विकास मिश्र, अट्ठाईस सिलेंडर और एक संतुष्ट जिंदगी


बीए पास ड्राइवर, जिसने बम्बई-गुजरात देखा और फिर घर के पास की छोटी नौकरी चुन ली

छह अगस्त को गैस सिलेंडर बुक किया था। आज अठारह तारीख को आया। इतने दिनों में दो-तीन बार फोन करके पूछताछ की जा सकती थी, लेकिन अब रसोई का काफी काम इंडक्शन पर शिफ्ट हो गया है, इसलिए सिलेंडर की चेजिंग पहले जैसी तीखी नहीं रही।

फिर भी आज जब इंडेन का सिलेंडर आया तो उसके साथ विकास मिश्र भी आए। एक छोटी-सी पिक-अप गाड़ी लेकर। लगभग सात क्विंटल की। बताया कि गाड़ी खराब हो गई थी। जब तक नहीं बनी, उसे बनवाने में लगे रहे और ठीक होते ही आज सिलेंडर लेकर निकल पड़े।

पहले बड़ी पिक-अप आती थी और दो आदमी होते थे। अब छोटी गाड़ी है और उसमें अकेले विकास। वही ड्राइवर, वही डिलीवरी देने वाले, वही पर्ची काटने वाले और वही कार्ड में एंट्री करने वाले। यह एजेंसी की कॉस्ट कटिंग है या कारोबार कुछ घटा है, पता नहीं। लेकिन विकास को इससे कोई शिकायत नहीं है।

वह वैसे भी शिकायत करने वाले आदमी नहीं लगते।

सिलेंडर की सप्लाई में एक DAC नंबर का आदान-प्रदान होता है। छह अंकों का कोई कोड। सिलेंडर बुक होने के बाद डिलीवरी के समय ग्राहक से वह नंबर लेकर एजेंसी में डिलीवरी दर्ज की जाती है।

इस बार काफी दिन निकल गए तो एजेंसी के एक सज्जन ने दो दिन पहले फोन किया। बोले, नंबर बता दीजिए। नंबर बता देने पर वे डिलीवरी दिखा सकते थे और उसके बाद सिलेंडर पहुंचाना उनकी भलमनसाहत पर निर्भर करता। मुझे अनजाने आदमी को नंबर बताने का उतना भरोसा नहीं था। विकास का फोन आया होता तो दे देता।

आज विकास ने सिलेंडर पहुंचाया तो पता चला कि मेरे ऑनलाइन भुगतान वाले सिलेंडर की डिलीवरी पहले ही दिखाई जा चुकी है।

यह नंबर वहां पहुंचा कैसे?

विकास इस पर बस मुस्कराए। कोई जवाब नहीं दिया।

मामला मेरी समझ में नहीं आया। लेकिन इस देश में NEET की परीक्षा के पर्चे लीक हो सकते हैं तो छह अंकों का DAC नंबर कौन-सी बड़ी चीज है! रहस्य वहीं पड़ा रहा।

वैसे विकास को देखकर व्यवस्था के इस छोटे-से गोरखधंधे से ज्यादा दिलचस्प खुद विकास लगते हैं।

वह हंसमुख आदमी हैं। हमारे स्टोर से खाली सिलेंडर निकालते हैं, नया भरा हुआ सिलेंडर उसकी जगह रखते हैं और पर्ची-किताब का काम निपटाकर अगले ग्राहक की ओर चल देते हैं। काम में कोई हड़बड़ी नहीं, लेकिन बेवजह रुकने का समय भी नहीं। आज मेरे घर में रहते हुए ही उनके मोबाइल पर दो-तीन फोन आ चुके थे।

विकास मिश्र इंडेन डिलिवरी वाले
गैस सिलेंडर डिलिवरी वाले विकास मिश्र

लगता है गांवदेहात में गैस सिलेंडर को लेकर अभी भी अफरातफरी रहती है।

विकास रोज अट्ठाईस सिलेंडर लेकर निकलते हैं। दिन भर में डिलीवरी पूरी करते हैं और काम खत्म। कभी गाड़ी खराब हो जाए तो भी छुट्टी नहीं मिलती; गाड़ी को गैराज ले जाकर बनवाना भी उन्हीं की जिम्मेदारी है।

महीना पूरा होने पर बारह हजार रुपये खाते में आ जाते हैं, ऐसा उन्होने बताया।

डिलीवरी के समय कुछ लोग बीस-पच्चीस रुपये टिप दे देते हैं। विकास के मुताबिक उससे चाय-पानी और पानमसाले का खर्च निकल जाता है।

बारह हजार रुपये। बीए पास आदमी। अट्ठाईस सिलेंडर। छोटी पिक-अप। दिन भर की डिलीवरी। किसी दूसरे कोण से देखें तो यह कहानी अभाव की लग सकती है। लेकिन विकास को देखकर ऐसा निष्कर्ष निकालना आसान नहीं है।

सन 2018 में उन्होंने बीए किया था। हालांकि ड्राइविंग उससे पहले ही शुरू कर दी थी। बम्बई और गुजरात में कारवां में पिक-अप चलायी। ट्रकों पर हेल्पर भी रहे और देश का पश्चिमी हिस्सा देखा। बताया कि अभी वे जितना महीने में कमाते हैं, उतना कारवां में हफ्ते भर में कमा चुके हैं।

अर्थात बाहर की दुनिया उन्होंने देखी है। केवल गांव से निकलकर शहर में मजदूरी करने का अनुभव नहीं, बल्कि देश के दूसरे हिस्सों की सड़कें, लंबे सफर, ट्रक, कारवां और प्रवासी कामगारों की दुनिया—सब कुछ थोड़ा-बहुत देखा हुआ है।

फिर भी अंततः घर लौट आए।

मैंने बाहर काम करने और यहां काम करने के फर्क की बात छेड़ी तो उन्होंने लगभग सहजता से कहा—आप जानते ही हैं, घर ज्यादा जरूरी है।

बस।

इसमें कोई भाषण नहीं था। न घर-परिवार के त्याग का भाव, न बाहर की दुनिया को कोसना, न कमाई की शिकायत।

हर आदमी बाहर जाकर ज्यादा कमाना नहीं चाहता। कुछ लोग घर के पास कम कमाकर भी अपनी जिंदगी को ज्यादा मानते हैं।

विकास उन्हीं में से एक लगते हैं।

लेकिन इसे केवल कम आकांक्षा कहना भी ठीक नहीं होगा। वह मूर्ख नहीं हैं। बीए किया है, ड्राइविंग जानते हैं, देश का एक हिस्सा घूम चुके हैं, अपने काम और उसकी कमाई का हिसाब समझते हैं। शायद उन्हें यह भी पता है कि बाहर जाकर बीस-पच्चीस हजार कमाने का मतलब केवल ज्यादा पैसा नहीं होता—घर से दूरी, अनिश्चितता, रहने-खाने का खर्च और परिवार से अलगाव भी उसी पैकेज में आता है।

हो सकता है उन्होंने बाहर और घर की नौकरी के नफा-नुक्सान का गहन हिसाब कर रखा हो। किया ही होगा।

कुछ लोग जीवन में ऊपर उठना चाहते हैं। कुछ लोग जीवन को बस ठीक रखना चाहते हैं। आखिर व्यक्ति अपनी प्राथमिकताएं अपनी प्रकृति से ही बनाता है।

शादी हो चुकी है। दो बच्चे हैं—दस और छह साल के। दोनों स्कूल जाते हैं। घर पास के कईयर मऊ में है।

मैं उनकी पत्नी के बारे में पूछना चाहता था। वह कितनी पढ़ी हैं? घर कैसे चलता है? खेती-बाड़ी है या नहीं? परिवार की अपनी जमीन कितनी है? खेती में विकास का हाथ लगता है या नौकरी ही उनका मुख्य सहारा है?

बच्चों को लेकर भी पूछना था। वे अपने बच्चों को क्या बनते देखना चाहते हैं? क्या चाहते हैं कि बेटे-बेटी भी उनके जैसा काम करें, या पढ़-लिखकर कोई दूसरी दुनिया चुनें?

ये सवाल रह गए।

विकास के पास समय कम था। फोन आ रहे थे और अभी कई घरों में सिलेंडर पहुंचाने थे।

शायद अगली बार पूछूंगा।

मुझे यह भी जानना है कि अगर उन्हें उतने ही पैसे में फिर बम्बई-गुजरात में गाड़ी चलाने का अवसर मिले तो क्या वे जाएंगे? और अगर यहां कमाई बढ़ जाए तो क्या वे बाहर जाने का विचार बिल्कुल छोड़ देंगे?

इन सवालों के जवाब से शायद यह पता चलेगा कि विकास की शांति वास्तव में संतोष है, पारिवारिक जिम्मेदारी है या जीवन के बारे में कोई बहुत व्यावहारिक फैसला।

अभी तो इतना ही दिखता है कि आदमी में कुंठा नहीं है।

गाड़ी खराब हो जाए तो उसे बनवाता है। अट्ठाईस सिलेंडर लेकर निकलता है। दिन भर घूमता है। घर लौटता है। महीने के अंत में बारह हजार रुपये आते हैं।

और शायद उसे यह जिंदगी स्वीकार ही नहीं, पसंद भी है।

बीए पास करने के बाद ड्राइविंग करते रहना हमेशा हार नहीं होता। कभी-कभी आदमी नौकरी नहीं, जीवन को अपनी शर्तों पर जीना चुनता है।

बारिश का मौसम है। कई दिनों से साइकिल लेकर निकलना नहीं हो रहा। घर पर आने-जाने वाले लोग भी कम हो गए हैं। ऐसे में आज विकास मिले तो उन्हीं पर लिखने का मन बन गया।

देश-परदेश घूम चुके विकास ने अंततः घर को चुना। उससे उनकी कमाई कम हुई होगी। शायद जिंदगी बड़ी हो गई।

अगला सिलेंडर लेकर वह शायद डेढ़ महीने बाद आएंगे। तब तक इस मुलाकात के छूटे हुए सवाल मन में रहेंगे।

शायद अगली बार खेती की बात होगी। पत्नी की। बच्चों की। और यह भी कि दस-बारह साल बाद वह अपने बेटे और बेटी को किस दुनिया में देखना चाहते हैं।

तब शायद विकास मिश्र की कहानी थोड़ी और पूरी होगी।

ψψψ

Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

2 thoughts on “विकास मिश्र, अट्ठाईस सिलेंडर और एक संतुष्ट जिंदगी”

  1. मैं गर्मी की छुट्टियां बिता कर लौटा हूँ तो आप की इस पोस्ट ने कुछ बातें फिर से याद दिला दीं- घर और घर से दूरी।

    विकास जैसे लोग हमारी अर्थव्यवस्था, या यूं कहें की हमारे दैनिक जीवन की रक्त धमनियां हैं, दिखती कम हैं पर शरीर काम करना बंद कर देगा अगर ये न हों तो। दुःख इस बात का होता है की हमारी शिक्षा व्यवस्था इतनी लचर है की शायद विकास के बच्चों को इस चक्र से निकलने का मौका नहीं मिल पायेगा। एक बच्चा किस परिवार में जन्म ले ये उसके भविष्य की लॉटरी नहीं होना चाहिये।

    R

    Liked by 1 person

    1. जी, और अब एआई के युग में वे बच्चे अपने लिए कैसी जगह बना पाएंगे, वह भी देखने की बात है।
      चलिए आप छुट्टियों से ताजा हो लौटे, स्वागत!

      Like

आपकी टिप्पणी के लिये खांचा:

Discover more from मानसिक हलचल

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading

Design a site like this with WordPress.com
Get started