सुधा जी की शादी और पालकी का जमाना

Sudha Shukla Header

सुधा शुक्ल हमारे घर मिलने आईं। पंड़ाने (पांडेय लोगों के घरों का समूह) के दीपू की बुआ हैं वे। मेरी पत्नीजी की हमउम्र, जन्म 1959–60 के आसपास। करीब एक किलोमीटर पैदल चलकर आई थीं।

वे और मेरी पत्नीजी बचपन की सखियाँ हैं। उस समय सखियाँ अग्नि को साक्षी मानकर बनती थीं—जैसे राम और सुग्रीव। सुधा और रीता ने ऐसा किया था या नहीं, पता नहीं; पर आज जिस स्नेह से वे मिलीं, वह बहुत अच्छा लगा।

इन दिनों मुझे पुराने समय को जानने का कीड़ा लगा है। शायद अमृतलाल नागर जी की तरह ओरल हिस्ट्री टटोलने की कोशिश। इसी क्रम में मैंने सुधा जी से उनकी शादी के बारे में पूछा।

उनकी शादी 1973 में हुई, गौना 1976 में। सोलह वर्ष की रही होंगी।
“पालकी में बिदाई भई रही हमार!” उन्होंने बताया। अकेली थीं पालकी में, पर्दे बंद। सोलह साल की लड़की और तैंतीस किलोमीटर की यात्रा। सवेरे करीब नौ बजे बिदाई, शाम पांच बजे ससुराल—जंगीगंज के उत्तर बड़ागांव—पहुंची पालकी।

सोलह साल की उम्र, बंद पर्दा और तैंतीस किलोमीटर—यह दूरी नहीं, एक जीवन से दूसरे जीवन की छलांग थी।

उस समय पालकी कंहार नहीं ढोते थे। उनका दर्जा “अपग्रेड” हो चुका था; इंदारे से पानी भरने का काम भी चापाकल आने से खत्म हो गया था। पालकी मुसहर ढोते थे।

मेरे ड्राइवर अशोक ने बचपन में मुसहरों के टोले में पड़ी एक पालकी देखी थी। यानी जब पालकी युग खत्म हुआ, तब उसे उठाने वाले मुसहर ही बचे थे। कंहार और पालकी का रिश्ता टूट चुका था।

कंहार के हाथ से छूटी पालकी, मुसहर के हाथ में आई—यहीं से इतिहास चुपचाप मुड़ गया।

पतई (रमाशंकर पाण्डेय) जी—सुधा के बड़े भाई—ने बताया कि वे 1971 में अपनी शादी में पालकी से गए थे। बारात गांव से अनई (बाबतपुर के पास) गई थी। नक्शे में दूरी 29 किमी है, पर खेतों की मेड़ों से होकर करीब 26 किमी चली पालकी। सवेरे 11 बजे निकली और शाम पांच बजे, द्वारचार से पहले पहुंची।

लगता है 30–35 किमी की दूरी दिन भर की पालकी यात्रा के लिए उपयुक्त मानी जाती थी।

पालकी के साथ एक नाऊ चलता था—गुड़, चना-चबैना, गांजा-तंबाकू और लोटा-डोरी लिए। रास्ते में रुककर नाऊ कुएं से पानी निकालता। न बिसलेरी थी, न सुराही। नाऊ, कुआं, लोटा और रस्सी—यही उस समय का वाटर सप्लाई सिस्टम था, जो सदियों चला।

रमाशंकर जी ने बताया—वे शादी में पालकी से गए थे, पर गौने में उनकी पत्नी एम्बेसडर कार से आईं। पालकी जा रही थी, कार युग आ रहा था। संक्रमण काल था।

मैंने देसी पालकी का चित्र बनाने के कई प्रयास किए, पर एआई सही बिंब नहीं बना पाया। वह सामग्री, वह दृश्य इंटरनेट से गायब है। ओरल हिस्ट्री जल्दी धुंधली होती है—पचास साल पुरानी बातें भी।

मैंने सुधा जी का गीत भी रिकॉर्ड किया, पर पत्नीजी ने ब्लॉग पर डालने से मना किया—परिवार क्या सोचे, यह विचार कर।

Sudha Shukla
श्रीमती सुधा शुक्ल

इसलिए बात पालकी, मुसहर, नाऊ, लोटा-डोरी और इंदारे के जल तक ही सीमित है।

पचास साल में ही लोग और रिवाज़ फेड आउट हो रहे हैं। दस साल में शायद स्मृति से भी।

ओरल हिस्ट्री की सबसे बड़ी त्रासदी यही है—समय पर न लिखी जाए, तो सच होते हुए भी गुम हो जाती है।

@@@@@@@

Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

आपकी टिप्पणी के लिये खांचा:

Discover more from मानसिक हलचल

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading

Design a site like this with WordPress.com
Get started