बनारसी आलू पापड़ – जब बनारस की गलियों ने एक ब्रांड गढ़ा

Kabir Chaura Papad

एक अख़बार में लिपटे पापड़ से शुरू हुई खोज मुझे बाबूसराय की दुकान से बनारस के कबीर चौरा की गलियों तक ले गई।

कुछ दिन पहले अमेज़न पर बनारसी आलू पापड़ खोज रहा था। कई ब्रांड सामने आ गए। भारत में भी बिक रहे हैं और विदेशों में भी। अमेरिका में रहने वाला कोई भारतीय परिवार लगभग नौ डॉलर देकर ढाई सौ ग्राम का एक पैकेट खरीद रहा होगा। वह उसे चाय के साथ खाएगा, मेहमानों के सामने परोसेगा और मेहमान शायद उसके स्वाद की तारीफ भी करेंगे।

पर मुझे नहीं लगता कि उसे यह पता होगा कि इस पापड़ की कहानी किसी फैक्टरी से नहीं, बनारस की तंग गलियों से शुरू होती होगी।

कल अमेज़न वाला कुरियर मुझे बनारसी आलू पापड़ का पैकेट दे गया है। लगभग ₹540 प्रति किलो के भाव से।

दो साल पहले मैं नहीं जानता था कि आलू का भी बड़े आकार का पापड़ होता है। यह भी नहीं जानता था कि आलू का पापड़ मूँग के पापड़ जितना या उससे ज्यादा स्वादिष्ट हो सकता है।

लेकिन उसके पीछे एक कहानी भी होगी, इसका तो बिल्कुल अनुमान नहीं था। वह कहानी मुझे इंटरनेट ने नहीं, एक कस्बे की छोटी-सी दुकान ने दी। बड़ी कहानियाँ अक्सर छोटी दुकानों में मिलती हैं।

दो वर्ष पहले मैं अपने गाँव के पास बाबूसराय बाज़ार गया था। रविशंकर की किराने की दुकान पर मूँग का पापड़ माँगा। उन्होंने कहा—”मूँग का तो नहीं है। यह आलू का ले जाइए। यहीं आसपास की औरतें बनाती हैं। यहाँ से बनारस जाता है। फिर बम्बई। वहाँ पैकेट बनते हैं। फिर वही बनारसी पापड़ बनकर बिकता है। अभी तो आपको अख़बार में लिपटा मिल रहा है।” उन्होंने दो सौ रुपये में एक किलो दिया।

मैं अख़बार में लिपटा वह पापड़ घर ले आया। उसका स्वाद सचमुच अलग था। कुरकुरा भी और हल्का भी। खाते-खाते मैंने पत्नीजी से कहा—”यह तो अच्छा है।” उन्होंने सहज भाव से उत्तर दिया—”अच्छा होगा ही। इसकी अपनी कहानी है।”

पत्नीजी की माँ का मायका बनारस का है। उनके नानाजी का मकान कबीर चौरा के जालपा देवी मोहल्ले में था। वही पुराना बनारस, जिसकी अँधेरी गलियाँ इतनी संकरी हैं कि एक साइकिल रिक्शा निकल जाए तो दूसरा रुककर रास्ता दे। दो-तीन मंज़िल के पुराने मकान। डेढ़ गज मोटी दीवारें। नीचे सीलन, ऊपर कहीं थोड़ी-सी धूप। जिन घरों ने सदियों तक मौसम झेले, उन्होंने शायद उतने ही किस्से भी सँजोए होंगे।

पत्नीजी ने जो कहानी सुनाई, वह उन्हें उनकी नानी ने सुनाई थी। नानी उन परिवारों को जानती थीं। यह कोई सरकारी दस्तावेज़ नहीं है। न ही मैं इसे इतिहास की अंतिम पंक्ति मानकर लिख रहा हूँ। इसे मैं बनारस की लोकस्मृति समझकर लिख रहा हूँ। हो सकता है मेरे पाठकों में से कोई इस कथा की पुष्टि करे, कोई उसे थोड़ा बदले, कोई नया अध्याय जोड़ दे।

उस समय जालपा देवी के उस इलाके के पुरुष आलू की आढ़त का काम करते थे। कोल्ड स्टोरेज से उनका सम्बन्ध था। व्यापार उनकी समझ में था। घरों के भीतर बड़े संयुक्त परिवार थे, जिनमें बहुत-सी महिलाएँ रहती थीं। घर का काम निपट जाने के बाद उनके पास समय ही समय बचता था। उसी समय में छोटी-छोटी बातों पर तकरार होती, कजिया होता, झोंटा-झोंटी होती। पत्नीजी हँसते हुए कहती हैं—सुबह चूल्हा जलता था और थोड़ी देर बाद कजिया भी। आदमी भी परेशान, पड़ोसी भी।

एक दिन एक परिवार के व्यापारियों ने मिलकर उपाय निकाला। कोल्ड स्टोरेज से बचे पुराने आलू घरों में भिजवाए गए। महिलाओं से कहा गया—”पापड़ बनाइए। बेचने का काम हम करेंगे। जो पैसा आएगा, वह आपका।”

महिलाओं को पापड़ बनाना सिखाया नहीं गया। वे पहले से जानती थीं। घर के लिए पापड़ बनते ही थे। पतले बेलना, बड़े पत्थरों के नीचे दबाकर उन्हें एकसार करना और छत पर धूप में सुखाना—यह सब पीढ़ियों से चला आ रहा कौशल था। पुरुषों ने केवल इतना किया कि घरेलू हुनर को बाज़ार से जोड़ दिया।

मैं उस दृश्य की कल्पना करता हूँ। कबीर चौरा की किसी छत पर दोपहर की धूप होगी। चार-पाँच महिलाएँ पापड़ बेल रही होंगी। कोई बच्ची उन्हें उठाकर चटाई पर सजा रही होगी। नीचे गली से सब्ज़ीवाले की आवाज़ आ रही होगी। शायद उनमें से किसी ने भी कभी नहीं सोचा होगा कि उनकी हथेलियों से निकला यह स्वाद एक दिन समुद्र पार पहुँचेगा।

Papad Making Benaras
कबीर चौरा की किसी छत पर दोपहर की धूप होगी। चार-पाँच महिलाएँ पापड़ बेल रही होंगी। कोई बच्ची उन्हें उठाकर चटाई पर सजा रही होगी।

यहीं से कहानी बदलने लगी। महिलाओं के हाथ में नियमित काम आया। पापड़ बनने लगे। गिनती होने लगी। बोरियों में भरकर जाने लगे। बेचने का काम पुरुषों ने सँभाला। घर की चौकी पर शुरू हुआ एक घरेलू काम धीरे-धीरे एक उद्योग का रूप लेने लगा।

पत्नीजी कहती हैं कि तब एक और परिवर्तन दिखाई दिया। पहले जो समय झगड़ों में जाता था, वह श्रम में जाने लगा। कजिया-कलह के लिए समय कम पड़ने लगा। आपस में होड़ भी होने लगी—कौन अधिक पतले और अधिक अच्छे पापड़ बनाता है। प्रतिस्पर्धा थी, पर अब उसका केन्द्र झगड़ा नहीं, काम था।

घरों की साफ-सफाई पर ध्यान बढ़ा। थोड़ा-थोड़ा पैसा आने लगा। फर्नीचर आने लगा। पुराने मकानों की मरम्मत होने लगी। सदियों पुरानी मोटी दीवारों को काटकर कमरे बड़े किए गए। मुझे यह दृश्य बहुत प्रतीकात्मक लगता है। जैसे केवल दीवारें नहीं छिलीं, जीवन भी कुछ खुला।

समय बीतता गया। काम बढ़ता गया। फिर शायद कुछ महिलाओं ने नेतृत्व सँभाला। समूह बने। आज जिन महिला स्वयं सहायता समूहों की चर्चा होती है, उनका बीज शायद ऐसे ही छोटे घरेलू उद्योगों में पड़ा होगा। आज बनारस में माँ भगवती महिला गृह उद्योग जैसे संगठन और अन्य महिला समूह पारंपरिक खाद्य पदार्थ बनाकर महिलाओं को आजीविका दे रहे हैं। किसी समय जो काम सीलन भरे घर के फर्श पर शुरू हुआ होगा, वह अब संगठित रूप ले चुका है।

बाबूसराय के रविशंकर की दुकान की बात मुझे आज भी याद है। तब पापड़ अख़बार में लिपटा मिलता था। अब वहाँ वह दिखाई नहीं देता। स्थानीय समूह शायद उसे सीधे बनारस के व्यापारियों तक पहुँचा देते हैं। समय का भी अपना विकासक्रम होता है—पहले अख़बार, फिर पॉलीथिन, फिर छपा हुआ डिब्बा और फिर ई-कॉमर्स। स्वाद वही रहता है, केवल उसकी यात्रा बदल जाती है।

मुझे इस पूरी कहानी में सबसे रोचक बात आलू नहीं लगती। सबसे रोचक बात है मूल्यवर्धन। खेत का आलू बहुत सस्ता होता है। वही आलू जब घर की महिलाओं के कौशल से पापड़ बनता है तो उसका मूल्य बढ़ जाता है। बनारस का नाम जुड़ता है तो और बढ़ जाता है। आकर्षक पैकेजिंग जुड़ती है तो कीमत में एक और छलांग आती है। फिर वही वस्तु समुद्र पार पहुँचकर कई गुना दाम पर बिकती है। खेती, कुटीर उद्योग, व्यापार और ब्रांड—चारों एक ही पापड़ में समा जाते हैं।

हमारे यहाँ अक्सर उद्योग की कल्पना बड़े कारखानों से जुड़ती है। मुझे लगता है कि भारत का एक बड़ा उद्योग बिना चिमनी के चलता है। उसकी मशीनें रसोई में हैं। उसकी उत्पादन इकाई घर का आँगन है। उसकी ऊर्जा महिलाओं के हाथ हैं। पापड़, बड़ी, अचार, मंगौड़ी, तिलौड़ी, सेव, नमकीन—इन सबने न जाने कितने परिवारों की अर्थव्यवस्था सँभाली है। विडम्बना यह है कि इस श्रम का बड़ा हिस्सा कभी उद्योग माना ही नहीं गया। घर की चौकी पर बैठकर बनने वाली इन चीज़ों ने करोड़ों रुपये का मूल्य पैदा किया, पर उनका इतिहास बहुत कम लिखा गया।

अब जब मैं अमेज़न पर बनारसी आलू पापड़ का पैकेट देखता हूँ, तो मुझे केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं दिखाई देता। मुझे बाबूसराय के रविशंकर दिखाई देते हैं। कबीर चौरा की सीलन भरी गलियाँ दिखाई देती हैं। छत पर सूखते पापड़ दिखाई देते हैं। और पत्नीजी की नानी की आवाज़ सुनाई देती है, जो शायद आधी सदी पहले की किसी दोपहर का दृश्य सुना रही हैं।

यह लेख किसी निष्कर्ष की घोषणा नहीं है। यह एक सूत्र है, जो मुझे एक पापड़ से मिला। अब उसे आगे बढ़ाना मेरे बनारसी पाठकों का काम है। यदि आपके परिवार का इस काम से कोई सम्बन्ध रहा हो, यदि आपने भी यह कहानी सुनी हो, यदि इसमें कोई भूल हो या कोई नया प्रसंग जोड़ना चाहें, तो कृपया टिप्पणी में लिखिए। हो सकता है, आपकी स्मृतियों से कबीर चौरा, जालपा देवी और पुराने बनारस के सामाजिक इतिहास का कोई भूला हुआ अध्याय फिर से पढ़ा जा सके।

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Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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