दूध कलेक्शन सेण्टर और उमा शंकर यादव


मैं मडैयाँ डेयरी से दूध खरीद कर निकला तो बाहर उन सज्जन को नाली की मुंडेर पर बैठे अखबार पढ़ते पाया। अखबार भी शायद डेयरी वालों का होगा। उनका दूध का बर्तन/बाल्टा लाइन में लगा होगा और वे अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हुये अखबार पढ़ ले रहे थे।

बाहर उन सज्जन (उमाकांत यादव) को नाली की मुंडेर पर बैठे अखबार पढ़ते पाया।

मैने पूछा – कितनी देर हो गयी इंतजार करते?

बताया करीब पच्चीस मिनट। समय से आ जायें – जल्दी से जल्दी – तो पांच मिनट में भी काम हो जाता है। कभी कभी आधा-एक घण्टा भी इंतजार करना होता है। वे कोठराँ से आते हैं। इस जगह से चार किमी दूर। वहां पास में भी कलेक्शन सेण्टर हैं। बनास डेयरी का।

“इतना दूर चल कर यहां क्यों आते हैं? पास के सेण्टर पर क्यों नहीं जाते?” – मैने पूछा।

उमाकांत यादव का दूध का बर्तन/बाल्टा लाइन में लगा होगा।

“उस जगह पर फैट गलत सलत बताता है। कई बार मशीन खराब होती है या खराब बता देता है। तब फैट ज्यादा भी हो तो भी तीन परसेण्ट (गाय का दूध) के भाव से खरीदता है। पैसा देने में भी हीला हवाली करता है। कहता है कि बैंक से पैसा आयेगा, तब देगा। इसलिये यहां आना और इंतजार करना अखरता नहीं।” – उन्होने बताया।

नाम बताया उमाशंकर यादव। गूगल मैप के हिसाब से उनका गांव पांच किमी दूर है। आजकल हर दो किमी पर डेयरी कलेक्शन केंद्र खुल गये हैं। फिर भी वे इतना दूर आते हैं। यहां की सर्विस से सन्तुष्ट प्रतीत होते हैं – “उस डेयरी पर कांटा भी सही नहीं था। वहां के कांटे पर दूध सात-साढ़े सात किलो बताता था, यहां आठ किलो से ऊपर ही रहता है।”

मैने सोचा था कि इन कलेक्शन सेण्टरों से दुग्ध क्रांति जैसा कुछ होगा; पर गांवदेहात में भ्रष्टाचार, खराब सेवा और किसान-ग्वाले का शोषण गहरे से घुसा हुआ है। वह किसी भी अच्छे कदम में पलीता लगाता है।

पांच दस किमी दूर से किसान-दुग्धउत्पादक इस मडैयाँ डेयरी के कलेक्शन सेण्टर पर आ रहे हैं तो यहां भीड़ लगती है। यहां का इंफ्रास्ट्रक्चर भी सीमित है। अजय पटेल, पिण्टू और सुभाष की कुशलता की भी शारीरिक सीमायें हैं। सही समाधान तो इमानदार डेयरी कलेक्शन सेण्टरों में वृद्धि ही है।

उमाकांत यादव

दूध का कलेक्शन एक मुद्दा है। भ्रष्टाचरण हर ओर पसरा नजार आता है। राशन बांटने वाला कोटेदार, राशन सप्लाई दफ्तर वाला कर्मचारी-अधिकारी, अमूल दूध वितरण की एजेंसी, ईंट भट्ठा वालों द्वारा उपजाऊ गांगेय पट्टी की मिट्टी का जेसीबी से उत्खनन और उनसे उगाही करने वाला तहसील का अधिकारी-कर्मचारी, गंगा की बालू का अवैध खनन — सब ओर भ्रष्टाचार दीखता है। उसे देखने के लिये कोई विशेष आंखें नहीं चाहियें। साइकिल ले कर सब ओर देखते निकलना वह स्पष्ट कर देता है।

मैने सोचा था कि इन कलेक्शन सेण्टरों से दुग्ध क्रांति जैसा कुछ होगा; पर गांवदेहात में भ्रष्टाचार, खराब सेवा और किसान-ग्वाले का शोषण गहरे से घुसा हुआ है। वह किसी भी अच्छे कदम में पलीता लगाता है।

उमाकांत यादव जी से दो तीन मिनट की बातचीत मुझे भीषण डिस्टोपियन भाव से ग्रस्त कर देती है। आम आदमी का कोई धरणी-धोरी नहीं है। सरकारें आती-जाती हैं। शिलिर शिलिर परिवर्तन होते हैं। रामराज्य कभी आयेगा? शायद नहीं या शायद मेरी जिंदगी गुजर जाये उसके इंतजार में।


शूट पहले, एडिट बाद में


जिस जगह पर सलीके से सोता शराबी मिला था, लगभग उसी जगह पर वह मैले कुचैले कपड़े पहने, एक लाठी और एक गठरी लिये आदमी बैठा मिला। पहला काम मैंने किया कि उसका दूर से एक चित्र खींचा। साइकिल बिना रोके, सीट पर बैठे बैठे, अपने नोकिया फीचर फोन से।

वह चित्र छोटे 2 मेगापिक्सल कैमरे का है तो बादलों भरी सुबह की लाइट कम होने पर उतना साफ नहीं आता। इसलिये उसे मैं फोटोस्केचर से एडिट कर बाद में उभारता हूं। चित्र, चित्र कम पेण्टिंग ज्यादा बन जाता है।

पहला चित्र छोटे कैमरे का है तो उतना साफ नहीं आता। इसलिये उसे मैं यदाकदा फोटोस्केचर से एडिट कर बाद में उभारता हूं।

पास आने पर भी वह व्यक्ति वहीं दिखता है। अब मेरे पास समय है। मैं रुक कर साइकिल की सीट पर बैठे बैठे अपने स्मार्टफोन से चित्र लेता हूं। फिर भी किसी फोटोग्राफी नियम का ध्यान दिये बिना। यह चित्र पहले से बेहतर है, पर मानकों पर खरा नहीं है।

अब मेरे पास समय है। मैं रुक कर साइकिल की सीट पर बैठे बैठे अपने स्मार्टफोन से चित्र लेता हूं। फिर भी किसी फोटोग्राफी नियम का ध्यान दिये बिना। यह चित्र पहले से बेहतर है, फिर भी मानकों पर खरा नहीं है।

फोटो त्वरित क्लिक करना मेरी मजबूरी है। आखिर मेरे लिये चित्र की गुणवत्ता नहीं, उसके द्वारा ब्लॉग सम्प्रेषण महत्वपूर्ण है। कोई सीन देख विचार मन में आते हैं और चित्र न लिया जाये तो वे गायब हो जाते हैं। चित्र लेना लगभग एक तरह की नोट-टेकिंग है।

और नोट टेकिंग की प्राथमिकता होने से मैं चित्र लेने की कला पर ध्यान नहीं दे पाता।

यही कारण है कि सधे हुये चित्र लेने का प्रयास मैंने बहुत कम किया है। और यही कारण है कि मैंने अपनी फोटोग्राफी परिष्कृत करने में पर्याप्त मेहनत नहीं की।

ब्लॉग के शुरुआती दौर में मेरे पास शब्द कम थे। अंगरेजी के शब्द ज्यादा जोड़ने पड़ते थे लेखन के पैबंद में। और उस गरीब लेखन की कमी चित्र के माध्यम से पूरी करने का प्रयास करता था। अब शब्द कुछ बेहतर हुये हैं सो चित्र पर निर्भरता कम हुई है। किसी विचार को बिना चित्र के संप्रेषित करने में उतनी झिकझिक नहीं होती। बार बार अंगरेजी-हिंदी की कामिल बुल्के की डिक्शनरी नहीं टटोलनी पड़ती।

पर लेखन/ब्लॉग की एक पैबंद वाली शैली बन गयी है। वह चले जा रही है!

किरीट सोलंकी मुझे ट्विटर पर डायरेक्ट मैसेज (डीएम) के माध्यम से फोटोग्राफी के गुर सिखाने का प्रयास करते हैं। मैं उन्हें मना नहीं करता। उनके चिड़ियों के चित्र देख कर मन होता है कि बेहतर कैमरा लिया जाये। पर उसकी बजाय खर्चे कहीं और हो जाते हैं।

फोटो के लिये मैं अपने सस्ते नोकिया फीचर फोन या मिड-रेंज वाले सेमसंग के स्मार्टफोन पर ही निर्भर रहता हूं।

उस मैले कुचैले, अर्धविक्षिप्त से लगते आदमी का चित्र लेते समय मैं रोशनी की दशा, फोकस, रूल ऑफ थर्ड … किसी पर ध्यान नहीं देता। ध्यान केवल चित्र शूटने पर रहता है। Shoot first, Edit afterwards. शूटो पहले, एडिटो बाद में।

मेरी एडिटिंग भी बढ़िया नहीं है। पर सब मिला कर काम चल जा रहा है। गड्डमड्ड तरीके से ‘मानसिक हलचल’ अभी भी जारी है।

वह अर्ध-विक्षिप्त सा आदमी एक बार मेरी ओर देखता है, मुझे नोटिस नहीं करता और फिर उंगलियों पर कुछ गिनने में लीन हो जाता है। उसका पूरा माहौल मुझे उसके ज्यादा पास जाने से रोकता है। झिझक उत्पन्न करता है – उसे अगर सीधे सीधे रिपल्सिव या अप्रिय न भी कहा जाये।

उस विक्षिप्त की चप्पल घिस गयी है। कपड़े मैले हैं और वह कई दिनों से नहाया नहीं लगता। एक बारगी मन होता है कि उसे चाय के लिये दस रुपये दे दूं। जब उसने मेरी ओर देखा तो उसकी आंखों में जरा भी याचना, कौतूहल या प्रश्न नहीं दिखा। अन्यथा मैं उसके कुछ और पास जाता और जरूर उसे दस रुपये देता। शायद ज्यादा भी।

फोटो एडिट SnapSeed से। वाटरमार्क AddWatermark से।

पर वह सब नहीं होता। मैं आगे बढ़ जाता हूं। मानवता और करुणा का प्रवाह नहीं होता।

और यह ब्लॉग पोस्ट उस आदमी पर बनने की बजाय फोटो शूटिंग और एडिटिंग पर बन जाती है। :sad:


#Status उपले ढंकने का उपक्रम


मई महीने की शुरुआत और सर्दी। बादल भरा आसमान और बारिश। नौकरानी काम पर आयी थी और उसने कल्पना भी न की थी कि बारिश तेज हो जायेगी। जाते समय घर में पड़ी एक पॉलीप्रॉपीलीन की बोरी ओढ़ कर गयी।

हर आदमी मौसम की गुगली से हक्काबक्का है।

भला हो कि रब्बी सीजन की सारी किसानी निपट चुकी है। लोगों ने (लगभग) भूसा भी समेट लिया है। मुझे लगा था कि इस समय किसान कम से कम काम धाम के लिये परेशान नहीं होगा। पर आज सवेरे की सैर में लगा कि मौसम में आश्चर्यजनक बदलाव से परेशानियाँ पीछा नहीं छोड़ रहीं।

उपले के उपड़ऊर पूरे रास्ते दिखते हैं। सवेरे उपले पाथती महिलायें भी नजर आती हैं। पर बारिश के मौसम में वह गतिविधि रुक जाती है। मानसून के पूरे दौरान तो गोबर इकठ्ठा ही किया जाता है। सितम्बर-अक्तूबर में मानसून चले जाने पर ही उपड़ऊर बनने लगता है।

उपला कल्चर

आज बारिश का मौसम था। कई दिन से चल रहा है। पर उपले के ढेर – उपड़ऊर बहुत हैं। आजकल स्त्रियों ने उपले पाथना बंद कर दिया है। उपड़ऊर बारिश के पानी से भीग कर खराब न हो जाये, उसके लिये तिरपाल, डण्ठल, कपड़ा – जो भी साधन मिला, उसका प्रयोग किया गया है।

साइकिल सैर के पूरे रास्ते उपले बचाने का उपक्रम नजर आया।

मौसम की जानकारी रोज दिखाती है कि थण्डरस्टॉर्म की सम्भावना है। दो दिन बाद मौसम खुलने की भविष्यवाणी रहती है पर अगले ही दिन वह भविष्यवाणी आगे सरक जाती है। आज भी सवेरे रिमझिम बारिश हुई।

उपलों के ढेर ढंके हुये हैं।

उपले पाथना रुक गया है। उपड़ऊर ढंकने के लिये उनपर तिरपाल बंधे दिखते

उपले बनाना और ईंधन के लिये उनका प्रयोग उज्वला योजना की सक्सेस-स्टोरी के बावजूद अभी भी व्यापक है। लोगों के पास गैस चूल्हे आ गये हैं; पर उनका प्रयोग आपात दशा में ही किया जाता है। भोजन अब भी उपले के प्रयोग से बनता है।

जब तक गोबर का वैसा उपयोग विकसित नहीं होगा जिससे खेतिहर किसान को महीने में एक-डेढ़ हजार की आमदनी हो, तब तक उपले बनते रहेंगे और उपड़ऊर को बारिश से बचाने संजोने का उपक्रम चलता रहेगा।

व्यापक और सुलभ प्रयोग का कोई वैज्ञानिक ब्रेक-थ्रू अभी आया नहीं है! उपला कल्चर अभी रहेगी! :-)

उपला कल्चर अभी रहेगी!

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