जरई और रक्षाबंधन

जरई

राखी का बाजार बचा रहा, जरई का संसार चला गया।

गरिमा, मेरी बहन, की राखी समय पर आ गई है—स्पीड पोस्ट से। सालों से पोस्ट ऑफिस के माध्यम से मिलती रही है। पहले सामान्य लिफाफे में आती थी, फिर कोई समय आया कि स्पीड पोस्ट से आने लगी। शायद सामान्य डाक पर हम जैसे सामान्य लोगों का भी भरोसा कम हो गया था।

अब राखी के दिन का इंतजार है। मेरी बहन की राखी मेरी पत्नीजी ही बांधती रही हैं। रेलवे की नौकरी ने अवकाश नहीं दिया देश के पश्चिमी भाग से प्रयाग-लखनऊ आने का और तब से घरेलू यात्रायें करने की आदत ही जाती रही। अब बूढ़ा व्यक्ति अपनी आदतें नहीं बदल पाता। घुटनों का दर्द बहाना देते हैं कहीं न जाने, न हिलने का।

लेकिन जरा और पीछे जाऊं—अपने बचपन में—तो राखी की स्मृतियां हैं ही नहीं।

तब लड़कियां तालाब से नागपंचमी के दिन मिट्टी लाती थीं। उसमें अपने-अपने जौ के बीज बोती थीं। फिर रोज उन छोटे-छोटे पौधों का अंकुरण और उनका बढ़ना देखती थीं। सबमें प्रतिस्पर्धा भी होती थी कि किसके पौधे—जरई—कितने ज्यादा बढ़ रहे हैं।

उस छोटे-से मिट्टी के पात्र में जाने कितनी चीजें एक साथ चलती थीं—तालाब का पानी, खेत की मिट्टी, जौ का बीज, लड़की के हाथ का श्रम और कई दिनों की प्रतीक्षा। नागपंचमी को बोया गया बीज केवल पौधा नहीं था; वह आने वाले त्योहार की तैयारी था। उसे हर दिन देखना पड़ता था। उसमें पानी देना पड़ता था। उसके बढ़ने का इंतजार करना पड़ता था।

जरई
इतिहास बन गई जरई

राखी के दिन की तरह एक सुबह उठकर सब कुछ तैयार नहीं मिल जाता था।

लड़कियाँ भादौं की कजरी तीज पर वही पौधे अपने भाइयों और पिता के सिर पर या कानों पर पहनाती थीं। जरई ही राखी का प्रतीक होती थी। उसमें गांव-देहात, ऋतु, मौसम, अन्न, जल, तालाब और जरई के लिए किया गया श्रम जुड़ता था।

जरई की सबसे पहली मेरी स्मृति कलुआ बुआ और मेरे बाबा की है। बाबा शम्भू-के-पूरा के स्कूल में हेडमास्टर थे और घर में भी उनका अनुशासन कड़ा था। घर के सबसे बड़े के कारण कुटुम्ब में उन्हें मालिक कहा जाता था। मालिक को कोई जरई पहना सकता है, यह मेरी कल्पना में भी नहीं था। पर मैने देखा कि बुआ बाबा (अपने पिताजी) के कान पर जरई खोंस और कुछ बालें सिर पर बिखेर, डर के मारे भागीं। मालिक को भी आश्चर्य हुआ होगा। कुछ जोर से बोले भी वे। किसी ने घर के जनाना में आकर सूचना दी — कलुई मालिक के जरई बांधे बा!

यह कुटुम्ब के लिए बड़ी बात थी। मालिक ने अपना डंडा भले फटकरा, जोर से बोले, लेकिन अपनी बंडी से निकाल कर एक डब्बल (शायद एक आना) कलुआ बुआ को दिया भी। मुझे भी यकीन हुआ कि बाबा के कठोर व्यक्तित्व के पीछे कोमलता भी रहती है कहीं।

अब जरई जैसा निरीह जौ का पौधा चमचमाती राखी, साथ में मिठाई का डिब्बा, चॉकलेट का हैम्पर और डिजाइनर रोली-चावल की प्रतिस्पर्धा कहां कर पाएगा!

राखी एक दिन में खरीदी जा सकती है, जरई के लिए नागपंचमी से इंतजार करना पड़ता है।

सो जरई इतिहास हो गई!

अब तो एक दशक से गांव में हूं, पर गांव में भी जरई उपजाते और भाई के सिर-कान पर जरई को बांधते नहीं देखा। तालाब हैं, मिट्टी है, जौ भी कहीं न कहीं बोया जाता होगा, भाई-बहन भी हैं—लेकिन वह छोटी-सी परंपरा उनके बीच से निकल गई है।

शायद यही परंपराओं के खत्म होने का सबसे विचित्र तरीका है। कोई घोषणा नहीं होती। कोई दिन तय नहीं होता कि आज से यह परंपरा समाप्त। बस एक साल कोई नहीं करता, दूसरे साल कम लोग करते हैं, तीसरे साल बच्चों को पता ही नहीं होता कि किया क्या जाता था। फिर किसी बूढ़े को अचानक याद आता है कि अरे, ऐसा भी तो होता था!

इस साल राखी 28 अगस्त को है और जरई/कजरी तीज 31 अगस्त को। पर तुरत-फुरत में रक्षाबंधन तो मनाया जा सकता है, जरई नहीं। जरई की तैयारी तो नागपंचमी के दिन से होती है।

अब तो अमेजन ने भाई-बहन के संबंध—राखी का बाजार—थाम लिया है। आपने सोचने, भेजने में देर भी कर दी तो क्या; आप अभी अमेजन या फ्लिपकार्ट पर बटन दबाएं तो घंटे भर में दूर मुंबई या बेंगलुरु में राखी और उसके साथ अन्य बाजार-जनित सामान के चमचमाते पैकेट की डिलिवरी हो सकती है।

बाजार ने इस त्योहार की एक बड़ी समस्या हल कर दी है—दूरी की। भाई प्रयागराज में हो, बहन मुंबई में या बेंगलुरु में, राखी पहुंच जाएगी। मिठाई पहुंच जाएगी। चॉकलेट पहुंच जाएगी। उपहार पहुंच जाएगा। संबंध का प्रतीक समय पर दरवाजे तक आ जाएगा।

लेकिन जरई जैसी perishable जौ की बालियों को डिलिवर करने में बाजार की न चाह है, न उसकी लॉजिस्टिक्स विकसित हो सकती है। जरई को किसी गोदाम में रखा नहीं जा सकता। उसे महीनों पहले पैक करके नहीं भेजा जा सकता। उसे कुरियर बॉक्स में डालने के लिए नहीं बनाया गया। उसे तो अपने ही गांव की मिट्टी में, अपने ही तालाब के पानी से, अपने ही मौसम में उगना पड़ता है।

राखी के साथ बाजार घर आता है; जरई के साथ गांव।

शायद इसीलिए जरई का खो जाना केवल एक पुराने त्योहार की छोटी-सी रस्म का खो जाना नहीं है। उसके साथ त्योहार की वह धीमी गति भी गई जिसमें मौसम को आने दिया जाता था, बीज को फूटने दिया जाता था, पौधे को बढ़ने दिया जाता था और बच्चे को उसके बढ़ने को देखने दिया जाता था।

आज हमारे पास त्योहार पहले से कहीं अधिक चमकदार हैं, लेकिन उनके लिए इंतजार कम हो गया है।

कोई फिल्मी सितारा, कोई प्रधानमंत्री या कोई बड़ा अभियान जरई को फिर से उगा दे तो बात और है। तब शायद सोशल मीडिया पर उसकी तस्वीरें आएंगी, “हमारी खोई हुई परंपरा वापस लाएं” जैसे अभियान चलेंगे और अमेजन पर भी शायद ‘Traditional Jarai Rakhi’ का कोई पैकेट दिखाई दे जाए! लेकिन तब वह जरई होगी या जरई की स्मृति—यह कहना कठिन है।

क्योंकि राखी डिलिवर हो सकती है, जरई नहीं। उसे डिलिवर करने के लिए एक कुरियर नहीं, एक मौसम चाहिए।

ΨΨΨ

ब्लॉग पर 2013 की एक पोस्ट है जरई पर। मेरी बुआ उसमें मेरे पिताजी को जरई बांध रही हैं। अब बुआ भी नहीं रहीं और पिताजी भी। उनकी और जरई की स्मृति जिंदा बची है। मेरे साथ रहेगी।

Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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