परसों शाम अचानक आँधी आई। अस्सी किलोमीटर की रफ़्तार से धूल भरी — घटाटोप अँधेरा छा गया। अभी एक घंटा बचा था सूरज ढलने में, पर रोशनी इतनी कम कि लगे रात के आठ बज गये।
हमने सारी खिड़कियाँ-दरवाज़े बंद किये। ड्राइवर अशोक को कहा कि वह अंदर आ कर बैठ जाये। पर उसने बताया कि बच्चे, औरतें, आदमी — सब आम बीनने निकल लिये हैं। उन्हें इसकी फ़िक्र नहीं कि आँधी उड़ा ले जायेगी, कोई डाल टूट कर उनपर गिरेगी, कोई टिन की छत उखड़ कर घायल कर देगी।
एक आम की चाहत — और यह भाव कि अगर उन्होंने पहले नहीं उठाया तो कोई दूसरा लपक लेगा — उन्हें तेज़ हवा में जान का जोखिम लेने को प्रेरित कर देती है।
टूट कर डालियाँ गिरीं। हमारे परिसर में ही एक नीम की डाल पट्ट से टूटी। उसके बाद गूलर का मज़बूत पेड़ तीन भागों में टूट गया। जाने कितने पक्षी उसपर आसरा पाते थे, बेआसरा हो गये होंगे। आम और छितवन की डालियाँ भी टूटीं।
कितना नुकसान हुआ — उसके लिये कौन बाहर निकलता। बिजली तो आँधी शुरू होते ही कट गई थी, पर सोलर पैनल काम कर रहा था। वाई-फ़ाई का टॉवर तड़ित बिजली से फुँक न जाये — मैंने उसकी बिजली काट दी। अपने आप को घर की दीवारों में समेट लिया।
आधा घंटे बाद हवा का ज़ोर कम हुआ। पर तब भी बाहर निकलने लायक नहीं था। लेकिन तीन लोग हमारे दरवाज़े पर खड़े थे — मोनू भी उनमें था। मुँह में पान मसाला दबाये, निस्पृह भाव से। इजाज़त माँगने में अनुनय कम था, औपचारिकता ज़्यादा — जैसे यह तो होना ही था, बस एक खानापूर्ति थी। वे परिसर में गिरे नीम और गूलर की शाखाएँ घसीट ले जाना चाहते थे। इन डालों की पत्तियाँ उनकी बकरियों के चारे और डालें उनके चूल्हे के ईंधन का काम करने वाली थीं।

मैं देख रहा था। यह व्यवहार मुझे अजीब लग रहा था — न निंदा थी मन में, न सहानुभूति की लहर। बस एक अचरज कि यह आदमी अभी यहाँ है, इस काम में, इस तरह।
अगले दिन सुबह पढ़ा — आँधी में 117 लोग मारे गये थे। पास 10 किलोमीटर दूर उगापुर में 7 लोग गिरे पेड़ के नीचे दब कर खतम हो गये। ये वे आँकड़े हैं जो दर्ज हुए होंगे। यहाँ बहुत कुछ दर्ज होता ही नहीं।
मुझे पड़ोस की वे औरतें याद आती हैं जो तेज़ आँधी में आम बीन रही थीं। मोनू याद आता है।
और मैं सोचता हूँ — यह व्यवहार आता कहाँ से है? जो दो कच्चे आम के लिये जान की फ़िक्र नहीं करता?
जवाब मेरे पास नहीं है। पर इतना ज़रूर लगता है — जो आम बीन रहे थे, वे पागल नहीं थे। उनकी दुनिया में कल अनिश्चित है, इसलिए अभी ज़रूरी है। जोखिम उनके लिए कोई नई चीज़ नहीं — वह तो हमेशा से हवा की तरह है, दिखता नहीं पर रहता है।
मैंने दरवाज़ा बंद किया था।
उनके पास दरवाज़ा था।
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“उनकी दुनिया में कल अनिश्चित है, इसलिए अभी ज़रूरी है।” कड़वा सच और बेहतरीन पंक्ति।
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आपकी जय हो!
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उनकी दुनिया में कल अनिश्चित है, इसलिए अभी ज़रूरी है। -दुखद है किन्तु शायद यही सत्य है.
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