रेलवे में नौकरी के दिनों की एक छोटी-सी आदत थी, जो तब सामान्य लगती थी। प्रयागराज या गोरखपुर के रेलवे जोनल मुख्यालय में एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर तक पैदल जाया जा सकता था, पर पैदल अकेले नहीं। साथ में चपरासी चलता था, फाइलें उठाए। बिल्डिंग के बाहर ड्राइवर कार लगाए खड़ा रहता था। वह दरवाज़ा खोलकर बैठाता था। आगे चपरासी बैठता था। दूसरी बिल्डिंग में उतरते ही वही क्रम फिर शुरू हो जाता था।
उस समय यह व्यवस्था थी। मैंने उसके बारे में कभी विशेष सोचा भी नहीं।
रिटायरमेंट के बाद जब गाँव लौटा तो वह पूरी व्यवस्था एक ही दिन में समाप्त हो गई। न ड्राइवर, न चपरासी, न सरकारी गाड़ी। उसके स्थान पर मेरे पास थी एक साधारण साइकिल।
शुरू में वह केवल आने-जाने का साधन थी। फिर धीरे-धीरे उसने मुझे गाँव को देखने का एक नया तरीका सिखा दिया।
साइकिल पर चलते हुए गति इतनी होती है कि रास्ता छूटता नहीं और इतनी कम होती है कि पेड़ पर बैठे पक्षी, खेत में काम करते किसान, पोखर का पानी, कच्ची सड़क की धूल और किसी बुज़ुर्ग का बरामदे में बैठा चेहरा—सब दिखाई देने लगते हैं। कार में ये सब दृश्य केवल पृष्ठभूमि बनकर निकल जाते हैं।
मैंने आसपास के गाँवों, पगडंडियों और खेतों को देखना शुरू किया। जेब में एक छोटी नोटबुक रहती, हाथ में मोबाइल फोन। जहाँ कुछ रोचक दिखा, उसका चित्र लिया, दो पंक्तियाँ लिखीं और आगे बढ़ गया। धीरे-धीरे मुझे समझ में आया कि मैं केवल साइकिल नहीं चला रहा हूँ; मैं अपने देखने का तरीका बदल रहा हूँ।
अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि रिटायरमेंट मेरे जीवन का पलट-बिंदु था। अंग्रेज़ी में जिसे Tipping Point कहते हैं। उसके बाद जीवन की दिशा बदल गई। अफसरवाद से साइकिलवाद की ओर।
साइकिलवाद का अर्थ केवल साइकिल चलाना नहीं है। वह तो उसका सबसे दिखाई देने वाला प्रतीक भर है। वास्तविक परिवर्तन भीतर हुआ था।
उसके बाद दो घटनाएँ और हुईं जिन्होंने मेरी सोच को और आकार दिया। पहली थी कोरोना महामारी। दूसरी, होरमुज़ क्षेत्र का संकट, जिसके कारण कुछ समय के लिए ऊर्जा और रसोई गैस को लेकर अनिश्चितता का वातावरण बना।
अब मुझे लगता है कि ये दोनों मेरे जीवन के बदलाव-बिंदु थे। दिशा उन्होंने नहीं बदली; दिशा तो रिटायरमेंट ने बदल दी थी। पर उन्होंने मेरी चाल बदल दी। जैसे नदी वही रहती है, पर कहीं उसका प्रवाह तेज़ हो जाता है और कहीं धीमा।
कोरोना ने यह सिखाया कि मनुष्य जितना समझता है, उससे कहीं कम चीज़ों में भी जीवन चल सकता है।
होरमुज़ संकट ने यह प्रश्न खड़ा किया कि यदि ऊर्जा महँगी होती चली जाए तो क्या हमारी जीवन-शैली बदलनी चाहिए?
इन प्रश्नों ने मुझे अपने जीवन की छोटी-छोटी आदतों को देखने पर मजबूर किया।
हमारी छोटी आल्टो कार अब दस वर्ष पुरानी हो चुकी है। उसे बदलने का समय था। पहले मैं शायद बिना अधिक सोचे नई कार ले लेता। इस बार निर्णय टाल दिया। कार अभी चल रही है। दो वर्ष और चलेगी। क्यों न चलने दिया जाए?
बाज़ार जाने से पहले अब एक नया प्रश्न उठता है—क्या यह काम साइकिल से हो सकता है?
अमेज़न खोलने से पहले दूसरा प्रश्न आता है—क्या यह वस्तु सचमुच चाहिए?
धीरे-धीरे मैंने पाया कि खरीदारी केवल पैसे का मामला नहीं होती। वह मन की बेचैनी का भी मामला होती है। बाज़ार चाहता है कि हम लगातार कुछ नया चाहते रहें। शायद आत्मनिर्भरता का पहला कदम यह है कि हम हर इच्छा पर तुरंत प्रतिक्रिया देना बंद कर दें।
इसी समय मेरे पढ़ने का संसार भी बदलने लगा।
हेनरी डेविड थरू मुझे पहले भी अच्छे लगते थे, पर अब वे अधिक समझ में आने लगे। आधुनिक मिनिमलिस्ट लेखकों को पढ़ने लगा। इन दिनों सुबह घर के परिसर में साइकिल चलाते हुए मार्क बॉयल की द वे होम सुनता हूँ। उसमें बार-बार एक बात आती है—यदि जीवन सरल हो जाए तो मनुष्य का समय वापस उसके पास लौट आता है।
मुझे लगता है कि मैं भी शायद उसी दिशा में धीरे-धीरे चल रहा हूँ। बिना किसी क्रांति के। बिना किसी घोषणा के।
रसोई तक भी यह परिवर्तन पहुँच गया।
माइक्रोवेव में बिना तेल की सब्ज़ियाँ बनाने के प्रयोग शुरू हुए। फिर लगा कि यदि वही काम कम बिजली में हो सके तो और अच्छा। अब 150 वाट के स्लो कुकर के साथ प्रयोग चल रहे हैं।
इन प्रयोगों से पत्नीजी बहुत प्रसन्न नहीं हुईं।
उन्हें लगता है कि मैं उनके कार्यक्षेत्र में अनावश्यक दख़ल दे रहा हूँ। उनका कहना भी गलत नहीं। पर अब यह घरेलू संवाद भी जीवन का एक नया अध्याय बन गया है। वे मुस्कराकर कहती हैं—”जब जवान थे, तब तो मेरी तरफ देखा नहीं। ट्रेनों को चलवाने और इंटरचेंज गिनने में लगे रहे। अब जब झुर्रियाँ आने लगी हैं, तब तुम्हें मेरी याद आई।”
मैं उनकी बात सुनकर हँस देता हूँ। सच पूछिए तो शायद वे ठीक ही कहती हैं।
उम्र बढ़ने का एक लाभ यह भी है कि आदमी धीरे-धीरे अपनी प्राथमिकताएँ बदलना सीख लेता है।
अब मुझे सुविधा से अधिक पर्याप्तता आकर्षित करती है।
गति से अधिक लय।
उपभोग से अधिक प्रयोग।
और बाज़ार से अधिक गाँव।
इसी परिवर्तन को यदि कोई नाम देना हो तो मैं उसे साइकिलवाद कहूँगा।
यह कोई विचारधारा नहीं है। न ही यह दूसरों को अपनाने का आग्रह है। यह तो केवल मेरे जीवन के प्रयोगों का नाम है।
फिलहाल इसके कुछ सूत्र मुझे दिखाई देते हैं—
- जहाँ साइकिल जा सकती है, वहाँ कार ले जाना संसाधनों का दुरुपयोग है। भोजन इतना सरल हो कि बनाने में आधा घंटा न लगे, और इतना पौष्टिक हो कि शरीर आधा दिन शिकायत न करे।
- हर नई चीज़ पर विश्वास करने से पहले स्वयं प्रयोग किया जाए।
- जो काम घर पर हो सकता है, उसके लिए बाज़ार पर निर्भरता कम की जाए।
- गाँव सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है। पेड़, पक्षी और किसान उसके प्रोफेसर हैं। मेरा घर-परिसर उसकी प्रयोगशाला है।
- उम्र बढ़ने का अर्थ गति कम होना नहीं, बल्कि अनावश्यक चीज़ें कम होना है।
- सुविधा नहीं, पर्याप्तता जीवन का लक्ष्य हो।
मुझे पूरा विश्वास है कि यह सूची बदलती रहेगी। कुछ सूत्र छूट जाएँगे। कुछ नए जुड़ेंगे। जीवन कभी स्थिर नहीं रहता।
शायद आगे मैं घर में अधिक सब्ज़ियाँ उगाऊँ। शायद ऊर्जा की बचत के और तरीके खोजूँ। शायद कुछ समय बाद यह भी समझ में आए कि जिन वस्तुओं को मैं अनिवार्य मानता था, उनमें से आधी की आवश्यकता ही नहीं थी।
और यह भी संभव है कि इनमें से कई प्रयोग असफल हो जाएँ। असफलता से मुझे कोई शिकायत नहीं होगी। शिकायत केवल तब होगी जब प्रयोग करना बंद हो जाएगा।
कौन जाने, कुछ वर्षों बाद मेरी साइकिल के कैरियर पर दो पुस्तकें हों, हैंडल से सब्ज़ियों और फलों की टोकरी लटक रही हो, और घर लौटकर मैं स्लो कुकर में रात का भोजन चढ़ा रहा होऊँ। उस समय शायद कोई पूछे कि यह सब क्यों?
तब मैं केवल इतना कहूँगा—मैंने जीवन को थोड़ा हल्का करने की कोशिश की है।
यदि उस प्रयास को कोई नाम देना हो, तो मेरे लिए वह साइकिलवाद है।

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