कंकर में शंकर और नरसिंहपुर से आगे


पता नहीं भोलेनाथ किसपर प्रसन्न होते हैं; पर मुझे भोलेनाथ की ओर से कांवर यात्रा का अंतिम परीक्षा प्रश्नपत्र बनाने का चांस मिलता तो मैं एक ही प्रश्न उसमें रखता – क्या तुमने यात्रा के दौरान मुझे बाहरी दुनियां में देखा? देखा तो कितना देखा?

किसका अनुशासन ज्यादा है और किसकी उन्मुक्तता ज्यादा है – नर्मदा परिक्रमा की या द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा की? यह प्रश्न मेरे मन में कई बार उठता है। नर्मदा परिक्रमा के नाम पर अमृतलाल वेगड़ जी की तीन किताबें मेरे सिरहाने पड़ी रहती हैं – कई दिनों से आसपास रखी हैं वे। और कांवर यात्रा का तो मैं डिजिटल सहभागी हूं। दोनो यात्राओं के कालखण्ड भिन्न हैं। दोनो के ध्येय भिन्न हैं और दोनो का गांवदेहात की संस्कृति छूने का अंदाज अलग है। वेगड़ मंदिर के चबूतरे पर, मड़ई में, ओसारे में और कभी कभी तो किसी पेड़ के नीचे भी डेरा जमाये हैं। उन्हें कभी, पूनम की रात में खीर बनाने के लिये गांव के कई लोगों से दूध इकठ्ठा करना पड़ा है। उनके ट्रेवलॉग में गांव की विपन्नता है पर उसकी दरियादिली और सरलता भी है।

वेगड़ जी की नर्मदा त्रयी।

मैं प्रेमसागर से कई बार पूछता हूं कि कभी जंगल में गाय-गोरू चराते चरवाहों से बात हुई? रास्ते में कोई गरीब, विपन्न दिखा? कभी सड़क किनारे ही सही किसी झोंपड़ी के सामने चारपाई पर या जमीन पर घण्टा आध घण्टा व्यतीत किया? मैं कई बार कहता हूं कि ज्योतिर्लिंग के अर्ध्य में ही शिवत्व नहीं है, वे इन मूर्त रूपों में भी हैं। सर्वव्यापक हैं महादेव!

ऐसा नहीं कि प्रेमसागर कोशिश नहीं करते। उत्तरोत्तर उनके देखने और बताने में परिष्कार हुआ है। पर यात्रा के शिवत्व पर गंतव्य का शिवत्व अभी भी भारी पड़ रहा है। अभी उनका औसत चलना 35 किलोमीटर के आसपास हो रहा है। मेरा बस चले तो मैं उन्हें कहूं कि उसे घटा कर पच्चीस किमी पर ले आयें और कस्बों-शहरों के बीच गांव देहात का अनुभव और उसका वर्णन अधिक करें। उन्हें गाकड़ भरता बनाना आता है। कभी कभी अपने सीधा-पिसान और आसपास उपलब्ध आलू और बैंगन का प्रयोग कर वह भी बनायें। वन कर्मी या आसपास के लोग जो उनके साथ पचीस पचास किलोमीटर चल सकते हों, वे एक दो दिन साथ चलें, रहें। महादेव उससे प्रसन्न होंगे! यात्रा की अवधि एक तिहाई बढ़ जायेगी, पर उससे यात्रा की सार्थकता द्विगुणित हो जायेगी। कंकर में शंकर हैं या यूं कहूं कि शंकर कंकर में ही है! :-)

प्रेमसागर

वेगड़ एक जगह लिखते हैं कि उनके गुरू नंदलाल बोस ने कहा था – सफल बनने के पीछे न भागना, सार्थक बनना। द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा की सार्थकता यात्रा के रस में है, यात्रा में शिवतत्व खोजने और अनुभव करने में है। पता नहीं भोलेनाथ किसपर प्रसन्न होते हैं; पर मुझे भोलेनाथ की ओर से कांवर यात्रा का अंतिम परीक्षा प्रश्नपत्र बनाने का चांस मिलता तो मैं एक ही प्रश्न उसमें रखता – क्या तुमने यात्रा के दौरान मुझे बाहरी दुनियां में देखा? देखा तो कितना देखा?


8 अक्तूबर रात्रि –

आज मैंने आधा पौना घण्टा लगाया प्रेमसागर को यह बताने के लिये कि वे टेलीग्राम या ह्वाट्सएप्प पर किस प्रकार से अपना लोकेशन शेयर कर सकते हैं। उनकी यात्रा को ट्रैक करना उससे आसान हो जायेगा। उन्होने सेट कर लिया टेलीग्राम को शेयरिंग के लिये। मुझे दोपहर दो बजे तक उनका मार्ग और स्थान पता चलता रहा। तब आठ घण्टे पूरे हो गये और उसके बाद आगे आठ घण्टा सेट करने की जहमत उन्होने नहीं उठाई। मैंने उनसे कहा भी, पर वे नहीं कर पाये।

कभी वे काफी टेक-सैवी लगते हैं और कभी बिल्कुल अनाड़ी। आज अनाडीत्व भारी पड़ रहा था। मसलन मैंने सवेरे पाया कि उनके स्मार्टफोन में गूगल मैप ही नहीं है। आधुनिक काल में बिना गूगल मैप के भारतवर्ष की यात्रा का बीड़ा उठा लेना मुझे वैसा ही लगा जैसे जुगनू या एक दिया ले कर अंधेरे को चीरते निकल पड़ना। वह तो महादेव जी ने उन्हें वन विभाग के लोगों और अन्य सुधी जनों की सहायता उपलब्ध करा दी है अन्यथा वे तो बस निकल पड़े थे! बस! सरलता के एक सुदूर छोर पर हैं प्रेमसागर! उतना सरल होना भी खतरनाक (?) है। …. पर उसके उलट एक सोच यह भी है कि लक्ष्य की विशालता का कोई पूरा आकलन कर चलने की सोचे तो शायद शुरू ही न कर पाये। आकलन के जाल में ही उलझ जाये। बड़ी बात यह है कि प्रेमसागर निकल लिये हैं और अब तक करीब एक हजार किमी चल चुके हैं! पर बिना आकलन और आकलन के मकड़जाल इन दोनो छोरों के बीच कोई मध्यबिंदु तो होगा?!

चलते समय नरसिंहपुर में उन्होने वीरेंद्र जी से बात कराई। वीरेंद्र मेहरा (जैसा उनके बोर्ड से दिखता है) व्यवसायी हैं। उनका होटल है जहां प्रेमसागर रुके थे। वीरेंद्र जी परक्कमा वालों की सेवा करते हैं। नर्मदा परिक्रमा वाले उनके यहां ठहरते हैं। और उसके अनुसार उनका होटल सात्विक भोजन वाला है – शाकाहारी, बिना लहसुन प्याज वाला। वीरेंद्र जी ने आगे भी प्रेमसागर को सहायता देने की बात कही। उन्होने रास्ते में पड़ने वाले उन लोगों के फोन नम्बर भी प्रेमसागर को दिये हैं जो सहायता कर सकते हैं।

वीरेंद्र जी बोले – “अब, महराज जी के साथ तो साक्षात भोलेनाथ हैं ही। सो उनको क्या दिक्कत है! यह तो हमारे लिये बड़ी सौभाग्य की बात है कि इतनी बड़ी यात्रा करने वाले की एक दिन सेवा का हमें मौका मिला। हमारे यहां जो संत लोग परिक्रमा पर आते हैं, उनको तो सेवा करने का मौका हमें यहां नरसिंहपुर में होटल होने के कारण तो मिलता ही है। … कराता तो सब ईश्वर ही है। हम तो निमित्त मात्र बना कर यहां बिठा दिये गये हैं।”

वीरेंद्र जी के साथ प्रेमसागर

वीरेंद्र मेहरा जी कर तो बिजनेस रहे हैं, पर उनका सेवाभाव और उनकी विनम्रता उनको बरक्कत देता ही होगा! उनसे बात करा कर प्रेमसागर निकल ही लिये होंगे आगे की यात्रा पर।

वीरेंद्र जी के होटल के बाहर निकलने को तैयार प्रेमसागर

प्रेमसागर ने बताया कि रास्ते में – करीब दोपहर में – एक नब्बे साल के वृद्ध मिले। लंगड़ा रहे थे। बोले कि उनके पांव में कांटा चुभ गया है। निकल नहीं रहा। प्रेमसागर ने अपनी कांवर एक ऊंचे स्थान पर टांगी। पानी ला कर वृद्ध का पैर धोया जिससे उनके तलवे में गड़ा कांटा नजर आ जाये। पर कांटा बहुत ध्यान से देखने पर भी कहीं दिखा नहीं। “तब भईया हम उन्हें पचास रुपिया दिये और कहा कि किसी डाक्टर के यहां जा कर कांटा निकलवा लें। मैं तो उन्हें अपनी सैण्डल भी दे रहा था, पर उनने मना कर दिया यह कहते हुये कि कभी चप्पल पहने नहीं हैं।”

“यह तो आपने बहुत अच्छा किया। उन वृद्ध का चित्र लिये क्या?” – मैंने पूछा। उन्होने कहा – “नहीं, मुझे चित्र लेना अटपटा लगा।”

गोस्वामी जी और सोनी जी के साथ प्रेमसागर पेड़ के नीचे। प्रेम सागर जी को भोजन परोसा जा रहा है।

उसके बाद ही करोली गांव पड़ा जहां तीन लोग रास्ते में मिले – गोस्वामी जी, सोनी जी और यादव जी। उन्हें शायद नरसिंहपुर से किसी ने, शायद वीरेंद्र जी ने खबर की होगी। ये लोग परकम्मा वालों को भोजन कराते हैं। वे लोग अपने साथ प्रेमसागर के लिये भोजन ले कर आये थे। एक आम के वृक्ष के नीचे प्रेमसागरजी को उन्होने भोजन कराया। भोजन करा कर वे लोग चले गये तो वहीं पर प्रेमसागर ने एक नींद निकाली पेड़ की छाया में। यूं इतना चलने, वह भी तेज गर्मी में और दिनों दिन चलते रहने के कारण नींद की कमी तो प्रेमसागर को होगी ही। बाद में मैंने उन्हे कहा कि उन्हें अपना चलने के अनुशासन की अति नहीं करनी चाहिये।

प्रेमसागर जी को भोजन कराते यादव जी।

वहीं उनसे मिलने और उनका सामान आगे ले कर चलने के लिये एक वन कर्मी आ गये। वे अपनी मोटर साइकिल पर सामान ले कर आगे पीछे चलते रहे। एक गांव (नाम बताया था करमदा) में उन्हें रात्रि विश्राम करना था पर जिन सज्जन के यहां ठहरना था, उनके घर में कोई पारिवारिक विवाद हो गया था। वहां रुकना नहीं हो सका। वहां पंहुचते शाम हो गयी थी और रुकने का ठिकाना तय नहीं था। अंतत: प्रेमसागर को दस बारह किलोमीटर और चलना पड़ा और कौड़िया गांव में राजकुमार रघुवंशी जी के यहां रात्रि विश्राम हुआ।

प्रेमसागर और राजकुमार रघुवंशी
9 अक्तूबर 21, सवेरे –

सवेरे प्रेमसागर को एक बार फिर समझाया कि अपनी लोकेशन शेयर कैसे करनी है। आज वे कहते हैं कि उन्हें ठीक से समझ आ गया है। रात में कुछ आराम मिला है और दिन में आज केवल गाडरवारा तक जाना है जो यहां से पांच सात किलोमीटर की दूरी पर है। रेंजर साहब ने सम्पर्क भी किया है। सवेरे सात-सवा सात बजे तक राजकुमार यदुवंशी जी के यहां से; कौड़िया गांव से; प्रेमसागर निकल लिये। नौ बजे सक्कर नदी पार कर लिये थे। कुछ लोग उनसे मिलने आये थे। चाय की भी दुकान थी।

चायवाले के साथ प्रेमसागर

आगे गाडरवारा है जहां उन्हें रुकना है। अच्छा है कि आज चलना ज्यादा नहीं है। थकान और नींद की कमी की पूर्ति हो सकेगी।

सक्कर नदी, गाडरवारा और उसके बाद की चर्चा अगली पोस्ट में।

आज सवा नौ बजे तक की यात्रा – कौड़िया गांव से सक्कर नदी के पुल तक।
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गोटेगांव से नरसिंहपुर और मुन्ना खान की चाय


7 अक्तूबर 21, शाम –

“विदा लेते समय भईया लड़की की विदाई का सा माहौल हो गया था। लोगों की आंखों में आंसू थे।” – प्रेमसागर ने कहा। प्रेमसागर को उपमा देते नहीं पाया मैंने पहले। दृश्य भावभरा रहा ही होगा! एक अजनबी कांवर ले कर चल रहा व्यक्ति ऐसे आत्मीय हो जाता है!

आज नरसिंंहपुर तक की यात्रा 38किमी की थी। कल 62 की होने के कारण आज प्रेमसागर आगे की यात्रा पर निकले देरी से। वैसे सवेरे जल्दी निकलने पर चलना तेज होता है, पर थकान रही होगी कल की। देर से निकलने का मतलब दिन की तेज धूप का सामना करना था और जो तेजी सवेरे होती, वह शायद धूप बढ़ने के पहले ही 20-25 किमी का रास्ता तय करा देती।

उन्हें लोग छोड़ने एक लिये आये थे। एसडीओ खत्री जी ने गोटेगांव में रुकवाया उन्हें अपने एक मित्र के होटल में था। सवेरे अपने घर पर उन्होने आमंत्रित किया। नाश्ते के लिये तो प्रेमसागर ने मना किया – “खा लेने पर चलने में आलस आता है और चलना नहीं हो पाता।” पर उनके यहां मिले प्रेम भाव की बात मुझसे फोन पर वे बार बार करते रहे। उनकी बिटिया जो सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, को कांवर के प्रति कौतूहल था। उसने कांवर उठाने के लिये मांगा – “बाबा जी, एक बार उठाने दीजिये।”

एसडीओ खत्री जी अपने परिवार के साथ।

“मैं कांवर दूंगा उठाने को अगर तुम मुझे चाचा जी या अंकल जी कहोगी। बाबा या महराज नहीं हूं मैं।” – प्रेमसागर ने कहा। उन्हें विदा करने के लिये बहुत से लोग सड़क पर आये। प्रेमसागर जी ने नाम बताया कि टोनी सिंह जी का परिवार था। वे एसडीओ साहब के मित्र हैं और व्यवसायी भी। वे लोग करीब तीन किमी साथ चले। औरतें भी थीं। “विदा लेते समय भईया लड़की की विदाई का सा माहौल हो गया था। लोगों की आंखों में आंसू थे।” – प्रेमसागर ने कहा। प्रेमसागर को उपमा देते नहीं पाया मैंने पहले। दृश्य भावभरा रहा ही होगा! एक अजनबी कांवर ले कर चल रहा व्यक्ति ऐसे आत्मीय हो जाता है!

मैने लोगों में उपजने वाली श्रद्धा की कल्पना की थी; ऐसी आत्मीयता की नहीं। लोगों के भाव समझने के लिये बाहर निकलना होता है, की-बोर्ड पर वे भाव नहीं उभरते। डिजिटल-ट्रेवलॉग की सीमायें हैं। बहुत संकुचित सीमायें। पर यह भी है कि उत्तरोत्तर प्रेमसागर अपने को बेहतर अभिव्यक्त करने लगे हैं। शायद मुझसे भी उनकी आत्मीयता बढ़ रही है।

आत्मीयता इस तरह है कि बात बात में प्रेमसागर मुझसे “उपदेश” भी पा रहे हैं और कभी कभी डांट भी। पर उसका बुरा माना हो, ऐसा फिलहाल नहीं लगा।

गोटेगांव से रवाना होने के पांच किलोमीटर आगे एक चाय की दुकान पर एक मुस्लिम बुजुर्ग बैठे थे। उन्होने बड़ी आत्मीयता से प्रेमसागर को पास बुलाया। उन्हें चाय पिलाई। गर्मी बहुत थी। इसलिये प्रेमसागर की उनसे बातचीत ज्यादा नहीं हुई। पर उनके बारे में उन्होने मुझे संदेश दिया –

मुन्ना खान
एक चाय की दुकान में चाचा’ जिनका नाम मुन्ना खान है ने बड़े प्यार से बुला कर
चाय पिलाये। इनका बहुत-बहुत धन्यवाद।
मुन्ना खान जी बोले – “हमको इंसान से मतलब है
धर्म से नहीं हम जानते हैं कि हम लोग इंसान हैं।
मेरा मक्का मदीना या आपका शिव एक ही है।
मेरा नाम मुन्ना खान है
आइए आप चाय पी लीजिए”
हम उनका बात को काट नहीं पाये।
हमने बैठकर चाय पी ली। मुन्ना खान जी का बात व्यवहार हमको बहुत ही अच्छा लगा।
हर हर महादेव
मुन्ना खान जी पर प्रेमसागर का टेलीग्राम पर संदेश्।

और भी लोग मिले रास्ते में। ये सज्जन मिले जिन्होने प्रेमसागर का काफी आदर सत्कार किया। दही-चीनी खिलाया। उनका नाम तो नहीं बता सके प्रेमसागार, पर चित्र जरूर ले लिया। राह चलते कांवर उठाये यात्री से आदर, श्रद्धा, प्रेम से बात करना, पानी, गुड़, चाय या दूध आदि पिलाना – यह बड़ी बात है।

ये सज्जन मिले जिन्होने प्रेमसागर का काफी आदर सत्कार किया।

आगे रास्ते में घाटी थी, लगभग एक किलोमीटर लम्बी घाटी। हरियाली और नदी भी दिखी। इलाके में गन्ना की खेती बहुत होती है। चित्र अच्छे हैं, पर प्रेमसागर शायद धूप और गर्मी से बेहाल थे। वे शाम सात बजे के आसपास नरसिंहपुर पंहुचे। उनके चित्र भी मुझे रात दस बजे के बाद मिले।

एक मंदिर के चित्र भी भेजे हैं। कोई दादा महराज। “ये बहुत चमत्कारी बाबा हैं। इनको मैंने पानी पीते देखा।” – प्रेमसागर ने बताया।

ऐसा पानी या दूध पिलाने का अनुष्ठान कई मंदिरों-मूर्तियों में भारत में (और बाहर भी) होता है। सर्फेस टेंशन का प्रयोग कर ऐसा प्रतीत होता है कि मूर्ति तरल पी रही है। इसी फिनॉमिना के तहद भारत भर में गणेश जी दूध पिये थे एक बार! मैं वे सभी चित्र एक स्लाइडशो में लगा दे रहा हूं। यात्रा में सौंदर्य, भाव, श्रद्धा, चमत्कार, भौतिकी – सब गड्ड-मड्ड है!

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जबलपुर से गोटेगांव


6 अक्तूबर, शाम –

मुझे लगता है कि आगे की ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा करने वालों के लिये प्रेमसागर एक मानक तैयार कर रहे हैं। क्या पहनें, क्या खायें, कैसे चलें आदि के मानक। वैसे यह भी है कि इस प्रकार की दुरुह और कष्टसाध्य यात्रा करने वाले भविष्य में नहीं ही होंगे। मेरे जैसा व्यक्ति द्वादश ज्योतिर्लिंग की साइकिल कांवर यात्रा या ई-साइकिल कांवर यात्रा की सोच सकता है। पर उसके मानक अलग तय होंगे।

आज की यात्रा सबसे लम्बी थी प्रेमसागर की। दो दिन जबलपुर में व्यतीत करने के बाद आज 62 किमी चलना था। सो भोर में चार-साढ़े चार बजे के बीच निकलना हुआ। वन विभाग के एक कर्मी 15 किलोमीटर साथ उनके साथ आये। सामान उन्होने उठा रखा था, कांवर प्रेमसागर ने। रास्ते में शुरुआत में ही नर्मदा माई का पुल पड़ा। अंधेरे में कुछ दिख नहीं रहा था। पुल की लाइट से पुल का पार करना भर पता चला। पांच बजे के पहले ही एक चाय की दुकान पर चाय पी; दिन की पहली चाय। चाय पीने के साथ एक अनुष्ठान चाय की दुकान की फोटो खींचना जुड़ गया है प्रेमसागर की यात्रा में। दो घण्टे बाद, सवेरे के उजाले में एक और चाय की दुकान का फोटो है। अर्थात पौने सात बजे तक दूसरी चाय भी हो गयी थी। जो वन कर्मी साथ आये थे वे लौट गये थे।

करीब 18 किमी तक का रास्ता कवर कर चुके थे प्रेम सागर जब मेरी उनसे सात बजे के पहले बात हुई थी। अभी भी उन्हें चालीस-पैंतालीस किलोमीटर चलना था; अपने पूरे सामान के साथ।

पौने सात बजे तक प्रेम सागर की दूसरी चाय भी हो गयी। भोर में अंधेरे में निकलने पर किसी भी चाय की दुकान पर रुकने का आकर्षण रोक पाना एक आम आदमी के लिये कठिन है। निकलती चाय की भाप आपनी ओर खींचती है! और उसमें अगर अदरक की महक आ रही हो तो क्या कहने।

पौने सात बजे तक प्रेम सागर की दूसरी चाय भी हो गयी।

कल जियो का नेटवर्क मरो की दशा में था। इसलिये मार्ग में प्रेमसागर जी के साथ वार्तालाप नहीं हो पाया। उनके अपडेट चित्रों की खेप जो अंतराल में आती रहती थी, वह भी नदारद थी। एक जगह उनसे सम्पर्क हुआ। मैंने उन्हें कहा कि अपनी लोकेशन शेयर कर दिया करें। टेलीग्राम या ह्वाट्सएप्प में शेयर करने पर आठ घण्टे तक ट्रेस किया जा सकता है कि पथिक किस रास्ते से गुजर रहा है। उनका जवाब था – “कल से करूंगा भईया, काहे कि आज तो नेट ही तकलीफ दे रहा है। आपको उससे जन्कारियै नहीं मिलगा, ठीक से।”

बारह बजे के लगभग एक शॉर्टकट से घूमे प्रेमसागर। सड़क की बजाय गिट्टी और लाल बालू जैसा दिख रहा है रास्ता। अगर नंगे पैर चलते होते तो निश्चय ही वह तलवे में चुभता। अब उनके पास रबर सोल की सैण्डल है – इसलिये दिक्कत नहीं हुई होगी। मुझे लगता है कि आगे की ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा करने वालों के लिये प्रेमसागर एक मानक तैयार कर रहे हैं। क्या पहनें, क्या खायें, कैसे चलें आदि के मानक। वैसे यह भी है कि इस प्रकार की दुरुह और कष्टसाध्य यात्रा करने वाले भविष्य में नहीं ही होंगे। मेरे जैसा व्यक्ति द्वादश ज्योतिर्लिंग की साइकिल कांवर यात्रा या ई-साइकिल कांवर यात्रा की सोच सकता है। पर उसके मानक अलग तय होंगे।

बारह बजे के लगभग एक शॉर्टकट से घूमे प्रेमसागर। सड़क की बजाय गिट्टी और लाल बालू जैसा दिख रहा है रास्ता।

एक जगह कोई जगदीश मंदिर में प्रेमसागर जी विश्राम किये। वहां के व्यवस्थापक नेतराम तिवारी जी ने उन्हें दूध पिलाया। मंदिर में एक बछिया का सुंदर चित्र भी प्रेमसागर ने भेजा है। राह में लोगों से मिलना, आराम करना और बोलना बतियाना यात्रा के सुखद पक्ष हैं। नेतराम जी दूध पिलाने में श्रद्धाभाव देख रहे थे या सामान्य सत्कार; ये वे ही जानें, पर इस तरह के कृत्य बताते हैं कि हिंदुत्व का व्यवहारिक पक्ष अभी शुष्क नहीं हुआ है – जैसे कई व्यंगकार (या वामपंथी) देखते हैं और उसमें हिंदुत्व निंदा का रस लेते हैं।

बासठ – पैंसठ किलोमीटर की यात्रा पूरी कर प्रेमसागर शाम सात बजे के आसपास गोटेगांव पंहुच गये होंगे। कमरे में बृजमोहन शर्मा जी के साथ उनका सेल्फी वाला चित्र शाम सात बज कर बाईस मिनट का है। प्रेमसागर उघार बदन बैठे हैं। चश्मा लगाये। शायद पढ़ने के लिये लगाया होगा। यात्रा से थके, गौरईया से लगते हैं। प्रेमसागर द स्पैरो! जब मैंने अपने घर पर उन्हें महीना भर पहले देखा था, तब से अब मुंह कुछ सिकुड़ गया है। पर लगते ग्रेसफुल हैं। (ग्रेसफुल को हिंदी में क्या कहते हैं, जीडी? अभी भी तुम्हारी अंगरेजी शब्द ठेलने की प्रवृत्ति गयी नहीं। हिंदी नहीं सीखोगे तो अच्छा ट्रेवलॉग कैसे बनाओगे। :lol: )

यात्रा से थके, गौरईया से लगते हैं। प्रेमसागर द स्पैरो!

मैंने बृजमोहन शर्मा जी से बात की। वे एसडीओ साहब (खत्री जी) के बाबू हैं। प्रेमसागर जी की देखभाल के लिये खत्रीजी ने उन्हें डिप्यूट किया है। पूछने पर कि कैसे हैं प्रेमसागर, उनके प्रति अच्छा-अच्छा ही बोलते हैं। ऐसी यात्रा वाला कोई व्यक्ति पहले कभी देखा नहीं उन्होने। अपने परिवार के लोगों से भी बात की है उन्होने प्रेमसागर की। परिवार के लोग चाहते हैं कि प्रेमसागर उन्हें पारिवारिक कष्टों के बारे में कुछ उपाय बतायें। यही भाव बहुत से लोग रखते हैं। पता नहीं, प्रेमसागर वह सब कैसे डील करते हैं। उनसे पूछना होगा।

बासठ किलोमीटर काहे चले एक दिन में। तीस पैंतीस का मानक रख कर क्यों नहीं चलते? प्रेमसागर का जवाब था – “बीच में रुकने का स्थान भी नहीं था और मुझे लगा कि इतना चला जा सकता है।” सम्भव है पहले की अपनी कांवर यात्राओं में वे साठ बासठ किलोमीटर से ज्यादा चलते रहे हों। उन्होने बताया भी है कि सुल्तानगंज से गंगाजल ले कर देवघर अगले दिन – चौबीस घण्टे में 105 किमी चल कर – महादेव को अर्घ्य देते रहे हैं। वह भी एक बार नहीं सौ से अधिक बार। निश्चय ही उनकी चलने की प्रवृत्ति की कल्पना मुझ जैसा व्यक्ति नहीं कर सकता!

गोटेगांव का अगले दिन सवेरे लिया चित्र

कल प्रेमसागर गोटेगांव से नरसिंहपुर के लिये रवाना होंगे। कुल छत्तीस – अढ़तीस किलोमीटर का रास्ता है। आज के मुकाबले कम चलना होगा!

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