मेरे घर की जलमुर्गी

Jal Murgi

मेरे घर में एक जलमुर्गी आती है।

मैं यह नहीं कह सकता कि वह यहीं रहती है। पक्षियों के पते मनुष्यों की तरह नहीं होते। फिर भी वह इतनी नियमितता से आती है कि घर का हिस्सा लगने लगी है। जैसे कोई पड़ोसी हो जो बिना सूचना दिए आता-जाता रहता हो।

उसकी चाल मुझे शुरू से आकर्षित करती रही है। अधिकांश पक्षी या तो फुदकते हैं या जल्दी-जल्दी चलते हैं। यह न तो फुदकती है, न भागती है। गर्दन थोड़ा आगे निकाले, नपे-तुले कदम रखती हुई चलती है। जैसे संसार में कहीं कोई विशेष जल्दी न हो। कई बार उसे देखते हुए मुझे लगता है कि वह चल नहीं रही है, कैटवाक कर रही है।

गर्मी की दोपहरों में वह घर के पोर्टिको की छाया में दिखाई देती है। कभी पानी के तसले तक जाती है। पानी पीती है। कभी मूड हुआ तो थोड़ी देर स्नान कर लेती है। उसका स्नान भी उसके व्यक्तित्व जैसा है—संयमित। न कोई उछल-कूद, न पानी की फिजूलखर्ची। बाहर निकलकर वह बड़ी तन्मयता से अपने पंख सँवारती रहती है।

मैं घर के परिसर में अक्सर साइकिल चलाता हूँ। कई बार उसके पास से गुजरता हूँ। शुरू में वह मुझे देखकर हट जाती थी। अब भी हटती है, पर केवल उतना जितना उसे आवश्यक लगता है। जैसे उसने अनुभव से तय कर लिया हो कि यह आदमी और उसकी साइकिल असुविधा तो हो सकते हैं, पर खतरा नहीं।

हम दोनों के बीच वर्षों में एक प्रकार की समझ विकसित हो गई है। मैं उसका रास्ता नहीं रोकता। वह मेरे कामों में दखल नहीं देती।

फिर भी मैं स्वीकार करता हूँ कि मेरे मन में एक छोटी-सी इच्छा है।

मैं कभी-कभी कल्पना करता हूँ कि मैं बरामदे में बैठा चाय पी रहा हूँ। जलमुर्गी अपनी उसी नपी-तुली चाल में आती है। पानी पीती है। और फिर मेरी मेज के पास से निकल जाती है। शायद मेरे पैरों के बीच से भी। बिना घबराहट। बिना किसी विशेष सावधानी के। जैसे मैं वहाँ हूँ ही नहीं।

जल मुर्गी
नहाती जलमुर्गी। हमारे लिये धूमिल चित्र के आधार पर एआई का बनाया हुआ।

यह इच्छा थोड़ी स्वार्थी है।

मैं उसे छूना नहीं चाहता। उसे पालतू भी नहीं बनाना चाहता। मैं केवल इतना चाहता हूँ कि वह मुझे अपने संसार की उन चीजों में गिने जिनसे डरने की आवश्यकता नहीं होती।

कुछ दिन पहले मैंने उसे अचानक उड़ते देखा। यह असामान्य था। वह सामान्यतः चलकर दूरी बनाती है। उस दिन वह सीधे उड़कर एक पेड़ की शाखा में जा छिपी। मैंने चारों ओर देखा। थोड़ी दूर एक बिल्ली गुजर रही थी।

तब मुझे लगा कि जलमुर्गी संसार को हमसे कहीं अधिक स्पष्टता से देखती है। वह जानती है कि किससे कितना डरना है। मेरी साइकिल उससे कहीं बड़ी है, पर बिल्ली उसके लिए अधिक खतरनाक है।

पिछले वर्ष उसका एक बच्चा बिल्ली का शिकार हो गया था। उसके बाद वह कई महीनों तक दिखाई नहीं दी। मैं नहीं जानता कि उस अनुपस्थिति का कारण क्या था। पर इतना अवश्य है कि तब से जब भी कोई बिल्ली दिखती है, मुझे उसकी सतर्क आँखें याद आ जाती हैं।

शायद यही कारण है कि मैं उसके विश्वास को लेकर इतना उत्सुक रहता हूँ।

जंगली जीवों के साथ संबंध मित्रता से नहीं बनते। वे धीरे-धीरे बनते हैं। वर्षों के सह-अस्तित्व से। बिना किसी घोषणा के।

अभी वह मुझसे कुछ फीट की दूरी बनाए रखती है। और संभव है कि जीवन भर बनाए रखे। शायद वही उचित भी है।

फिर भी जब मैं सुबह चाय लेकर बरामदे में बैठता हूँ, तो और पक्षियों के साथ उसकी भी प्रतीक्षा करता हूँ। वह आए, अपनी उसी कैटवाक चाल में पानी के तसले तक जाए, और लौटते समय मुझे बिल्कुल महत्व न दे।

मैं अब शायद मानने लगा हूँ कि मैंने नहीं, उसने मुझे और मेरे परिसर को स्वीकार किया है। पानी के तसले के पास रखा रोटी का टुकड़ा जब वह बिना किसी हिचक के टूंगती है, तो यह विश्वास और पुख्ता हो जाता है।

एक सहज कृतज्ञता जन्म लेती है मुझमें – जलमुर्गी ने मेरे घर को अपने संसार में शामिल कर लिया है।

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Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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