आदर्श चीफ ट्रेन कंट्रोलर गोस्वामी जी

गोस्वामी जी, टेन कंट्रोलर

नीलकंठ बरियापुर के रिटायरमेंट होम में तैयार हो कर सैर पर निकलने जा रहा है। वह जूते—स्पोर्ट्स शू—पहन रहा था। झुकते ही कमर में हल्का दर्द उठा। सत्तर साल की उम्र में कभी किधर, कभी उधर दर्द होना अब रूटीन है। उससे क्या शिकायत?
शरीर अपनी उम्र याद दिलाता रहता है, पर मन अपनी नहीं मानता।

पर यादें हैं—जाने कहां ले जाती हैं।
नीलकंठ को गोस्वामी जी याद आ गये।

चालीस साल पहले का दृश्य। रतलाम। नीलकंठ वहाँ बतौर सहायक परिचालन अधीक्षक पोस्ट हुआ था। पहली पोस्टिंग। रतलाम जैसे व्यस्त रेल मंडल का यातायात अधिकारी—बिना किसी अनुभव के। उसे आज भी समझ नहीं आता कि जोनल चीफ साहब ने उसमें क्या देखा था। शायद कोई संभावना, शायद सिर्फ़ एक खाली जगह। उस समय तो इतना ही पता था कि जिम्मेदारी बड़ी है और हाथ खाली।

रतलाम ट्रेन कंट्रोल में चीफ ट्रेन कंट्रोलर थे—गोस्वामी जी। उनके रिटायरमेंट में बस एक महीना बचा था। एक तरफ नीलकंठ नौकरी शुरू कर रहा था, दूसरी तरफ गोस्वामी जी उसे समेट रहे थे। जैसे दो पटरियाँ—एक आगे की ओर जाती हुई, दूसरी धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म से बाहर।

गोस्वामी जी शांत भाव से काम करने वाले गाड़ी नियंत्रक थे। नीलकंठ ने कभी उन्हें ऊँची आवाज़ में बोलते नहीं सुना। न डांटना, न हड़बड़ी। ट्रेन रनिंग के बारे में उनकी दूरंदेशी विख्यात थी। वे चीफ कंट्रोलर की मेज पर बैठे-बैठे पूरे मंडल को मन में देख लेते थे—कौन-सी गाड़ी कहाँ है, किस सेक्शन में दबाव बढ़ेगा, और अगले दो-तीन घंटे में स्थिति किस तरफ़ जाएगी।
कभी-कभी नीलकंठ को लगता, गोस्वामी जी नक्शे नहीं देखते—वे नक्शा हो जाते हैं।

फोन पर वे पोज़ीशन लेते, दो-चार सवाल पूछते, और फिर संक्षिप्त निर्देश देते। उनके ब्रीफ में शब्द कम और आश्वासन ज़्यादा होता था। उनकी सलाह को कोई अनदेखा नहीं करता था—इसलिए नहीं कि वे सीनियर थे, बल्कि इसलिए कि उन्होंने पहले भी ग़लतियों से परिचालन को उबारा था। उन दिनों किसी बड़े डिरेलमेंट या ट्रैफिक जाम की याद आते ही लोग कहते—“अगर गोस्वामी जी होते तो शायद ऐसा न होता।”

कंट्रोल के लोगों ने नीलकंठ को सलाह दी—
“एक ही महीना है गोस्वामी जी का। उनसे ट्रेन यातायात का काम सीख लीजिये। वे चले जायेंगे तो आप एक महत्वपूर्ण अवसर खो देंगे।”

नीलकंठ ने यह बात गांठ बाँध ली। उसने गोस्वामी जी को पूरा आदर दिया। दिन में दो-तीन घंटे उनके पास बैठता। काम की बारीकियाँ सीखता—किस जटिल स्थिति में क्या निर्णय देना है, कैसे अपने मन में ट्रेनों की वर्तमान स्थिति को पकड़ कर अगले कुछ घंटों का फ्लो सोचना है, अपने पद की अहमियत और उसकी सीमाएँ कहाँ हैं।
गोस्वामी जी कभी लंबा उपदेश नहीं देते थे। बस कहते—“सोच कर बोलो, और बोल कर डटे रहो।”

नीलकंठ अब याद करता है—वह तब सचमुच कुशल लर्नर था, और गोस्वामी जी अति कुशल सिखाने वाले। उन्होंने ज्ञान ही नहीं दिया, दृष्टि दी।

रिटायरमेंट से कुछ दिन पहले गोस्वामी जी चिंतित दिखने लगे। कारण काम का नहीं था। रिटायरमेंट से पहले आवास खाली कर वेकेशन सर्टिफिकेट लेना ज़रूरी था। नहीं तो पेंशन प्रोसेसिंग अटक जाती—और दो-तीन महीने बाद ही पैसा मिलना शुरू होता। सरकारी सेवा की यह छोटी-सी बड़ी गाँठ उन्हें परेशान कर रही थी।

नीलकंठ ने सहज ही कहा—
“मैं तो चार कमरे के घर में अकेला रहता हूँ। आप मेरे यहाँ शिफ्ट हो जाइये, और घर का वेकेशन दे दीजिये।”

गोस्वामी जी की समस्या हल हो गयी। वे और उनकी पत्नी नीलकंठ के साथ रहने आ गये। रिटायरमेंट के हफ्ता भर बाद तक वे साथ रहे। नीलकंठ को गोस्वामी जी का सानिध्य तो मिला ही, श्रीमती गोस्वामी के हाथ का भोजन भी मिलने लगा।
वह समय बिना किसी औपचारिकता के बीतता था—जैसे नौकरी और पद के बीच की सारी दीवारें गिर गयी हों।

रिटायरमेंट होम का नौकर सेंटर टेबल पर चाय रख गया। सैर पर जाने से पहले की चाय। साथ में दो मेरी बिस्कुट।
नीलकंठ तो चालीस साल पहले की यादों में खोया था।

उसे याद आया—श्रीमती गोस्वामी सवेरे चाय के साथ रात की बची रोटी के टुकड़े प्लेट में रखती थीं। रोटियाँ—जो ओवरनाइट फरमेंट हो जाती होंगी। वे उन पर हल्का नमक और घी लगाकर तवे पर गरम कर देती थीं। उनका स्वाद नीलकंठ की स्मृति में आज भी ताज़ा था।
वह स्वाद सिर्फ़ भोजन का नहीं था—वह अपनत्व का था।

पता नहीं अब गोस्वामी दंपति कहाँ होंगे। होंगे भी या नहीं। चालीस साल हो गये। गोस्वामी जी ज़िंदा होंगे तो अट्ठानवे के होंगे। होंगे क्या?

नीलकंठ को याद आया—जब वह पहली बार गोस्वामी जी से मिला था, तो वे उसे “सर” कह कर संबोधित करते थे। वह “सर” कितनी जल्दी “बेटा” में बदल गया—उसे पता ही नहीं चला।

गोस्वामी जी, चीफ ट्रेन कंट्रोलर
गोस्वामी जी, चीफ ट्रेन कंट्रोलर । चित्र चैट जीपीटी द्वारा

जूते बाँधते समय अगर कमर में दर्द न हुआ होता, तो चीफ कंट्रोलर की मेज पर बैठे गोस्वामी जी का झुक कर ज़मीन पर गिरी पेन की कैप उठाना, और उसी बहाने पूरी स्मृति का यूँ उभर आना—शायद न होता।

चाय के साथ मेरी बिस्कुट खाते हुए नीलकंठ ने सोचा—
नौकर से वह कहेगा कि कल से वह बासी रोटी घी-नमक लगाकर दिया करे। मेरी बिस्कुट की जगह।

कुछ स्वाद उम्र के साथ लौट आते हैं।
और कुछ लोग—कभी जाते ही नहीं।

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नीलकंठ चिंतामणि मेरा वह रूप है जो यादें साझा करते समय पूरी लिबर्टी लेता है। यादें कभी धुंधली भी होने लगती हैं सो नीलकंठ उन्हें प्रस्तुत करता है – जीडी नहीं।

Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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