विकलांगता पर जयी जितेन्द्र


जितेन्द्र मेरे अन्यतम कर्मचारियों में से है। कार्य करने को सदैव तत्पर। चेहरे पर सदैव हल्की सी मुस्कान। कोई भी काम देने पर आपको तकाजा करने की जरूरत नहीं। आपकी अपेक्षा से कम समय में आपकी संतुष्टि वाला कार्य सम्पन्न कर आपको दिखाना जितेन्द्र को बखूबी आता है। और उस व्यक्ति में, आप क्या चाहतेContinue reading “विकलांगता पर जयी जितेन्द्र”

टॉल्सटॉय और हिन्दी ब्लॉगरी का वातावरण


मैं लियो टॉल्सटॉय (१८२८-१९१०) की मेरी मुक्ति की कहानी पढ़ रहा था। और उसमें यह अंश उन्होंने अपने समय के लेखन के विषय में लिखा था। जरा इस अंश का अवलोकन करें। यह हिन्दी ब्लॉगरी की जूतमपैजारीय दशा (जिसमें हर कोई दूसरे को दिशा और शिक्षा देने को तत्पर है) पर सटीक बैठता है –Continue reading “टॉल्सटॉय और हिन्दी ब्लॉगरी का वातावरण”

आज सवेरा न जागे तो मत कहना


मेरी पत्नीजी ने कबाड़ से मेरी एक स्क्रैप बुक ढूंढ़ निकाली है। उसमें सन १९९७ की कुछ पंक्तियां भी हैं। यूं देखें तो ब्लॉग भी स्क्रैप बुक ही है। लिहाजा स्क्रैप बुक की चीज स्क्रैप बुक में – आज सवेरा न जागे तो मत कहना घुप्प कोहरा न भागे तो मत कहना दीवारों के कानोंContinue reading “आज सवेरा न जागे तो मत कहना”

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