मोबाइल को जीवन में रस और जीवन के बड़े अर्थ से जोड़ने का उपक्रम
सुबह साइकिल लेकर निकलता हूँ। घरपरिसर में ही गोल गोल चक्कर। साइकिल बहुत तेज नहीं चलाता—इतनी ही कि शरीर चलता रहे और मन को पीछे छूट जाने का डर न हो। कान में किसी किताब की summary चलती है, लेकिन 1X पर नहीं, 0.8X पर।
धीमी साइकिल। धीमी आवाज़।
इसका एक अप्रत्याशित लाभ है। सुनाई गई बात और अगली बात के बीच थोड़ा-सा खाली स्थान बच जाता है। उस खाली जगह में अपना विचार घुस आता है। कभी-कभी किताब से अधिक महत्वपूर्ण वही विचार हो जाता है।
ऐसी ही एक सुबह Arthur C. Brooks की *The Meaning of Your Life* की summary सुन रहा था। काम, vocation, जीवन के अर्थ और उस पुराने Zen प्रसंग की बात थी—”Chop wood. Carry water.”
कहानी में एक युवा साधु ज्ञान प्राप्त करने की आकांक्षा से Zen गुरु के पास जाता है। गुरु उसे साधारण काम देता है—लकड़ी काटो, पानी भरो। साधु वर्षों तक यही करता रहता है। उसके मन में उम्मीद है कि एक दिन enlightenment आएगा और तब जीवन बदल जाएगा।
दशक बीत जाते हैं। वह स्वयं गुरु बन जाता है। पुराने गुरु से पूछता है—अब क्या करना है?
उत्तर मिलता है— लकड़ी काटो। पानी भरो।
अर्थात enlightenment ने काम नहीं बदला। काम करने का ढंग बदल दिया।
मैं साइकिल चलाता रहा और मुझे अचानक दो पुराने चेहरे याद आए। चेहरे क्या याद आए, मन ने गढ़ लिए। उनके छाया-बिम्ब मन में थे, पर गहरे रंग मन ने भरे।
पहला चेहरा था फ़कीर चन्द का।
कल्पना कीजिए, सन् 1675 का कोई फ़कीर चन्द। रावलपिंडी के पास किसी गाँव में खेती करता है। दिन भर खेत में रहा। शाम को घर के बाहर चबूतरे पर ढोलक लेकर बैठ गया।
लोग इकट्ठे होने लगे। बतकही शुरू हुई। किसी की भैंस खो गई है। किसी की लड़की की कुड़माई की तैयारी चल रही है। गांव का ही रामदास फिर अपनी पत्नी से लड़ रहा है। कोई बाहर से आया आदमी नई खबर लाया है। बीच-बीच में फ़कीर चन्द ढोलक बजाता है। कोई गीत निकलता है। फिर हँसी। फिर बातचीत। फिर ढोलक।
फ़कीरचन्द किसी दर्शनशास्त्र को नहीं जानता। उसे “meaning of life” का प्रश्न परेशान नहीं करता। वह enlightenment की खोज में नहीं है। उसे अपने जीवन का purpose define करने की जरूरत महसूस नहीं होती।
वह बस शाम में मौजूद है। उससे पूछा जाए—”शाम कैसे बीत गई?”
तब वह शायद कहे—”अरे, ढोलक बजाते-बजाते पता ही नहीं चला।”
आज का आदमी भी यही कह सकता है—”रील देखते-देखते पता ही नहीं चला।”
लेकिन दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। फ़कीर चन्द की तल्लीनता किसी उपकरण ने पैदा नहीं की। वह जीवन के बीच पैदा हुई थी। उसकी ढोलक, लोग, किस्से, गाँव—यही उसकी शाम थे। वह यह जाने बिना कि “रस लेना” क्या होता है, रस ले रहा था।
मुझे तो लगता है कि फ़कीर चन्द उस Zen शिष्य से भी एक कदम आगे है। Zen का शिष्य लकड़ी काटते समय enlightenment की प्रतीक्षा कर रहा है। फ़कीर चन्द ढोलक बजाते समय किसी अगली अवस्था की प्रतीक्षा नहीं कर रहा है। उसे कहीं और पहुँचना ही नहीं है।
शायद वह जीवन को सुधारने की कोशिश भी नहीं कर रहा। वह उसे जी रहा है। बस!
और फिर मुझे जयदेवा माई याद आती हैं।
आज से करीब अस्सी वर्ष पहले की गरीब स्त्री। उनके जीवन का सबसे बड़ा उत्सव था माघ मास का त्रिवेणी कल्पवास।
लेकिन कल्पवास उनके लिए केवल माघ का एक महीना नहीं था। माघ में नहाकर लौटते ही अगले माघ की तैयारी शुरू हो जाती— अचार डालना है। वड़ियाँ बनानी हैं। अनाज बचाना है। पिसान रखना है। लकड़ी जुटानी है।
एक-एक छोटी चीज अगले वर्ष के कल्पवास से जुड़ी हुई थी। उनका पूरा वर्ष जैसे माघ के महीने की ओर धीरे-धीरे बह रहा था।
जयदेवा माई को भी शायद यह पता नहीं था कि वे “जीवन के अर्थ” की तलाश कर रही हैं। उन्होंने कोई पुस्तक नहीं पढ़ी थी जिसमें लिखा हो कि मनुष्य को एक दीर्घकालिक purpose चाहिए। उन्हें vocation का सिद्धान्त नहीं मालूम था।
वे बस अपना जीवन जी रही थीं।
लेकिन उनके जीवन के साधारण कामों में एक बड़ी धुरी थी— अचार केवल अचार नहीं था। लकड़ी केवल लकड़ी नहीं थी। अनाज केवल अनाज नहीं था। हर चीज अगले माघ की ओर जा रही थी।
यहाँ फ़कीर चन्द और जयदेवा माई मुझे एक साथ दिखाई देते हैं।
फ़कीर चन्द हमें सिखाता है कि जीवन के अर्थ को पहले शब्दों में पकड़ना जरूरी नहीं। आप बिना किसी दर्शन के भी जीवन में पूरी तरह उपस्थित हो सकते हैं।
जयदेवा माई दिखाती हैं कि जीवन के छोटे-छोटे काम किसी बड़े अर्थ से जुड़ जाएँ तो पूरा वर्ष एक दिशा पा सकता है।
और Brooks का Zen प्रसंग इन दोनों को एक तीसरी भाषा देता है—लकड़ी काटो, पानी भरो।

काम वही है। अर्थ उस काम के साथ हमारे सम्बन्ध में है।
यहीं आधुनिक मोबाइल की कहानी शुरू होती है।
मोबाइल को हम प्रायः दोष देते हैं। कहते हैं कि उसने मनुष्य को स्वाइप करने वाला जीव बना दिया है। घंटों अंगूठा चलता रहता है और समय का पता नहीं चलता।
लेकिन मोबाइल ने मनुष्य में तल्लीन होने की क्षमता पैदा नहीं की। वह क्षमता फ़कीर चन्द में पहले से थी। मोबाइल ने केवल उस क्षमता के सामने एक नया संसार रख दिया।
अब हमारे पास ऐसी चीज है जो हर पाँच सेकंड में नया दृश्य दे सकती है। अगली सूचना, अगला वीडियो, अगली टिप्पणी, अगली उत्तेजना। और सबसे खतरनाक बात—इसका कोई स्वाभाविक अंत नहीं है।
फ़कीर चन्द की शाम समाप्त होती थी। जयदेवा माई का माघ समाप्त होता था। पर मोबाइल का फ़ीड समाप्त नहीं होता।
इसलिए समस्या शायद मोबाइल नहीं है। समस्या यह है कि आधुनिक जीवन में हमारे पास फ़कीर चन्द जैसी सहज तल्लीनता भी कम हो गई है और जयदेवा माई जैसा दीर्घकालिक कल्पवास भी।
हम या तो किसी चीज में डूबना चाहते हैं, या किसी बड़े उद्देश्य की तलाश में भटकते हैं; और मोबाइल दोनों के बीच की खाली जगह भर देता है।
शायद इसका समाधान जीवन से मोबाइल छीन लेना नहीं है। हमें अपने जीवन में कुछ ऐसे काम फिर से खोजने हैं जिनमें हम उपस्थित हो सकें—और कुछ ऐसे काम भी, जिनकी तैयारी महीनों और वर्षों तक चल सके।
यह हो सकता है — किसी के लिए पुस्तक लिखना। किसी के लिए बगीचा लगाना। किसी के लिए गाँव का इतिहास दर्ज करना। किसी के लिए बच्चों को पढ़ाना। किसी के लिए कोई कला सीखना। किसी के लिए नदी के किनारे पेड़ लगाना। और किसी के लिए, शायद, रोज सुबह धीरे-धीरे साइकिल चलाते हुए मोबाइल पर ही किसी किताब को 0.8X पर सुनना और उसके बीच पैदा होने वाले अपने विचारों को पकड़ लेना।
तब मोबाइल हमारा जीवन नहीं होगा। वह जीवन के काम आएगा।
तब वह distraction नहीं, साधन होगा। प्रोपेलर होगा, चालक नहीं।
शायद आधुनिक मनुष्य को “डिजिटल डिटॉक्स” से अधिक “डिजिटल कल्पवास” की जरूरत है। डिजिटल कल्पवास का अर्थ मोबाइल छोड़ना नहीं है। अर्थ यह है कि मोबाइल को किसी ऐसी यात्रा में लगा देना जो अगले पाँच सेकंड में समाप्त नहीं होती।
फ़कीर चन्द को enlightenment नहीं चाहिए था। जयदेवा माई को meaning की परिभाषा नहीं मालूम थी। Zen के साधु को enlightenment चाहिए थी, लेकिन अंत में उसे फिर वही मिला—लकड़ी काटो, पानी भरो।
और शायद हमसे भी जीवन यही कह रहा है— कुछ ऐसा खोजो जिसे करते हुए तुम्हें समय का पता न चले। तुम्हें रस मिल रहा है, इसका अहसास न होते हुए भी वह सतत मिलता रहे।
कुछ ऐसा भी खोजो जिसके लिए आज का छोटा काम कल के बड़े अर्थ से जुड़ता हो।
और फिर अपने मोबाइल को उसी काम में लगा दो।
शायद यही डिजिटल युग का कल्पवास है।
