का झुंड तैयार मिलता है।
“कितना चलती है?”
“चार्ज में कितना समय लगता है?”
“बिजली वाली है तो पैडल काहे मारते हैं?”
“कित्ते में पड़ी?” 

Bijali
बिजली, गंगा किनारे

अब तो उत्तर बिना सोचे निकल आते हैं—बैटरी पर पैंतीस-चालीस, पैडल-असिस्ट में सड़सठ-सत्तर, चार्जिंग चार घंटे में। बीस हजार की पड़ी और महराजगंज से ही ली—पहले किसी ने ऑर्डर नहीं किया था, तो दुकानदार ने खास मंगवाई।

बच्चे मेरे सबसे पक्के दर्शक हैं। दूर से किसी की टेर आती है—“हौ देखऽ, कइसन साइकिल बा!”
दूसरा तुरन्त इंटेलिजेंट बन जाता है—“गेर वाली हौ रे!”

और कोई छोटा बच्चा झिझक कर बैटरी छूता है—मानो पता नहीं कब बिजली उछलकर काट ले!

Electric Cycle and Child
छोटा बच्चा झिझक कर बैटरी छूता है—मानो पता नहीं कब बिजली उछलकर काट ले! चित्र एआई का बनाया।

कभी कोई बराबर में चलता साइकिल वाला कह देता है—“बिजली की है तो पैडल काहे?”
मैं समझाता हूं—“आधा मैं, आधा मोटर जोर लगाते हैं।”

पर उसकी भौंहें कहती हैं—यह “बुढ़ाते आदमी की सनक” ही है। वरना चार गुना कीमत देकर पैडल मारने का क्या तुक?

मुझे तो मज़ा आता है। शरीर चलता रहता है, और मोटर उस चलने को थोड़ा आसान बनाती है। यह आपस-दारी अच्छी लगती है।

कभी मन में आता है—अगर हर चालीस-पचास किलोमीटर पर चार्जिंग मिल जाए, तो कम्बल, टेंट, कपड़े, लैपटॉप बाँधकर भारत-भ्रमण कर लूं। उम्र सत्तर सही, पर मन में उठती परिकल्पनाओं पर किसी सरकार ने रोक थोड़े ही लगा रखी है।

मैं आधुनिक युग का ऋषि तो नहीं बन सकता पर शायद शेख चिल्ली का आधुनिक अवतार जरूर बन सकता हूं! 

फ़िलहाल तो यह बिजली वाली साइकिल गांव-देहात में मेरी सबसे भरोसेमंद साथी है। सुना है अब सौ-दो सौ किलोमीटर तक चलने वाली भी आने वाली हैं। वह मिल गईं—बस मान लीजिये, मेरी घुमक्कड़ी का नक्शा अचानक बहुत बड़ा हो जाएगा।





Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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