भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
पत्नीजी ने कमरे में लैपटॉप, बिस्तर और रज़ाई के कंफर्ट जोन से भगा दिया है। बताया है कि आज अलाव की भी जरूरत नहीं। आज लॉन में कुर्सियां लगा दी हैं। धूप अच्छी है। आसमान साफ है। वहीं बैठो। कमरा बुहारने दो!
और सच में आज लॉन शानदार लग रहा है। कार्पेट घास का आनंद लेने का समय है।
पक्षी और गिलहरियों की आवाज आ रही है। गुलाब और अन्य फूल खिले हैं। कमरे की बंद बंद हवा से अलग अनुभव हो रहा है। घर में काम करने वाले भी चहक रहे हैं। पत्नीजी एक राउण्ड चाय नाश्ता उन्हें दे चुकी हैं। “फुआ” – पत्नीजी पूरे गाँव भर की बुआ हैं – भी मगन हैं उनके द्वारा आदर पा कर। मैं इस आदर पाने की कॉस्टिंग (ख़र्चे का आकलन) करता हूँ। पर पत्नीजी को वह आदर मिलना उसके लिए हुए ख़र्चे से कहीं ज्यादा रुचता है।
गांव उनका है। कुछ ज्यादा कह भी नहीं सकते। 😊
बहरहाल, आज का दिन बढ़िया है। रिटायरमेंट का पूरा आनंद! 😁
अपडेट – डेढ़ घंटे बाद की दशा
सूरज के आसमान में चलने के साथ कुर्सी मेज का कोण 30 अंश बदल दिया गया। गर्मी के साथ पहले शॉल और फिर आधा स्वेटर उतार दिया। एक कप चाय और उसके साथ कुछ भक्षण योग्य सामग्री का सेवन संपन्न किया। पुस्तक के बीस पेज पढ़े। ब्लॉग पोस्ट पर रिस्पॉन्स का भी अवलोकन हुआ।
हम सब ने प्रबंधन और आत्मोन्नति की पुस्तकों में एक कहानी पढ़ी है। मेढक को अगर खौलते पानी में डाला जाये तो वह तुरंत कूद कर बाहर आ जायेगा और बच जायेगा। अगर उसे ठण्डे पानी के भगौने में रख कर धीरे धीरे पानी गर्म किया जाये तो वह पानी के ताप के बढ़ने को भांप नहीं पायेगा और अंतत: उबलते पानी में मर जायेगा।
हम सब इस रूपक पर यकीन करते हैं। हम मानते हैं कि धीरे धीरे होने वाले परिवर्तन हमारी बदलाव पर प्रतिक्रिया को कुंद कर देते हैं।
हम = मेढक
मेढक = हम
पर क्या ऐसा है?
एडम ग्राण्ट की 2021 में आई पुस्तक “थिंक अगेन” की प्रस्तावना में इसकी चर्चा है। उनका कहना है –
“मैंने इस लोक प्रसिद्ध कथा पर थोड़ा शोध किया। और पाया कि इसमें एक सलवट है – यह कथा सही नहीं है!
उबलते पानी में मेढक इतना जल जायेगा कि वह बाहर उछल कर भागने की दशा में ही नहीं रहेगा। मेढक असल में धीमे धीमे गर्म होते पानी में बेहतर दशा में है। वह जब असहजता वाली गर्मी महसूस करेगा, उछल कर बाहर आ जायेगा।
असल में मेढक वह प्राणी नहीं है जो स्थिति का सही सही आकलन नहीं कर पाता। सही आकलन न करने वाले हम हैं। जब हम यह कहानी सुनते हैं और, प्रथमदृष्ट्या, इसे सही मानते हैं; तब हम शायद ही इसपर कोई प्रश्न चिन्ह लगाते हैं!
हम उस व्यक्ति पर हंसते हैं जो विण्डोज 11 के जमाने में विण्डोज 95 का प्रयोग करता पाया जाता है। पर हम खुद सन 1995 में बनाये अपने विचारों को छोड़ नहीं पाते। हम उन बातों-विचारों को सुनते और यकीन करते हैं जो हमें अच्छे लगते हैं। हम उन विचारों को प्रथमदृष्ट्या खारिज कर देते हैं जो हमें गहन सोचने को बाध्य करें!”
मैंने मेढक वाला मेटाफर/रूपक बहुत बार सुना है और लोगों के सामने अपनी विद्वता (?) छांटने के लिये कभी कभी दोहराया भी है। पर इस रूपक पर कभी प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया। अब; छियासठ प्लस की उम्र में लगा रहा हूं। ऐसे कितने ही जड़ विचार और पूर्वाग्रह मन में हैं। उनपर भी ध्यान देने की जरूरत है। उनपर भी ‘थिंक अगेन’ किया जाये! :lol:
छियासठ की उम्र में कोई खास बात नहीं है। यह संख्या छप्पन, छियालीस, छत्तीस… सोलह भी हो सकती है। कोई भी अवस्था हो सकती है।
मैंने एडम ग्राण्ट की उक्त पुस्तक पढ़ने के लिये अँवासी* है। आप भी शुरू कर सकते हैं! :smile:
* नया कपड़ा लत्ता पहनना शुरू करने को मेरी देशज (अवधी) भाषा में अँवासना कहते है। यह शब्द नई पुस्तक के संदर्भ में भी ट्रांसपोर्ट कर लिया है।
ऋचा भट्ट बडोला की पुस्तक ‘पाइन इन द टेल‘ अंतत: मैंने पढ़ ही ली। ऋचा जी से परिचय ट्विटर पर हुआ था। उस परिचय के पहले मैं पहाड़ की जिंदगी पर सर्च करते हुये उनकी इस पुस्तक से परिचय पा चुका था और उसका अंश किण्डल पर डाउनलोड भी कर चुका था। यह बहुत पहले की बात है – साल भर से ज्यादा हो गया होगा। नॉन-फिक्शन या ट्रेवलॉग होता तो मैं पूरी पुस्तक खरीद कर पढ़ गया होता। पर पिछले कई दशकों से कहानियाँ नहीं पढ़ीं। या यूं कहूं कि मुंशी प्रेमचंद के बाद कहानी पठन की रुचि विकसित नहीं हुई।
पाइन इन द टेल का कवर स्क्रीनशॉट
शायद मैं बहुत ‘इमोशनली अनस्टेबल’ जीव हूं। कथा के साथ बहने लगता हूं। उसके पात्र मन में अंदर तक घुस जाते हैं। और वे, अगर पूर्णत: हास्य या सटायर न हुआ तो, बहुत व्यथित करते हैं। कभी कभी आंसू भी आने लगते हैं। पात्र जो काल्पनिक हैं, में जीना बहुत कष्टप्रद होता है। यही कारण है कि दशकों से मैंने फिल्में नहीं देखीं और उपन्यास या कहानी नहीं पढी।
सो ऋचा जी की पुस्तक (जो कालांतर में किण्डल पर मुफ्त में मिल गयी और 7 अप्रेल 2021 को मैंने डाउनलोड की थी) मैं अर्से से पढ़ने का प्रयास करता रहा। कतरा कतरा पढ़ी। छूट भी गयी बीच बीच में। अंतत: कल मैंने समाप्त की। कुल आठ कहानियां हैं। गढ़वाल की मिट्टी की महक है उनमें। गढ़वाली अंचल की गरीबी, पलायन, धर्मपरायणता, बदलते जीवन मूल्य, लोगों में सरलता और समय के साथ आते परिवर्तन सब हैं। अंतिम कहानी – ‘टच मी नॉट’ में तो मेरी तरह का रीवर्स माइग्रेशन भी है एक कर्नल हरिदत्त का!
मैंने सोचा था कि ऋचा एक नितांत शहरी जीव होंगी और उनकी गांवदेहात की समझ, हद से हद, सतही ही होगी। पर एक एक कहानी खत्म करने पर यह अहसास पुख्ता होता गया कि ऋचा में जो अंचल की समझ है वह ठोस और गहरी है। उनकी कहानी बुनने की क्षमता, सरल साधारण में भी कथा के सभी अनिवार्य तत्व सूंघ कर सशक्त भाषा में उकेरना प्रशंसनीय है।
उनकी पुस्तक पढ़ने पर मुझे एक व्यक्तिगत लाभ हुआ है। मेरे ब्लॉग पर मेरे अंचल के कई पात्र आने को कुलबुलाते हैं। पर उनमें बहुत कुछ विवादास्पद है। उनके बारे में कई पोस्टें आधी अधूरी लिख कर अंतत: मैंने ‘ट्रेश बिन’ में डाली हैं। ऋचा जी की कहानियों को पढ़ कर यह गहरे से महसूस किया कि मुझे चरित्रों, घटनाओं और वातावरण को जस का तस रखने की बजाय कथा या उपन्यास विधा का सहारा लेना चाहिये। यह सोच मन में पैठना “पाइन इन द टेल” पढ़ने के कारण ही हुआ है। इसके अलावा कथा और उपन्यास साहित्य पढ़ने के प्रति एक लगाव – जो बचपन या किशोरावस्था के साथ ही प्राय खत्म हो गया था – वह पुन: प्रारम्भ करने का मन बना है।
ऋचा भट्ट बडोला – चित्र जैसा ट्विटर पर है।
आज गुडरीड्स की साइट डाउन है। उसपर मैं अपनी पुस्तक रेटिंग नहीं पोस्ट कर पा रहा। अमेजन पर मैंने इसे पांच में से पांच रेट किया है। ऋचा से परिचय न होता, तो भी मैं निरपेक्ष भाव से, इसे चार से पांच के बीच ही रेट करता। मुझे अगर ऋचा की कहानियां अपनी कलम से लिखनी हों तो एक दो में अंत बदलना चाहूंगा। पर शायद मेरी वह सोच गढ़वाल की आंचलिकता – जिसकी समझ ऋचा बडोला को निश्चय ही सशक्त है – से तालमेल न रखे। वह शायद बेकार में गढ़वाली और पूर्वांचली आंचलिकता का बेमेल फ्यूजन हो जाये! लिहाजा, पाइन इन द टेल वैसी ही रहनी चाहिये, जैसी है! एक एक कहानी पढ़ने-सोचने को बहुत कुछ देती है।
गुडरीड्स पर रेटिंग देने का अवसर आयेगा तो मैं पांच में से पांच ही दूंगा। पुस्तक रिव्यू लिखना मुझे आता नहीं सो इसी ब्लॉग पोस्ट को रिव्यू माना जाये।