मकर संक्रांति, सर्दी और मैं


खेल खत्म होने के बाद शतरंज की सभी गोटियां – राजा, ऊंट और प्यादा; सब – एक डिब्बे में बंद हो जाते हैं। पर तब भी मुझे अपने को बड़े बाबू के तुलनीय रखना जमा नहीं। क्या कर लोगे जीडी?!

अलाव के इर्द गिर्द चर्चा


पिछली कोरोना लहर की बात चली। बम्बई से आये एक आदमी की बात की राकेश ने। उसको उसके गांव वालों ने घर में नहीं घुसने दिया था। बाहर तम्बू तान कर उसमें रहने को कहा। घर के बर्तनों में नहीं महुआ के पत्तल दोना में भोजन दिया गया।

लौकी की बेल की झाड़ फूंक


नजर झाड़ना, ओझाई-सोखाई, डीहबाबा की पूजा, सत्ती माई को कढ़ईया चढ़ाना – ये सब ऑकल्ट कृत्य अभी भी चल रहे हैंं! हर लाइलाज मर्ज की दवा है इन कृत्यों में। मैंने गुन्नीलाल पाण्डेय जी से पूछा – कोई कोरोना की झाड़ फूंक वाले नहीं हैं?