‘बना रहे बनारस’ – श्री विश्वनाथ मुखर्जी


श्री विश्वनाथ मुखर्जी की यह पुस्तक – बना रहे बनारस सन 1958 में भारतीय ज्ञानपीठ, काशी ने छापी थी. उस समय पुस्तक की छपी कीमत है ढ़ाई रुपया. अब भी शायद 30-40 रुपये के आस-पास होगी. इस 188 पेज की पुस्तक में कुल 24 लेख हैं. अर्थात प्रत्येक लेख 7-8 पृष्ठ का है. सभी लेखContinue reading “‘बना रहे बनारस’ – श्री विश्वनाथ मुखर्जी”

एक घायल पिल्ले की पांय-पांय


परसों एक पिल्ला एक कार से टकरा गया. बहुत छोटा नहीं था. कुत्ते और पिल्ले के बीच की अवस्था में था. कार रुकी नहीं. पिल्ला मरा नहीं. जख्मी होकर पांय-पांय करता रहा. शायद अपंग हो जाये. अपंग होने पर मानव का जीवन दुरूह हो जाता है, जानवर के लिये तो और भी कठिन होगा. मेरीContinue reading “एक घायल पिल्ले की पांय-पांय”

आलोक पुराणिक और बोरियत


दो शब्द ले लें जिनमे कुछ भी कॉमन न हो और शीर्षक बना दें. कितना ध्यानाकर्षक शीर्षक बनेगा! वही मैने किया है. आलोक और बोरियत में कोई कॉमनालिटी नहीं है. आलोक पुराणिक को मरघट के दृष्य पर लिखने को दे दें – मेरा पूरा विश्वास है कि वे जो भी अगड़म-बगड़म लिखेंगे उससे आप अपनीContinue reading “आलोक पुराणिक और बोरियत”

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