रामदेव बाबा पीर का मंदिर, सरवा, बोटाड


30 नवम्बर रात्रि –

सवेरे राणपुर के आगे रामदेव पीर बाबा के बन रहे मंदिर के टिन शेड में रात गुजारने के बाद प्रेमसागर रवाना हुये। उनका इरादा पालीयाड के आस पास किसी स्थान पर आज रात गुजारने का स्थान तलाशना था। पर वैसा कोई स्थान उन्हें वहां मिला नहीं। उन्हे लगभग दस किमी और चलना पड़ा। अंतत: एक और रामदेव पीर बाबा के मंदिर में उन्हे स्थान मिला। यह स्थान सरवा गांव में है। नक्शे में यह गांव एक नीचाई की जमीन पर दिखता है। बारिश के मौसम में इसके उत्तर में जल का बड़ा तालाब या मार्श-लैण्ड बन जाता होगा। फिलहाल तो प्रेमसागर को वहां बबूल के झाड़ दिखे।

आज की यात्रा का पथ। शाम के मुकाम रामदेव पीर बाबा के स्थान के ऊपर हरा ताल या नीचाई वाली जमीन दिखती है।

पालियाड के पहले प्रेमसागार का जूता जवाब दे गया। मध्य प्रदेश में ॐकारेश्वर के बाद उन्होने यह जूता खरीदा था। उसने यहां गुजरात में सौराष्ट में प्रवेश तक साथ निभाया। “फट गया था बेचारा। कितना चला मेरे साथ।” प्रेमसागर ने उसे श्रद्धांजलि दी। उसके बाद करीब बारह किलोमीटर वे पुराने अंदाज में नंगे पांव चले। रास्ते में कोई बड़ी जगह नहीं पड़ी जहां नया जूता लिया जा सकता।

पालियाड के चौराहे का चित्र भेजा है प्रेमसागर ने। यह स्थान बीच में पड़ा था। चौराहे पर गदा और धनुष की मूर्ति आकर्षक है। प्रेमसागर ने बताया कि इलाके में हिंदू, जैन के अलावा मुस्लिम जनसंख्या भी दिखती है पर कहीं कोई बहुत अलगाव या वैमनस्य जैसा नहीं नजर आता। पालियाड बड़ा कस्बा है। यहां आसपास रात्रि विश्राम की जगह न मिल पाना कुछ अजीब लगता है। यह भी सम्भव है कि प्रेमसागर थोड़ा ठीक होने पर थोड़ा और चल लेने का एडवेंचर करने लगे हों। अगर वैसा है तो वह निश्चय ही सही नहीं है। उन्हे मान कर चलना चाहिये कि वे समय के साथ प्रतिस्पर्द्धा में नहीं हैं। उन्हे अपने दम खम को बचाये रखने की कवायद करनी चाहिये।

सरवा में रामदेव पीर बाबा के आज के मुकाम पर पंहुचने के पहले बुरा हुआ उनके साथ। रास्ता खराब था। सड़क पर गिट्टी उधड़ी हुई थी और बबूल के कांटे भी थे। एक जगह बबूल के कांटे चुभ गये पैर में। मुकाम लगभग सौ मीटर दूर था। पर चला नहीं जा रहा था। अंतत: उन्हें साथ चल रहे लोगों ने वाहन पर पीर बाबा के स्थान पर पंहुचाया।

प्रेमसागर का जूता चला गया। उनका बैग भी जवाब दे रहा है। उनको नये जूते और बैग की जरूरत है। लोग उनके यूपीआई पते पर उन्हे थोड़ी-बहुत रकम दे सकते हैं उन्हे; मौके पर काम आयेगी।

ये साथ चल रहे लोगों की भी रोचक दास्तान है जिन्होने अंतिम सौ मीटर में प्रेमसागर को वाहन पर बिठा कर रामदेव बाबा के मंदिर पंहुचाया। एक पचास लोगों का जत्था ग्वालियर से गोण्डल की पदयात्रा कर रहा है। उनके साथ कुछ वाहन भी हैं। महिलायें हैं जो वाहनो में चल रही हैं और पुरुष पैदल। वे लोग स्वामीनारायण स्वामी के मंदिर जा रहे हैं। इस मास की पंचमी को वहां स्वामीनारायण स्वामी का जन्मोत्सव मनाया जाता है। वे लोग हर वर्ष यह पदयात्रा करते हैं। करीब बारह सौ किलोमीटर की सामुहिक उत्सव-पदयात्रा! भारत वर्ष में धर्म आर्धारित पद यात्रा के भी कितने स्वरूप हैं! कितने प्रकार! और वे यात्रायें भी कितनी लम्बी होती हैं!

चित्र में प्रेमसागर के साथ सुरेश जी। उन्होने प्रेमसागर को बहुत स्नेह और आदर दिया।
उनके बैनर से स्पष्ट होता है कि उनके सूत्र अमेरिका में प्रवास कर रहे एन आर आई भारतीयों से भी हैं।

गोण्डल के ये यात्री प्रेमसागर को रास्ते में मिल गये। वे लोग जसदण तक प्रेमसागार के साथ साथ चलेंगे। उसके बाद प्रेमसागर सोमनाथ की ओर निकलेंगे और वे गोण्डल की ओर। चित्रों से लगता है कि वे सम्पन्न व्यवसायी हैं। उनके साथ कुछ किसान भी हैं। उनके बैनर से स्पष्ट होता है कि उनके सूत्र अमेरिका में प्रवास कर रहे एन आर आई भारतीयों से भी हैं। शायद कुछ एन आर आई भी इस यात्रा में शामिल हों। रामदेव पीर बाबा के सरवा वाले स्थान पर रात के सामुहिक भोजन में उन्होने प्रेमसागर को भी शामिल कर लिया है। वे लोग प्रेमसागर की एकाकी और दुरूह यात्रा पर आश्चर्य व्यक्त कर रहे थे।

स्वामीनारायन के पदयात्रियों ने रामदेव पीर बाबा के सरवा वाले स्थान पर रात के सामुहिक भोजन में प्रेमसागर को भी शामिल कर लिया है।

दिन में मैंने सौराष्ट्र के बारे में जानकारी के लिये अपने ब्लॉग मित्र संजय बेंगानी जी के माध्यम से एक सज्जन रवि पटेल जी से बात की। आगे भी जानकारी लेने के लिये रवि जी का फोन नम्बर ले लिया है। सोमनाथ तक के क्षेत्र के बारे में वे इनपुट्स दे सकेंगे। आगे की यात्रा के बारे में भी और लोगों के सम्पर्कसूत्र बता सकेंगे, जो आगे के इलाके की जानकारी रखते हों।

रवि पटेल, आर एस एस के प्रचारक

रवि पटेल जी ने संघ के प्रचारक के रूप में इस इलाके में काफी कार्य किया है। वे सौराष्ट्र के इस भाग के बारे में बताते हैं कि दो महान विभूतियां – द्वापर के श्री कृष्ण और वर्तमान युग के स्वामीनारायण पैदा उत्तर प्रदेश में हुये पर उनकी कर्म भूमि सौराष्ट्र ही रही। दोनो को प्रतिष्ठा और देवत्व यहां की धरती पर मिला। कृष्ण के बारे में तो सब जानते हैं कि उनका जन्म मथुरा में हुआ। स्वामीनारायण जी के बारे में मैं बता दूं कि उनका जन्म छपिया में हुआ था जो गोण्डा के समीप उत्तर में एक रेलवे स्टेशन भी है। मुझे याद है कि हम उस खण्ड के वार्षिक निरीक्षण पर निकले थे तो “स्वामीनारायण छपिया” रेलवे स्टेशन पर सम्प्रदाय के प्रमुख जी महाप्रबंधक महोदय से मुलाकात करने हमारी स्पेशल रेलगाड़ी पर भी आये थे और उन्होने हमारा स्वागत भी किया था। वे वास्तव में सरल संत लग रहे थे। शांत और उद्वेग रहित! … प्रेमसागर को इस पदयात्री जत्थे का साथ मिला है, यह मुझे अभूतपूर्व लग रहा है!

आज की इस पोस्ट को गिन कर अब तक प्रेमसागर की कांवर यात्रा पर 75 पोस्टें हो गयी हैं। जितनी मेहनत, जितना संकल्प, जितना जुनून प्रेमसागर का होगा, उसका चार आना भर मेरा भी होगा। मेरी पत्नीजी और मेरी बिटिया इस जुनून पर झुंझलाते भी हैं और जिज्ञासा भी रखते हैं कि प्रेमसागर का क्या हुआ। … यह बड़ा खट्टा-मीठा ब्लॉगानुभव है! :-)

आज अपने नियत कोटा से ज्यादा ही चले हैं प्रेमसागर। दूसरे, अंतिम छोर पर उनके पैर में कांटा भी चुभा है जो तकलीफ दे रहा है। निकालने की कोशिश में कुछ निकला और कुछ बाकी है। “पैर धो कर इत्मीनान से निकालूंगा भईया।” मेरी पत्नी जी का विचार है कि निकाल जरूर लेना चाहिये। न निकल पाये तो डाक्टर को दिखाना चाहिये। अन्यथा गड़ा हुआ कांटा पक कर बहुत पीड़ा दायक हो जायेगा और यात्रा में बड़ा अवरोधक होगा।

प्रेमसागर आज थके ज्यादा हैं। जल्दी जल्दी में मुझे दिन भर का विवरण दे कर सोने जाने की बात करने लगे। आज इतना ही।

हर हर महादेव।

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

वागड़ से राणपुर के आगे


29 नवम्बर 21, रात्रि –

सवेरे वागड़ से निकलने के बाद प्रेमसागर को एक नहर दिखी। लगता है गुजरात की खुशहाली – जैसी भी है – का एक प्रमुख कारण इन नहरों का जाल है। पक्की नहर जिसमें पानी का रिसाव नहीं होता; उनसे पानी लेने के लिये भी पाइप और वाल्व जैसा कुछ देखा प्रेमसागर ने। उसका चित्र नहीं ले पाये। पर यह तो स्पष्ट हुआ कि जल किसान के पास बिना अपव्यय के पंहुच रहा है और उससे खुशहाली आ रही है। ऐसे में कुपोषण के डाटा जो दिखाये जाते हैं, उनको समझना कठिन होता है। शायद लोगों की भोजन की आदतों से जुड़ा हो वह मामला। बहरहाल, समृद्धि तो नजर आती है।

गुजरात की खुशहाली – जैसी भी है – का एक प्रमुख कारण इन नहरों का जाल है।

एक चाय की दुकान में बैठे प्रेमसागर। चायवाले भाई ने प्रेमसागर को देख कर उन्हें बुला कर चाय नाश्ता कराया। चाय की दुकान की फोटो में एक बच्चा भी दिखता है। मैंने उसके बारे में प्रेमसागर से पूछा। उन्होने कहा कि वह अपने घर से भाग कर भटकता हुआ यहां आ गया था। यहीं रह गया। मध्यप्रदेश का है वह। उसकी मां की अकाल मृत्यु हो गयी थी और विमाता उसे बहुत सताती थी। तो घर से भाग खड़ा हुआ। अब यहां रहता है और वापस नहीं जाना चाहता। उसका कोई कॉण्टेक्ट भी नहीं है अपने पैत्रिक स्थान से। प्रेमसागर ने उसका हाल पूछा तो वह प्रसन्नमन से बोला कि यहां वह बड़े अच्छे से है।

चायवाले भाई ने प्रेमसागर को देख कर उन्हें बुला कर चाय नाश्ता कराया।

चाय वाले सज्जन के माता पिता भी आये प्रेमसागर से मिलने। उन्होने चरण छू कर उनको प्रणाम किया। मां ने आग्रह किया कि उनके यहां कुछ देर रुक कर वे स्नान-ध्यान-भोजन कर लें। पर प्रेमसागर ने बताया कि वह स्नान-पूजा वे सवेरे कर चुके हैं। उसके बाद ही यात्रा प्रारम्भ होती है।

सौराष्ट्र के बारे में बताते हुये प्रेमसागर के ऑब्जर्वेशन हैं – जमीन में बबूल बहुत हैं। उन्होने पता नहीं किया है पर बबूल का गोंद यहां सस्ता मिलना चाहिये। वे रात में बबूल का गोंद भिगो कर सवेरे उसका सेवन करते हैं। “पता करूंगा; अगर कहीं सस्ता मिला तो खरीद लूंगा।” बबूल के अलावा यहां कपास की खेती बहुत है। लोग बाजरे की रोटी का प्रयोग बहुत करते हैं। अतिथि सत्कार में दूध और मठ्ठा खूब परोसते हैं। मठ्ठा तो ऐसा होता है जैसे दही। “इसके अलावा खास बात यह है भईया कि यहां लोग दूध में पानी नहीं मिलाते। लोग सीधे सादे हैं। किसानी पर ज्यादा आश्रित हैं पर यहां किसान गरीब बहुत कम हैं। सौराष्ट्र का बच्चा बच्चा तक भक्ति भाव रखता है।” – प्रेमसागर ने कहा। एक स्थान पर प्रेमसागर को नागफनी के झाड़ भी दिखे। उससे सोरठ की भूमि और जलवायु की कल्पना की जा सकती है।

“कल दो धोती मैंने निकाल कर दान कर दिया भईया। अब अपने साथ काम से कम सामान ले कर यात्रा करूंगा। कांवर में तो सामान नहीं रहेगा। केवल जल ही जल रहेगा। किसी ने बताया है कि सोमनाथ (वेरावल) में लोटा सस्ता मिलता है। वहां दो बड़े लोटे खरीद कर जल उनमें रखूंगा। अभी बैग (पिठ्ठू) खरीदना है। यात्रा के दौरान यह तीसरा बैग होगा। पीठ पर पसीने से बैग खराब हो जाता है। अभी वाला बैग फट गया है।” प्रेमसागर फ्र्यूगल ट्रेवल की ओर उन्मुख हैं उत्तरोत्तर! उन्हें यह यकीन हो गया है कि लोग सहायक हो ही जा रहे हैं यात्रा के दौरान और बहुत ज्यादा संग्रह कर चलने की जरूरत नहीं है।

प्रेमसागर के पास प्रयागराज (संगम) का जल है। उन्होने अमरकण्टक से नर्मदा के उद्गम स्थल से भी जल लिया है। ॐकारेश्वर में नर्मदा की एक धारा कावेरी हैं। उनका जल भी उनके संग्रह में है। यह सभी जल मिला कर चढ़ाया जायेगा आगे के ज्योतिर्लिंगों पर। और रास्ते में बड़ी महत्व वाली नदियों – गोदावरी, कावेरी आदि का जल भी संग्रह में जुड़ेगा। … पता नहीं जल के इस मिलान को वे किस भाव से लेते हैं। पर भारतवर्ष के एक होने का वह जल बड़ा प्रमाण होगा!

रास्ते में एक जगह पथरीली भूमि को तोड़ कर गिट्टी बनाने का उपक्रम हो रहा था। प्रेमसागर ने उसका चित्र भी भेजा। “इलाके में कहीं कहीं छोटे पहाड़ जैसे भी हैं भईया”।

“आज मैंने एक अच्छा काम किया। एक सांप का बच्चा, करीब डेढ़ बित्ते का सड़क पर था। चिकनी सड़क पर चल नहीं पा रहा था। भूरे रंग का था। बहुत पतला। शायद हाल ही में जन्म हुआ होगा उसका। मैंने अपने पास कांवर में खोंसे मोर पंख से उसे सरका सरका कर किनारे के खेत में छोड़ दिया। अब उसकी जान बच जायेगी। वर्ना वह किसी वाहन के नीचे आ कर मर ही जाता। था वह कोई विष वाली प्रजाति का। मोर पंख से छूने पर अपना फन ऊपर करता था। करीब एक इंच उठा ले रहा था। उसे बचा कर मुझे आत्मिक संतोष हुआ भईया।” प्रेमसागर ने दिन की यात्रा का विवरण देते बताया।

देवराज जी

शाम के समय जब मैंने पांच बजे उनसे बात की तो वे राणपुर से तीन किलोमीटर आगे निकल आये थे। अभी तक वे बीस किलोमीटर चल चुके थे और रुकने के लिये कोई मुकम्मल जगह नहीं मिल पायी थी। “अभी एक देसराज भईया के पास बैठा हूं। इन्होने चाय भी पिलाई है और बताया है कि आगे पांच सौ मीटर पर रहने का इंतजाम हो जायेगा।” प्रेमसागर ने देसराज जी का चित्र भी भेजा। उसके बाद जब वे उस स्थान पर – रामदेव बाबा के बन रहे मंदिर पर पंहुचे तो उन्हें अलग ही अनुभव हुआ!

रामदेव बाबा के बन रहे मंदिर के संत रामगिरि जी और उनकी पत्नी

रामदेव पीर बाबा का मंदिर पहले वहां हुआ करता था। सड़क के चौड़ा करने में वह मंदिर/आश्रम तोड़ना पड़ा। अब सड़क का ही ठेकेदार मंदिर का बगल में निर्माण करवा रहा है। आश्रम के संत/पुजारी रामगिरि हैं। अभी टीन के शेड़ के नीचे वे रह रहे हैं। उन्होने और उनकी पत्नीजी ने प्रेमसागर का स्वागत किया। पत्नीजी ने कहा कि कोई भी अतिथि का वहां स्वागत है। उनके पास जो भी रूखा-सूखा होगा, वह अतिथि के साथ बांट कर प्रसाद के रूप में लिया जायेगा। उसी टिन के शेड के नीचे रात्रि विश्राम किया प्रेमसागर ने।

रामदेव बाबा के मंदिर के घोड़े।

रामगिरि बाबा से देर रात तक चर्चा हुई। इग्यारह बज गये। प्रेमसागर को यह सत्संग अनूठा और अच्छा लगा। “सबसे अलग तरह का अनुभव था भईया!” रामगिरि बाबा के पास दो घोड़े हैं। रामदेव बाबा के सभी स्थानों, मंदिरों में घोड़े पाले जाते हैं। उसका कारण है कि रामदेव पीर बाबा घोड़े पर ही सवारी किया करते थे। बाबा रामदेव के सभी चित्र घोड़े के साथ ही हैं। जब भी विशेष अवसर होता है तब घोड़े को अच्छे से सजाया जाता है – यह प्रेमसागर ने मुझे बताया।

रामदेव पीर बाबा और अन्य देवों के चित्र राम गिरी जी के आश्रम में।

आज दिन भर में नक्शे के हिसाब से प्रेमसागर बीस किलोमीटर चले। स्वास्थ्य सुधार, ज्यादा दूर चलने पर अंकुश लगाने और मौसम की ऊष्णता कम होने का फायदा यह है कि प्रेमसागर अब यात्रा विवरण बेहतर बता पा रहे हैं। अन्यथा वे थक कर चूर होते थे और मात्र चित्र भर भेज पाते थे। बीच में तो चित्र लेना भी लगभग नहीं के बराबर हो रहा था। उनके यात्रा विवरण लिखना कठिन हो रहा था और मैं इस ट्रेवल-ब्लॉग को त्यागने की सोचने लगा था। अभी लगता है प्रेमसागर के साथ कुछ और यात्रा की जा सकती है; बावजूद इसके कि पढ़ने वाले ऊब से रहे होंगे प्रेमसागर-सेण्ट्रिक-ब्लॉग देख कर।

आज इतना ही।

हर हर महादेव।

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धंधुका से आगे प्रेमसागर, वागड़ में


28 नवम्बर 21, रात्रि –

प्रेमसागर ने तीन दिन आराम किया धंधुका रेलवे स्टेशन के रेस्ट हाउस में। उन्होने कोरोना का टीका लिया और डाक्टर से परामर्श भी। डाक्टर ने उनकी सामान्य दशा ठीक ही पाई। तटवर्ती हवाओं की गर्मी और उमस से शरीर का जल कम हुआ था और प्रेमसागर ने पर्याप्त पानी पिया नहीं था। उन्हे पानी खूब पीने और दिये गये घोल को पीने के लिये निर्देश मिले। कुछ और दवाईयां भी दीं। इसके अलावा कीवी खाने को कहा – करीब 10-15 दिन तक। प्रेमसागर ने बताया कि बहुत मंहगा फल है – सत्तर रुपये का एक। फल वाले ने उन्हें साठ में दिया। वे खा रहे हैं।

कीवी खाने को कहा – करीब 10-15 दिन तक। प्रेमसागर ने बताया कि बहुत मंहगा फल है – सत्तर रुपये का एक। फल वाले ने उन्हें साठ में दिया। वे खा रहे हैं।

धंधुका में कुछ लोग प्रेमसागर से कौतूहल वश मिलने आये थे। अधेड़ और वृद्धावस्था की ओर अग्रसर लोग। सवेरे वे धंधुका स्टेशन के आसपास घूमने आते होंगे तो उन्हें प्रेमसागर के बारे में पता चला। उनमें से कुछ नौकरी करते हैं या नौकरी से रिटायर हैं। कोई किसान भी हैं। लोगों में प्रेमसागर जिज्ञासा का विषय तो हैं ही, धर्म आर्धारित श्रद्धा का विषय हों या न हों।

धंधुका में ये अधेड़ और वृद्ध लोग प्रेमसागर से मिलने आये थे।

रेलवे स्टेशन पर स्टेशन अधीक्षक साहब छुट्टी पर चले गये – उनकी रिश्तेदारी में कोई शादी का अवसर था। दूसरे मास्टर साहब ने प्रेमसागर को वह भाव नहीं दिया, पर नियत समय तक वे धंधुका में रहे जरूर। कल शाम उन्होने बताया कि वे फतेहपुर (जहां से मोटर साइकिल पर बैठ कर वे धंधुका आये थे) सवेरे जा कर वहीं से अपनी कांवर यात्रा जारी रखेंगे। आज वही किया।

कल रात पास के चाय वाले से बात की थी; वह भला आदमी सवेरे साढ़े चार बजे इनको मोटर्साइकिल पर बिठा फतेहपुर छोड़ने को तैयार हो गया था। आज सवेरे उसी के साथ नियत स्थान पर पंहुच कर वहां से यात्रा प्रारम्भ की।

सवेरे रास्ते में दिखा यह जैन स्थल। बहुत से स्थान हैं इस इलाके में जैन समाज के। पर वहां प्रेमसागर को ठहरने की सुविधा नहीं है। वे लोग ठहरने का चार्ज करते हैं।

सवेरे सात-आठ बजे जब मुझसे बात की प्रेमसागर ने तो वे फतेहपुर से धंधुका पार कर साढ़े तीन किलोमीटर आगे चल रहे थे। दोपहर तक वे किसी मंदिर में पंहुच कर रात के विश्राम का जुगाड़ बना चुके थे। उस मंदिर में कोई प्रवचन चल रहा था। कमरे में रुकने का विधिवत इंतजाम था। नक्शे में पास ही में भादर नदी दिखती है पर प्रेमसागर को वह दिखी नहीं। धंधुका -राणपुर मार्ग पर वह लगभग समांतर चल रही नदी है। मैं उसे ट्रेस करता हूं तो वह खम्भात की खाड़ी में जाती दीखती है। नक्शे में पाट चौड़ा है। नदी ठीकठाक होनी चाहिये।

इस मंदिर में रुके प्रेमसागर वागड़ में।

नक्शे में ही कोई ‘सुरधन दादा नू मंदिर’ दिखता है। जगह का नाम नजर आता है वागड़ (Vagad)। शायद वहीं रुके हों प्रेमसागर। पर वे मंदिर का नाम “रामदेव बापा” बताते हैं। मध्यम आकार का मंदिर है। प्रेमसागर ने बताया कि उन्हे रास्ते में आता देख पांच सात लोग सड़क पर आ कर उन्हें मंदिर में ले गये और उनका नाश्ता-पानी से सत्कार भी किया। उनके बारे में जान कर यात्रा के विषय में अश्चर्य व्यक्त कर रहे थे वे।

प्रेम कहते हैं कि वे अपनी कांवर हल्की कर लेंगे। कुछ कपड़े आदि कम करेंगे। किसी सुपात्र को दे देंगे। कांवर का वजन आधा कर चलते में सहूलियत रहेगी। वैसे भी यह धंधुका-राणपुर मार्ग ठीक ठाक है और आज गर्मी भी ज्यादा नहीं थी, इसलिये वे काफी चल पाये। रास्ते में एक बदाम के वृक्ष का चित्र भी लिया प्रेमसागर ने। बताया कि इस इलाके में बहुत से बदाम के वृक्ष हैं। बदाम यहां सस्ता मिलता है। दो सौ से पांच सौ रुपये किलो तक। वे एक दो किलो बदाम खरीद कर अपनी पोटली में रख लेंगे। मैंने उन्हे सुझाया कि सवेरे भीगे छिलका उतारे आठ दस बदाम खाया करें।

बदाम का पेड़

रास्ते में प्रेमसागर खपरैल के मकान और एक जगह मंदिर-मस्जिद के आमने सामने के होने के चित्र भी भेजते हैं। उनसे लगता है कि गांवदेहात का गुजरात अन्य भारत से बहुत अलग नहीं है। एक जगह कपास की खेती का चित्र भी है। जो यहां की जलवायु के अनुकूल फसल होगी।

इन दिनों प्रेमसागर की आगे की यात्रा पर उनसे कई बात बात होती रही है। मैं गणना कर बताता हूं कि अगर वे 15किमी प्रति दिन के हिसाब से चलते रहे तो सोमनाथ, नागेश्वर और महाराष्ट्र के तीन ज्योतिर्लिंग निपटा कर मई-जून के महीने में प्रयाग से केदार की यात्रा सम्पन्न कर सकेंगे। पर प्रेमसागर को खुद भूगोल की बेसिक जानकारी भी नहीं है और यह नहीं लगता कि वे दक्षता से गूगल मैप का प्रयोग भी करना जानते हैं। वे लोगों के कहे पर चल पड़ते हैं। ॐकारेश्वर में एक पण्डित की सलाह पर वे माहेश्वर से गुजरात की ओर चले आये; जबकि इस प्रकार वे (निरर्थक) 400 किमी अतिरिक्त चल रहे हैं। उस चलने में वे अपना स्वास्थ्य भी खराब कर चुके हैं। मैं बहुत तल्खी से उन्हे यह बताता हूं; पर उनपर कोई असर नहीं होता। वे बड़ी सरलता और जड़ता से लोगों पर यकीन कर लेते हैं। लोगों को यात्रा की पूरी समग्र जानकारी नहीं होती और उनकी सलाह पर एक गलत दिशा इस प्रकार का ब्लण्डर करा देती है।

अभी वे गुजरात के बाद राजस्थान के जरीये केदार जाने की बात कर रहे थे। किसी शुभेच्छु ने उन्हे पट्टी पढ़ाई होगी। मैं उन्हे बताता हूं कि जिस यात्रा को वे कर चुके हैं, उसके किसी बिंदु से वे केदार की यात्रा करें तो सबसे कम दूरी प्रयागराज से बनती है। गुजरात के किसी स्थान, उज्जैन या वाराणसी से केदारेश्वर की दूरी प्रयागराज से दूरी से अधिक बनती है। … पर नक्शे को ले कर मेरी गणना का उनके लिये कोई मतलब नहीं। मुझे नहीं लगता कि वे मेरी ब्लॉग पोस्ट भी ध्यान से पढ़ते होंगे। वे केवल यह देखते हैं कि मैंने कितने किलोमीटर की अब तक की उनकी यात्रा जोड़ी है। वे यह सोचते ही नहीं कि यात्रा इस प्रकार से की जाये कि इस लम्बी दुरुह यात्रा में कोई व्यर्थ दूरी न तय करनी पड़े। यात्रा किसी कठपुतली की तरह लोगों के कहे पर नाचना थोड़े ही होना चाहिये। पर प्रेमसागर को मेरा कहा समझ नहीं आता। :-)

आज इतना ही। प्रेमसागर प्रवचन सुन रहे हैं मंदिर में। मुझे जुकाम हो गया है। सवेरे सर्दी हो जाती है। साइकिल भ्रमण में सर्दी लग गयी है। यहीं रुका जाये।

हर हर महादेव!

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