भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
शिव भक्त प्रेमसागर की यात्रा इस समय वैष्णवों के बीच और वैष्णवों के पूरे आदर से सराबोर हो रही है। आज सवेरे वे लोयेज के स्वामीनारायण नीलकण्ठ वर्णी स्वामी के मंदिर में थे। स्वामीनारायण की शिक्षापत्री में भगवान स्वामीनारायण के सूत्र दिये हैं जिनके अनुसार सामान्य व्यक्ति को, आचार्यों को, राजा और गृहस्थ को, शादी शुदा और विधवाओं को और ब्रह्मचारी/साधू को पालन करना होता है। वे सभी जीवन के ‘करने और न करने के नियम’ हैं। वे नियम वैष्णव परम्परा के अनुसार ही लगते हैं। कहीं कहीं वे सरल और सामान्य लगते हैं और कहीं लगता है कि उनका पालन करना कठिन होगा। वे माध्वाचार्य के द्वैत दर्शन के समीप लगते हैं। बाकी, उन सूत्रों का चूंकि मैंने सरसरी निगाह से ही अवलोकन किया है; मैं शिक्षापत्री पर कोई निश्चयात्मक टिप्पणी नहीं कर सकता।
यह जरूर है कि अभी पिछले कई वर्षों से अपने जीवन को जिस तरल तरीके से जीता रहा हूं, उसे आगे अगर मुझे शिक्षापत्री के नियमों से बांधना हो तो कठिन होगा। वैसे उन नियमों का सत्तर अस्सी प्रतिशत पालन तो मैं करना ही होऊंगा। प्रेमसागर शायद उससे ज्यादा करते होंगे – यद्यपि वे शैव हैं।
पूर्णत: नैतिक नियमों से बंध कर चलने में एक झंझट है। नियमपालन में उहापोह की स्थिति तो आती है। उस समय क्या किया जाये? तब नैतिक नियमों के मूल – धर्म या उसे जो भी नाम दें – पर जाने और अपने कार्य निर्णय की जरूरत महसूस होती है। वे धर्म सूत्र कहां हैं? स्वामीनारायण भगवान ने अपने प्रवचन दिये हैं जो उनके वचनामृत में संकलित हैं। उनमें शायद समाधान हो। … मैं जितना इस सब के बारे में सोचता हूं, उतना यात्रा विवरण लिखने से दूर होता हूं। धर्म-नैतिक-व्यवहार के बारे में लिखने की एक सीमा तो बनानी होगी। इसलिए यात्रा पक्ष पर लौटा जाये।
नीलकण्ठ वर्णी
सवेरे प्रेमसागर उठ कर बलदेव राजगुरु जी के साथ नीलकण्ठ वर्णी आश्रम का भ्रमण कर लिये। उन्होने उस कुंये का भी दर्शन किया जहां नीलकण्ठ वर्णी आये थे और जल ग्रहण किया था। कथा यह है कि उस कुयें पर महिलायें ही पानी भरती थीं और उन्होने नीलकण्ठ वर्णी को कहीं और जाने को कहा। उन्होने अपना गागर और रस्सी भी उन्हें नहीं दिया कुंये से पानी भरने के लिये। पर चमत्कार हुआ कि कुंये का पानी अपने आप ऊपर आ गया किशोर स्वामी की प्यास बुझाने के लिये। उससे गांव वालों को किशोर साधू की विलक्षणता का आभास हुआ। वहां वे गुरू रामानंद के शिष्यों के माध्यम से उनके सम्पर्क में आये और कालांतर में रामानंद जी ने उन्हें सहजानंद के रूप में दीक्षा दी। उन्हें अपने उद्धव सम्प्रदाय का उत्तराधिकारी भी बनाया। समय बीता और यह सम्प्रदाय कई शाखाओं में बंटा – अभी तीन शाखायें मुख्यत: नजर आती हैं। नीलकण्ठ वर्णी के इस लोयेज स्थित मठ को तीनो शाखायें श्रद्धा से देखती हैं।
उस कुंये की फोटोग्राफी पर प्रतिबंध के कारण प्रेमसागर वहां के चित्र नहीं ले पाये, पर उसे देखा इत्मीनान से।
प्रेमसागार को मठ के प्रमुख स्वामी जी का भी आशीर्वाद मिला। उन्होने नीलकण्ठ वर्णी की प्रतिमा पर जल भी चढ़ाया। एक चित्र में बलदेव राजगुरु जी भी जल चढ़ाते नजर आते हैं। मैंने प्रेमसागर से पूछा कि जल कौन सा चढ़ाया था – अपने कमण्डल का या नीलकण्ठ वर्णी परिसर का। उन्होने बताया कि वहीं का था। शायद उस पवित्र कूप का हो, जिसकी कथा नीलकण्ठ वर्णी के साथ जुड़ी है।
नीलकण्ठ आश्रम के चित्र। प्रेमसागर ने प्रतिमा को जल चढ़ाया और स्वामी जी का आशीर्वाद पाया। चित्र में बलदेव राजगुरु जी भी जल चढ़ा रहे हैं।
प्रेमसागर मठ के दर्शन के बाद माधवपुर के लिये रवाना हुये। कुछ ही किलोमीटर आगे उन्हें पंकज भाई अपने घर ले गये और उनका आतिथ्य सत्कार किया। दिलीप थानकी जी से बात करते हुये पता चला कि मार्ग में बहुत से लोगों को उन्होने प्रेमसागर के बारे में सूचना दे रखी है। इस पूरे समुद्र तटीय क्षेत्र में लोग सरल हैं, धर्म में श्रद्धा रखते हैं और उनमें धोखा देने की वृत्ति नहीं है। लोग शाकाहारी हैं और शराब का सेवन नहीं करते। बकौल दिलीप जी, लोगों में धूर्तता नहीं, भोलापन है और परनिंदा में समय व्यतीत नहीं करते। आतिथ्य की भावना उनमें सहज है।
कुछ ही किलोमीटर आगे उन्हें पंकज भाई अपने घर ले गये और उनका आतिथ्य सत्कार किया।
शाम के समय प्रेमसागर माधवपुर में थे। वहां जनक भाई से उनकी मुलाकात हुई। जनक भाई ने आग्रह किया कि प्रेमसागर वहां एक दिन और रुक जायें। इसी भाव के तो भूखे थे प्रेमसागर। वे रुक गये हैं। कल वे माधवपुर में रहेंगे। आसपास के स्थलों का दर्शन करेंगे। यहां समुद्र तट है, ओशो का मूल आश्रम है और कृष्ण के विवाह से सम्बंधित स्थल/कथायें भी हैं।
लगता है प्रेमसागर को आतिथ्य मिलता रहेगा नागेश्वर/द्वारका तीर्थ तक और प्रेमसागर की यात्रा जो सप्ताह-दस दिन में हो सकती थी, उसमें दुगना समय लगेगा। महादेव ने सोमनाथ की खूब भरपाई का इंतजाम कर दिया है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी (गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
जब शुरू किया था तो अपेक्षा नहीं थी कि इतनी पोस्टें हो जायेंगी इस कांवरिया पर। लेकिन अभी तक न प्रेमसागर आउट हुये हैं न मैं। फर्क इतना पड़ा है कि मेरे आसपास इतना कुछ है जिसपर मानसिक हलचल होती है। अब उत्तर प्रदेश चुनाव का हल्ला शुरू हो रहा है। गांव की राजनीति अलग है। गौ गंगा गौरीशंकर पर दो तीन अधलिखी पोस्टें ड्राफ्ट में पड़ी हैं। पर सारा लेखन समय प्रेमसागर के खाते जा रहा है। यह भी नहीं है कि प्रेमसागर विषय की विविधता दे रहे हों। वे अपनी ओर से पूरी कोशिश करते हैं; पर यात्रा में देखने के नजरिये में वैविध्य लाना सरल काम नहीं है।
मैं इंतजार करता हूं कि प्रेमसागर उदासीनता दिखायें बताने में तो मैं लेखन की आवृति कम करूं। लेकिन वह होता नहीं। सोमनाथ के आसपास दर्शन की साठ फोटो मेरे पास भेज दी हैं। उनमें रिपिटीशन भी है। उन चित्रों में उपयुक्त का चयन करना, उन्हें क्रॉप और एडिट करना और उनपर प्रेमसागर का वाटरमार्क चस्पां करना भी समय खाता है। मैं कोशिश करता हूं कि बिना चित्रों के काम चलाया जाये, पर उससे मेरा लेखन बढ़ता है। दूसरे मेरी भाषा में लालिल्य की तंगी तो है ही। चित्र और लेखन की जुगलबंदी का अनुपात बदलना भी कठिन है। मैं पॉडकास्टिंग का सहारा ले सकता था, पर प्रेमसागर की अटक कर धीरे बोलने की आदत श्रोता को बांध नहीं सकती।
रास्ते का एक दृश्य। दोनो ओर समुद्र तटीय वृक्ष दिख रहे हैं।
अब मुझे आसपास लोग मिलते हैं – कई ऐसे लोग भी जिन्हें मैं सोच नहीं सकता कि वे प्रेमसागर के बारे में जानते होंगे। पर वे भी मुझसे प्रेमसागर के बारे में पूछते हैं। एक गांव के व्यक्ति ने जब पूछा कि “इंही मोबईलिया पर ही लिखथ्यअ का प्रेमसंकर (नाम गलत बोले) के बारे में (इसी मोबाइल पर ही लिखते हैं क्या प्रेमसंकर के बारे में)?” तो मुझे आश्चर्य हुआ। प्रेमसागर को लोग जानने लगे हैं और उनके साथ मुझे जोड़ कर देखने लगे हैं। यहां गांवदेहात में भी मिलने लगे हैं ऐसे लोग। … प्रेमसागर फेमस हो जायेंगे। आजकल कोने अंतरे के लोगों को खोज खोज कर प्रधानमंत्री पद्मश्री बना रहे हैं। प्रेमसागर पद्म पुरस्कार पा जायेंगे और तुम लिखते ही रह जाओगे जीडी! :lol:
खैर; आज के ट्रेवल-ब्लॉग पर आया जाये। प्रेमसागर सवेरे चार उठते ही टेम्पो पकड़ कर सोमनाथ से गड़ू आ गये। एक ही दिन रुके सोमनाथ में।
लगता है सोमनाथ में किसी स्थानीय ने प्रेमसागर को कोई भाव दिया नहीं। कांवर देख कर भी किसी ने कुछ पूछा तक नहीं। सोमनाथ के ट्रस्टी साहेब, जिन्होने प्रेमसागर के लिये रेस्ट हाउस करवा दिया था, वे भी शायद सोमनाथ में नहीं थे। उनसे प्रेम सागर की फोन पर ही बात हुई। प्रेमसागर बेचारे वेरावल से सोमनाथ के बीच ठीक से रास्ता न जानने के कारण अंधेरे और जंगल में भटभटाये भी। एक कांवर पदयात्री पंद्रह-बीस किलो वजन लिये ढाई हजार किलोमीटर चल कर अमरकण्टक से जल उठाये चला आ रहा हो और गंतव्य पर पंहुचने पर कोई देख कर प्रतिक्रिया भी न दे, यह अजीब लगता है। पर यही था।
शंकर भगवान के तौर तरीके भी अजीब हैं। किसी किसी जगह – शहरों और गांवों में – प्रेमसागर को 25-50 लोग साथ साथ लेने और छोड़ने आये और यहां सोमनाथ में जो बाबा की खास नगरी है; वहां कठिन तप कर पंहुचे शिव भगत को कोई लोकल बोलने बतियाने या एक जून चाय – खाना पूछने वाला भी नहीं था। वह तो भला हो दिलीप थानकी जी का जो पोरबंदर से प्रेमसागर के लिये आये और उनको आसपास के दर्शनीय स्थान दिखाये, भोजन आदि कराया; वर्ना सोमनाथ वालों ने तो घोर उपेक्षा ही की।… बाबा महादेव; मैं तो आपके यहां (सोमनाथ में) जाने के पहले खूब सोचूंगा, तभी तय करूंगा; अगर कभी जाने की बात भी हुई तो। या फिर जाऊंगा तो बढ़िया सी कार में एक लाख रुपया जेब में रख कर ही। तभी आपके वहां लोग नोटिस करेंगे।
प्रेमसागर को तनिक भी खराब नहीं लगा। उन्होने मुझे सोमनाथ के अनुभव के बारे में खुद कुछ कहा भी नहीं। पर मुझे अच्छा नहीं लगा। लिखना मेरे हाथ है सो मैंने लिख दिया। प्रेमसागर ऐसा खुद कभी कहते या लिखते ही नहीं।
मेरी पत्नीजी तो मेरी यह बात सुन कर और भी भुनभुना रही हैं। उन्होने कहा – “मंदिरों के आसपास के लोग; ये पण्डे-पुजारी भक्त नहीं हैं; भगवान की सेल्फ अप्वाइण्टेड दलाली करते हैं। जहां दलाली है वहां भ्रष्टाचार है, वहां भक्ति नहीं और भक्त की कद्र भी नहीं है। यह केवल सोमनाथ का ही हाल नहीं है। सभी मंदिरों में इन्ही दलालों की भरमार है – चाहे काशी हो, विंध्याचल हो या ॐकारेश्वर हो। वहां भक्त का हितैषी कोई भक्त ही मिले तो मिले; ये लोग तो नहीं ही होंगे। हिंदू धर्म की सहिष्णुता, करुणा और आतिथ्य भाव की अपने लालच के कारण बेइज्जती करते हैं ये लोग।”
गड़ू में प्रेमसागर ने कुछ देर आराम किया। सवेरे मैंने छ बजे उनसे बात की तो उन्हें जम्हाई आ रही थी। नींद शायद ठीक से पूरी नहीं की थी। दिन में गड़ू से लोयेज तक 30-32 किमी की पदयात्रा उन्हें करनी थी। मैं प्रेमसागर की संकल्प शक्ति की दाद दूंगा। तीन घण्टे बाद जब मैंने पता किया तो वे नौ किलोमीटर पदयात्रा कर चुके थे। दिन में उनसे कोई आगे बात नहीं हुई। शाम सवा सात बजे पूछा तो वे लोयेज के स्वामीनारायण मंदिर में थे। साढ़े छ बजे शाम को पंहुच गये थे। एक चित्र उनका सूर्यास्त का है जो लोयेज से तीन-चार किलोमीटर पहले का होगा।
एक चित्र उनका सूर्यास्त का है जो लोयेज से चार किलोमीटर पहले का होगा।
जब मैंने प्रेमसागर से बात की तो लोयेज के आश्रम में वहां के बलदेव भाई राजगुरु जी प्रेमसागर से मिलने आये थे। राजगुरु जी कांवर भक्त की कठिन तपस्या से प्रभावित थे। प्रेमसागर ने बताया कि वे – स्वामी बलदेव भाई राजगुरु जी – उनसे मिलने के लिये एक-डेढ़ किलोमीटर पहले सड़क पर ही खड़े थे।
बलदेव भाई राजगुरु जी से मेरी भी बात हुई। वे सरल और पवित्रात्मा लगे – कोई ईश्वर के “बिचौलिये” नहीं।भगवान ने दो ही दिन में दो छोरों के अनुभव कराये प्रेमसागर को। प्रेमसागर ने दोनो को सम भाव से लिया होगा; मैं उतना श्रद्धावान नहीं हूं; मैं सम भाव से नहीं ले पा रहा। यह भी विचित्र अनुभव रहा – सोमनाथ के बाद लोयेज! मुझे लगा कि महादेव कह रहे हों – “तुमने जल अर्पण किया वह अच्छा किया। मैं उसे एकनॉलेज करता हूं। मैं तुम्हें लोयेज में मिलूंगा! अभी यहां इन लोगों के बीच फंसा हूं।”
नीलकण्ठ वर्णी। स्वामीनारायण की किशोरावस्था, जिसमें वे लोयेज आये थे। यह एक पोस्टर का थम्बनेल व्यू है।
नीलकण्ठ वर्णी स्वामीनारायण के बारे में जानने की इच्छा मुझमें जगी है बलदेव राजगुरु जी से फोन पर बातचीत कर। वर्ना सोमनाथ में प्रेमसागर की उपेक्षा के कारण आस्था पर ठेस ताजा थी।
स्वामीनारायण भगवान आज से 230 साल पहले घूमते घामते छपिया से यहां पंहुचे थे। किशोर वय के ही रहे होंगे। गुरु रामानंद के सम्पर्क में आये। गुरु ने विलक्षण शिष्य को पहचाना और उन्हें दीक्षा दी। वे नीलकण्ठ वर्णी से स्वामी सहजानंद बने और कालांतर में वे स्वयम ईश्वरीय हो गये। स्वामीनारायण भगवान।
यूं, बचपन में उनका नाम घनश्याम पाण्डे था। मेरे पूर्वज भी उसी स्थान के आसपास से थे, जहां से स्वामीनारायण सम्प्रदाय के प्रवर्तक स्वामीजी थे। अपने नाम में भी पाण्डे होने पर मुझे गर्व हो रहा है। अभी जितनी बाकी जिंदगी है, उसमें शायद मुझपर भी कोई कृपा हो और सरलता-भक्ति और ईश्वर के प्रति उत्तरोत्तर श्रद्धा में विकास हो। शायद मुझे भी कोई मार्गदर्शक मिलें। … पर वह साधक की तीव्र अभीप्सा और ईश्वर की कृपा बिना नहीं ही होता; ऐसा मुझे बताया गया है।
चोरवड में धीरूभाई अम्बानी मेमोरियल घर। चित्र दिलीप थानकी जी द्वारा।
प्रेमसागर से उनकी यात्रा के दौरान बात नहीं हुई। पर उनसे दिलीप थानकी जी का फोन नम्बर मिला और उनसे सम्पर्क हुआ। थानकी जी ने बताया कि प्रेमसागर चोरवड़ से हो कर गुजरे। चोरवड़ धीरूभाई अम्बानी का जन्मस्थान है। वे रास्ते भर अरबसागर के साथ चलेंगे। तीस-बत्तीस किलोमीटर पर लोयेज में स्वामीनरायण मंदिर में उनके रुकने का इंतजाम है। वहां स्वामीनारायण सम्प्रदाय के संस्थापक स्वामी जी किशोरावस्था में घूमते घामते नीलकण्ठ वर्णी के रूप में यहां आये थे। इस स्थान का स्वामीनारायण सम्प्रदाय में बहुत महत्व है। अत्यंत पवित्र स्थल है यह।
रास्ते में मंगरोल पड़ता है। यह गुजरात के राजाओं में से एक की स्टेट थी। सन 1949 में इसका भारत में विलय हुआ और यह सौराष्ट्र का अंग बना। विलय एक रेफरेण्डम के उपरांत हुआ जिसमें नागरिकों ने पाकिस्तान की बजाय भारत में रहने पर मुहर लगाई थी। यह गुजरात के जूनागढ़ जिले में है।
मंगलोल नगर पालिका का प्रवेश द्वार
दिलीप जी ने बताया कि आगे की पूरी यात्रा के दौरान स्थानों की, उनके भौगोलिक और एतिहासिक महत्व आदि के बारे में पूरी जानकारी दे सकेंगे। यह पूरा इलाका उनका देखा जाना है और प्रेमसागर की यात्रा के प्रबंध से उन्हें सहज प्रसन्नता है – “अब हम तो खुद इस प्रकार की यात्रा कर नहीं सकते। इसलिये जो अवसर मिला है, उसमें अपना जो भी योगदान हो सके वह करने में ही पुण्य है।”
दिलीप थानकी
स्वामीनारायण मंदिर के राजगुरु जी कह रहे थे कि जो वे कर रहे हैं वह ईश्वर का काम है; वे तो निमित्त मात्र हैं। दिलीप जी भी लगभग वही भाव व्यक्त कर रहे थे – निमित्त वाला! गीता में भी केशव कहते हैं – निमित्त मात्रम भव सव्यसाचिन!
काश; सोमनाथ के बंधु भी निमित्त बनते। पर क्या पता, वे अपनी तरह से निमित्त बने हों; मेरा देखना ही वक्र हो! क्या पता!
स्वामीनारायण आश्रम में कक्ष की दीवार जहां प्रेमसागर को ठहराया गया।
कल वैसे प्रेमसागर को ज्यादा नहीं चलना है। उन्हें लोयेज से माधवपुर तक ही जाना है। माधवपुर लोयेज से 16 किमी आगे है। वे अगर कल सवेरे देर से भी रवाना होते हैं तो शाम से पहले माधवपुर पंहुच जायेंगे। प्रेमसागर ने बताया कि वे सवेरे आश्रम में घूमेंगे और वे स्थल देखेंगे जहां नीलकण्ठ वर्णी के रूप में भगवान स्वामीनारायण के कुछ स्मृति-चिन्ह हैं।
अपडेट 13 दिसम्बर सवेरे –
प्रेमसागर ने स्वामीनारायण परिसर का भ्रमण किया। आश्रम के प्रमुख स्वामी जी का आशीर्वाद भी पाया और नीलकण्ठ वर्णी भगवान को जल भी चढ़ाया। उस सब के चित्र भेजे हैं। बलदेव राजगुरु जी भी उन चित्रों में हैं।उसके बाद आगे की यात्रा के लिये रवाना हुये प्रेमसागर। सवेरे का अनुभव विवरण आगे की पोस्ट में होगा।
स्वामीनारायण भगवान की जय! ॐ नम: शिवाय। हर हर महादेव!
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी (गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
कल सवेरे सवेरे देवी अहिल्याबाई निर्मित सोमनाथ मंदिर में जल चढ़ा आये प्रेमसागर। उसके बारे में पिछली पोस्ट में लिखा जा चुका है। बाद में प्रेमसागर ने बताया कि नये मंदिर में जल चढ़ाने की प्रथा नहीं है। वे पुराने मंदिर में अकेले रेस्ट हाउस से निकल कर गये और थोड़ी ही देर में जल अर्पण कर लौट आये।
नया मंदिर मई 1951 को स्थापित हुआ था। पुराना मंदिर देवी अहिल्याबाई होल्कर ने इस्वी सन 1783 में बनवाया था – जैसा मंदिर के बाहर लिखे पट्ट में है। इसका स्थान और परिकल्पना देवी अहिल्याबाई के स्वप्न में आयी थी और बिना समय गंवाये उन्होने मंदिर का निर्माण प्रारम्भ कराया था। बहुत से श्रद्धालु यह मानते हैं कि मंदिर में स्थापित शिवलिंग ही मूल सोमनाथ शिवलिंग है। यहां आसानी से स्थानीय पुजारी की सहायता से लोग पूजा अर्चना कर सकते हैं। और हर किसी को गर्भगृह में जाने की निर्बाध अनुमति है; जो नये मंदिर में नहीं है।
शिव कहां रहते होंगे? वे तो सब जगह हैं। पर अगर मेरी व्यक्तिगत राय मांगी जाये तो मैं यह कहूंगा कि सोमनाथ का गौरव, शान तो नये मंदिर में है; पर सोमनाथ का हृदय देवी अहिल्याबाई के मंदिर में है।
पुराना मंदिर देवी अहिल्याबाई होल्कर ने इस्वी सन 1783 में बनवाया था – जैसा मंदिर के बाहर लिखे पट्ट में है।
कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जी सन 1922 में सोमनाथ मंदिर की अपनी यात्रा के बाद लिखते हैं –
मुंशी जी की पुस्तक Somanatha the Shrine Eternal का परिशिष्ट अंश
पता नहीं वे किस अंश की बात कर रहे हैं। सम्भवत: सोमनाथ मंदिर के टूटे प्रस्तर खण्डों की या देवी अहिल्याबाई के मंदिर की। अगर वे देवी अहिल्याबाई के मंदिर पर कह रहे हैं तो उससे निम्न बातें मुझे स्पष्ट होती हैं –
देवी अहिल्याबाई तो दिव्य महिला थीं। उनके नाम से वाराणसी, उज्जैन और सोमनाथ के ज्योतिर्लिंगों के पुनरुद्धार का वर्णन मिलता है। उन्हें तो हिंदू जागरण का मुकुट मानना चाहिये।
उनके पहले और बाद के हिंदू मानस, सेठ और राजे रजवाड़े घोर चिरकुट (सॉरी, इससे बेहतर शब्द मुझे नहीं मिला) थे जो 1783 के 140 साल बाद (जब मुंशी जी ने लिखा) तक इस मंदिर की सामान्य देखरेख भी नहीं कर सके। सोमनाथ हिंदू धर्म का गौरव प्रतीक है। उसका सामान्य रखरखाव भी नहीं हुआ होगा सन 1922 में। अन्यथा मुंशी जी उसपर संतोष तो व्यक्त करते।
यही हाल काशी के मंदिरों का है जहां लोग मंदिर को घर में हड़प गये थे और अब भी काशी विश्वनाथ कॉरीडोर के इतर मंदिरों में उनके पट्ट के ऊपर साड़ी बेचने वालों के बोर्ड देखता हूं। मंदिर परिसरों में साड़ी बेचक नजर आते हैं विश्वनाथ गली में।
काशी में काशीराज काली मंदिर और 1008 गौतमेश्वर महादेव मंदिर जहां दुकाने लगी हैं और साड़ियाँ टंगी हैं। चीनी और इतालियन भोजन मिल रहा है।
पर इस 1783 के मंदिर का भी कुछ कायाकल्प हुआ है – ऐसा पत्रिका के एक न्यूज आइटम में है। अठाईस मार्च 21 की अहमदाबाद डेटलाइन की इस खबर के अनुसार सोमनाथ ट्रस्ट इसका लोकार्पण प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा करवाना चाहता है। पता नहीं वह हुआ या नहीं; पर वहां देवी अहिल्याबाई की प्रतिमा लग गयी है – ऐसा प्रेमसागर के भेजे चित्र से स्पष्ट है। प्रेमसागर के चित्रों में यह जूना मंदिर छोटा है, पर इस समय अच्छी दशा में दिखता है। उसके आगे कुछ दुपहिया वाहन खड़े हैं। कोई तामझाम नहीं है। मेरे आसपास के कई शिवालय ऐसे ही हैं। शिवजी के पास उनमें निर्बाध जाया जा सकता है। वहां लालची पण्डा-पुजारीगण भी नहीं घेरते। महादेव सब जगह हैं। कंकर में शंकर हैं। पर मेरे लिये महादेव 1783 वाले इस मंदिर में ही होंगे – वहां उनसे आसानी से अप्वाइण्टमेण्ट जो मिल सकता है। :-)
सोमनाथ के 1951 वाले नये मंदिर के सामने प्रेमसागर
प्रेमसागर जी अकेले रेस्ट हाउस में रहे। भोजन बाहर किसी भोजनालय में किया। दिन में पोरबंदर से दिलीप थानकी जी पोरबंदर से उनसे मिलने आये। साथ में उनके जीजा जी थे। एक चित्र में उनका भांजा भी दिखाई पड़ता है।
हिरन-कपिला-सरस्वती का त्रिवेणी संगम
दिलीप जी ने सोमनाथ से नागेश्वर ज्योतिर्लिंग तीर्थ, दारुकवन की यात्रा का रोड-मैप भी प्रेमसागर को दिया है। दिन में उन्हें साथ सोमनाथ के आसपास के दर्शनीय स्थल – परशुराम जी की तपस्थली, कृष्ण का देहत्याग स्थल, हिरन-कपिला-सरस्वती का त्रिवेणी संगम दिखाये भी। भोजन आदि भी दिलीप जी ने कराया। यह लगता है कि महादेव ने आगे की नागेश्वर तीर्थ यात्रा के लिये प्रेमसागर को दिलीप जी को सुपुर्द कर दिया है। आगे के ट्रेवल-ब्लॉग का बारह आना भर इनपुट लगता है दिलीप जी देंगें। प्रेमसागर के जिम्मे केवल चलना और चित्र खींचना रहेगा! :lol:
दिलीप थानकी, प्रेमसागर और दिलीप जी के बहनोई साहेब (भूरी जैकेट में)
प्रेमसागर से फोन नम्बर ले कर मैंने दिलीप जी से बात की। वे दफ्तर निकलने की जल्दी में थे। उन्होने बताया कि उन्हें प्रेमसागर के बारे में अपने मित्र अजित प्रताप सिंह जी से पता चला। अजित लखनऊ में हैं और बस्ती/बहराइच से हैं। पता नहीं अजित प्रेमसागर के सम्पर्क में कैसे आये और उस सम्पर्क में इस ब्लॉग का कोई रोल है या नहीं। पर जैसे भी है; दिलीप थानकी जी सोमनाथ-पोरबंदर-द्वारका-नागेश्वर के बीच प्रेमसागर का पूरा साथ देंगे; यह लगता है।
अजित प्रताप सिंह,, पुत्र श्री राजेंद्र प्रताप सिंह, देवखाल, हरैया, बस्ती। वर्तमान में लखनऊ में रहते हैं।
आज सवेरे प्रेमसागर से बात की तो वे गड़ू में थे। किसी टेम्पो से वे सोमनाथ से सवेरे गड़ू पंहुच कर आराम कर रहे थे। जूनागढ़ से सोमनाथ के रास्ते वे गड़ू से हो कर गुजरे थे, इसलिये वहां तक की यात्रा उन्होने वाहन से सम्पन्न की। आगे, कांवर पदयात्रा करेंगे नागेश्वर तीर्थ के लिये घण्टे भर बाद वे रवाना होने वाले थे। नागेश्वर तीर्थ उनका पांचवा ज्योतिर्लिंग होगा यात्रा का। इस यात्रा में वे लगभग सौराष्ट्र के अरब सागर के समुद्र तट के साथ साथ ही चलेंगे।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी (गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –