प्रेमसागर अमरकण्टक को निकल लिये


द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा के एक महत्वपूर्ण अंश में बलभद्र जी सहायक बने। उनका सहयोग रामेश्वरम सेतु वाली गिलहरी जैसा नहीं, नल-नील जैसा माना जाना चाहिये। उनके रहने से ही प्रेमसागर वह दुर्गम रास्ता पार कर पाये।

मैने संकल्प न किया होता, तो यह यात्रा कभी न करता – प्रेमसागर


छ साल पहले हृदय रोगी जो छ मीटर भी नहीं चल सकता था, आज पैदल मैकल पहाड़ चढ़ गया! … प्रेम सागर कहते हैं कि अगर वे हृदय रोग से उबरे न होते तो उनका हार्ट फेल हो गया होता!

प्रेमसागर के बारे में आशंकायें


“आप मेरे बारे मेंं लिख रहे हैं, उससे मैं गर्वित नहीं होऊंगा, इसके लिये सजग रहा हूं। आप चाहे दिन में तीन बार भी लिखें, मैं उससे विचलित नहीं होऊंगा, भईया। लालसा बढ़ने से तो सारा पूजा-पाठ, सारी तपस्या नष्ट हो जाती है।”

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