लेट थे डाला छठ के सूरज


लगता है रात देर से सोये थे। मेरी तरह नींद की गोली गटक कर। देर हो गयी उठने में सूरज देव को। घाट पर भीड़ को मजे से इन्तजार कराया। लेकिन थे खूब चटक, लाल। उस अधेड़ मेहरारू की डलिया से लप्प से एक ठोकवा गपके और चढ़ गये आसमान की अटारी पर। हमसे बतियायेContinue reading “लेट थे डाला छठ के सूरज”

मोहम्मद यूसुफ धुनकर


मेरे मोहल्ले के पास जहां खंडहर है और जहां दीवार पर लिखा रहता है “देखो गधा पेशाब कर रहा है”; वहां साल में नौ महीने जानी पहचानी गंघ आती है पेशाब की। बाकी तीन महीने साफ सफाई कर डेरा लगाते हैं रुई धुनकर। नई और पुरानी रुई धुन कर सिलते हैं रजाई। मैं रुई धुनContinue reading “मोहम्मद यूसुफ धुनकर”

लल्लू


हमें बताया कि लोहे का गेट बनता है आलू कोल्ड स्टोरेज के पास। वहां घूम आये। मिट्टी का चाक चलाते कुम्हार थे वहां, पर गेट बनाने वाले नहीं। घर आ कर घर का रिनोवेशन करने वाले मिस्तरी-इन-चार्ज भगत जी को कहा तो बोले – ऊंही त बा, पतन्जली के लग्गे (वहीं तो है, पतंजलि स्कूलContinue reading “लल्लू”

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