बस, वह चली जाती है। हम अंग्रेजी तरीके से हाथ हिलाते हैं।
वह आई और चली गयी। बेटियाँ आती ही जाने के लिये हैं!
भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
बस, वह चली जाती है। हम अंग्रेजी तरीके से हाथ हिलाते हैं।
वह आई और चली गयी। बेटियाँ आती ही जाने के लिये हैं!
कभी भी शहर जाता हूं तो स्टेशनरी/किताब की दुकान पर जरूर जाता हूं। मेरी पत्नीजी को वह पसंद नहीं है। पर मुझे भी उनका टेर्राकोटा या नर्सरी पर पैसे खर्च करना पसंद नहीं है। लिहाजा हम दोनो शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में जीते हैं।
माँ बिटिया में फिर वाक्-युद्ध होता है – “कटहल नहीं मिला? यहाँ मेरे पसंद की सब्जी भी नहीं खरीदना चाहती आप!” कोई भी बहाना हो, दोनो को लड़ना है ही। ये दो दिन लड़ने का आनंद लेने के लिये हैं।