पोरबंदर – दूसरा दिन


18 दिसम्बर 21, सवेरे –

दिलीप थानकी मुझे विवरण दे रहे हैं। बाबा (बाबा प्रेमसागर) नेपथ्य में हैं। दिलीप की भाषा हिंदी है पर गुजराती पुट है। वैसे उन्होने मुझे बताया है कि उनकी शिक्षा दीक्षा मध्य गुजरात और पुणे में हुई है। सो वे काठियावाड़ी ही नहीं कॉस्मोपोलिटन हैं। अपना व्यवसाय भी वे डाइवर्सीफाई करने की दिशा में काम करते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में भी पैठ रखते हैं और बढ़ाने की सोचते हैं।

पसंद आ रहे हैं दिलीप मुझे। उम्र भी दिलीप की मेरे दामाद के समवयस्क सी लगती है। वह (विवेक) भी अपने व्यवसाय को बढ़ाने और डाइवर्सीफाई करने की सोचता/करता है। हो सकता है कि दोनो में कोई मेल मुलाकात और सिनर्जी कायम हो भविष्य में। … खैर वह सब भविष्य की बातें हैं और मैं उसकी बहुत सोचता नहीं।

दिलीप जी ने मुझे कल की प्रेमसागरीय गतिविधि के चित्र भेजे हैं और विवरण भी बताया है फोन पर। उन्होने न बताया होता तो मैं तीन दिन की इस अवधि को यात्रा और ब्लॉग-ब्रेक मान कर चलता। पर चूंकि उन्होने जानकारी दी है; उसके आधार पर कुछ लिखा तो जा ही सकता है।

किलेश्वर महादेव में प्रेमसागर

कल वे लोग बाबा प्रेम सागर को ले कर किलेश्वर महादेव गये थे। यह पौराणिक प्रसिद्धि का मंदिर बरडा पहाड़ियों के ऊपर है। कथानक है कि पाण्डव अज्ञातवास (सम्भव है लाक्षागृह से निकल भागने के बाद) में यहां रहे। वैसे अज्ञातवास को ले कर कई अन्य स्थान भी अपनी दावेदारी करते हैं। उसमें मेरी जानकारी में किलेश्वर महादेव भी जुड़ गया। यह स्थल पोरबंदर से 40-50 किमी उत्तर में है। बरडा पहाडियों में एक वन्यजीव अभयारण्य भी है। सावन के महीने में इस स्थान की छटा निखर जाती होगी – झरनों और हरियाली के बीच। उस समय यहां बहुत से श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं। शत्रुशाल्या जी (जामनगर के राजा) की ओर से भण्डारा भी होता है।

बाबा जी को दिलीप जी ने शनि मंदिर भी दिखाया। यह स्थान भी पोरबंदर से 30 किमी दूर है। सातवीं-आठवीं सदी का यह शिव मंदिर हाथला गांव में है और यह स्थान शनि देव के बाल रूप से जुड़ा है।

किलेश्वर महादेव परिसर में महेश भाई और मयूर थानकी ( प्रेमसागर के दांये) हितेशभाई (लाल कमीज) और केतन भाई चेलावाड़ा

शनि और यम – दोनो भाई हैं और दोनो सूर्य के पुत्र हैं। दोनो मनुष्य को उसके कर्म अनुसार न्याय देने वाले हैं। शनि का जन्म उनकी माता छाया द्वारा शिवजी की तपस्या से हुआ है। शनि का रंग सांवला होने के कारण वे सूर्यदेव से तिरस्कृत रहे और उन्होने शिव जी की तपस्या की, तपस्या के फलस्वरूप अपने पिता को उन्होने हराया।… पौराणिक कथायें खूब गड्डमड्ड हैं। पर मूल बात यह है कि शनि मनुष्य के भय और न्याय की चाह के देवता हैं।

शनि मंदिर में प्रेमसागर

थानकी जी बताते हैं कि आज वे कीर्ति मंदिर, हरि मंदिर और सुदामा जी का मंदिर दिखायेंगे। समय मिला तो भीमेश्वर महादेव और जाम्बवंत की गुफा भी दिखायेंगे। आज अवसर मिलने पर बाबा प्रेमसागर को चिकित्सक से भी साक्षात्कार करा देंगे। यह सब प्रेमसागर की कांवर यात्रा से इतर गतिविधियांं हैं। पर यह सब प्रेमसागर को अपनी ऊर्जा री-कूप करने में सहायक होंगी। उनको इसी भाव से देखने को मैंने अपने को समझाया है।

प्रेमसागर को न केवल यात्रा करते हुये कंकर में शंकर तलाशने चाहियें, वरन मौका मिलने पर यात्रा मार्ग से दांये बांये भी झांक लेना चाहिये – यह मैंने अपने को समझाया है। मैं समझ रहा हूं, और मैं इस समझ में पहले फिसड्डी रहा; कि प्रेमसागर की यात्रा, यात्रा की पूर्णता और विधिवत सम्पन्नता में कम, यात्रा के लालित्य और वैविध्य में है। प्रेमसागर को क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये – यह मेरा बिजनेस नहीं है। … और यह मेरी पिछले एक दो दिन की उभरी सोच में आया परिवर्तन है।

मैं सोचता था कि मैं ब्लॉग में प्रेमसागर के बारे में लिख कर प्रेमसागर की यात्रा का फेसिलिटेटर हूं; पर वह भाव मैंने त्याग दिया है। मैं इस बात से थोड़ा चिंतित रहता था कि भौगोलिक जानकारी के अभाव में प्रेमसागर व्यर्थ ही 400 किमी अतिरिक्त चले जब कि लम्बी यात्रा में एक एक किलोमीटर अतिरिक्त चलना भारी होता है। मुझे यह भी चिंता थी कि महाराष्ट्र और दक्षिण की यात्रायें – सुदूर रामेश्वरम की यात्रा – कैसे होगी। अब वह चिंता मैं छोड़ने की कोशिश करूंगा। वह सब महादेव के जिम्मे! देखता हूं, यह भाव स्थाई रहता है या नहीं।

रात्रि भोजन के समय अलाव के इर्दगिर्द

महादेव अपने हिसाब से चलायेंगे यात्रा। हर हर महादेव।

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

पोरबंदर – सौराष्ट्र का आतिथ्य


कल @sabalparanaresh (उनका नाम क्या है, वह स्पष्ट नहीं होता। ट्विटर पर वे छैलछबीलो के नाम से यदाकदा दिखते हैं। उन्होने मेरे उनका परिचय देने के अनुरोध को अनदेखा किया है।) जी ने टिप्पणी में बताया कि सौराष्ट्र का आतिथ्य ऐसा है जो भगवान को भी स्वर्ग भुला दे –

“कोक दी काठियावाड़ मा,
भूलो पड भगवान,
तारा एवा करूँ सम्मान,
स्वर्ग भूलावू शामला।”
आतिथ्य में भगवान को भी अपना घर भूल देना सौराष्ट्र की प्रकृति है। प्रेमसागरजी तो फिर भी मनुष्य ठहरे। :lol:

सो वही हुआ है। उमा दारुजोषित की नांई, सबहि नचावत राम गोसाईं – प्रेमसागर यात्रानुशासन भूल कठपुतली की तरह नाच रहे हैं। परसों वे अपनी कांवर यात्रा बीच में छोड़ दिलीप थानकी जी के समूह के साथ पोरबंदर पंहुचे। कहां उन्होने अपनी यात्रा होल्ड पर रखी? यह पूछने पर प्रेमसागर ने बताया – नरवा। वे नाम बताने और याद रखने में बहुत कच्चे हैं। इसलिये मैंने दुबारा भी पूछा। जब नरवा ही बताया तो उस स्थान को यात्रा मार्ग में तलाशने की कोशिश की। ऐसा कोई स्थान नहीं मिला। … आतिथ्य के बाद दिलीप जी वापस उन्हें उसी स्थान पर पंहुचा देंगे और वे अपनी कांवर यात्रा फिर जारी करेंगे। स्थान के नाम वाम से प्रेमसागर को क्या लेना देना। :lol:

[दिलीप जी ने बाद में मुझे बताया कि वह स्थान नवी बंदर है। माधवपुर से 29 किमी आगे। उसको स्थानीय लोग नरवा भी कहते हैं।]

पोरबंदर में स्वागत - बच्चे भी उनके स्वागत में सड़क पर थे।
पोरबंदर में स्वागत – बच्चे भी उनके स्वागत में सड़क पर थे।

कल सवेरे प्रेमसागर का फोन आया था। आशीर्वाद लेने के लिये किया था – जिसकी उन्हें अगले दो तीन दिन तक जरूरत ही नहीं। पिछले दिन वे सत्कार पाये थे दिलीप जी के जीजा जी के घर पर। एक फोटो में वे महराज की तरह तख्त पर विराजमान हैं। आसपास बहुत से लोग हैं। प्रेमसागर का आभामण्डल टपक रहा है। उनके आसपास दिलीप जी के जीजा जी के परिवार के ही नहीं उनके समाज के जानने वाले लोग भी बैठे हैं। लोग बकौल दिलीप थानकी “खुद इस प्रकार की कठिन यात्रा नहीं कर सकते तो आतिथ्य भाव से उसका लाभ लेने का प्रयास कर लेते हैं”। उनका यह भाव नैसर्गिक है। शायद उसी भाव से मैं भी यह ब्लॉग लिखे जा रहा हूं। पर मेरे ख्याल से प्रेमसागर की यात्रानुशासन के लिये यह उचित नहीं – मेरे ख्याल से; और मैं गलत भी हो सकता हूं। मैं अगर कांवर यात्रा कर रहा होता – और वह कदापि सम्भव नहीं लगता – तो अपने को किसी भी समारोह या किसी के ड्राइंग रूम में जाना वर्जित रखता।

“पिछले दिन वे सत्कार पाये थे दिलीप जी के जीजा जी के घर पर। एक फोटो में वे महराज की तरह तख्त पर विराजमान हैं। आसपास बहुत से लोग हैं।”

आज सवेरे प्रेमसागर का फोन नहीं आया। दिलीप जी से बात हुई और प्रेमसागर की गतिविधि का पता चला। तीन दिन उनके पोरबंदर प्रवास के हैं। कांवर यात्रा उसके बाद ही होगी। अभी तो प्रेमसागर लोगों के भाव और श्रद्धा के सागर में तैरती कठपुतली हैं। खूब आनंद से तैरती कठपुतली। सौराष्ट्र के भाव समुद्र में जब भगवान भी अपना स्वर्ग भूल जाते हैं तो प्रेमसागर को उसका आनंद लेने दिया जाये। भरपूर भाव आनंद! :-)

दिलीप थानकी और उनकी पत्नीजी प्रेमबाबा के साथ।

वैसे भी, प्रेमसागर को सतत चलते रहने के बाद आराम की जरूरत थी। उन्हें अपना मैडीकल चेक अप भी करा लेना चाहिये और अपने हिमोग्लोबीन स्तर को सुधारना चाहिये। विटामिन और आयरन की कमी अगर है तो वह दूर करनी चाहिये। दिलीप थानकी जी यज्ञ-अनुष्ठान के साथ साथ प्रेम बाबा को इस पक्ष पर ध्यान देने को मना सकें तो वह पूरी यात्रा के लिये बहुत बड़ा सहयोग होगा।

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
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प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
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प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

माधवपुर


13-14 दिसम्बर 21 –

माधवपुर सौराष्ट्र का एक तटीय गांव या कस्बा है। छोटा पर सांस्कृतिक रूप से समृद्ध। तेरह दिसम्बर की शाम प्रेमसागर अपनी द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा के अंतर्गत नागेश्वर जाते हुये यहां पंहुचे थे। वहां जनक भाई के आतिथ्य में एक दिन ठहर कर उन्होने आसपास के दर्शनीय स्थलों को देखा।

माधवपुर घेड के नाम से एक पर्यटक वेबसाइट है जो सुंदर चित्रों के साथ माधवपुर की जानकारी देती है। वेब साइट के अनुसार यहां दर्शनीय है – माधवराय का प्राचीन मंदिर, माधव रमणीय समुद्र तट, रामनवमी के दौरान कृष्ण-रुक्मिणी विवाह का विवाह आयोजन और उसका व्यापक उत्सव, ओशो का एक आश्रम, वल्लभाचार्य की एक ‘बैठक’ और एक कछुओं के अण्डों से बच्चे जनने की हेचरी। “घेड” शब्द का अथ जानने के लिये मैंने नेट पर ही छानबीन की।

घेड का अर्थ व्यापक आद्रभूमि (wetland) से है। समुद्रतटीय इलाके में यह घेड क्षेत्र वर्षा के मौसम में अधिक जलवृष्टि का जल अपने में भर लेते हैं। इससे बाकी रिहायशी स्थल बाढ़ से बच जाते हैं। माधवपुर की यह आद्रभूमि गूगल नक्शे में बहुत व्यापक क्षेत्र में नहीं दिखती पर पोरबंदर के आसपास भादर और ओजत नदियां जब समुद्र में मिलती हैं तो करीब 100 वर्ग किलोमीटर के घेड क्षेत्र से गुजरती हैं। इन नदियों में बारिश के मौसम में व्यापक तबाही मचाने की क्षमता होती होगी। पर घेड क्षेत्र होने के कारण कोई जलप्लावन रिहायशी इलाके में नहीं होता। उस आद्रभूमि के कारण वनस्पतीय, जैव और जानवरों की भी विविधता होती होगी और पर्यावरण भी पुष्ट होता होगा। उसके बारे में अलग से जानकारी लेने का यत्न करूंगा।

एक माधवपुर नाम का स्थान नेपाल में है, जिससे इस माधवपुर का कोई सम्बंध नहीं है। यह माधवपुर तो कृष्ण के रुक्मिणी विवाह से पौराणिक महत्व रखता है।

मेरे पास प्रेमसागर के ठेले चार पांच दर्जन चित्र हैं। कुछ समझ आ रहे हैं और कुछ का संदर्भ समझ नहीं आता।

प्रेमसागर ने इन स्थलों के भ्रमण के बाद चार पांच दर्जन चित्र, थोक में, संदर्भ रहित मेरे पास ह्वाट्सएप्प पर ठेल दिये। उनका विवरण देने के लिये कोई फोन करने की औपचारिकता या शिष्टाचार पालन भी नहीं किया। उन्हें जनक भाई और अन्य लोगों का आतिथ्य सत्कार मिल रहा है, ऐसे में मुझे फोन करने का ध्यान कहांं! गुजरात में छोटा उदयपुर से वडोदरा के इलाके में भी उनका इसी प्रकार का व्यवहार दिख चुका है – जहां लोग उन्हें धर्म श्रद्धा में भाव देते रहे और प्रेमसागर अपनी यात्रा के मूल अनुशासन को भूल उसी में मगन रहे। शंकर भगवान बीच बीच में यह परिवर्तन उनकी परिस्थितियों में करते रहे हैं। अब फिर कर रहे हैं। अब फिर, शायद प्रेमसागर के बारे में ब्लॉग लिखने की आवृति कम होते जाने का समय आ रहा है। शायद! :lol:

माधवराय का 15वीं सदी का पुराना मंदिर तो मुस्लिम आक्रांताओं ने नष्ट कर दिया है। इधर, गांगेय प्रांत में तो उस बर्बरता को गंगा-जमुना संस्कृति का वर्क चढ़ाया जाता है; वहां गुजरात में कोई और नाम दिया जाता होगा इस बर्बरता को जस्टीफाई करने के लिये। उस पुराने मंदिर के खण्ड दिखते हैं। एक नया माधवराय मंदिर बना है कहीं आसपास पर उसका चित्र प्रेमसागर के चित्रों में चिन्हित नहीं होता। प्रेमसागर को मैं अनेकानेक बार कह चुका हूं कि चित्र भेजते समय उसके परिचय में कोई पंक्ति या वॉइसनोट डाल दिया करें। पर प्रेमसागर में वह डिसिप्लिन कभी आया ही नहीं। अनगढ़ व्यक्ति है यह! यह आदमी ट्रेवल-ब्लॉग लेखन के लिये गढ़ा ही नहीं गया है।

माधवराय का 15वीं सदी का पुराना मंदिर तो मुस्लिम आक्रांताओं ने नष्ट कर दिया है।

दिलीप थानकी जी ने बताया कि कृष्ण-रुक्मिणी विवाह का उत्सव वैसे ही मनाया जाता है जैसा परम्परा में होता रहा होगा। उनके मायके और मामा के इलाके के लोग विदर्भ, झारखण्ड (?) और असम (?) से यहां आते हैं। माधवराय मंदिर में विवाह की सभी रस्में विधिनुसार सम्पन्न होती हैं। एक रथ पर कृष्ण-रुक्मिणी की सवारी पूरे गांव में निकलती है। लोग नाचते गाते साथ चलते हैं और एक दूसरे पर अबीर-गुलाल भी लगाते हैं। रामनवमी के दौरान पांच दिन चलता है यह उत्सव। उसके पर्यटन महत्व का दोहन भी किया जाता है।

थानकी जी ने बताया कि यहां रजनीश (ओशो) का एक प्राचीन शैली का आश्रम है जिसमें ओशो के अन्य आश्रमों जैसी तड़क भड़क नहीं है। शांत जगह है और वहां जाना अच्छा लगता है। वेबसाइट के अनुसार वहां ओशो परम्परा के स्वामी ब्रह्मवेदांत जी रहते हैं। आश्रम में बिना पैसा दिये भी रहा जा सकता है। वहां आश्रम की दिनचर्या के नियमों का पालन करना होता है। स्थान रमणीय है।

ओशो आश्रम के चित्र का स्क्रीनशॉट। मूलचित्र इस वेबसाइट पर है।

माधवपुर के समुद्र तट के जो चित्र इण्टर्नेट पर दिखते हैं वे बहुत मोहक हैं। पूरी वेबसाइट देखने पर मन होता है कि यहां भदोही जिले में रिहायश बनाने की जगह एक कुटिया मुझे वहीं माधवपुर में बना कर बस जाना चाहिये था! एक ऐसा एक डेढ़ कमरे का स्थान जहां से समुद्र तट डेढ़ दो किलोमीटर की दूरी पर हो। मन होता है कि थानकी जी या जनक भाई से पूछूं कि किराये पर ऐसा कमरा कितने में मिल सकेगा जिसमें कुछ बेसिक फर्नीचर हो और आसनी से रहा जा सके। सुबह शाम समुद्र तट पर व्यतीत करना और दिन में सोचना और लिखना – कितना आनंद रहे! पर हर स्थान जो प्रकृति के समीप होता या दिखता है, लुभाता है। शायद एक मोबाइल घर होना चाहिये जिसपर जहां मन हो पार्क कर महीना दो महीना रहा जाये, फिर वहां से निकल कर कहीं और! जॉन स्टाइनबैक के “ट्रेवल्स विथ चार्ली” की तरह एक ट्रक की बॉडी पर बने घर/सैलून को लेकर!

रेलवे की नौकरी में सैलून की यात्रा की आदत रही। लगभग 80 प्रतिशत यात्रायें वैसे ही की हैं। अब कोई कम्पनी इस तरह के ट्रक बॉडी पर घर/सैलून बना कर किराये पर देने लगे तो मेरे जैसे कई लोग होंगे जो उसका प्रयोग करना चाहेंगे। वे जो मात्र पर्यटक नहीं हैं – वे जो घुमंतू जीवन का अनुभव करना चाहते हैं अपनी धीमी रफ्तार से। वे जिनके लिये यात्रा महत्वपूर्ण नहीं है। जिनके लिये अनुभव महत्व का है। उगते और अस्त होते सूरज का अनुभव! जंगल और घेड का अनुभव!

मेरे पास प्रेमसागर के ठेले चार पांच दर्जन चित्र हैं। कुछ समझ आ रहे हैं और कुछ का संदर्भ समझ नहीं आता। प्रेमसागर का फोन नहीं आया और मैं अपनी ओर से करना नहीं चाहता। जीडी; यह कांवर ऑब्सेसन बहुत अच्छी बात नहीं। प्रेमसागर की लाइफ और लाइफस्टाइल जितना दिखे, देखो; पर उसे जानने का जुनून न पालो! इग्यारह बजे पोस्ट करने की भी क्या बाध्यता है? जब वे सज्जन बतायेंगे, तब देखा जायेगा। नहीं तो जो लिखा है, वही काफी है।

15 दिसम्बर 21 सवेरे –

सवेरे प्रेमसागर अवतरित हुये। सौ से ऊपर फोटो ठेलीं आज सवेरे, कल के उनके भ्रमण की। थोक में अपनी गैलरी मुझे थमा दी। उसमें दो दर्जन फोटो बनारस में मोदी के कार्यक्रम की भी हैं। कुछ मेरे ही ब्लॉग के स्क्रीनशॉट हैं जो किसी ने उन्हे भेजे होंगे। मैंने उन्हे कहा भी कि इनका मैं क्या उपयोग करूं? उन्हें मुझे आठ दस फोटो देनी चाहियें। उनके साथ वॉइस नोट या एक पंक्ति का लेखन होना चाहिये जिससे उन्हें लिंक किया जा सके।

जनक भाई के परिवार का चित्र।

माधवराय के भग्न मंदिर का मात्र एक चित्र है जिससे स्पष्ट नहीं होता कि उसे कितना खण्डित किया गया और कितना वह समय से रखरखाव के अभाव में खण्डहर बना। समुद्र के बीच का कोई चित्र नहीं है। जनक भाई के परिवार के अनेकानेक चित्र हैं पर यह नहीं पता चलता कि जनक ठाकर जी कौन हैं और कौन दूसरे लोग। यह भ्रम-संशय पहले भी होता रहा है पर बहुत बार मैं इत्मीनान से उनसे बात कर समझ लिया करता था। अब प्रेमसागर के पास समय का टोटा है।

आज वे तीस किलोमीटर चलेंगे, उसके बाद किसी वाहन से पोरबंदर जा कर रात्रि विश्राम करेंगे। कल या परसों वापस उसी स्थान पर आ कर वहीं से कांवर यात्रा प्रारम्भ करेंगे। पोरबंदर में उनके लिये कोई आयोजन है, जिसमें शामिल होना है। … यह प्रेमसागर के कांवर यात्री से आयोजनों में शामिल होने का फेज है। यह पहले भी हो चुका है। नया नहीं है! इस रूपांतरण में ब्लॉगानुशासन का कचरा होता है। वह होगा! :lol:

हर हर महादेव!

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
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द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
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प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
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