कुसुमडीह से कुलुबंदी – झारखण्ड बंगाल बॉर्डर


19 मार्च 23

कुसुमडीह में रिया रमन होटल से सवेरे रवाना होते समय अंदाज नहीं था कि शाम तक कहां होगा पड़ाव। झारखण्ड में या बंगाल में? कोई मंदिर मिलेगा या धर्मशाला या होटल या फिर पीपल का पेड़।

होटल से सटी है वह ट्विन दुकान – बाबा बासुकी पान भण्डार प्लस बाबा बासुकी चाय भण्डार।

सवेरे रिया रमन होटल से निकलते ही चाय की दुकान मिल गयी। होटल से सटी है वह ट्विन दुकान – बाबा बासुकी पान भण्डार प्लस बाबा बासुकी चाय भण्डार। आगे के रास्ते के बारे में प्रेमसागर ने बताया कि घर ज्यादातर खपरैल के हैं। उन्होने दूर बैलगाड़ी चलती देखी। लोग सामान ढोने में और बांस आदि ले जाने में बैलगाड़ी का इस्तेमाल करते हैं। सागौन के ज्यादा वृक्ष हैं। लोग सीधे हैं। जो दुकान इत्यादि लगाये हैं, वे कुछ चालाक भी हैं।

घर ज्यादातर खपरैल के हैं।

दुमका झारखण्ड के जंगल भी समेटे है। जैसे जैसे आगे बढ़ रहे हैं प्रेमसागर, जंगल भी बढ़ रहा है। आदिवासी घर भले ही खपरैल के हों, उनमें सुविधायें कम हों, टीवी के एण्टीना ज्यादा न दीखते हों, पर घर साफ दीखते हैं। घर के बाहर की जमीन बहुधा मिट्टी से लीपी हुई होती है। उनकी मुर्गियां और बकरियां सड़क पर भी आ जाती हैं। इक्कीसवीं सदी में भी उनका जंगल से समीकरण (बदला भले है) गड़बड़ाया नहीं है।

हाथियों के एक स्थान से दूसरे में आने-जाने का रूट यहीं से है। झुण्ड में चलते हैं। चेतावनी के बोर्ड जगह जगह लगे हैं। लोग अपने पास मशाल-ढोल और पटाखों का इंतजाम करते हैं। हाथियों से दूर रहना चाहते हैं। उन्हें छेड़ने पर खुद का ही नुक्सान है – यह लोग भली तरह जानते हैं। पर हाथी और मनुष्य में इलाके के वर्चस्व की लड़ाई तो है और उसे नकारा नहीं जा सकता। चेतावनी बोर्डों पर हाथी दीखने पर वन विभाग को सूचित करने का संदेश लिखा रहता है।

अजगर? प्रेमसागर को लोगों ने चेताया कि अजगर भी दिख सकते हैं रास्ते में। छोटे जीव, मसलन बकरी का बच्चा उनके शिकार होते हैं। उन्हे बता दिया है कि अजगर दिखे तो घबराना नहीं है। दूर से बचते हुये निकल जाना है।

दिन भर चलते रहे प्रेमसागर और शाम चार बजे से रात के पड़ाव तलाशने की कवायद शुरू हो गयी। मंदिरों में पूछना शुरू किया गया। मैंने उनकी लाइव लोकेशन देखी तो वे किसी रानीश्वर नामक जगह के समीप थे। जो रास्ता उन्हें नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ के लिये लेना था उससे थोड़ा हट कर थे पर ज्यादा हट कर नहीं। उनके दांई ओर मयूराक्षी नदी थी। लगभग समांतर चल रहे थे वे नदी के। गूगल मैप पर मैंने देखा कि रानीश्वर में एक बड़ा शिव मंदिर था – रानीश्वर नाथ मंदिर। जो चित्र उस मंदिर के गूगल मैप पर थे, उसमें एक बड़ा नंदी मंदिर के बाहर चबूतरे पर बैठे थे। लगभग उसी आकार के जैसे काशी विश्वनाथ मंदिर में ज्ञानवापी को फेस करते बड़े नंदी हैं। मैंने प्रेमसागर को सुझाव दिया वहां पंहुच कर कोशिश करें रात्रि विश्राम की। वह जगह नक्शे के हिसाब से एक डेढ़ किलोमीटर दूर थी।

रानीश्वर नाथ मंदिर

पांच बजे फिर पूछा तो प्रेमसागर के स्वर में निराशा थी – “मंदिर में पुजारी नहीं हैं, पण्डा हैं। वे मंदिर बंद कर अपने घर चले जाते हैं। परिसर में किसी पेड़ के नीचे भी रात गुजारना ठीक नहीं था। चार पांच विक्षिप्त से लोग वहां दिख रहे थे। पागल से। उनके बीच रुकना ठीक नहीं है। लोगों ने बताया है कि पास में एक किलोमीटर पर लक्की हार्डवेयर स्टोर है। उसके मालिक आने जाने वाले यात्रियों के रहने का इंतजाम करते हैं। अब वहीं जा रहा हूं।”

घण्टे भर बाद और भी निराशा – “आगे कोई लाइन होटल (ढाबा) तलाश रहा हूं। लक्की हार्डवेयर के यहां बात नहीं बनी। उसके मालिक जी, जो इंतजाम करते थे, गुजर गये हैं।”

उसके आधे घण्टे बाद – “झारखण्ड-बंगाल बॉर्डर की ओर चल रहा हूं भईया। एक जगह मिली थी वह पांच सौ मांग रहे थे रात भर रुकने का। उसमें तो कोई तकलीफ नहीं थी, पर उनके पास पेटीएम नहीं था। मेरे पास कैश में दो-तीन सौ भर ही था। ज्यादा पैसा जेब में रखना ठीक नहीं समझता मैं। अब झारखण्ड बॉर्डर पर कोई न कोई होटल मिल जायेगा। आप फिकर न करें भईया।”

रानीश्वर का एक दृश्य

प्रेमसागर की आवाज में अनिश्चय था और बेचैनी भी। पर मैं उन्हें बार बार फोन कर रहा था तो उन्हें लगा कि मैं शायद ज्यादा व्यग्र हूं। वे मुझे ढाढस बंधा रहे थे। मैं, जिसके पास घर की पूरी सुविधायें और आराम था। उनके पास तो उनकी लाठी, पिट्ठू और मोबाइल भर था। गूगल मैप पर शेयरिंग बता रही थी कि उनके मोबाइल की बैटरी भी 34 प्रतिशत बची है। इससे पहले कि बैटरी डाउन हो जाये, उन्हें कोई न कोई जगह मिलनी ही चाहिये।

सात बजे वे झारखण्ड – बंगाल सीमा पर थे। जगह का नाम था कुलुबंदी। एक ठिकाना मिला – शांति होटल एण्ड रेस्टोरेण्ट। कमरे का रेट पांच सौ का है। पास की एक दुकान से प्रेमसागर ने सात सौ रुपये निकाल लिये हैं। दुकान वाले ने पेटीएम पर ऑनलाइन ले कर कैश दे दिया है।

“रात का इंतजाम हो गया भईया। कल सवेरे पार करूंगा झारखण्ड-बंगाल बॉर्डर। अभी तो झारखण्ड है। आगे बंगाल में कैसे टाइम कटेगा, वह माई जानें, महादेव जानें। हम क्या फिकर करें भईया।” – प्रेमसागर ने कहा।

होटल वाला बमुश्किल तैयार हुआ कमरा देने को। उसने बताया – “बाबा लोग आते हैं रुकने के लिये और बहुत नौटंकी करते हैं।”

इतने सारे मंदिर हैं। उन मंदिरों में रुकने की जगह की कमी नहीं। लोगों में शायद श्रद्धा भाव भी पूरी तरह मरा नहीं है। ताली दोनो हाथों से बजती है। बाबाओं-साधुओं ने अपनी साख गंवा दी है जन मानस में। वह आसानी से वापस नहीं आ सकती। :-(

यह घटना सुन कर मेरी पत्नीजी याद करती हैं। पंद्रह बीस साल पहले प्रयाग के शिवकुटी में हाथी पर सवार साधू लोग आते थे। जोर जोर से चिल्ला कर मांगते हुये। उन्हें देख लोग अपने घर-दरवाजे-खिड़कियां बंद कर लेते थे। वे भिक्षा न देने पर बहुत अपशब्द कहते थे। शाप देते थे – जा मर जा। तेरा वंश नाश हो जाये। … मुस्टण्डे साधुओं को, जो हाथी पर सवार हों, यह नौटंकी करने की क्या जरूरत? उन्ही की नौटंकी के कारण हिंदू धर्म में से पदयात्रियों के प्रति अश्रद्धा और अविश्वास बढ़ा है। लोग अर्थ के युग में स्वार्थी तो वैसे भी हो गये हैं। हिंदू धर्म का धर्म और अर्थ का बैलेंस बुरी तरह गड़बड़ा गया है। काम का उद्दीपन हो गया है और मोक्ष तो लोगों के ध्येय के राडार पर रहा ही नहीं!

प्रेमसागर अपने परिचय के रूप में होटल वाले को मेरे ब्लॉग दिखाते हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा के और इस शक्तिपीठ यात्रा के। उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि बाबा प्रेमसागर जेन्युइन पदयात्री हैं; नौटंकीबाज नहीं। और उससे होटल वाले का पैराडाइम बदल जाता है। बदले नजरिये से उसमें श्रद्धा भाव आ जाता है। वह कमरे का किराया – 500 रुपया – तो कम नहीं करता; पर प्रेमसागर को अपनी ओर से रोटी दाल (बघारी हुई), आलू की भुजिया और एक ग्लास दूध देता है।

प्रेमसागर ने जब यह बताया तो मुझे अपने डियाक लेखन की सार्थकता का अहसास हुआ। उसी के माध्यम से लोग प्रेमसागर को उनके यूपीआई पते पर अंशदान भी कर रहे हैं। अनेकानेक लोगों की शुभकामनायें उनके साथ जुड़ गयी हैं। शांति होटल वाले सज्जन की शुभकामना भी उसमें जुड़ गयी।

होटल वाला बमुश्किल तैयार हुआ कमरा देने को। उसने बताया – “बाबा लोग आते हैं रुकने के लिये और बहुत नौटंकी करते हैं।”
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इतने सारे मंदिर हैं। उन मंदिरों में रुकने की जगह की कमी नहीं। लोगों में शायद श्रद्धा भाव भी पूरी तरह मरा नहीं है। ताली दोनो हाथों से बजती है। बाबाओं-साधुओं ने अपनी साख गंवा दी है जन मानस में। वह आसानी से वापस नहीं आ सकती। :-(

इस जगह से नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ पच्चीस किलोमीटर दूर है। वहां से पच्चीस-तीस-पचास किलोमीटर के अंतराल पर चार और शक्तिपीठ हैं। शक्तिपीठ दर्शन की एक चेन बन जायेगी अगले सप्ताह। गया से ले कर कुलुबंदी तक की यात्रा रोचक रही है। कठिन यात्रा में भी मेरा प्रेमसागर से और प्रेमसागर का मुझसे उच्चाटन नहीं हुआ है। आगे देखें क्या होता है!

इलाका जंगल का है!

आज तक की यात्रा में प्रेमसागर हजार किलोमीटर का आंकड़ा पार कर गये हैं। आजतक का जोड़ बनता है 1020किमी! हजार किलोमीटर पैदल चलना बिना साधन-सम्पन्नता के, कोई मामूली बात नहीं है। मामूली नहीं है, तभी मैं उनकी डियाक (डिजिटल यात्रा कथा) लिखने में दिन में तीन चार घण्टे लगाता हूं, कम से कम! :lol:

हर हर महादेव। ॐ मात्रे नम:।

आप तो कृपया प्रेमसागर को रहने और यात्रा की खुराकी के लिये अपने अंशदान की सोचें। उनके यूपीआई एड्रेस पर जो भी दे सकते हैं, देने का कष्ट करें। छोटा अमाउण्ट भी चलेगा। :-)

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रेमसागर की पदयात्रा के लिये अंशदान किसी भी पेमेण्ट एप्प से इस कोड को स्कैन कर किया जा सकता है।

तालझारी से दुमका के आगे कुसुमडीह


18 मार्च 23

तालझारी के महाकल मंदिर के प्रमुख प्रकाश जी ने प्रेमसागर को रोकने की कोशिश की। कहा कि नवरात्रि तक वहीं रुकें। पर प्रेमसागर ने बरसात के पहले पहले बंगाल-असम की शक्तिपीठ पदयात्रा पूरा कर लेने की जरूरत बताई। उनका काम ही चलना है। ज्यादा दिन रुक जाने पर चलने की मशीन का तेल शायद जाम हो जाने का खतरा हो जाता हो।

वे रुके नहीं। सवेरे की पूजा अर्चना के बाद निकल लिये। प्रकाश जी ने अपने हितैशी शंकर जी को फोन लगाया। शंकर जी की धर्मशालायें हैं सुल्तानगंज-बाबा धाम के रास्ते में। उनके बहनोई जी का दुमका के आगे एक होटल है। रिया रमन होटल। वहीं रुकने की व्यवस्था कर दी है शंकर जी ने।

सवेरे तालझारी में प्रकाश बाबा के आश्रम से विदा लेने के पहले का ग्रुप फोटो।

पहले तालझारी से निकलने के तीन घण्टे बाद पड़ा बासुकीनाथ। प्रेमसागर बार बार कहते हैं – भईया, बाबा धाम हाईकोर्ट है तो बासुकीनाथ सुप्रीमकोर्ट। बाबाधाम के दर्शन के बाद बासुकीनाथ का दर्शन करना ही होता है। वहां उन्होने दर्शन किया। प्रसाद इत्यादि लिया होगा। मार्केट का चित्र भी भेजा है।

बासुकीनाथ का बाजार

नक्शे के अनुसार बासुकीनाथ और दुमका के बीच प्रेमसागर ने मयूराक्षी नदी पार की होगी। पानी से भरी नदी जैसा कुछ नजर नहीं आया उनके चित्रों में। रेत ही दीखती है। और एक क्षीण सी धारा। ताराशंकर बंद्योपाध्याय के उपन्यास गणदेवता में मयूराक्षी बड़ी नदी है। अब शायद सौ साल बाद वह क्षीण हो गयी हो। नदियों का, बरसात के मौसम से इतर बुरा हाल होता जा रहा है। नदी पर डैम/बैराज बने हैं। शायद पहले पानी रुक गया हो। आगे भी एक जगह मसंजोर डैम दिखाई पड़ता है नक्शे में। पर प्रेमसागर का वहां से गुजरना नहीं होगा।

मयूराक्षी नदी

दामोदर नदी पहले बंगाल का काल कही जाती थी। बाढ़ से बहुत तबाही होती थी। वैसा ही कुछ हाल मयूराक्षी का भी रहा है। दामोदर नदी पर बांध और पानी के दूसरे प्रयोगों से वैसी भीषण बाढ़ अब दामोदर में नहीं आती। शायद वैसा मयूराक्षी के साथ भी हो। अंतिम बाढ़/तबाही कब लाई थी मयूराक्षी? … नेट पर बहुत सामग्री नहीं मिलती। भारतीय मानस नेट पर उथली बातें ठेलता है| जो कुछ मिलता है उसमें बहुधा गहराई नहीं होती। :sad:

दुमका के पहले नंगे पैर चलते प्रेमसागर के पांव में खजूर का कांटा गड़ गया। खुद निकाल नहीं पाये तो रास्ते में एक स्वास्थ्य केंद्र पर डाक्टर साहब से निकलवाया। वहां की पर्ची के चित्र में जगह का नाम लिखा है – सामुदायिक स्वास्थ केंद्र, जामा। वहां पेन किलर भी दिया गया उन्हे। वहीं कांटा निकालने के लिये प्रेमसागर ने सेफ्टीपिन का गुच्छा खरीदा और एक जोड़ी चप्पल भी।

चप्पल पहले क्यूं नहीं खरीदा? कांटा गड़ने का इंतजार क्यूं किया?

प्रेमसागर का तर्क अजीब है। “पहले मंहगा मिल रहा था भईया” … यात्रा की कुछ बेसिक जरूरतें हैं। जूता नहीं पहनना, चट्टी पहनना या नंगे पैर चलना। चप्पल भी सस्ता लेना – कई कई तरह की ग्रंथियां हैं! इन ग्रंथियों के बावजूद (या उनके साथ अपनी श्रद्धा का सम्बल जोड़ कर) प्रेमसागर की लदर-फदर यात्रा चल रही है।

दुमका के बारे में बताते प्रेमसागर कहते हैं – भईया, साफ सुथरी जगह है। लोग भी सीधे हैं और सहायता करते हैं। ज्यादा फोटो नहीं ले पाया। कई जगहों पर फोटो लेने की मनाही थी।

सिद्धू और कानू मुर्मू पर डाकटिकट। Post of India – https://colnect.com/en/stamps/stamp/158245-Sido_Murmu_-_Kanhu_Murmu-History-India, GODL-India, https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=98713604 द्वारा

दुमका संथाल परगना का एक प्रमुख शहर है। आदिवासी संथालों की बहुतायत है। सिद्धू और कानू मुर्मू का नाम आजकल बहुत से लोगों ने, राष्ट्रवादी भावनाओंं के उफान युग में बहुत से लोगों ने सुन लिया होगा। पर शायद इतिहास जानने की उत्सुकता उतनी न हो। उन्होने सन 1855-56 में संथाल हूल के नाम से स्वतंत्रता का युद्ध लड़ा ईस्ट इण्डिया कम्पनी और शोषक महाजनों के खिलाफ। साठ हजार संथाल इकठ्ठे हुये। उन्होने इलाके को मुक्त कर लिया। अपनी टेक्स व्यवस्था भी लागू की। अंग्रेज हतप्रभ रह गये थे। पर अंतत: जीत उनकी टेक्नॉलॉजी – गोला बारूद – और तीर कमानों के असमान युद्ध के कारण संथाल विद्रोह दबा दिया गया। सिद्धू और कानू को फांसी दी गयी।

प्रेमसागर की पदयात्रा में इतिहास जानने की और आसपास के स्थानों की घुमक्कड़ी की गुंजाइश नहीं है। डियाकी (डिजिटल यात्रा कथा लेखन) में है। कुछ वर्षों पहले मेरे दामाद ने मालूती की यात्रा की थी। यह मिट्टी से बने अनेक मंदिरों का गांव है और दुमका जिले में ही है। उनके खींचे कई चित्र काफी समय तक मेरे मोबाइल में रहे भी। कभी यह नहीं सोचा था कि प्रेमसागर के साथ डिजिटल यात्रा में उनके पास से गुजरना होगा। विवेक (मेरे दामाद) कामकाजी जीव हैं। मेरे कहने पर वे पुन: मालूती की यात्रा करने से रहे! कितनी जगहें स्मृति में यूं ही धुंधलाते हुये गुम हो जायेंगी। फिलहाल, प्रेमसागर के बहाने उनकी याद हो आयी!

प्रेमसागर ने सोचा कि रिया रमन होटल शायद पातबारी में है। वह जगह उन्हें गूगल मैप पर नजर नहीं आई। मैप अपड़ेट नहीं होता – उसके लिये कामचलाऊ इण्टरनेट कनेक्शन चाहिये। वह शायद नहीं था। सो, अंदाज से ही निकल लिये थे तालझारी से प्रेमसागर। यह सोचते हुये कि शायद पचास साठ किलोमीटर चलना हो। लेकिन दुमका पास होते ही कुसुमडीह में पड़ा रिया रमन होटल।

रिया रमन होटल रास्ते में ही सड़क पर है। “शंकर जी के बहनोई जी के होटल में शाकाहारी-मांसाहारी दोनो तरह का भोजन होता है। मीट मुरगा सब होता है। पर बहनोई जी ने अपने घर से साफ सुथरे भोजन की व्यवस्था की। पनीर की सब्जी, दाल, चावल। हमको कमरे में ही भोजन कराया। बहनोई जी काफी बिजी थे। होटल रात इग्यारह बजे तक चलता रहता है। काम धाम वे संभालते हैं।”

रिया रमन होटल रास्ते में ही सड़क पर है।

कुछ अलग सा नाम है रिया रमन। कोई कृष्ण भक्त तो रखेगा राधारमण। शायद बहनोई जी के बेटी-बेटा हों रिया और रमन। प्रेमसागर को यात्रा में यह जिज्ञासा भी होनी चाहिये कि किसी जगह को कोई नाम क्यूं दिया जाता है। वैसे अपनी मेमोरी में नाम न रजिस्टर करना या गलत रजिस्टर करना प्रेमसागर का बड़ा कमजोर पक्ष है। इसलिये वे नामों और शब्दों को रखने की ओर ध्यान देंगे – मुझे नहीं लगता। उनकी इस कमजोरी के साथ ही मुझे डियाक (डिजिटल यात्रा कथा) लेखन करना है! :lol:

आज छियालीस किलोमीटर चले। आगे करीब 65 किमी बाद नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ है। बंगाल में। कल वहां पंहुचेंगे या रास्ते में कहीं पड़ाव होगा? समय ही बतायेगा।

हर हर महादेव। ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
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देवघर से तालझारी


17 मार्च 23

कल सवेरे साढ़े छ – पौने सात बजे प्रेमसागर ने बाबा धाम दर्शन किये। मंदिर खुला था तो विधिवत दर्शन हुये। मुझे दर्जन भर चित्र ह्वाट्सएप्प पर ठेले और फिर फोन किया। मैं साइकिल चला रहा था। किनारे लगा उनकी बात सुनी – “आज अभी बाबा धाम के दर्शन किये हैं। अभी घण्टा भर बाद निकलूंगा एक टैबलेट ले कर।”

टेबलेट काहे?

“कुछ खास नहीं भईया। हरासमेण्ट है।” – प्रेमसागर का हिंदी शब्द हरारत (थकान, हल्का ज्वर और सामान्य शिथिलता) का शायद अंगरेजी या शहरी तर्जुमा है हरासमेण्ट। तबियत नरम होने पर इस शब्द का प्रेमसागर बहुधा उपयोग करते हैं। अंग्रेजी शब्दकोश में शरीर की दशा के अर्थों में सम्भवत: उसका प्रयोग न होता हो।

सवेरे साढ़े छ – पौने सात बजे प्रेमसागर ने बाबा धाम दर्शन किये।

जब तबियत नरम है तो एक दिन आराम कर लीजिये। मोनू पण्डा और यहां की व्यवस्था तो आपकी जानी पहचानी है। रुकने में कोई परेशानी थोड़े होगी?

प्रेमसागर शायद रुकना चाहते भी थे। उनकी भावना पर एक हामी मेरी ओर से मिली और उन्होने रुकने का निर्णय ले लिया। कल आराम ही किया। बाद में दिन भर के बारे में बताते हुये मुझे बताया – “खूब सोया दिन भर भईया। बीच में जब उठता तो बाबाधाम में जा कर बैठ जाता। फिर वापस आ कर सो जाता। शरीर को जो चाहिये था, वह आराम मिल गया।”

आज सवेरे साढ़े तीन – पौने चार बजे ही निकल लिये प्रेमसागर वासुकीनाथ के लिये। जब आठ बजे मुझसे चित्र भेजने के बाद बात की तो करीब बीस किमी चल चुके थे। घोरमारा में बैठ चाय पी रहे थे। दिन की पहली चाय।

“घोरमारा का पेड़ा एक नम्बर का होता है।”

“घोरमारा वह जगह है जहां बासुकीनाथ जाने वाले यात्री रुक कर बासुकीनाथ का प्रसाद लेते हैं। अभी तो मैं आज की पहली चाय की दुकान देख कर रुक गया हूं। प्रसाद की दुकानें कुछ आगे हैं। बहुत सी हैं। पचास ठो से ऊपर ही होंगी। मेन बात है भईया कि नम्बर एक का दूध का पेड़ा मिलता है वहां। कभी मैं आपको खिलाऊंगा।” – प्रेमसागर ने अपनी कमेण्ट्री दी।

“सवेरे जल्दी निकलना बहुत फायदेमंद है भईया। अब गर्मी हो गयी है। दिन में सड़क तपने लगती है तो चलने में मुश्किल होती है। सवेरे सवेरे खूब चला जा रहा है। अब आगे यही करूंगा। सवेरे जितना हो सके चल कर दिन में आराम और फिर शाम को चलना हुआ करेगा। आगे बंगाल में तो और भी गर्मी होगी। मैं बासुकीनाथ में एक चप्पल खरीदूंगा। बनारस से चलने पर खरीदी पहले वाली चप्पल तो टूट गयी। अब नंगे पैर चल रहा हूं। ज्यादा मंहगी नहीं, पचास – साठ की खरीदूंगा। जितना चले चले, फिर दूसरी।”

जूता क्यों नहीं खरीदते?

“जूते से चलने में थकान ज्यादा होती है। गर्मी का मौसम है। सर्दी का होता तो ज्यादा ठीक रहता जूता। अब चप्पल ही ठीक है।” – प्रेमसागर कहते हैं।

“भईया, बंगाल के शक्तिपीठ तो आप देख लिये होंगे नक्शे में। एक लिस्ट बना लिये होंगे न?” – उनका यह कहना मुझे मनोरंजक लगता है। यात्रा वे कर रहे हैं। प्लानिंग उनकी होनी चाहिये पर धीरे से यात्रा का प्लानिंग वाला पार्ट मेरी ओर सरका दे रहे हैं – मेरी तरफ, जिसने बिहार-बंगाल का यह हिस्सा कभी देखा नहीं। कभी मानसिक रूप से जिस इलाके की कोई छवि भी नहीं बनी। :lol:

प्रेमसागर रास्ते में पड़े त्रिकूट पर्वत की बात किये। रास्ते से तीन किलोमीटर हट कर पर्वत है। “चित्र में आप जरा जूम कर देखियेगा। लगता है पहाड़ को किसी ने तरवार से फारा हो। … मैं वहां कभी गया नहीं। वहां माई का मंदिल है। जब बुलावा आयेगा, तब शायद जाना हो पाये।” त्रिकूट पर्वत के दूर से अनेक चित्र भेजे हैं प्रेमसागर ने। एक चित्र में तो इकहरी रेल लाइन के अंत में क्षितिज पर दीखता है त्रिकूट।

एक चित्र में तो इकहरी रेल लाइन के अंत में क्षितिज पर दीखता है त्रिकूट।

घोरमारा से आगे बढ़ने पर ढाई घंटे बाद फिर फोन आया प्रेमसागर का। कोई जगह है तालझारी। वहां के प्रकाश बाबा ने उन्हें आज के लिये रोक लिया है। प्रकाश बाबा भी कांवर यात्री रह चुके हैं।

“मैं डब्बा में जल ले कर चलता था और प्रकाश बाबा सुराही (मिट्टी के संकरे मुंह वाले बर्तन) में जल ले कर चला करते थे। उन्होने यहां महाकाल शिवजी का मंदिल (मंदिर) और आश्रम बनाया है। एक गौशाला भी है। बाउण्ड्री का काम अभी होना है। प्रकाश बाबा दरभंगा जिला के हैं। वे उज्जैन से शिवलिंग ला कर यहां स्थापित किये हैं। भजन-पूजन और यज्ञ आदि करते हैं। मेरे लिये बहुत स्नेह है। उन्होने कहा तो रुक ही गया हूं। मोटामोटी अठ्ठाईस किलोमीटर चल चुका हूं।” – प्रेमसागर ने बताया।

तारझारी। वहां के प्रकाश बाबा ने उन्हें आज के लिये रोक लिया है।

पहले इतनी जानकारी लेने के लिये मुझे कम से कम पांच साल सवाल करने होते थे। अब वह प्रेमसागर खुद बता ले रहे हैं। वे समझ गये हैं कि मुझे किस तरह की जानकारी चाहिये और वे शायद अपनी ओर से तैयार रखते हैं। या फिर यह हो सकता है कि देवघर-वासुकीनाथ उनका अपना बैटिंग-फील्ड है और यहां वे ज्यादा सहज महसूस करते हैं।

मैंने पूछा – भजन-पूजन करते हैं प्रकाश बाबा तो कैसी आवाज है गाने में? क्या उनका गायन ह्वाट्सएप्प पर रिकार्ड कर भेज सकते हैं आप?

“हां हां। जब गायेंगे तो भेजूंगा। आप से उनकी बात भी करा दूंगा।” – प्रेमसागर ने कहा। पर उसके बाद पूरे दिन लगता है तालझारी में प्रकाश बाबा के आतिथ्य में मगन रहे प्रेमसागर। मुझे फोन करने का या ह्वाट्सएप्प पर संदेश भेजने का समय नहीं निकाल पाये।

अब कर वासुकीनाथ के लिये निकलना होगा। वह तालझारी से बीस किलोमीटर से कम ही दूरी पर है। कल भी ज्यादा चलना नहीं होगा। कल ही बात होगी प्रेमसागर से।

आप कृपया प्रेमसागर की यूपीआई पते पर सहायता करने पर विचार करें। वे आप जैसों के सहयोग से ही आगे बढ़ रहे हैं। आगे बंगाल में अनजान जगह और भाषाई अपरिचय के कारण उन्हें आर्थिक सहयोग की ज्यादा ही जरूरत होगी।

हर हर महादेव। जय वासुकीनाथ। ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
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दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रेमसागर की पदयात्रा के लिये अंशदान किसी भी पेमेण्ट एप्प से इस कोड को स्कैन कर किया जा सकता है।

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