रोहित – कस्टमर केयर, सेमसंग


मेरे रेलवे ज्वाइन करने के समय से यह धारणा पुष्ट होती रही है कि रेलवे की नौकरी व्यक्ति को (मुख्यत: अफसर को) अंतर्मुखी बनाती है। नौकरी के दौरान मैं भी रेलवे के बाहर के बहुत कम लोगों से मिला। अब, जब उस काल का तामझाम/पैराफर्नेलिया नहीं है; तब बहुत से लोगों से मिलना हो रहा है। गांव देहात के तो अनेकानेक चरित्रों से रोज आमना-सामना होता है। अपने परिवेश को जानने-टटोलने की खब्ती इच्छा के कारण लोगों से मिलना होता है। अब, छ साल गांवदेहात में व्यतीत होने पर उसमें भी एक प्रकार की मोनोटोनी होने लगी है। पर शहर में यदा कदा जाने पर अब उस प्रकार के लोग मिलते हैं, जिनसे रेलवे की नौकरी के दौरान नहीं मिला।

शनिवार को रोहित मिले। रोहित यादव। सेमसंग के कस्टमर केयर के अधिकारी। हरी टीशर्ट पहने और नये काट के हेयर स्टाइल वाले नौजवान। बनारसी, पर बनारसीयत का दो पीढ़ी पहले का जो पैमाना होता है – बात करने में बनारसी टोन और मुंह में पान/पानमसाला ठुंसा हुआ – वह नदारद। यहीं नाटी इमली में रहते हैं। उनका यह सेमसंग का कस्टमर केयर सेण्टर उनके घर से करीब दस मिनट की पैदल दूरी पर है। उनकी पत्नी उनके लिये उनका लंच भेजती हैं। … घर से दस मिनट की दूरी पर दफ्तर। दफ्तर में; जैसा दीख रहा था; रोहित के प्रभुत्व में एक दर्जन से ज्यादा कर्मी। वे लोग रोहित जी के मित्रवत थे; यद्यपि उनके साथ अदब और आदर से पेश आ रहे थे। जिस तरह का माहौल था, उसके अनुसार रोहित बॉस नहीं, फर्स्ट-अमॉन्ग-ईक्वल नजर आ रहे थे।

रोहित यादव। सेमसंग कस्टमर केयर के एग्जीक्यूटिव

मैंने उन्हें अपना परिचय देते समय उनपर अपने बीते प्रभुत्व का वर्णन उस प्रकार किया जैसे लोग नेम-ड्रॉपिंग में करते हैं। यह बताने की कोशिश की कि मैं रेलवे का गैरमामूली अधिकारी था। पर वह बोलते ही मुझे अहसास हो गया कि बीते अतीत की शान बताना कोई अच्छी बात नहीं। वह अतीत तो अब खण्डहर हो रहा है।

शब्द मुंह से निकल ही गये थे। वापस नहीं लिये जा सके थे। वैसे मुझे लगा कि रोहित के मुझ कस्टमर के प्रति व्यवहार में मेरे द्वारा मेरे अतीत का वजन डालने का कोई असर नहीं पड़ा। पड़ना भी नहीं चाहिये। रोहित मेरे रुआब झाड़ने के पहले भी विनम्र थे और बाद में भी। हाँ, मुझे जरूर लग गया कि अपना परिचय देने में मेरे पास मेरे वर्तमान के तत्व होने चाहियें; “हम फलाने तोप हुआ करते थे” वाला रिटायर्ड आदमी का राग नहीं गाना चाहिये।

रोहित के पास जाने को मैं विवश हुआ था। पिछले दिन मेरे मोबाइल में एक बैंक वाले एप्प ने कहा कि वे एप्प जो उसके ऊपर स्कीन को देखने और पढ़ने की परमीशन लिये हैं, उनकी परमीशन वापस ले कर बैंकिंग एप्प का प्रयोग करें, अन्यथा आपकी जानकारी कॉम्प्रोमाइज हो सकती है। तीन चार एप्प – स्क्रीन शॉट, लाइव ट्रांसस्क्राइब, स्क्रीन को रात के अनुरूप ढालनेवाला एप्प आदि को वह ओवर राइडिंग परमीशन है। सेटिंग में वह परमीशन वापस लेने की प्रक्रिया में मैंने कुछ गड़बड़ कर दिया। पूरा मोबाइल हैंग कर गया। री-बूट हो कर भी अपनी सही दशा में नहीं लौटा। लिहाजा, मजबूरन मुझे पैंतालीस किलोमीटर दूर की बनारस की यात्रा करनी पड़ी सेमसंग के कस्टमर केयर सेण्टर के लिये।

तीन प्रतिशत से कम असंतुष्ट – वह भी धुर यूपोरियन गढ़ बनारस में। वैसे आम बनारसी तो बनारसी सांड़ की तरह बिना बात हत्थे से उखड़ता है और उसकी भाषा भी कासी-का-अस्सी टाइप होती है। अगर बनारसी जनता को भी रोहित साध लेते हैं तो उनकी काबलियत और सैमसंग को काबिल लोगों की कद्र करने की कल्चर – दोनो का साधुवाद।

रोहित को मोबाइल सुधारने में पांच मिनट से कम ही समय लगा। मेरे जैसी सेटिंग की समस्या को ले कर वहां आने वाले कम ही लोग होंगे। मेरे जैसे बेकार में ही स्मार्टफोन के खांची भर के फीचर्स के साथ, उसकी सेटिंग में खुरपेंच करते हैं और अपने पैर का अंगूठा अपने मुंह में डाल लेते हैं। :lol:

रोहित ने मुझसे पूछा भी कि कितने समय से मैं स्मार्टफोन का प्रयोग कर रहा हूं। मैंने बताया कि एक दशक से ज्यादा हो गया। करीब डेढ़ दशक। रोहित ने कहा – साठ से ज्यादा की उम्र के अधिकांश लोग वे आते हैं जो स्मार्टफोन का हाशिये बराबर प्रयोग करते ही दीखते हैं। उन लोगों का समस्या बताते समय पहला कथन यही होता है कि “उन्होने कुछ नहीं किया। मोबाइल जाने क्यों खराब हो गया”।

वैसे स्मार्टफोन के युग में सीनियर सिटिजन उत्तरोत्तर उसका अधिक प्रयोग करेंगे और उन्हें झमेला होने पर कस्टमर केयर सेण्टर आने की दरकार होगी। नुक्कड़ की मोबाइल रिपेयर शॉप वाला झोलाछाप डाक्टर की तरह मोबाइल की तकनीकी समस्या का समाधान करने के लिये उपलब्ध रहेगा; पर जैसे भारत का हेल्थ केयर सिस्टम अपर्याप्त है; वैसे ही शायद स्मार्टफोन केयर सिस्टम भी।

यह बनारस का सेमसंग का सर्विस सेण्टर भी घुमावदार उंची ऊंची सीढ़ियां चढ़ कर ही पंहुचा जा सकता है। वहां जाना इतना दुरुह है कि बूढ़ा आदमी हाँफ जाये! कुल छ काउण्टर हैं यहां और भीड़ भी खूब दिखी। सर्विस सेण्टर अपने आप में सेमसंग के लिये एक लाभ का सौदा होगा, ऐसा मुझे लगा। कस्टमर केयर बिजनेस पर सैमसंग को और ध्यान देना चाहिये। ग्रे-सेगमेण्ट में जो तकनीकी सुविधा प्रदान की जा रही है नुक्कड़ की दुकानों पर, उसकी बजाय अधिक आसपास कस्टमर केयर के आउटलेट होने चाहियें। और उम्रदराज लोगों के लिये ज्यादा सुविधाजनक होना चाहिये वहां पंहुचना।

रोहित आने वाले कस्टमर को सर्विस देने के बीच पिछले दिन के ग्राहकों से फोन पर सम्पर्क कर बात भी कर रहे थे और उनसे यह जानने का प्रयास कर रहे थे कि उनका संतुष्टि का स्तर कैसा है। वे फोन पर ग्राहकों से एसएमएस में दिये लिंक पर फीडबैक देने का आग्रह भी कर रहे थे। उन्होने मुझे बताया कि वे 23 साल की उम्र में इस नौकरी में आये थे और अब इग्यारह साल हो गये हैं इसी दफ्तर में काम करते हुये। अपना काम उन्हें अच्छा लगता है। ग्राहकों में तीन प्रतिशत से ज्यादा नहीं होते जो असंतुष्ट हों। और बहुधा वे भी अपने आकलन में गुड रेटिंग तो देते ही हैं।

तीन प्रतिशत से कम असंतुष्ट – वह भी धुर यूपोरियन गढ़ बनारस में। वैसे आम बनारसी तो बनारसी सांड़ की तरह बिना बात हत्थे से उखड़ता है और उसकी भाषा भी कासी-का-अस्सी टाइप होती है। अगर बनारसी जनता को भी रोहित साध लेते हैं तो उनकी काबलियत और सैमसंग को काबिल लोगों की कद्र करने की कल्चर – दोनो का साधुवाद।

आज दो दिन बाद, रोहित का फोन आया। “बाबूजी आप संतुष्ट तो हैं न सर्विस से? और एसएमएस में फीडबैक जरा देख लीजियेगा।” – रोहित के यह कहने पर मुझे लगा कि ड्राफ्ट में लिखी यह पोस्ट पब्लिश कर ही दी जाये। सेमसंग वाले हिंदी पढ़ते नहीं होंगे; पर शायद यह रोहित के किसी काम आ जाये।

रोहित यादव को शुभकामनायें।


महाराष्ट्र का सत्ता पलट ड्रामा


मैं राजनीति में सामान्य से कम दिलचस्पी रखता हूं। कई बार मुझे खबरें पता ही नहीं होती – वे खबरें जो आम चर्चा में होती हैं। और जब कोई मुझे टोकता है – यह टोकना अब उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा है – तब एक बारगी लगता है कि मुझे इतनी जल्दी और इतनी गहराई से वानप्रस्थ में नहीं जाना चाहिये। पर अंतत: मेरा उदासीन मन हावी हो जाता है।

लेकिन वह मन महाराष्ट्र के सत्तापलट जून के तीसरे पीरियड में अचानक पलट गया। बीस-इक्कीस जून से मुम्बई-सूरत-गुवाहाटी-गोवा और पुन: मुम्बई की हलचल काफी हद तक टेलीवीजन पर देखी। टेलीवीजन का रिमोट जो मैं सामान्यत: छूता नहीं था, दिन में काफी समय मेरे हाथ में रहा।

चीजें रोचक थीं। शिवसेना की कांग्रेस और शरद पवार की पार्टी से बेमेल अघाड़ी कभी भी ठीक नहीं लगी थी मुझे और यह अवसर था कि वह ‘अश्लील’ प्रयोग खत्म होने की सम्भावना बन रही थी। एक आम नागरिक की तरह मैंने घटनाक्रम को रीयल टाइम ट्रैक किया।

यहां उत्तर प्रदेश में भी कुछ वैसा ही है। सवर्ण वोट को टेकेन फॉर ग्राण्टेड मानने की सोच है भाजपा स्टेटेजी-नियंताओं में। अपने इलाके में पिछले पांच छ साल से देख रहा हूं कि सांसद-विधायक के लिये कोई भी लैम्प-पोस्ट खड़ा कर देते हैं और यह मान कर ही चलते हैं कि भाजपा का सवर्ण वोट तो मिलेगा ही।

पर अंतिम दिन – कल शाम/रात जो ड्रामा हुआ; वह जमा नहीं। यह तो साफ लगा कि जो जोड़ तोड़ हो रही थी, उसमें फड़नवीस को पूरी तरह लूप में नहीं रखा गया था। फड़नवीस को दिल्ली दरबार द्वारा मना कर शिंदे को मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा का ‘अचम्भा’ जग जाहिर करना मजेदार लगा। पर उसके बाद नड्डा-अमित शाह का बेचारे फड़नवीस को कोंच-ठेल कर उपमुख्यमंत्री पद के लिये मनाना जमा नहीं। यह लग गया कि पूरी कवायद में फड़नवीस को मोहरे की तरह भाजपा ने प्रयोग किया है।

मराठा वोट बैंक साधना, ठाकरे और शरद पवार को ठिकाने लगाना – यह सब ठीक है। और जिस तरह से बेमेल अघाड़ी बना कर ढाई साल से जनता के मेण्डेट का मजाक बन रहा था; यह करना उचित ही था। पर मराठा वोटबैंंक साधने के लिये फड़नवीस को दरकिनार करना सही नहीं है। फड़नवीस को लूप में रखना था…

असल में भाजपा के साथ यही दिक्कत है। कुछ वर्गों को वह अपना बंधुआ मान कर चलती है। यह तो सही है कि महाराष्ट्र में बाभन तीन परसेण्ट ही हैं और वहां वोट बैंक के रूप में मराठा/ओबीसी को फड़नवीस के ऊपर तरजीह दिये जाने को भाजपा मास्टरस्ट्रोक मान कर चल सकती है। पर बांभन को बंधुआ मानना खराब तो लगता ही है।

यहां उत्तर प्रदेश में भी कुछ वैसा ही है। सवर्ण वोट को टेकेन फॉर ग्राण्टेड मानने की सोच है भाजपा स्टेटेजी-नियंताओं में। अपने इलाके में पिछले पांच छ साल से देख रहा हूं कि सांसद-विधायक के लिये कोई भी लैम्प-पोस्ट खड़ा कर देते हैं और यह मान कर ही चलते हैं कि भाजपा का सवर्ण वोट तो मिलेगा ही। सो खड़ा करते हैं केवट-पासी-ओबीसी या कोई अन्य जाति का खम्भा। उसे उसकी बिरादरी के अलावा कोई जानता नहीं और उस लैम्पपोस्ट को अपनी बिरादरी के अलावा किसी को देखने की जरूरत ही नहीं। बाभन ठाकुर भेड़ें है, जो साल दर साल चुनाव में कमल पर ठप्पा मारने की मजबूरी रखते हैं। मैं भी, थर्ड-क्लास उम्मीदवार के बावजूद मोदी के नाम पर वोट देता आया हूं और वह उम्मीदवार जीतने के बाद (उसके पहले भी) कभी दिखा नहीं। और स्थानीय स्तर पर; जहां जीते उम्मीदवार की प्रो-एक्टिविटी की जरूरत होती है; कोई काम होता ही नहीं। :sad:

भेड़ों को साधने की सोच वाली राजनीति अंतत: समाज के भले के लिये नहीं होती, वह मीडियॉक्रिटी को बढ़ावा देती है। पहले की सरकारें एक धर्म के तुष्टीकरण का खेल खेलती रहीं। भाजपा अगर वर्गपोषण की राजनीति पर चली तो उसमें और अन्य में क्या फर्क होगा?

खैर, आगे देखें कि क्या कुछ होता है महाराष्ट्र की या देश की राजनीति में।


आसन्न मानसून की मानसिक हलचल


गांव, जहाँ जीवन अब भी (कमोबेश) कृषि आर्धारित है; मौसम बहुत मायने रखता है। आज भी यहां मौसम के एप्प के हिसाब से नहीं, नक्षत्र के हिसाब से मृगशिरा या देशज भाषा में ‘मिरघिसिरा’ तपता है। ग्रामीण जीवन में चांद्र मास, नक्षत्र, राशि, तारे (सुकुआ, सप्तर्षि, ध्रुव आदि) अपनी पैठ अभी भी बनाये हैं। यूट्यूब और ह्वाट्सएप्प के युग में भी! घाघ और भड्डरी की कहावतें कोट करने वाले अभी भी हैं – उनकी संख्या भले कुछ कम हुई हो। वैसे तो लगता है कि क्लाइमेट चेंज के युग में उनकी लोकोक्तियों का नया रूप भी बनना चाहिये।


जून 15 2022 –

इस साल तपन कुछ ज्यादा ही चली है। अभी तापक्रम 44-45 डिग्री सेल्सियस बना हुआ है। आद्रता भी है। उसके कारण 44 डिग्री का प्रभाव 49 डिग्री होता है। ऐसे में भी कल पुन्नवासी (पूर्णिमा) को अगियाबीर के दो मित्र – गुन्नीलाल और प्रेमनारायण जी – सवेरे विंध्यवासिनी देवी के दर्शन के लिये निकले थे। एक कप चाय मेरे यहां पीते हुये गये। इतनी तपन में भी, जब पूरा वायुमण्डल झऊंस रहा है, लोग मातृशक्ति के प्रतिश्रद्धा रखते हुये अस्सी किलोमीटर मोटर साइकिल चलाते पंहुचते हैं। गजब श्रद्धा, गजब लोग। विंध्यवासिनी माँ से शायद बारिश की मांग करने गये होंगे। मां जब बारिश भेज देंगी तो खेती बहेतू जानवरों और घणरोजों से बचाने के लिये फिर एक चक्कर लगायेंगे माता के दरबार मेंं। मौसम, उद्यम, श्रद्धा और भग्वत्कृपा – सब साथ साथ चलते हैं यूपोरियन गांव में!

अभी तापक्रम 44-45 डिग्री सेल्सियस बना हुआ है। आद्रता भी है। उसके कारण 44 डिग्री का प्रभाव 49 डिग्री होता है। ऐसे में भी कल पुन्नवासी को अगियाबीर के दो मित्र – गुन्नीलाल और प्रेमनारायण जी – सवेरे विंध्यवासिनी देवी के दर्शन के लिये निकले थे। एक कप चाय मेरे यहां पीते हुये गये।

गुन्नीलाल जी ने लौट कर बताया कि वहां विंध्याचल में बहुत भीड़ थी। विंध्यवासिनी कॉरीडोर का काम चल रहा है तो बहुत अव्यवस्था भी थी। वहां उन्होने कुछ भोजन-जलपान नहीं किया। पण्डा जी ने अपने फ्रिज से एक बोतल पानी पिलाया। कलेवा बंधाई बीस रुपया दिया उन्हें। दर्शन किये जैसे तैसे और लौट पड़े। वापसी में टेढ़वा पर पेड़ा खाये सौ सौ ग्राम। हनुमान जी के मंदिर में कथा चल रही थी, वह दस मिनट सुनी। घर आ गये। बकौल गुन्नी पांड़े; लोग दूर दूर से कष्ट सह कर त्रिवेणी स्नान करने, विंध्यवासिनी और बाबा विश्वनाथ का दर्शन करने आते हैं। वे लोग तो तीन घण्टे और सौ ग्राम टेढ़वा के पेड़ा खा कर दर्शन कर लिये। …. यह श्रद्धा होती है। पैंतालीस डिग्री के तापक्रम पर भी चैतन्य श्रद्धा!

इस श्रद्धा का पांच परसेंट भी मुझमें आ जाये!


जून 18 2022 –

मृगशिरा नक्षत्र लगा हुआ है। बाईस जून तक है पंचांग के हिसाब से। उसके बाद तेईस जून से आर्द्रा। तेईस के पहले ही एक दो शॉवर गिरने चाहियें। कब तक भूंजेंगे भगवान भास्कर। वे जो भांति भंति के भयंकर नरक बताये हैं हमारे पुराणोंं में – जिनमें शरीर को ग्रिल किया जाता है या जलते तेल में डाला जाता है – वे भयंकर नरक वैसे ही होते होंगे जैसा इस समय शरीर-मन-प्राण सह रहे हैं। रोज सुबह दोपहर शाम मोबाइल पर वेदर चैनल एप्प खोल कर देखा जा रहा है कि तापक्रम कुछ कम बता रहा है और/या बारिश के दो चार छींटों की भविष्यवाणी बन रही है या नहीं। अभी तक तो मायूसी ही हाथ लगी है।

एक परिवार जन लपेटा पाइप लगा रहा है बेहन की सिंचाई के लिये। उसके दिन तो बेहन और लपेटा पाइप में लिपटे हैं। उसके लिये यही विन्ध्यवासिनी हैं और यही टेढ़वा का पेड़ा!

मैं तो वेदर चैनल और तापक्रम के चक्कर में पड़ा हूंं, पर किसान अपने काम पर लग गया है। उसको कोई पगार या पेंशन तो मिलती नहीं। उसे तो खरीफ की फसल की तैयारी करनी ही है। मेरे घर के बगल में मेजर साहब का अधियरा धान के बेहन के लिये नर्सरी बना चुका है। उसके परिवार का एक नौजवान लपेटा पाइप लगा रहा है बेहन की सिंचाई के लिये। उसके दिन तो बेहन और लपेटा पाइप में लिपटे हैं। उसके लिये यही विन्ध्यवासिनी हैं और यही टेढ़वा का पेड़ा!

वह नौजवान लपेटा पाइप खोलते हुये मुझे सलाह देता है कि मैं भी एक ट्यूब-वेल बिठा दूं। बैठे बैठे पानी बेंच कर कमाऊं। उसके खेत तक नाली बनवा दूं, जिससे उसे भी आराम हो। लपेटा पाइप खोलने, लगाने का झंझट भी न हो।

धान की नर्सरी बनाने का उपक्रम।

“एक ट्यूब-वेल कितने में लगता है?” मेरे यह पूछ्ने पर वह ब्लैंक लुक देता है। उसे रुपया कौड़ी का हिसाब नहीं मालुम। जैसे मुझे भी धान के बेहन का खेत-पानी का हिसाब नहीं मालुम। हम सभी का दूसरे के काम का आकलन नहीं आता। पर हम सभी अपनी अज्ञानता में विशेषज्ञ बने घूम रहे हैं। वह तो फिर भी खाने भर को धान उपजा लेगा; मैं तो सिवाय ब्लॉग पोस्ट लेखन के और कुछ नहीं कर सकता!

खड़ंजा बनना प्रकृति से संस्कृति की ओर कदम है। और जब उस खडंजे के बीच, ईंटों के सांसर में, घास उगने लगती है तो संस्कृति का पुन: प्रकृति करण होने लगता है। संस्कृति और प्रकृति के बीच का सामंजस्य, माधुर्य ही गांव का प्लस प्वॉइण्ट है।


जून 23 22 –

मुझे गांव में रहते छ साल हो गये। अब कुछ दिन बाद आने वाला मानसून यहां का सातवां होगा। पहले मानसून में अनजाने मौसम और क्रियाकलाप की सनसनी भी थी और हम उसके लिये तैयार भी नहीं थे। हमेशा यह आशंका रहती थी कि कब कोई सांप घर में घुस कर किसी कोने में बैठा मिलेगा। घर के बाहर चलने के लिये रास्ते भी नहीं थे। पैर कीचड़ में सन जाते थे। वह साल अनुभव और कठिनाई का समांग मिश्रण रहा। उत्तरोत्तर हम मौसम परिवर्तन के अभ्यस्त होते गये। अब भी मानसून आने पर जीवन अस्तव्यस्त होता है, पर उसमें आश्चर्य के तत्व कम ही होते हैं। और जब आश्चर्य नहीं होता तो एक स्तर पर उसकी पूर्व तैयारी भी हो जाती है।

आश्चर्य और पूर्व तैयारी? कुछ ज्यादा तैयारी सम्भव ही नहीं है। यह गांव है, अरण्य तो नहीं पर अरण्य के तत्व तो हैं ही। मेढ़क आ गये मौसम की पहली बरसात के बाद। और बारिश भी क्या झमाझम थी। रात इग्यारह बजे हम शयन कक्ष से निकल कर अपने पोर्टिको में बैठे। पानी की फुहार कभी दक्षिण से उत्तर को थी और कभी उत्तर से दक्षिण को। छ्त के नीचे रह कर भी पूरा भीग गये हम। फिर ठण्ड कम करने को एक एक ग्लास दूध और स्नेक्स का सहारा लिया। रात बारह बजे पानी और हवा की आवाज के बीच झूमते पेड़ों को निहारना और बीच बीच में मेढ़क की आवाज सुनना एक अनूठा ही अनुभव है।

मेढ़क निकले तो सांप कहां पीछे रहेंगे? अगले दिन एक असाढ़िया सांप मेरे पैर के पीछे से निकल गया। सरसराता। मैंने तो देखा तब जब मित्र गुन्नीलाल पांड़े जी ने मुझे आगाह किया। बड़ा था। दो मीटर का। मोटा भी। अंदाज न हो तो उसकी कद काठी देख कर आदमी भय से जड़वत हो जाये। … ऐसे अनुभव शहर में नहीं ही मिलते। मुझे रेल के जीवन में कम ही मिले ऐसे अनुभव। उस हिसाब से नौकरी के चालीस साल पर पोस्ट रिटायरमेण्ट के छ साल भारी हैं।

जून 26 2022 –

निरुद्देष्य साइकिल चलाना अच्छा लगता है जब गर्मी और उमस के बाद बारिश के पहले की ठण्डक भरी सुबह हो। कल मैं गया एक दूसरे गांव की ओर। बसंतापुर को एक खड़ंजा जाता है। उसपर कुछ दूर बाद कच्ची सड़क है – या पगडण्डी। देखा उसपर म-नरेगा का काम चल रहा है। राधेश्याम पाल काम करा रहे थे। कुल छबीस लोग काम पर थे। सड़कों का बनना प्रगति है। खड़ंजा बनना प्रकृति से संस्कृति की ओर कदम है। और जब उस खडंजे के बीच, ईंटों के सांसर में, घास उगने लगती है तो संस्कृति का पुन: प्रकृति करण होने लगता है। संस्कृति और प्रकृति के बीच का सामंजस्य, माधुर्य ही गांव का प्लस प्वॉइण्ट है। अन्यथा नये जमाने की विकृतियां तो घेर-दबोच ही रही हैं।

बसंतापुर को एक खड़ंजा जाता है। उसपर कुछ दूर बाद कच्ची सड़क है – या पगडण्डी। देखा उसपर म-नरेगा का काम चल रहा है। राधेश्याम पाल काम करा रहे थे। कुल छबीस लोग काम पर थे।

बारिश में बसंतापुर जाने का रास्ता पुख्ता हो जायेगा! चौमासा कहता है हम अपने घर में दुबके रहें। म-नरेगा की सड़क जोड़ने की जद्दोजहद में लगी है। यह कशमकश ही जीवन है। मानसिक हलचल उसी उद्वेलन का दस्तावेजीकरण होना चाहिये। नहीं?


Create your own website, free on WordPress.com.Create your own website.
Start free