लेवल क्रॉसिंग गेट के हेक्सागोनल ब्लॉक


रेलवे के तीन दशकों से भी ज्यादा के गहन और थकाऊ अनुभव के बाद अब रेल से मेरा जुड़ाव मेरे घर के पास के एक रेलवे लेवल क्रॉसिंग तक ही सिमट गया है। इसकी दशा-दुर्दशा से कष्ट होता रहा है। उसके निवारण के लिये मैं मण्डल रेल प्रबंधक महोदय से मिला था।

समपार फाटक पर रेल लाइन और सड़क का रखरखाव उम्दा होना चाहिये। रेल और सड़क मार्ग का मिलान यहीं होता है और दुर्घटनायें भी यहीं ज्यादा होती हैं। रोज वहां से गुजरने के कारण मुझे अपनी ही फिक्र होती है कि कहीं मेरी साइकिल डगमगा कर गिरे और इस उम्र में मुझे किसी फ्रेक्चर का सामना करना पड़े।

वे हेक्सागोनल ब्लॉक समस्या का समाधान कम, उससे बड़ी समस्या बने हुये थे। चित्र अगस्त 2022 का है।

उसके पास की सड़क बहुत खराब है। पटरियों की चेक रेल के बीच तथा फाटक सीमा में आसपास की सड़क पर रखरखाव की दिक्कत के कारण वहां हेक्सागोनल ब्लॉक लगाये गये थे। पर उन मोटे सीमेण्ट-कॉन्क्रीट के टुकड़ों को एक अनुशासन के साथ जमाया जाता है। वह कुशलता कर्मियों में नहीं थी। वे हेक्सागोनल ब्लॉक समस्या का समाधान कम, उससे बड़ी समस्या बने हुये थे।

मण्डल रेल प्रबंधक जी के आदेश से कर्मचारियों ने वे षटकोणीय पाषाण एक बार निकाल कर पुन: बिछाये जरूर, पर कुशलता की कमी के कारण कुछ महीनों में वे जस के तस हो गये। सड़क का रखरखाव तो खैर हुआ नहीं। शायद वह आरवीएनएल को करना हो।

सारे ब्लॉक्स निकाल कर किनारे फैंक दिये हैं। फाटक के बीच और चेक रेल के बीच भी गिट्टी बिछा दी गयी है। शायद सड़क का डामरीकरण किया जायेगा।

कुछ दिन पहले मैंने देखा कि शायद रेलवे के इंजीनियरिंग विभाग को लग गया है कि हेक्सागोनल ब्लॉक बिछाना और उसका रखरखाव (अच्छे से बिछाया जाये तो यह बहुत कम रखरखाव मांगता है) टेढ़ा काम है। उन्होने सारे ब्लॉक्स निकाल कर किनारे फैंक दिये हैं। फाटक के बीच और चेक रेल के बीच भी गिट्टी बिछा दी गयी है। शायद सड़क का डामरीकरण किया जायेगा। अलकतरा वाली सड़क बनाई जायेगी।

किनारे फेंके हेक्सागोनल ब्लॉक्स को देख कर मेरी पत्नीजी को लालच होता है। “पीडब्ल्यूआई साहब इन ब्लॉक्स का क्या करेंगे? लोग एक एक कर उठा ही ले जायेंगे। मुझे दस ब्लॉक्स क्यों नहीं दे देते? तुम एसएस साहब को बोलो न! इन ब्लॉक्स के ऊपर मेरे गमले अच्छे से रखे जा सकेंगे।” – जब भी वहां से हमारा वाहन गुजरता है, मेम साहब लालच से उन ब्लॉक्स को देखती हैं। मैं उन्हें अनदेखा करता हूं।

किनारे फेंके हेक्सागोनल ब्लॉक्स को देख कर मेरी पत्नीजी को लालच होता है। “पीडब्ल्यूआई साहब इन ब्लॉक्स का क्या करेंगे? लोग एक एक कर उठा ही ले जायेंगे। मुझे दस ब्लॉक्स क्यों नहीं दे देते?

रिटायरमेण्ट के बाद किसी को कोई अनुरोध करने का मन नहीं होता। और किसी चीज को मांगने का तो बिल्कुल नहीं। मेरा मन अनासक्त हो गया है पर पत्नीजी की आसक्ति अपने बगीचे को संवारने में है। वे बार बार कहती हैं – “आखिर ये ब्लॉक्स उनके किसी काम की चीज तो होंगे नहीं!”

मैं कोई अनुरोध किसी से नहीं करता। बहुत बदल गया हूं सेवानिवृत्ति के बाद। जिस विभाग में आदेश चलते रहे हों, वहां अनुरोध क्या करना व्यक्तिगत रूप से!

गांव के लोग और मेरे पुराने रेलवे के इंस्पेक्टर लोग बताते हैं कि मेरे निरीक्षण नोट के आधार पर ही यह लेवल क्रॉसिंग अपग्रेड हो कर गेट मैन युक्त बना था। दो दशक पहले की बात होगी वह। अब उसी लेवल क्रॉसिंग पर गुजरते हुये अंदेशा रहता है कि कहीं मेरी साइकिल का बैलेंस न बिगड़ जाये। :-(

समय का चक्र है – कभी गाड़ी नाव पर, कभी नाव गाड़ी पर। सैलून से साइकिल तक का समय चक्र! :-)


मानस पाठ का निमंत्रण


मैं उन सज्जन को जानता नहीं। लेकिन उन्होने मुझे घर आ कर “अखण्ड श्री मानस पाठ” का निमंत्रण दिया। मानस पाठ का निमंत्रण भी बाकायदा तीन रंग में छपा हुआ कार्ड और उसी तरह छपे लिफाले में डाल कर भेजा जाता है। चौबीस घण्टे के इस कार्यक्रम में टेण्ट-कनात, फूल माला, कीर्तन करने की मण्डली, लाउडस्पीकर की व्यवस्था और चौबीस घण्टे चाय-पान-मुलेठी आदि का इंतजाम खर्चीला आयोजन होता होगा। कार्यक्रम के बाद हवन, प्रसाद और कुछ अंतरंग लोगों के लिये भोजन भी होता ही होगा।

खर्चा पचीस तीस हजार से क्या कम आता होगा?

मेरे पास इतने पैसे हों तो मैं ढेरों किताबें खरीद लूं। मेरी पत्नीजी पौधे और गमले खरीद लायें। लोगों को धर्म में आनंद आता है, हमें किताबों और गमलों पौधों में। यो यत श्रद्ध स एव स:। जिसकी जैसी श्रद्धा है, वह वैसा ही होता है।

सड़क किनारे वह मानस पाठ कार्यक्रम था तो मैं सवेरे साइकिल सैर के दौरान चला गया। बाद में लगा कि गया तो अच्छा ही किया।

जिनके यहां कार्यक्रम था, वे सज्जन व्यक्ति थे। उन्होने आगे बढ़ कर मुझे रिसीव किया और मेरी साइकिल खुद ठीक से खड़ी की। साइकिल को भी कार जैसी इज्जत दी। वर्ना साइकिलहे को कौन पूछता है?!

एक कमरे-कम-दुकान में मानस पाठ चल रहा था। पाठ करने वालों की मण्डली के बैग आदि बाहर रखे थे। एक ओर लाउड स्पीकर रखे थे। चौकी पर राम दरबार की फोटो थी। अन्य देवी-देवताओं के भी चित्र थे। फूलों- मुख्यत: गेंदे के फूलों की मालाओं से सजे।

मैंने भगवान को प्रणाम किया और एक कुर्सी पर बैठ गया। सोचा कि दस मिनट वहां बैठ कर राम चंद्र जी को नमन कर वापस आ जाऊंगा। पर वे सज्जन चाय ले आये। सवेरे चाय की तलब थी। तुलसी बाबा की कृपा से मिल गयी। अच्छा लगा।

लाउड स्पीकर पर्याप्त लाउड था। किसी की बात सुनने के लिये अपना मुंह/कान उनके मुंह के पास ले जाना होता था। गांवदेहात में कोई शोर को बुरा नहीं मानता पर जितने मानस पाठ देश भर में होते हैं, इन सब का शोर जोड़ लिया जाये तो (अगर तुलसी बाबा जिंदा होते) तुलसी बाबा पर साउण्ड पॉल्यूशन का एक मुकदमा तो बन ही जाता। बाबा देश भर में मुकदमा-यात्रा करते करते थक जाते! आज यहां कोर्ट की तारीख, कल वहां।

छविनाथ पांड़े

पास में एक सज्जन बैठे थे – छविनाथ पांड़े। इसी गांव – पठखौली – के ही हैं। लगता है काफी देर से बैठे थे। एक चाय पी चुके थे। एक बार मेरे साथ और हुई। परिचय हो गया तो उनके गांव चक्कर लगाते हुये जै राम जी की हो जाया करेगी।

एक रिटायर्ड मास्साब मिले। गांव के ही प्राइमरी और मिड़िल स्कूल में नौकरी कर अपनी वर्किंग लाइफ गुजार ली। सड़क किनारे पठखौली/बारीपुर में उनका घर है। मेरे श्वसुर जी की प्रशंसा कर रहे थे। मास्साब का नाम नहीं पूछ पाया। लाउड स्पीकर तेज था तो बातचीत कठिनाई से हो रही थी।

एक रिटायर्ड मास्साब (बांये) मिले। गांव के ही प्राइमरी और मिड़िल स्कूल में नौकरी कर अपनी वर्किंग लाइफ गुजार ली। दूसरे सज्जन वे हैं जिनके यहां मानस पाठ है।

फिर भी, इतना तो लगा कि अपने आसपास के गांवों में यूंही गुजरते हुये, यूं ही उन लोगों के पास रुका, बैठा, बतियाया जा सकता है। हर एक के पास कहने को बहुत कुछ है और मुझ जैसे अपरिचित से भी परिचय बनाना तथा आगे बढ़ कार बात करना उन्हें आता है। शहराती लोगों वाली स्नॉबरी नहीं है उनमें।

मानस पाठ गायन-लय के साथ चल रहा था। बार बार सम्पुट भी आ रहा था – गुर पितु मातु महेस भवानी। प्रनवउं दीनबंधु दिन दानी॥ मैं वहां पांच दस मिनट बैठने वाला था, ज्यादा ही बैठ गया।

मानस पाठ अभी भी जवान-बूढ़े सभी को अपने साथ जोड़े हुये है। भदेस भोजपुरी श्लीलाश्लील गायन के बीच तुलसीदास जी की इस कालजयी कृति की महिमा कम नहीं हुई है। धर्म, आस्था, सम्बल, मानता-मनौती और अभीष्ट पूरा होने पर ईश्वर स्मरण – सब के लिये रामचरित मानस का सहारा है। कई कई लोग तो नियमित रूप से वार्षिक मानस पाठ कराते ही हैं।

अगर गेय मानस श्रवण ध्येय हो तो मेरे हिसाब से स्वामी तेजोमयानंद का यूएसबी स्टिक पर उपलब्ध रामचरित मानस का सम्पूर्ण गायन सुनना और साथ में दोहराना बहुत बढ़िया है।

कभी कभी लगता है कि मानस पाठ अशुद्ध है या उसकी स्पीड ज्यादा कर दी जाती है समय से पूरा करने के लिये। देर रात में अनाड़ी पाठ करने वाले कभी कभी पानी मिला देते हैं अनुष्ठान में। अगर गेय मानस श्रवण ध्येय हो तो मेरे हिसाब से स्वामी तेजोमयानंद का यूएसबी स्टिक पर उपलब्ध रामचरित मानस का सम्पूर्ण गायन सुनना और साथ में दोहराना बहुत बढ़िया है। उसका प्रचलन नहीं हुआ है। शायद आगे होने लगे।

सवेरे सवेरे “राजेश्वरी प्रसाद पाण्डेय” के सिरिनामें से मिले निमंत्रण पर पंद्रह बीस मिनट वहां बैठना और परिवेश देखना अच्छा लगा।

तुलसी बाबा की जय हो! जै श्री राम!


कांग्रेस घास का उन्मूलन कैसे हो?


मेरे परिसर में पौधों को पानी देने में मशक्कत करनी पड़ रही है। जेठ की गर्मी आज ज्यादा ही लग रही है। क्यारियों और गमलों को पानी दिया गया है। बाहर, खेतों में फसल कटने के बाद हरियाली बहुत कम हो गयी है।

मेरे परिसर में पौधों को पानी देने में मशक्कत करनी पड़ रही है।

तीन तरह के पौधे पानी की कमी के बावजूद हरे भरे हैं। बगीचे में कोचिया, गंगा किनारे हिंगुआ और इधर उधर फैली कांग्रेस (गाजर) घास। मेरे परिसर के आगे कांग्रेस घास तो लहलहा रही है। वह जगह टुन्नू पण्डित (शैलेंद्र कुमार दुबे, मेरे साले साहब) और मेरे घर के सामने की है। टुन्नू पण्डित भाजपा के नेता हैं और उनके यहां कांग्रेस घास लहलहा रही है! :lol:

कांग्रेस घास, गाजर घास या पार्थेनियम (Parthenium) बड़ा जिद्दी पौधा है। गाजर की तरह इसकी पत्तियां होने के कारण इसे गाजर घास कहा जाता है। मेरे बचपन में यह था ही नहीं। फिर अकाल पड़ता रहा। सरकार ने अमरीका को गुहार लगाई और उन्होने पीएल 480 समझौते के तहद घटिया गेंहू – जो उनके यहां पशु खाते – भारत को दिया। उससे अन्न संकट तो खत्म हुआ, पर गेंहू के साथ पार्थेनियम के बीज भी भारत आ गये और आने के बाद यहीं पसर गये।

कांग्रेस के जमाने में आये थे तो इनका नाम पड़ गया कांग्रेस घास। केरल में इन्हें कम्यूनिस्ट घास कहते हैं। जब ये आये थे तो वहां साम्यवादी सरकार थी।

बहरहाल घर के आगे पार्थेनियम लहलहा रही है। मेरे घर कोई आये तो पहले पहल उन्हें इस गाजार घास के दर्शन होंगे। इसका रंग देखने में आंखों को सुखदायक लगता है, पर कोई बकरी या अन्य पशु इनकी ओर मुंह नहीं करता।

मेरे घर के आगे, टुन्नू पण्डित के अहाते में कांग्रेस घास लहलहा रही है।

इसके उन्मूलन का तरीका है कि इसके फूल लगें, उसके पहले ही इसे जड़ से उखाड़ कर एक कोने में सुखाया जाये और जला दिया जाये। अपने परिसर में तो साल दर साल हमने यही किया। अत: घर में तो पार्थेनियम का आतंक बहुत कम हो गया है। पर बाहर तो इसका साम्राज्य है! इतना बड़ा है कि पौधों को जड़ से उखाड़ना बहुत श्रम का काम है और उखाड़ने वाले को एलर्जी भी हो जाती है। अब तो इनमें फूल भी लग गए हैं।

इन्हें खत्म करने के लिये पास के कस्बे से घास जलाने वाली दवाई लेने गया था आज। एक पांड़े जी की दुकान है। पर आज बंद मिली। लगता है घर पटिदारी में लगन बरात होगी, अन्यथा बंद नहीं होती। वैसे भी उनकी बीज, खाद और पेस्टिसाइड का यह ऑफ सीजन है। इसलिये दुकान बंद करने में उन्हें ज्यादा कठिनाई नहीं हुई होगी।

चाणक्य को पैर में कुशा गड़ गयी थी तो उन्होने कुशा की जड़ को मठ्ठा पिला कर उसका नाश किया था। चाणक्य ने नंद वंश को भी मठ्ठा पिलाया था। मेरी तो उतनी क्षमता नहीं है। उतनी जिद भी नहीं है। पर अपने घर के सामने की इस गाजर घास का इस सीजन में उन्मूलन तो करना ही है। टुन्नू पण्डित तो करने से रहे; भले ही वे भाजपाई हों और यह घास कांग्रेसी हो। :lol:

[बाई द वे; टुन्नू पण्डित का आज परतंत्रता दिवस है। आज के दिन उनका विवाह हुआ था। उनकी पत्नी, जया, आज हवाई जहाज से प्रयाग पंहुच रही हैं। आज उन्हें बरामदे में बैठे डबल शेव खींचते देखा। पत्नी को रिसीव करने जो जाना है! :lol: ]


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