महामृत्युंजय पाठ का भंडारा – अगियाबीर की एक शाम

महामृत्युंजय पाठ के बाद भंडारा 

कल प्रेमनारायण मिश्र जी रात पौने नौ बजे आये। वे चित्रकूट धाम से लौट रहे थे और आज होने वाले भंडारे का निमंत्रण देने आये थे। रात का समय, यात्रा की थकान, और उसके बावजूद उनका आग्रह—इससे ही आयोजन का भाव समझ में आ रहा था।

प्रेमनारायण जी के यहां सात दिवसीय महामृत्युंजय मंत्र-जाप हुआ था। सात पंडित एक साथ बैठकर मंत्र का पाठ करते हैं—एक पंडित एक दिन में लगभग आठ घंटे लगाकर करीब 3000 जप करता है। इस तरह कुल मिलाकर डेढ़ लाख बार मंत्र का उच्चारण हुआ। यह संख्या सुनने में जितनी बड़ी लगती है, उतनी ही बड़ी उसकी साधना भी रही होगी।

जप की समाप्ति पर मनौती के अनुसार प्रेमनारायण जी चित्रकूटधाम हो कर आये और अगले दिन भंडारा रखा। परम्परा में यह क्रम जैसे स्वाभाविक रूप से जुड़ा हुआ है—जप, तीर्थ और फिर सामूहिक भोजन।

अपने घर उन्होंने बड़े आदर से मुझे बिठाया। भोजन का आग्रह किया, पर उसी दिन मेरे दांत का कैपिंग हुआ था और डेंटिस्ट साहब ने मोलर दांत पर जोर न देने को कहा था। सो मैंने भोजन के बजाय चाय ली। आधा-पौना घंटा रुक कर वापस लौट आया।

मिश्र जी का घर अगियाबीर के एक टीले पर है। अगियाबीर नियोलिथिक काल की उत्खनन साइट है—यह भी सम्भव है कि उनके घर के नीचे तीन-चार हजार साल पुरानी सभ्यता के अवशेष हों। उनके घर के आसपास पहली सदी की ईंटें बिखरी मिल जाती हैं। कुछ लोगों ने उनका उपयोग अपने मकान या बाड़ बनाने में कर लिया है। गंगा नदी उनके घर से लगभग दो सौ मीटर की दूरी पर है।

उनके ओसारे में बैठा था तो गौरैयों की चहचहाहट साफ सुनाई दे रही थी। वहां हर बार जाने पर एक साथ दो अनुभूतियाँ मिलती हैं—प्राचीनता और प्रकृति। एक तरफ इतिहास की परतें, दूसरी तरफ जीवन की सहज ध्वनियाँ।

महामृत्युंजय पाठ का कारण भी उन्होंने बताया। विगत कुछ समय में दो दुर्घटनाएँ उनके साथ घटी थीं और दोनों में उनका सकुशल बच जाना, उनके अनुसार, आश्चर्य से कम नहीं था। वे इसे ईश्वर की कृपा मानते हैं और उसी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिये उन्होंने यह जाप करवाया।

जाप के बाद समाज को भंडारे के माध्यम से जोड़ना इस देशकाल की परिपाटी है। हालांकि अब भंडारों का स्वरूप बदल रहा है—केटरर, बफे और एक तरह की व्यवस्थित दूरी। आयोजक हाथ बांधे खड़े रहते हैं और लोगों से बातचीत का समय मिलता है।

पर मिश्र जी के यहां परम्परा अभी जीवित है। लोग पांत में बैठते हैं और भोजन परोसने के लिये घर और आसपास के दर्जन भर—या उससे भी अधिक—नौजवानों की टीम लगी थी। वह टीम इतनी मुस्तैदी से काम कर रही थी कि कहीं कोई अव्यवस्था नजर नहीं आई।

मैं अगियाबीर के ही अपने मित्र गुन्नीलाल पांडेय जी के साथ वहां गया था। वहां एक शुक्ल जी भी थे—सतहत्तर साल की उम्र में मिर्जापुर से गंगापुल पार कर अपने स्कूटर से आये थे। इतनी उम्र में भी लोग 30–40 किलोमीटर स्कूटर चला रहे हैं—यह देख कर लगा कि अपने स्वास्थ्य को ऐसा बनाये रखना चाहिए कि गतिशीलता बनी रहे।

वापस लौटते समय प्रेमनारायण मिश्र जी ने आग्रहपूर्वक भोजन की पोटली—मिठाई के साथ—बांध दी। यह कहते हुए कि अगर मैं नहीं खा सकूंगा तो दीदी तो प्रसाद ले ही सकेंगी। यह आग्रह भी उस परम्परा का हिस्सा है जिसमें भोजन केवल भोजन नहीं रहता, प्रसाद बन जाता है।

गाँव-देहात में — और पूरे भारत में भी — जाप, भंडारा, भोजन, प्रसाद — सब ईश्वर से जुड़ा है। सेकुलर और रिलीजियस जीवन के बीच कोई स्पष्ट रेखा नहीं — या है भी तो बहुत धूमिल, बहुत झीनी। और शायद यही स्वाभाविक भी है — सहस्राब्दियों से मनुष्य इसी श्रद्धा के बल पर जीता आया है। यह आधुनिक  तर्कशास्त्र से परे है; पर जीवन से गहरे जुड़ी इस आस्था को सिरे से खारिज करना सरल नहीं है।

एकबारगी मन में आता है — मैं कोई बड़ा आयोजन तो नहीं कर सकता, पर घंटा-डेढ़ घंटा रोज़ देते हुए एक साल में डेढ़ लाख महामृत्युंजय पाठ कर सकता हूँ। हो सकता है कोई विलक्षण अनुभूति हो — जैसी प्रेमनारायण जी कह रहे थे। और हो सकता है न भी हो। पर यह यात्रा तो की जा सकती है।

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
15/16 अप्रेल 2026

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Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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