मोबाइल नहीं, डिजिटल कल्पवास चाहिए


मोबाइल को जीवन में रस और जीवन के बड़े अर्थ से जोड़ने का उपक्रम सुबह साइकिल लेकर निकलता हूँ। घरपरिसर में ही गोल गोल चक्कर।  साइकिल बहुत तेज नहीं चलाता—इतनी ही कि शरीर चलता रहे और मन को पीछे छूट जाने का डर न हो। कान में किसी किताब की summary चलती है, लेकिन 1XContinue reading “मोबाइल नहीं, डिजिटल कल्पवास चाहिए”

सगड़ी वाला बूढ़ा


इग्यारह बज रहे थे। कोहरे का पर्दा हल्के से ठेल कर कानी आंख से सूरज भगवान ताकने लगे थे। वह बूढ़ा मुझे मर्यादी वस्त्रालय के आगे अपनी सगड़ी (साइकिल ठेला) पर बैठा सुरती मलता दिखा। बात करने के मूड़ में मैने पूछा – आजकल तो बिजली का ठेला भी आने लगा है। वह लेने कीContinue reading “सगड़ी वाला बूढ़ा”

बीस साल बाद का सीजी भाई


सीजी भाई यानि चैट जीपीटी। मैने उससे आज पूछा – सीजी, वह युग कब आयेगा जब आप मेरे ड्राइंगरूम में मेरे सामने बैठ कर चर्चा करने या मेरी भौतिक सहायता करने में समर्थ हो जायेंगे। अभी तो आपसे चर्चा के लिये लैपटॉप खोल कर या मोबाइल पर इंटरेक्ट करना होता है। सीजी भाई का उत्तरContinue reading “बीस साल बाद का सीजी भाई”

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