सुनना हमारे जीवन का महत्वपूर्ण अंग है। सुनाने से कहीं ज्यादा सुनने का महत्व है। सुनने का महत्व, जानने के लिये हो – यह जरूरी नहीं। जानने के लिये तो देखना-सुनना है ही। सुनने के लिये भी सुनना है। जीवन की आपाधापी में सुनना कम हो गया है। तनाव और व्यग्रता ने सुनाना बढ़ा दियाContinue reading “सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं”
Category Archives: आत्मविकास
जीवन मूल्य कहां खोजें?
(यह पोस्ट मेरी पिछली ’यदि हमारे पास चरित्र न हो’ विषयक दोनो पोस्टों पर आयी टिप्पणियों से प्रेरित है) नीति शतक का जमाना नहीं। धम्मपद का पढ़वैया कौन है? तिरुवल्लुवर को कौन पढ़/पलट रहा है? भग्वद्गीता के दैवीसम्पद (अध्याय १६) का मनन कौन कर रहा है? रामचरित मनस के उस प्रसंग को कौन खोज रहाContinue reading “जीवन मूल्य कहां खोजें?”
यदि हमारे पास यथेष्ट चरित्र न हो — २
(कल से आगे—) यदि हमारे पास यथेष्ट चरित्र न हो, तो छात्रो के रूप मे हम गम्भीर अध्ययन के कालयापन के स्थान पर अपने पाठ्यक्रम से अलग की गतिविधियो मे ही अधिक रुचि लेंगे और हम ऐसे विचारो तथा कार्यों मे व्यस्त रहेंगे, जो हमारे जीवन कालिका को गलत आकार देंगे और इसके फ़लस्वरूप हमContinue reading “यदि हमारे पास यथेष्ट चरित्र न हो — २”
