चारधाम यात्रा सम्पन्न – बद्रीनाथ को जल अर्पण किया प्रेमसागर ने


यात्रा कठिन है और असल समस्या शायद पैसों की है। प्रेमसागर के साथ मैंने डिजिटल यात्रा की है करीब दो हजार किलोमीटर की। उससे भी ज्यादा की। उनके साथ एक बार लूट भी हुई और बीच में यह भी लगा कि स्वास्थ्य ठीक नहीं है। पर कभी इस प्रकार की समस्या नहीं आयी। रात को खुले में रहा नहीं जा सकता पहाड़ की एक हजार मीटर की ऊंचाई पर। कमरे या डॉर्मेट्री में बिस्तर के डेढ़ दो हजार मांगते हैं। उतना देना अखर रहा है प्रेमसागर को। सोच रहे हैं कि तीन दिन की यात्रा किसी तरह दो दिन में पूरी हो सके। एक बार बस बद्रीनाथ के दर्शन हो जायें, उसके बाद तो बस पकड़ कर सीधे ऋषिकेश/हरिद्वार पंहुचेंगे वे। वहां पंहुचने पर समस्या नहीं होगी। फिर हरिद्वार से गाड़ी पकड़ कर बनारस आने पर तो सब दिक्कत खतम!

नंदप्रयाग से आगे की यात्रा में पहली चाय की दुकान वाले सज्जन

लोग मैदान की गर्मी से बेहाल पहाड़ की तरफ रुख कर रहे हैं। पारा उनचास डिग्री तक चला गया है। प्रेमसागर को पारा चढ़ने से नहीं, पहाड़ में हर सुविधा के बेतहाशा पैसे लगने और देने पर दिक्कत हो रही है। नंद प्रयाग के आसपास उन्हें गुफायें दिखीं। गुफा देखते ही मन होने लगा कि ठहरने को ऐसी एक गुफा मिल जाये तो कितना अच्छा हो। उन्होने बताया कि इन गुफाओं में तो तपस्वी लोग नहीं रहते – शायद पुलीस या फोर्स वाले गुफाओं पर कब्जा नहीं जमाने देते। पर गंगोत्री-गोमुख में कई गुफाओं में तपस्वी रहते हैं। वहां एक गुफा में रहते बाबा को प्रेमसागर ने कहा था कि उनके लिये भी एक गुफा जुगाड़ दें। पर तपस्वी ने उत्तर दिया कि उन्हीं लोगों को कम पड़ रही है गुफायें, एक और को कहां से एडजस्ट किया जाये। :lol:

बकौल प्रेमसागर ये गुफायें हैं बड़े काम की। गर्मियों में ठण्डी और सर्दियों में गर्म रहती हैं। कितना बढ़िया हो कि शहर में तीन बीएचके फ्लैट की बजाय जोशीमठ के आसपास वन बीएचके गुफा मिल जाये। तब वहां रह कर एक बीएचके गुफा के जीवन पर पुस्तक लेखन का यत्न किया जाये। :-)

नंदप्रयाग से आगे पड़ी एक गुफा।

मैदान की आबादी दौड़ रही है हिमाचल-हिमाद्रि की ओर। और उन्हीं भर से हिमालय नहीं भर गया; बाबाओं की भी भरमार से त्रस्त हो गया है! :-)

जैसा प्रेमसागर मुझे बताते हैं – केदार या बद्रीनाथ उनके लिये धार्मिक पर्यटन नहीं, एक यात्रा की अनिवार्यता है, जो उन्हें संसाधनों की कमी के बावजूद पूरी करनी है। इसलिये जितनी जल्दी पूरी हो जाये उतना अच्छा। जरूरत से क्षण भी अधिक प्रेमसागर वहां रुकने वाले नहीं लगते।

मौसम खराब होता रहता है। वे सोचते है‍ कि आगे की यात्रा कम से कम समय मे‍ पूरी कर ले‍, पर मौसम कभी कभी साथ नही‍ देता। वे एक दिन पहले मुझे कहते है‍ कि कल 35 किमी चलने का प्रयास करेंगे पर चल मात्र पच्चीस, या उससे कम ही, पाते हैं। पच्चीस किलोमीटर भी कम नही‍ है पहाड़ पर चलना।

नंदप्रयाग से पहले प्रेमसागर के पास तीन लीटर पीने का पानी था; जो यात्रा के श्रम के कारण खत्म हो गया। “भईया, बिना पानी के एक कदम चलना कठिन हो रहा था। ऐसे में एक कार से जाते लोगों को उन्होने हाथ से इशारा किया। कार कुछ आगे जा कर रुकी। उन लोगों ने पास आ कर एक लीटर पानी की बोतल दी। मानो अमृत दिया। “महादेव ने ही उनके जरीये कृपा की…” प्रेमसागर ने दिन भर की गतिविधियों का विवरण देते बताया।

नंदप्रयाग में नंदाकिनी (नीचे) और अलकनंदा का संगम

तेरह मई की शाम को प्रेमसागर कर्णप्रयाग में थे। अलकनंदा और पिण्डर नदी के संगम स्थल पर। चौदह की शाम वे नंदप्रयाग पंहुच गये थे। वहां नंदाकिनी और अलकनंदा का संगम है। नंदाकिनी का रंग नीला-हरा है और अलकनंदा का सफेद-मटमैला। वे उत्तरोत्तर अनेक नदियों के संगम स्थल से गुजरेंगे। अनेक प्रयाग आयेंगे। सभी तीर्थ हैं और सभी दर्शनीय। हिमालय का चप्पाचप्पा दर्शनीय है।

अगले दिन वे पीपलकोटी पंहुच कर रहने के लिये कोई जगह तलाश रहे थे। पर यात्रियों की भीड़ के कारण कमरा/बिस्तर मिलना कठिन था। मिल भी रहा था तो दो हजार रुपये के आस पास। अंतत: कुछ आगे जा कर एक स्थान मिला जहां मोलभाव/छूट के बाद आठ सौ लगे। प्रेमसागर के पास धन की समस्या होगी जरूर। उन्होने बार बार मुझसे कहा कि जल्दी से जल्दी वे बद्रीनाथ दर्शन कर वहां से अगली बस पकड़ना चाहते हैं।

पर्यटक – और धार्मिक पर्यटक भी – बद्रीनाथ दर्शन कर वहां से हेमकुण्ट या फूलों की घाटी देखने का मन बनाते हैं। इतनी दूर हिमाद्रि के गोद में आना वंस इन लाइफटाइम जैसा अनुभव होता है। व्यक्ति ज्यादा से ज्यादा समेटना चाहता है। अगली बस पकड़ कर लौटने की नहीं सोचता। मैने प्रेमसागर से पूछा – क्या सरकार बिना पैसे के चलने वाले तीर्थयात्री के लिये कोई सुविधा नहीं देती। कम से काम रात गुजारने और सादा भोजन का जुगाड़। प्रेमसागर ने कहा कि वैसा कुछ नहीं दिखा। उत्तराखण्ड के मंत्री साहब का कोई सिफारिशी पत्र लाये तो उसे सरकारी गेस्ट हाउस में जगह मिल सकती है, ऐसा सुना है। पर वह चिठ्ठी पाना कोई खेल नहीं होगा। आम आदमी कहां से पायेगा?

सोलह मई को प्रेमसागर कुछ अस्वस्थ लगे। सवेरे देर से उठे और देर से यात्रा प्रारम्भ की। दिन में अठारह किलोमीटर ही चल पाये। दोपहर में मुझे बताया कि किसी स्थान पर उन्होने डेरा डाला है। इस जगह से जोशीमठ 18-20 किमी दूर है और उसके आगे 38किमी है बद्रीनाथ। जितना जल्दी वे चलना चाह रहे हैं, समय उतना ज्यादा लगता जा रहा है।

चित्र कम ले पा रहे हैं प्रेमसागर और यात्रा भी ड्रैग कर रही है। फिर भी वातावरण ही मनोरम है और कुछ चित्र लुभावने खिंच पा रहे हैं। रास्ते में चाय की दुकान, मिले यात्री – फेसबुकर्स – के साथ चित्र हैं। एक भाई-बहिन यतेंदर और नीरजा शर्मा के साथ उनका चित्र है। प्रेमसागर कहते हैं कि वे मुझे ट्विटर या फेसबुक पर जानते हैं।

नीरजा शर्मा और यतेन्दर के साथ प्रेमसागर

किसी प्रकार से चारधाम यात्रा सम्पन्न हो, इसकी आस है उन्हें। यात्रा उनके लिये अनिवार्य कृत्य है; उत्फुल्लता का कारक नहीं। पता नहीं यात्रा जब खत्म हो जायेगी, तब प्रेमसागर क्या करेंगे? खैर अभी तो उन्हें बद्रीनाथ के बाद हरिद्वार हो कर वाराणसी लौटना है और वहां से देवघर। फिर बारहों ज्योतिर्लिंग दर्शन सम्पन्न होने पर एक बार गोमुख का जल ले कर रामेश्वरम जाना है। वह जाना रेलगाड़ी से होगा। कुल मिला कर अभी महीना भर लगेगा इस यात्रा-यज्ञ के सम्पन्न होने में।

उसके बाद क्या करेंगे प्रेमसागर? घर परिवार वालों को बैठ कर रोज रोज अपनी यात्रा कि कथायें सुनायेंगे या कहीं कोई आश्रम बना कर बाबाजी के रूप में स्थापित हो जायेंगे? दोनो ही दशाओं में मेरा सम्पर्क शायद ही रहे। हमारा साथ महीने भर का शेष है!

17 मई 2022 –

सवेरे साढ़े आठ बजे प्रेमसागार ने बताया कि वे अठारह किमी चल चुके। असल में कोई शॉर्टकट मिल गया। जिसमें आधी दूरी चलने से वे दूने चलने का लाभ ले पाये। सवेरे वे जोशीमठ पंहुच गये हैं। तीन बार चाय पी चुके हैं। चाय भी सस्ती मिली यहां – दस रुपया कप। पहले तो तीस रुपये तक की मिल रही थी। जोशी मठ के आगे भी शॉर्टकट का उपाय बताया है राह चलते लोगों ने। उसी का प्रयोग कर वे अपेक्षा करते हैं कि आज ही बद्रीनाथ पंहुच जायें। जोशी मठ से हिमाद्रि की शुरुआत हो गयी है। सभी कुछ हिम-आच्छादित दिखने लगा है। जैसा गंगोत्री-गोमुख और यमुनोत्री मे दीखता था। आज प्रेमसागर में जोश और उत्साह दिख रहा है। जब भी किसी शॉर्टकट का वे प्रयोग करते हैं, तो उनके बीच सहज उत्फुल्ल्ता मैंने पायी है। आज भी वैसा ही लगा।

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

अभी दोपहर सवा दो बजे प्रेमसागर ने सूचना दी कि उन्होने बद्रीनाथ के दर्शन कर लिये हैं। वे वीडियो कॉल कर मंदिर के बाहर निकलते दिखाना चाहते थे, पर खराब नेटवर्क के कारण वह नहीं कर पा रहे। अब वे कुछ जलपान कर बद्रीनाथ से रवाना होंगे। उनका सामान पीपलकोटी के आगे दो किमी बाद एक लॉज में रखा है। बोलेरो जाती हैं बद्रीनाथ से। उससे वे पीपलकोटी पंहुच कर सामान ले कर रुद्रप्रयाग के रास्ते हरिद्वार जायेंगे। हरिद्वार से ट्रेन पकड़ कर बनारस।

पहाड़ का उनका मिशन – केदारनाथ ज्योतिर्लिंग और चारधाम पदयात्रा का मिशन पूरा हुआ।

बद्रीनाथ धाम पर प्रेमसागर

बद्रीनाथ धाम के चित्र देख कर लगता है कि वहां बेतहाशा भीड़ है। कोरोना प्रोटोकॉल जैसा कुछ नहीं है। कोई लाइन-कतार जैसा भी नहींं है। धर्म और श्रद्धा वश लोग-लुगाई एक साथ बिना किसी सेग्रिगेशन के, पिले पड़े हैं दर्शन के लिये।

मैंने प्रेमसागर को बधाई दी। उन्होने मेरी पत्नी और मुझे चरणस्पर्श कहा। बद्रीनाथ की व्यवस्था, साफसफाई और वहां के सामान्य रखरखाव के बारे में मैं पूछना चाहता था, पर वह फिर कभी होगा। स्टीफन एल्टर ने अपनी पुस्तक सेक्रेड वाटर्स में बद्रीनाथ की अव्यवस्था और भीड़ की बात की थी। वही अब भी दीखता है। खैर, प्रेमसागर ने किसी असुविधा या अव्यवस्था की बात नहीं की। पर वे वहां बहुत ज्यादा रुके भी नहीं। जलपान कर निकल लिये।

मेरा लैपटॉप खराब हो गया है। कल विवेक – मेरे दामाद – आये थे। वे ले कर बोकारो गये हैं। ठीक करा कर भेजेंगे। यह पोस्ट पुराने लैपटॉप, जिसका कीबोर्ड और स्पीकर काम नहीं करता; और रह रह कर स्क्रीन हैंग कर जाता है; पर किसी तरह टाइप कर पोस्ट कर रहा हूं। जिस तरह प्रेमसागर को यात्रा का जुनून है, उसी तरह लिखने और पोस्ट करने का मेरा जुनून है। दोनो में तालमेल बना रहना चाहिये।

जय बदरी विशाल। जय केदार। हर हर हर हर महादेव!


राघवेंद्र दास – बीजापुर, कर्णाटक के पदयात्री


लगता है लम्बी लम्बी पदयात्रायें करना मेरी लकीरों में लिखा नहीं है पर लम्बी पदयात्रायें करने वालों से मिलना, पहचानना मेरे भाग्य में है। या शायद मैं नेशनल हाईवे के किनारे गांव में रहता हूं, इसलिये ऐसे लोगों से मिलना सरल है और मेरी प्रवृत्ति में आ गया है ऐसे ‘अजीबोगरीब’ लोगों से मिलना।

आज राघवेंद्र दास मिले। बीजापुर, कर्णाटक से दो झोला और एक बोतल पानी लिये हवाई चप्पल पहने चले आ रहे हैं। गेरुआ वस्त्र पहने; हल्का सा तिलक। इकहरा बदन। थोड़ा सांवला रंग। सिर पर गमछे का स्कार्फ। कन्नड पुट लिये हिंदी। बताया कि बीजापुर के इंडी तहसील के जेवुर गांव के हैं। वहां से चल कर रायचूर के पास से नेशनल हाईवे 8 पकड़ कर वाराणसी चले आये। अब बनारस से निकले हैं – मथुरा-वृन्दावन जायेंगे। उसके आगे जहां भगवान ले जायें! – वे ऊपर आसमान की ओर हाथ कर बोलते हैं कि सब ईश्वर आधीन है। उनकी पदयात्रा ईश्वर आधीन है।

राघवेंद्र दास – अपने दो थैले और निशान (झण्डा) लिये। बस इतना ही सामान लिये चल रहे हैं।

जहां जगह मिलती है, सो जाते हैं। लोग भोजन करा देते हैं। भूख लगती है तो लोगों से भोजन मांग लेते हैं। साथ में एक चद्दर है। दो थैलों में थोड़ा बहुत सामान है। थैले भी बड़े नहीं हैं। हाथ में एक झण्डा लिये हैं। जहां जहां जाते हैं, लोग वहां के निशान दे देते हैं। वह सब झण्डे की लाठी में लपेट लेते हैं।

महराजगंज बाजार से अपने गांव की ओर आते हुये मैंने उस परिवेश से अलग लगते व्यक्ति को देखा तो रिफ्लेक्स एक्शन के रूप में कमीज की ऊपरी जेब में रखा नोकिया का छोटा मोबाइल निकाल कर चित्र खींच लिया। उनसे पूछा – कहां से आ रहे है?

“बीजापुर” उन सज्जन ने जवाब दिया। मुझे लगा कि पास किसी विजयपुर के होंगे। किसी धार्मिक अनुष्ठान में जाते हुये। विंध्याचल के आगे एक विजयपुर है जहां शीतलामाता का मंदिर है। पर सज्जन ने जब जोड़ा – कर्णाटक से” और उनके लहजे में दक्षिण भारतीय पुट झलका, तब मुझे लगा कि ये सामान्य स्थानीय पदयात्री नहीं हैं। उन्होने अपने स्थान के बारे में मैसुरू और हुबली आदि नाम लिये। उससे लग गया कि वे लम्बी पदयात्रा करते हुये आ रहे हैं।

राघवेंद्र दास रामानंद सम्प्रदाय के अनुयायी हैं। उन्होने अपने गुरु महोदय का नाम भी बताया। पिछले दो महीने आठ दिन से वे यात्रा कर रहे हैं। करीब दो हजार किमी चले होंगे – यद्यपि सही सही आंकड़ा नहीं रखा अपने पास। इन दो महीने में तो इतना चले हैं, वैसे भी पिछले चार पांच साल से चलते रहे हैं। माता पिता ऊपर जा चुके हैं। परिवार नहीं है। सो चलने में कोई बाधा नहीं है।

मैं राघवेंद्र से बातचीत करने सड़क किनारे एक पत्थर पर उनके साथ बैठ गया। राघवेंद्र ने मुझसे धर्म की बात की, कबीर की बात की, अपने गुरू की बात की, जीवन जीने के बारे में बात की। आधा मैंने सुना और आधा ध्यान राघवेंद्र को देखने में लगा रहा।

बाधा नहीं है, तो भी क्या है यह घुमक्कड़ी? तुलसी कलियुग का वर्णन करते लिख रहे हैं – “नारि मुई घर सम्पति नासी। मूड़ मुड़ाई भयें सन्यासी॥” राघवेंद्र दास के माता पिता नहीं रहे, पत्नी नहीं बच्चे नहीं। तो जोगिया कपड़ा पहन निकल दिये? मांगने पर भोजन मिल जायेगा। बस वही जरूरत है?! आदमी का सेंस ऑफ ग्रेटीफिकेशन किससे संतुष्ट होता है? आदमी में कम ही सही, कुछ राजसिक वृत्तियाँ तो होती हैं। उनका पोषण या उनका शमन कैसे होता है? आजकल रोटी कपड़ा मकान और इण्टरनेट की मूलभूत जरूरतें होती हैं; वे कैसे पूरी होती हैं?

मैं राघवेंद्र से पूछता हूं – उनका मोबाइल नम्बर क्या है? और उत्तर मुझे ट्रिप कर देता है। “कोई मोबाइल नहीं है। जब भजन करो, ध्यान करो तो किसी न किसी का फोन आ जायेगा। फोन तो ध्यान खा जायेगा। मैंने फोन ही नहीं रखा। जितना कम सामान, उतना सुखी जीवन।” – मुझे लगता है कि राघवेंद्र और मुझमें बहुत अंतर है। रहन सहन में भी और वासनाओं/सोच में भी। राघवेंद्र को समझने के लिये राघवेंद्र दास के स्तर पर उतरना पड़ेगा। कर नहीं पाऊंगा मैं।

मैं राघवेंद्र से बातचीत करने सड़क किनारे एक पत्थर पर उनके साथ बैठ गया। राघवेंद्र ने मुझसे धर्म की बात की, कबीर की बात की, अपने गुरू की बात की, जीवन जीने के बारे में बात की। आधा मैंने सुना और आधा ध्यान राघवेंद्र को देखने में लगा रहा। इस व्यक्ति ने कम साधन के साथ चलने को ही अपना ध्येय बना लिया है। पर ऐसा नहीं कि उसमें चाह नहीं है। वह बार बार मुझे और मेरी साइकिल को देखते रहे। मुझसे पूछा – “यह साईकिल कहां से ली? कितने की है? मेरे साइज की साइकिल तो थोड़ी बड़ी होगी। आपका हाईट कम है मेरा तो पांच फिट आठ इंच है। यहां बाजार में मिलती है? होलसेल वाला है बेचने वाला?”

साइकिल के बारे में अनेकानेक सवाल। राघवेंद्र का मन साइकिल पर लग गया है। साइकिल उनको यात्रा करने की सहूलियत देगी। “पहले मेरे पास साइकिल थी। वह छोड़ कर पैदल निकला मैं। पर लगता है साइकिल काम आयेगी।” – राघवेंद्र ने कहा।

मेरे पास राह चलते राघवेंद्र को भोजन कराने के लिये कुछ नहीं था। मैंने अपना पर्स निकाल कर उन्हें पांच सौ रुपये दिये। राघवेंद्र ने अपना थैला खोल कर एक पतली सी पुस्तिका, जिसपर कन्नड़ या तेळुगू में लिखा था; में पांच सौ रुपये सहेज दिये। मुझे धन्यवाद दिया और कहा कि ये पांच सौ उन्हें साइकिल खरीदने में सहायक होंगे।

मेरे बारे में राघवेंद्र ने अपना इम्प्रेशन मुझे बताया – “आप मेरा छोटे मोबाइल से फोटो ले रहे थे तो मैं सोचा देखो कितना गरीब आदमी है। साइकिल से चला आ रहा है और पुराना छोटा मोबाइल (फीचर फोन) है। पर इस उम्र में भी कितना देख रहा है।”

अच्छा लगा राघवेंद्र का बेबाक अपना सोचना बताना। मुझे इसी तरह बहुत से ग्रामीण भी निरीह, जिज्ञासु और गरीब (?) समझते होंगे। मैंने अपने स्मार्टफोन से भी उनके कई चित्र लिये। उन्हें यह भी बताया कि मैं रेलवे की नौकरी से रिटायर हुआ था। उन्होने मुझसे मेरी पेंशन के बारे में पूछा, फिर खुद ही अटकल लगाई – दस हजार तो मिलती होगी? उनकी अटकल पर मैंने हां हूं कर सहमति सी व्यक्त की। मैंने उनके बारे में पूछा था, उन्होने मेरे बारे में, मेरे बच्चों के बारे में पूछा।

विदा होते समय बातचीत करते हम दो तीन बार उठे और फिर बैठ गये। ज्यादातर राघवेंद्र ही बोलते जा रहे थे। बस यही मुलाकात ही तो हमारे पास थी। आगे कोई सम्पर्क सूत्र था ही नहीं। कोई मोबाइल नम्बर नहीं राघवेंद्र का। आज के और उस डिपार्टिंग के बाद मात्र स्मृति भर ही रहेगी। फिर मिलना होगा नहीं।

विदा होते समय मैंने राघवेंद्र को गले लगाया। उसी तरह जैसे प्रेमसागर को लगाया था। राघवेंद्र को मैंने प्रेमसागर के बारे में अपना लिखा दिखाया था बैठ कर। राघवेंद्र ने कहा – “मेरे बारे में भी लिख दीजियेगा। हो सकता है आपका लिखा देख कर कोई मुझे खाना ही खिला दे। मेरी उतनी ही जरूरत है।”

राघवेंद्र दास के साथ मैं सड़क किनारे

घर लौटा तो राघवेंद्र की ही सोचता रहा। राघवेंद्र जैसे भी हैं दुनियां में और महादेव हैं तो उन जैसों से मुझे मिलाते रहते हैं।


राघवेंद्र को दिये पांच सौ रुपयों के बारे में भी कथा रोचक है। और उसमें कुछ विलक्षण तत्व हैं। सवेरे साइकिल सैर के लिये निकलते समय मेरे जेब में पर्स नहीं होता। आज मैंने जाने क्यूं पर्स रख लिया था। उसमें एक भी पैसा नहीं था। मात्र एटीएम कार्ड था। दूध, सब्जी लेने में पर्स की जरूरत नहीं पड़ी। पड़ती भी नहीं है। यूपीआई पेमेण्ट से काम चल जाता है। महीने में मेरी कैश डीलिंग बहुत कम है। अगर जरूरत पड़ती है कहीं सौ पचास रुपये की तो किसी दुकान से यूपीआई पेमेण्ट कर उससे कैश मांग लेता हूं।

पर आज सवेरे एक ए.1 का एटीएम पड़ा और उसका दरवाजा खुला था। पता नहीं क्या मन में आया मैं यह देखने के लिये कि मेरा एटीएम काम करता है या नहीं और एटीएम मशीन आजकल पैसा रखती है या नहीं; मैं अंदर चला गया। चार हजार रुपये कैश निकाल लिये। तो पर्स में पांच पांच सौ के आठ नोट आ गये थे।

राघवेंद्र जिस रास्ते पर मिले, सामान्यत: उससे वापस नहीं लौटता हूं मैं। पर उस दिन वहीं से मुड़ गया। उस रास्ते पर मुड़ना, राघवेंद्र दास से मुलाकात और मेरे पास पर्स होना, उसमें चार हजार रुपये आ जाना – यह सब संयोग भर था? और मैंने चार हजार रुपये निकाले थे, उसमें से पांच सौ रुपये देना क्या ऐसा नहीं था कि महादेव परीक्षा ले रहे हों कि यह बंदा चार हजार में से कितना दे देता है?! आप एक घटना को कई कई तरह से देख समझ और वर्णन कर सकते हैं। वही घर लौटने पर मेरी पत्नीजी और मैंने किया।

फ्रूगल जीवन और भूख लगने पर भोजन मांग लेना – दो बातें मेरे मन में घूम रही हैं। फ्रूगल जीवन तो मैं जीना चाहता हूं। कुछ प्रयास भी करता हूं। पर भूख लगने पर मांग कर खा लेने का भाव अभी तो नहीं ही आया या आने की सम्भावना भी नहीं लगती है। शायद वह आना, अपने आप को और सिकोड़ने की पराकाष्ठा हो। शायद।

राघवेंद्र से आगे मिलना होगा नहीं। पर एक छोटी सी मुलाकात मन में बहुत कुछ उथल पुथल दे गयी।

मैंने अपना पर्स निकाल कर उन्हें पांच सौ रुपये दिये। राघवेंद्र ने अपना थैला खोल कर एक पतली सी पुस्तिका, जिसपर कन्नड़ या तेळुगू में लिखा था; में पांच सौ रुपये सहेज दिये। मुझे धन्यवाद दिया और कहा कि ये पांच सौ उन्हें साइकिल खरीदने में सहायक होंगे।

चारधाम यात्रा के अंतिम धाम की ओर प्रेमसागर


आठ मई 2022 –

सात मई की शाम को प्रेमसागर अगस्त्य मुनि की लॉज में डेरा डाले थे। आठ की सुबह आगे रवाना हुए। गूगल मैप के अनुसार अगस्त्य मुनि से केदार 71 किमी दूर है। इस यात्रा में तीन दिन लगने चाहिये थे। पर प्रेमसागर ने वह दूरी दो दिन में ही तय कर ली। वही नहीं वे वापस भी लौट आये, रात भर चलते हुये। गजब प्रॉवेस। गजब ऊर्जा, गजब इच्छा शक्ति।

मैंने उनके केदार होने के बारे में पहले ही लिख दिया है। अब उनके द्वारा बीच के दिनों में दिये इनपुट्स के आधार पर यह विवरण लिख रहा हूं। प्रेमसागर के साथ नित्य चर्चा के अनुसार ट्रेवलॉग लेखन की आदत छूटने के कारण तारतम्य गड़बड़ हो गया है। कभी कभी यह भी लगता है कि जब आधे से ज्यादा यात्रा का विवरण है ही नहीं तो अब पैबंद-पैचवर्क का क्या तुक है? लेकिन फिर लिखने में जुट जाता हूं।

आठ मई, चाय की दुकान

आठ मई की सुबह प्रेमसागर का फोन आया। वे तीन किलोमीटर चल चुके थे सवेरे। चाय की दुकान पड़ी थी, तो चाय पीने रुक गये थे। “यहां सब कुछ बहुत मंहगा है। इसमें इन बेचारे दुकानदारों की गलती नहीं। यही कुछ महीने हैं जिनमें इन्हें दुकान से आमदनी होती है। उसके बाद तो साल का आधा भाग बिना कोई ग्राहक के चला जाता है। अभी जिस दुकान में आया हूं, वह तीन दिन पहले खुली है। यहीं गांव के हैं दुकान वाले। लोकल। पर दुकान का सब सामान उन्हें नीचे रुद्रप्रयाग से ले कर आना होता है। पास में बाजार नहीं है। रास्ते में यात्री बहुत हैं, पर वाहनों में हैं। पैदल चलने वाला तो मुझे कोई दिखा ही नहीं आज। चाय तीस रुपये कप मिल रही है। इस कीमत के कारण मैंने पीना बहुत कम कर दिया है। दिन में एक दो कप, बस।” – प्रेमसागर ने कहा।

प्रेमसागर का इरादा गुप्तकाशी पंहुचने का था। अगस्त्य मुनि से गुप्तकाशी 26-26 किमी दूर है। “महादेव की कृपा हो जो आज गुप्तकाशी पंहुचा दें।” कांधे पर कांवर और अन्य सामान था। “अब साथ के सामान को पहले की अपेक्षा बहुत कम कर लिया है। पर फिर भी 10-15 किलो तो होगा ही। गर्म कपड़ा है – एक गर्म चद्दर और बेडशीट। गर्म जैकेट भी है।”

प्रेमसागर की कांवर और पिट्ठू – कुल वजन करीब 15 किलो होगा।

मैंने चाय की दुकान पर सामान और कांवर का चित्र ले कर भेजने को कहा। सामान जरूर 15 किलो के आसपास होगा, पर साइज में काफी था। बल्की। उसे उठा कर पहाड़ पर चढ़ना मशक्कत है। गुजरात में तो प्रेमसागर को सामान के कर पीछे पीछे चलने वाले भक्त लोग मिल गये थे; यहां सब उन्हें खुद ही करना था। व्यक्ति की पहचान इसी से होती है कि सुविधा-असुविधा सब में वह सम भाव से रहे। यहां अकेले चलने को ले कर प्रेमसागर को बहुत कुड़बुड़ाते नहीं पाया मैंने। यह जरूर कह रहे थे कि महादेव सहायता करें। किसी तरह पार लगा दें। “महादेव आज शाम तक गुप्तकाशी पंहुचा दें! आगे रास्ता ऊंचा और कठिन है।”

प्रेमसागर ने फोटो भेजते समय लिखा – अंकित नेगी; ये बच्चा ट्विटर मे देखा था मुझे , रोक कर नास्ता पानी कराया।

पर शाम तक वे गुप्तकाशी नहीं पंहुच पाये। चार किलोमीटर पहले ही मौसम खराब हो गया। आंधी और बारिश होने लगी। उन्हें रुकना पड़ा। एक लॉज में शरण मिली। लॉज के भरत सिंह जी काम आये। यहां किराया भी मामूली था – दो सौ रुपया। भोजन तो शायद भरत सिंह जी ने ही करा दिया।

रास्ते में एक हाइडल पावर प्लाण्ट पड़ा। जगह जगह बोर्ड लगे हुये थे कि जमीन धसक सकती है। कहीं कहीं तो सतत टूटटे पहाड़ दिखे। रास्ते के कष्ट और मौसम की विकटता के कारण प्रेमसागर बहुत चित्र नहीं ले सके। उनके चित्रों में वैसे भी धुंधलापन है। शायद लेंस पर कुछ जमा हो गया है। या फिर मौसम के कारण दृष्यता कम हो गयी रही हो।

नौ मई 2022 –

नौ मई को सवेरे चल कर प्रेमसागर शाम तक फाटा पंहुचे। कुल 19 किमी चले होंगे। शाम को किसी लॉज में जगह मिली। काफी डिस्काउण्ट के बाद 1200 रुपये में। प्रेमसागर के कहने से लग रहा था कि उनके पास ज्यादा आर्थिक रीसोर्स हैं नहीं। दो हजार रुपये प्रति दिन के खर्चे का भार ज्यादा ही होगा। मैं सोचता था कि पोरबंदर-राजकोट के अनुभव के बाद प्रेमसागर की रहने खाने और अन्य जरूरतों की समस्या नहीं रहेगी। मैं सही नहीं सोचता था। प्रेमसागर ने कुछ कहा नहीं, पर मैंने अपने हिसाब से कुछ पैसा उनके यूपीआई पते पर – prem12shiv@sbi – पर भेजा। इसके पहले मैंने प्रेमसागर के बारे में लिखा भर था; उनकी आर्थिक सहायता खुद करने की नहीं सोची थी। कभी 500रुपये से ज्यादा दिया नहीं था। यदा कदा उन्होने मिठाई खाने के लिये 10 रुपये मांगे थे तो मैंने 100रुपये भेजे थे। बस।

आशा करता हूं कि लोग उनकी सहायता करेंगे।

दो दिन से प्रेमसागर केदार नाथ धाम में चल रही एक अफवाह की बात कर रहे थे – कि वहां भगदड़ से 12-15 लोगों की मृत्यु हो गयी है और कपाट बंद कर दिये गये हैं। वापस आते लोग यह अफवाह सुना रहे थे। ऐसी कोई खबर कहीं मीडिया में पाई नहीं गयी। अंतत: आज नौ मई शाम को प्रेमसागर ने बताया कि शायद कोई पुलीस वाला ज्यादा कमाई के फेर में एक साथ ज्यादा लोगों को मंदिर के पास जमा कर लिया था। उसके कोई अनहोनी टालने के लिये कुछ समय के लिये मंदिर के कपाट बंद किये गये थे। … जहां मेला लगता है, लोग जुटते हैं वहां अफवाह भी जन्म लेती है। और यह संचार के त्वरित साधनों के युग में भी होता है!

10-11 मई 2022 –

दस मई को सवेरे साढ़े आठ बजे प्रेमसागर से बात हुई। वे फाटा से भोर तीन बजे ही निकल लिये थे। उनका इरादा एक ही दिन में केदारनाथ दर्शन सम्पन्न करने का था। पता नहीं यह निर्णय उन्होने क्यों किया। शायद रास्ते में चाय पानी भोजन और रहने की दरों में बेतहाशा उछाल ने उन्हें यह प्रेरित किया हो कि जल्दी से जल्दी दर्शन कर लौट जायें। या भगवान महादेव जल्दी आने को कह रहे थे। जो भी कारण हो, एक ही दिन में 36 किमी जाने और छतीस किमी वापसी की यात्रा प्रेमसागर ने सम्पन्न की। साथ में शायद बहुत सामान नहीं लिया था – फाटा में शायद कहीं रखा हो। साथ में एक पिट्ठू और गोमुख का जल लिया होगा।

सवेरे साढ़े आठ बजे वे सोन प्रयाग में थे। एक छड़ी खरीद रहे थे। आगे के ऊंचे रास्ते में बिना छड़ी और रेनकोट के चलना कठिन होता।

इसके आगे का विवरण मैंने केदारनाथ, 11वाँ ज्योतिर्लिंग दर्शन सम्पन्न, प्रेमसागर नामक पोस्ट में दे रखा है। प्रेमसागर 36 किमी चल कर केदार दर्शन कर अगले दिन 11 मई को सवेरे तक फाटा वापस आ चुके थे। पहाड़ की हिमाद्रि की 72 किमी से अधिक की यात्रा एक दिन में – अपने दमखम का इतना कठिन परिचय, और संकल्प की दृढ़ता का इतना प्रमाण महादेव को शायद पहले कभी न दिया हो। महादेव निश्चय ही प्रसन्न हुये होंगे!

जय केदार! हर हर महादेव!

12-13 मई 2022-

केदार यात्रा से फाटा 11 मई को लौटे प्रेमसागर। पर फाटा नहीं रुके। वे आठ मई की शाम को गुप्तकाशी के चार किमी पहले एक लॉज में ठहरे थे। वह स्थान ऊखीमठ के सामने है। ऊखीमठ मंदाकिनी के दूसरे छोर पर है और यह नदी के इस छोर पर। वहीं के भरत सिंह जी उन्हें फाटा से सम्भवत अपने दुपहिया वाहन पर लॉज में ले आये। यहां उनका किराया भी नाम-मात्र का था और भरत सिंह जी का आतिथ्य भी। पूरे दिन और रात भर वे सोये। अगले दिन सवेरे वे रवाना हो कर किसी वाहन से रुद्रप्रयाग आ गये।

कर्णप्रयाग से चोटी का दृष्य। मैसम खराब हो रहा था।

तेरह मई को शाम के समय कर्णप्रयाग से प्रेमसागर ने बात की। सवेरे जल्दी चल कर प्रेमसागर करीब 33-34 किमी चल कर कर्णप्रयाग पंहुचे थे। रुद्रप्रयाग से बदरीनाथ की पैदल यात्रा वे कर रहे हैं। केदारनाथ की यात्रा की चारधाम यात्रा एक अनुषांगिक (सबसीडियरी/एंसिलियरी) यात्रा है। वैसे भी कांवर यात्री को गंगोत्री/गोमुख से जल लेना होता है केदारनाथ को चढ़ाने के लिये। केदारनाथ के दर्शन के बाद शैव-वैष्णव एकात्मता के प्रतीक के रूप में बदरीनाथ का दर्शन उसके साथ जुड़ा है। वैसे भी प्रेमसागर अब तक यमुनोत्री गंगोत्री/गोमुख और केदार की यात्रा सम्पन्न कर चुके हैं। अब उन्हें हिमालय में बदरीनाथ दर्शन ही करने हैं।

कर्णप्रयाग – पिण्डार (दांये) और अलकनंदा का संगम

कर्णप्रयाग के कुछ चित्र भेजे। यहां पिण्डार नदी अलकनंदा में आ कर मिलती हैं। संगम है दोनो नदियों का। वहीं किसी लॉज में प्रेमसागर रुके थे। उनके भेजे चित्रों में संगमस्थल और अलकनंदा पर एक पैदल-पुल अच्छे से दीखता है। मौसम खराब था। बारिश होने लगी थी। ज्यादा चित्र वे दिन भर की यात्रा के नहीं दे पाये, पर जो दिये, वे संतोषजनक कहे जा सकते हैं।

कर्णप्रयाग संगम पर प्रेमसागर

अकेले यात्रा पर हैं प्रेमसागर। केदार यात्रा सम्पन्न करने का संतुष्टि भाव उनमें है और बदरीनाथ धाम की यात्रा सम्पन्न करने की आतुरता है। आगे 120 किमी की पैदल यात्रा है बदरीनाथ तक। कल उनका ध्येय गोपेश्वर पंहुचने का है। गोपेश्वर 37-38किमी दूर है। मैं नक्शे में देखता हूं तो रास्ते में नंदप्रयाग दिखता है, जहां अलकनंदा में नंदाकिनी नदी आ कर मिलती हैं। … इलाके में जाने कितने प्रयाग हैं – जाने कितने संगम। यह जरूर है कि प्रेमसागर के बारे में न लिखना होता तो मैं गढ़वाल के नक्शे को इतनी बारीकी से नहीं देखता। और इतनी बारीकी से प्रेमसागर ने भी नहीं देखा होगा। वे तो लोगों के बताये रास्ते पर निकल पड़ते हैं। अपने पैरों, अपनी कांवर और अपने वेश का सहारा लिये हुये। प्रेमसागर पहाड़ के लोगों से प्रभावित हैं – “भईया वे सब बहुत सरल हैं और सहायता करना चाहते हैं। उनकी भी मजबूरी है। कमाई के लिये यही कुछ महीने उन्हें मिलते हैं। इस कमाई से ही उन्हें साल भर का खर्च चलाना होता है।”

मेरा इस यात्रा के दौरान प्रेमसागर से सम्पर्क उतना रीयल टाइम नहीं है। मैं पहले की तरह उन्हें बार बार फोन नहीं करता। हर कदम पर उनकी यात्रा ट्रैक नहीं करता। वे दिन में एक बार फीडबैक देते हैं। वही मुख्यत: सम्पर्क है। एक ट्रेवलॉग लिखने के लिये यह पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। तनिक भी नहीं। पर यही चल रहा है। जब तक मैं यात्रा के विषय में चार्ज हूँगा, तब तक हिमालय की यह यात्रा सम्पन्न हो जायेगी। बदरीनाथ दर्शन में दो-चार दिन भर ही लगेंगे। उसके बाद हेमकुण्ट साहिब या फूलों की घाटी तो प्रेमसागर की यात्रा में होगा नहीं।

खैर, देखें आगे की यात्रा कैसे होती है!

हर हर महादेव!

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