भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
कंकड़हिया सड़क – गंगा के कंकरों को जगह जगह गड्ढे भरता और धुरमुस से पीटता आदमी गांव से लालानगर तक जाता था। दिन भर के काम पर उसे चार आना मजूरी मिला करती थी। फागुन से पहले सड़क यूं रिपेयर होती थी और उसके बाद गुड़ का बैलगाड़ियों का काफिला निकला करता था तिलंगा से।
दिन भर जगह जगह गुड़ लादते, चलते शाम को पंहुचता था सौ बैलगाड़ी का कारवां शिवाला पर। एक बनिया जिसे जानकारी होती थी कारवां की, वह किराना का सामान दिया करता था, वही केवट और हरिजन बस्ती को सूचना देता था कि उनकी महिलायें घास की टोकरियां लिये तैयार रहें।
रात गुजारता था कारवां शिवाला पर। “आप समझिये जीजा जी, सन 1945-50 तक की बात होगी यह।”
उस जमाने में एक कोयला से चलती बस जाती थी कछवां बाजार से चील्ह तक। एक ही बस थी जो जाती थी और शाम को वापस आती थी। मिर्जापुर जाने का वही साधन था। आगे गंगा पर पीपा पुल हुआ तो उससे, वर्ना नाव से लोग मिर्जापुर से आते जाते थे।
“स्टीम इंजन की बस?” – मैं और मेरी पत्नीजी आश्चर्य से बोल उठे।
कछवां बाजार से चील्ह जाती स्टीम बस
“हां मेरे समय के पहले की बात है। पर अपने बचपन में (1970 की आसपास) बनारस में कोयले से चलता रोड रोलर तो अपनी आंखों देखा है।” टुन्नू ने कहा।
बैलगाड़ी का कारवां, स्टीम इंजन की बस — हमारी कल्पना में भी नहीं था यह भारत, यह इलाका।
मैने सोचा – गज़ब चल रहा है टुन्नू का यह बताना।
टुन्नू यूं बोलते जा रहे थे, और मुझे लग रहा था—यह सब अगर काग़ज़ पर नहीं उतरा, तो शायद अगली पीढ़ी के लिए कभी हुआ ही नहीं माना जाएगा।
नहीं लिखा गया तो यह ओरल हिस्ट्री गायब ही हो जायेगी!
टुन्नू पण्डित – शैलेंद्र दुबे, मेरे साले साहब; इलाके का इतिहास खोलना शुरू किये हैं अब।
सन 1940-50 में चलता था गोपीगंज के पास तिलंगा से गुड़ से लदा सौ बैलगाड़ियों का काफिला। कलकत्ता जाता था। साढ़े सात सौ किलोमीटर की यात्रा।
रोड़ भी क्या रोड थी। गंगा के कंकर बिछाये जाते थे। एक आदमी धुरमुस से पीट कर उन्हें समतल करता था। तिलंगा से चला कारवां पहला पड़ाव कटका-विक्रमपुर के पास करता था।
बैलगाड़ी के साथ 100-200 लोग और बैल रात गुजारते रहे होंगे – भोर होते ही चल देते होंगे। कैसी और कितनी चहल पहल होती रही होगी!
और यह चल रहा था, तब जब 1860 के दशक में रेल आ चुकी थी।
कब तक चला बैलगाड़ी का कारवां। कब बदलाव हुआ। यह सब सोच कर ही इतिहास जानने का उत्साह मन में जग रहा है।
गुड़ लदा बैलगाड़ी कारवां
टुन्नू पण्डित के साथ कई बैठकें होनी हैं अब। एक बातचीत का रिकॉर्डर साथ में रख कर।
टुन्नू पंडित की जय हो!
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अगले दिन 29 जनवरी की सोशल मीड़िया पर पोस्ट –
गोपीगन्ज के तिवारी जी से मैने पूछा – सुना है तिलंगा से कलकत्ता के लिये 100 बैलगाड़ियों का काफिला जाया करता था। गुड़ से लदा हुआ।
तिवारी जी की उम्र 60+ की होगी। उनके बचपन में बैलगाड़ी के कारवां की स्मृति तो नहीं है, पर यह जरूर याद है कि तिलंगा (गोपीगंज से 5 किमी दूर) में जब भी जाते थे, बैलगाड़ियां बहुत दीखती थी वहां। उनके जन्म के एक दो दशक पहले का दृश्य रहा होगा कारवां का।
और गुड़ तो खूब होता था इलाके में। हर गांव में गन्ने की खेती और कई कोल्हू होते थे गन्ना पिराई के। बड़े, पत्थर के कोल्हू!
महराजगंज के बाबा प्रधान ने कहा – जी, वैसा हुआ करता था। बाकी, ज्यादा जानकारी पता कर एक दो दिन में बात करेंगे मुझसे।
बैलगाड़ी का कारवां – 1940-50 का रेलवे का कम्पीटीटर! यह जानकारी मुझे बहुत आकर्षित कर रही है।
टुन्नू पंडित का कहना है – कारवां गांव के पास आता था तो केवटाने की औरतें, सिर पर घास की टोकरी लिये दौड़ लगाती थीं – बैलों को घास चाहिये होता था। दो सौ बैलों के लिये घास! शिवाला के पास मैदान में कारवां रुकता था और बाटी लगा करती थी शाम के समय।
यह सब सुन लिख कर क्या बनेगा जी? इतिहास या उपन्यास? या कुछ लिखने बनाने की काबलियत है जीडी में?
सुबह के अखबार में जब कोई उत्पाद आधा कॉलम लेता है, तो वह हमें अपने बारे में कुछ बताता है। लेकिन जब कोई कंपनी पूरा पहला पन्ना खरीद ले—और उस पर किसी सुपरस्टार को रख दे—तो वह समाज, अर्थव्यवस्था और उपभोक्ता मनोविज्ञान, तीनों स्तर पर गहरे से प्रभाव डालती है।
कुछ दिन पहले जो फुल-फांट पेज हीयरिंग डिवाइस का विज्ञापन आया, उसमें सबसे पहले नज़र जाती है मॉडल पर—और वह मॉडल कोई साधारण चेहरा नहीं है। वह फिल्मी कलाकार सोनू सूद हैं।
हियरिंग डिवाइस का फुल फ्रंट पेज विज्ञापन
अभिनेता, मेहनती व्यक्तित्व, और कोविड-काल में जन सामान्य की मदद के कारण देशभर में बनी भरोसेमंद छवि वाला सोनू सूद। यह चेहरा सिर्फ रील का नहीं, असल जीवन का भी प्रतीक बन गया है।
अब सवाल उठता है—हीयरिंग एड जैसी परंपरागत “मेडिकल” चीज़ के विज्ञापन में सोनू सूद को काहे लाया गया? यह तो 70+ बुज़ुर्गों की मशीन मानी जाती थी – या है भी। क्या इसकी जगह कोई डाक्टर किसी बुजुर्ग के कान जांचता नहीं दिखाया जाना चाहिये था? और तब क्या एक चौथाई पेज का विज्ञापन काफी नहीं रहता?
फुल फ्रंट पेज और सोनू सूद जैसे स्टार का प्रयोग – यही वह कारण है जहाँ यह विज्ञापन अपना बड़ा संकेत देता है।
सोनू सूद को रखने का मतलब है— विज्ञापन लक्ष्य-समूह बदला है। कम्पनी अब बूढ़े, बेंत पकड़े, “आंय-आंय” करते लोग नहीं ढूँढ रही। वह 45–55 वर्ष के उस कामकाजी वर्ग को लक्ष्य कर रही है जो—
बिज़नेस संभालता है,
मीटिंग्स करता है,
भीड़ में बोलता-सुनता है,
और जिसे आजकल के शहरी और औद्योगिक-व्यवसायिक शोर की थकान सताती है।
सोनू सूद का चेहरा इस बदलाव का एंकर है। अब सुनने का यंत्र चालीस साल के जवान को टार्गेट कर रहा है। यह तीन स्तरों – परतों में – प्रभाव डालता है।
विज्ञापन की पहली परत — समाजिक बदलाव आज हीयरिंग एड (hearing aid) का नया अर्थ है— “साफ़ सुनना आर्थात शार्प होना।” यह बीमारी वाला उपकरण नहीं, बल्कि आधुनिक लाइफ स्टाइल का हिस्सा बनता जा रहा है। और सोनू सूद, एक फिट और सक्रिय व्यक्तित्व, इसे बूढ़ों के कोने से निकाल कर उमंग से भरी मिडिल एज़ की मुख्य धारा में लॉन्च कर देता है।
उनका संदेश यह है: “यह डिवाइस कमजोरी नहीं, सुविधा है। यह आपको और सक्षम बनाता है, बीमार नहीं दिखाता।”
विज्ञापन की दूसरी परत — अर्थशास्त्र फुल-पेज विज्ञापन की कीमत लाखों में जाती है। और यह देश भर में – अलग अलग अखबारों में दिया जाता है तो लागत करोड़ों में बैठती है। कंपनी तभी यह खर्च करती है जब उसे पता हो कि— उत्पाद जनता की मांग बन सकता है, शहरी मध्य-वर्ग इसे स्वीकार करेगा, आखिर डिवाइस की कीमत वही चुकाने की हैसियत रखेगा। और उपभोक्ता के मन में बहरेपन का धब्बा नहीं लगेगा। वह उसके लिये अभिजात्य फैशन स्टेटमेंट होगा; कोई लजाने – छुपाने वाली चीज नहीं।
सोनू सूद की “भरोसेमंद” ब्रांड छवि यहाँ आर्थिक निवेश की सुरक्षा बनती है। उनकी लोकप्रियता में एक खास बात है— वह बहु-क्षेत्रीय है: हिंदी पट्टी उन्हें जानती है, दक्षिण भारत उन्हें पसंद करता है, और कोविड के कारण पूरा देश उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है।
ऐसे व्यक्ति का चेहरा हीयरिंग डिवाइस को चिकित्सा से निकाल कर उपभोक्ता सामग्री की श्रेणी में ले आता है।
विज्ञापन की तीसरी परत — मनोविज्ञान बुज़ुर्ग मॉडल कोई कहानी नहीं बेचते; कोई सपने नहीं उपजाते; वे सिर्फ “बीमारी” की याद दिलाते हैं।
लेकिन सोनू सूद एक कहानी बेचते हैं— “मैं सक्रिय हूँ। आधुनिक हूँ। काम में तेज़ हूँ। और यह डिवाइस मेरी क्षमता बढ़ाता है।”
यह छवि अपनापन पैदा करती है। उपभोक्ता सोचता है— “अगर सोनू इसे पहन सकते हैं, मैं क्यों नहीं?”
यही मनोविज्ञान है। विज्ञापन सिर्फ उत्पाद नहीं बेच रहा… वह एक पहचान बेच रहा है।
और फिर आता है तकनीकी मोड़— हीयरिंग एड्स और ईयर बड्स का फर्क तेजी से मिट रहा है। बुढ़ापा और जवानी का अंतर गायब हो रहा है। AI वाले हीयरिंग डिवाइसेज़ वातावरण का किर्र किर्र, घिसघिस वाला शोर कम करते हैं, बातचीत उभारते हैं, फोन कॉल सीधे डिवाइस में लाते हैं, और रोज़मर्रा की आदतें सीखते हैं। ये बूढ़े से ज्यादा नौजवान को लाभ पंहुचाने वाले बन सकते हैं। वह भीड़ में, शोर में, व्यवधान में भी एकाग्रता से काम कर सकता है।
अब इस पूरे चित्र में सोनू सूद क्या कर रहे हैं? वह इन हीयरेबल्स को “मरीज के यंत्र” के पिंजरे से निकालकर “स्मार्ट लाइफस्टाइल डिवाइस” के मंच पर ला रहे हैं। बहुत कुछ वैसे ही जैसे चश्मा मायोपिया या हेपर मेट्रोपिया के लिये नहीं, धूप या अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाव के लिये फैशनेबल पीढ़ी पहनती है। खबर छपती है कि दावोस की बैठक में फलां राष्ट्राध्यक्ष धूप का चश्मा लगाये पंहुचे। फिल्मी हीरो-हीरोइनें तरह तरह के चश्मे पहने और लुभावने लगते हैं।
चश्मा जैसे आज का फैशन स्टेटमेंट बना है, हियरिंग डिवाइस भविष्य का फैशन स्टेटमेंट बनेगा।
एक तरह से यह फुल-पेज विज्ञापन कह रहा है— “सुनना अब उम्र की समस्या नहीं, प्रदर्शन की आवश्यकता है। और अगर सोनू सूद को यह चाहिए—तो आपको भी चाहिए।”
फुल-पेज विज्ञापन एक उत्पाद की कहानी नहीं होता। यह समाज के बदलते आत्मविश्वास की कहानी होता है। और आज इसकी कहानी एक सामान्य विज्ञापन-अभिनेता नहीं, एक बड़ा प्रतीक सुना रहा है—सिनेमा का स्टार सोनू सूद।
आज कम सुनने वाले खरीद रहे हैं इसे। पांच साल में एआई युक्त डिवाइस, पचास हजार में उच्च मध्यवर्ग खरीदेगा और यह वैसा ही फैशन स्टेटमेंट होगा जैसे एप्पल का आईफोन! कोई आश्चर्य नहीं कि नया डिवाइस लॉन्च हो और खरीदने वालों की एक किलोमीटर लम्बी लाइन लगे। लोग गर्व से बाइट दें कि उन्होने रात भर लाइन में लग कर आखिर सबसे पहले हीयरिंग डिवाइस खरीद लिया!
सारी बड़ी कम्पनियां – फिलिप्स, एप्पल, बोस, सोनी, सिग्निया इस बाजार में कूदेंगी। भविष्य का सपना लाया है यह विज्ञापन!