हीयरिंग एड – फुल-पेज विज्ञापन का समाज और अर्थशास्त्र


सुबह के अखबार में जब कोई उत्पाद आधा कॉलम लेता है, तो वह हमें अपने बारे में कुछ बताता है। लेकिन जब कोई कंपनी पूरा पहला पन्ना खरीद ले—और उस पर किसी सुपरस्टार को रख दे—तो वह समाज, अर्थव्यवस्था और उपभोक्ता मनोविज्ञान, तीनों स्तर पर गहरे से प्रभाव डालती है।

कुछ दिन पहले जो फुल-फांट पेज हीयरिंग डिवाइस का विज्ञापन आया, उसमें सबसे पहले नज़र जाती है मॉडल पर—और वह मॉडल कोई साधारण चेहरा नहीं है। वह फिल्मी कलाकार सोनू सूद हैं।

हियरिंग डिवाइस का फुल पेज बिज्ञापान
हियरिंग डिवाइस का फुल फ्रंट पेज विज्ञापन

अभिनेता, मेहनती व्यक्तित्व, और कोविड-काल में जन सामान्य की मदद के कारण देशभर में बनी भरोसेमंद छवि वाला सोनू सूद। यह चेहरा सिर्फ रील का नहीं, असल जीवन का भी प्रतीक बन गया है।

अब सवाल उठता है—हीयरिंग एड जैसी परंपरागत “मेडिकल” चीज़ के विज्ञापन में सोनू सूद को काहे लाया गया?
यह तो 70+ बुज़ुर्गों की मशीन मानी जाती थी – या है भी। क्या इसकी जगह कोई डाक्टर किसी बुजुर्ग के कान जांचता नहीं दिखाया जाना चाहिये था? और तब क्या एक चौथाई पेज का विज्ञापन काफी नहीं रहता?

फुल फ्रंट पेज और सोनू सूद जैसे स्टार का प्रयोग – यही वह कारण है जहाँ यह विज्ञापन अपना बड़ा संकेत देता है।

सोनू सूद को रखने का मतलब है— विज्ञापन लक्ष्य-समूह बदला है। कम्पनी अब बूढ़े, बेंत पकड़े, “आंय-आंय” करते लोग नहीं ढूँढ रही। वह 45–55 वर्ष के उस कामकाजी वर्ग को लक्ष्य कर रही है जो—

  • बिज़नेस संभालता है,
  • मीटिंग्स करता है,
  • भीड़ में बोलता-सुनता है,
  • और जिसे आजकल के शहरी और औद्योगिक-व्यवसायिक शोर की थकान सताती है।

सोनू सूद का चेहरा इस बदलाव का एंकर है। अब सुनने का यंत्र चालीस साल के जवान को टार्गेट कर रहा है। यह तीन स्तरों – परतों में – प्रभाव डालता है।

विज्ञापन की पहली परत — समाजिक बदलाव
आज हीयरिंग एड (hearing aid) का नया अर्थ है—
“साफ़ सुनना आर्थात शार्प होना।”
यह बीमारी वाला उपकरण नहीं, बल्कि आधुनिक लाइफ स्टाइल का हिस्सा बनता जा रहा है।
और सोनू सूद, एक फिट और सक्रिय व्यक्तित्व, इसे बूढ़ों के कोने से निकाल कर उमंग से भरी मिडिल एज़ की मुख्य धारा में लॉन्च कर देता है।

उनका संदेश यह है:
“यह डिवाइस कमजोरी नहीं, सुविधा है। यह आपको और सक्षम बनाता है, बीमार नहीं दिखाता।”

विज्ञापन की दूसरी परत — अर्थशास्त्र
फुल-पेज विज्ञापन की कीमत लाखों में जाती है। और यह देश भर में – अलग अलग अखबारों में दिया जाता है तो लागत करोड़ों में बैठती है।
कंपनी तभी यह खर्च करती है जब उसे पता हो कि—
उत्पाद जनता की मांग बन सकता है,
शहरी मध्य-वर्ग इसे स्वीकार करेगा, आखिर डिवाइस की कीमत वही चुकाने की हैसियत रखेगा।
और उपभोक्ता के मन में बहरेपन का धब्बा नहीं लगेगा। वह उसके लिये अभिजात्य फैशन स्टेटमेंट होगा; कोई लजाने – छुपाने वाली चीज नहीं।

सोनू सूद की “भरोसेमंद” ब्रांड छवि यहाँ आर्थिक निवेश की सुरक्षा बनती है।
उनकी लोकप्रियता में एक खास बात है—
वह बहु-क्षेत्रीय है:
हिंदी पट्टी उन्हें जानती है, दक्षिण भारत उन्हें पसंद करता है, और कोविड के कारण पूरा देश उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है।

ऐसे व्यक्ति का चेहरा हीयरिंग डिवाइस को चिकित्सा से निकाल कर उपभोक्ता सामग्री की श्रेणी में ले आता है।

विज्ञापन की तीसरी परत — मनोविज्ञान
बुज़ुर्ग मॉडल कोई कहानी नहीं बेचते; कोई सपने नहीं उपजाते;
वे सिर्फ “बीमारी” की याद दिलाते हैं।

लेकिन सोनू सूद एक कहानी बेचते हैं—
“मैं सक्रिय हूँ। आधुनिक हूँ। काम में तेज़ हूँ।
और यह डिवाइस मेरी क्षमता बढ़ाता है।”

यह छवि अपनापन पैदा करती है।
उपभोक्ता सोचता है—
“अगर सोनू इसे पहन सकते हैं, मैं क्यों नहीं?”

यही मनोविज्ञान है।
विज्ञापन सिर्फ उत्पाद नहीं बेच रहा… वह एक पहचान बेच रहा है।

और फिर आता है तकनीकी मोड़—
हीयरिंग एड्स और ईयर बड्स का फर्क तेजी से मिट रहा है। बुढ़ापा और जवानी का अंतर गायब हो रहा है।
AI वाले हीयरिंग डिवाइसेज़ वातावरण का किर्र किर्र, घिसघिस वाला शोर कम करते हैं, बातचीत उभारते हैं, फोन कॉल सीधे डिवाइस में लाते हैं, और रोज़मर्रा की आदतें सीखते हैं। ये बूढ़े से ज्यादा नौजवान को लाभ पंहुचाने वाले बन सकते हैं।
वह भीड़ में, शोर में, व्यवधान में भी एकाग्रता से काम कर सकता है।

अब इस पूरे चित्र में सोनू सूद क्या कर रहे हैं?
वह इन हीयरेबल्स को “मरीज के यंत्र” के पिंजरे से निकालकर “स्मार्ट लाइफस्टाइल डिवाइस” के मंच पर ला रहे हैं।
बहुत कुछ वैसे ही जैसे चश्मा मायोपिया या हेपर मेट्रोपिया के लिये नहीं, धूप या अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाव के लिये फैशनेबल पीढ़ी पहनती है। खबर छपती है कि दावोस की बैठक में फलां राष्ट्राध्यक्ष धूप का चश्मा लगाये पंहुचे। फिल्मी हीरो-हीरोइनें तरह तरह के चश्मे पहने और लुभावने लगते हैं।

चश्मा जैसे आज का फैशन स्टेटमेंट बना है, हियरिंग डिवाइस भविष्य का फैशन स्टेटमेंट बनेगा।

एक तरह से यह फुल-पेज विज्ञापन कह रहा है—
“सुनना अब उम्र की समस्या नहीं, प्रदर्शन की आवश्यकता है।
और अगर सोनू सूद को यह चाहिए—तो आपको भी चाहिए।”

फुल-पेज विज्ञापन एक उत्पाद की कहानी नहीं होता।
यह समाज के बदलते आत्मविश्वास की कहानी होता है।
और आज इसकी कहानी एक सामान्य विज्ञापन-अभिनेता नहीं, एक बड़ा प्रतीक सुना रहा है—सिनेमा का स्टार सोनू सूद।

आज कम सुनने वाले खरीद रहे हैं इसे। पांच साल में एआई युक्त डिवाइस, पचास हजार में उच्च मध्यवर्ग खरीदेगा और यह वैसा ही फैशन स्टेटमेंट होगा जैसे एप्पल का आईफोन! कोई आश्चर्य नहीं कि नया डिवाइस लॉन्च हो और खरीदने वालों की एक किलोमीटर लम्बी लाइन लगे। लोग गर्व से बाइट दें कि उन्होने रात भर लाइन में लग कर आखिर सबसे पहले हीयरिंग डिवाइस खरीद लिया!

सारी बड़ी कम्पनियां – फिलिप्स, एप्पल, बोस, सोनी, सिग्निया इस बाजार में कूदेंगी।
भविष्य का सपना लाया है यह विज्ञापन!

Hearing device for all ages
व्यापक वर्ग के लिये हीयरिंग डिवाइस

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किर्रू लेवल की जर्दालू डिप्लोमेसी


मनोहर श्याम जोशी जी की किताब है – नेता जी कहिन। पाँच–सात किताबें लोगों को उपहार दे चुका हूँ। यहाँ तक कि मेरी प्रति भी कोई सज्जन ले गये तो ले कर भूल गये।

सो एक प्रति हफ्ता भर पहले फिर खरीदी। उसी में पत्नीजी ने पढ़ा – जर्दालू की किर्रू लेवल भेंट के बारे में।

किताब में उस पेज का ट्रांसस्क्रिप्ट कुछ यूं है –

नेताजी कहिन का अंश

… नेताजी हंसे, बोले – पिछली साल में यह (सिगरेट) कितनी मर्तबा छोड़ी है?
हमने गिन कर बताया – सातवीं।
“तब रख लीजिये।” उन्होने कहा। “काम आयेगी। नहीं तो भगत आ कर पीते रहेंगे। आपका पान मसाला, तम्बाकू चल रहा हय तो यह सउदा हम कानपुर वाले चेले को लिख देंगे। मगर है वह जर्दालू आम टाइप।”

“जर्दालू आम टाइप?”

“पुरानी चाल का चालू। वह यूँ है—एक बार किसी चेला महोदय ने सी.एम. को लिखा: पत्र के साथ, भागलपुर का फस्सक्लास सौ जर्दालू आम सेवा में भेजा जा रहा हय, सो ग्रहण किया जाय। अउर हमारा राजसभा के लिए अउर ऊ न हो तो पब्लिक सर्विस कमीशन के लिए लम्बर लगाया जाए। अबे गदहे, इन कामों के लिए लाखों के वारे-न्यारे हो रहे हैं, अउर तू समझे है जर्दालू आम की डाली से बात बन जाएगी! बताइए! इन जर्दालू आम टाइपों ने भी अपने ढंग से एइसी-की-तइसी फेर दी हय पालटिक्स पर। डाली भेजू, चरण-छू किर्रू पालटीसियन, जब देखिये तब हीं हीं हीं, मेरा यह काम करवा दीजिए। अरे काम अइसे होते हैं कभी। काम का ढंग होता है। न करो तो डसडंट बने घूमते हैं। आप समझ लीजिए कक्का, इस देश में विद्रोही, क्रान्तिकारी कोई नहीं ससुरा। सबै हीं हीं हीं डसडण्ट हैं। कौमे अइसे डसडण्टों की है ससुरी।”

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आदर्श चीफ ट्रेन कंट्रोलर गोस्वामी जी


नीलकंठ बरियापुर के रिटायरमेंट होम में तैयार हो कर सैर पर निकलने जा रहा है। वह जूते—स्पोर्ट्स शू—पहन रहा था। झुकते ही कमर में हल्का दर्द उठा। सत्तर साल की उम्र में कभी इधर, कभी उधर दर्द होना अब रूटीन है। उससे क्या शिकायत?
शरीर अपनी उम्र याद दिलाता रहता है, पर मन अपनी नहीं मानता।

पर यादें हैं—जाने कहां ले जाती हैं।
नीलकंठ को गोस्वामी जी याद आ गये।

चालीस साल पहले का दृश्य। रतलाम। नीलकंठ वहाँ बतौर सहायक परिचालन अधीक्षक पोस्ट हुआ था। पहली पोस्टिंग। रतलाम जैसे व्यस्त रेल मंडल का यातायात अधिकारी—बिना किसी अनुभव के। उसे आज भी समझ नहीं आता कि जोनल चीफ साहब ने उसमें क्या देखा था। शायद कोई संभावना, शायद सिर्फ़ एक खाली जगह। उस समय तो इतना ही पता था कि जिम्मेदारी बड़ी है और हाथ खाली।

रतलाम ट्रेन कंट्रोल में चीफ ट्रेन कंट्रोलर थे—गोस्वामी जी। उनके रिटायरमेंट में बस एक महीना बचा था। एक तरफ नीलकंठ नौकरी शुरू कर रहा था, दूसरी तरफ गोस्वामी जी उसे समेट रहे थे। जैसे दो पटरियाँ—एक आगे की ओर जाती हुई, दूसरी धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म से बाहर।

गोस्वामी जी शांत भाव से काम करने वाले गाड़ी नियंत्रक थे। नीलकंठ ने कभी उन्हें ऊँची आवाज़ में बोलते नहीं सुना। न डांटना, न हड़बड़ी। ट्रेन रनिंग के बारे में उनकी दूरंदेशी विख्यात थी। वे चीफ कंट्रोलर की मेज पर बैठे-बैठे पूरे मंडल को मन में देख लेते थे—कौन-सी गाड़ी कहाँ है, किस सेक्शन में दबाव बढ़ेगा, और अगले दो-तीन घंटे में स्थिति किस तरफ़ जाएगी।
कभी-कभी नीलकंठ को लगता, गोस्वामी जी नक्शे नहीं देखते—वे नक्शा हो जाते हैं।

फोन पर वे पोज़ीशन लेते, दो-चार सवाल पूछते, और फिर संक्षिप्त निर्देश देते। उनके ब्रीफ में शब्द कम और आश्वासन ज़्यादा होता था। उनकी सलाह को कोई अनदेखा नहीं करता था—इसलिए नहीं कि वे सीनियर थे, बल्कि इसलिए कि उन्होंने पहले भी ग़लतियों से परिचालन को उबारा था। उन दिनों किसी बड़े डिरेलमेंट या ट्रैफिक जाम की याद आते ही लोग कहते—“अगर गोस्वामी जी होते तो शायद ऐसा न होता।”

कंट्रोल के लोगों ने नीलकंठ को सलाह दी—
“एक ही महीना है गोस्वामी जी का। उनसे ट्रेन यातायात का काम सीख लीजिये। वे चले जायेंगे तो आप एक महत्वपूर्ण अवसर खो देंगे।”

नीलकंठ ने यह बात गांठ बाँध ली। उसने गोस्वामी जी को पूरा आदर दिया। दिन में दो-तीन घंटे उनके पास बैठता। काम की बारीकियाँ सीखता—किस जटिल स्थिति में क्या निर्णय देना है, कैसे अपने मन में ट्रेनों की वर्तमान स्थिति को पकड़ कर अगले कुछ घंटों का फ्लो सोचना है, अपने पद की अहमियत और उसकी सीमाएँ कहाँ हैं।
गोस्वामी जी कभी लंबा उपदेश नहीं देते थे। बस कहते—“सोच कर बोलो, और बोल कर डटे रहो।”

नीलकंठ अब याद करता है—वह तब सचमुच कुशल लर्नर था, और गोस्वामी जी अति कुशल सिखाने वाले। उन्होंने ज्ञान ही नहीं दिया, दृष्टि दी।

रिटायरमेंट से कुछ दिन पहले गोस्वामी जी चिंतित दिखने लगे। कारण काम का नहीं था। रिटायरमेंट से पहले आवास खाली कर वेकेशन सर्टिफिकेट लेना ज़रूरी था। नहीं तो पेंशन प्रोसेसिंग अटक जाती—और दो-तीन महीने बाद ही पैसा मिलना शुरू होता। सरकारी सेवा की यह छोटी-सी गाँठ उन्हें परेशान कर रही थी।

नीलकंठ ने सहज ही कहा—
“मैं तो चार कमरे के घर में अकेला रहता हूँ। आप मेरे यहाँ शिफ्ट हो जाइये, और घर का वेकेशन दे दीजिये।”

गोस्वामी जी की समस्या हल हो गयी। वे और उनकी पत्नी नीलकंठ के साथ रहने आ गये। रिटायरमेंट के हफ्ता भर बाद तक वे साथ रहे। नीलकंठ को गोस्वामी जी का सानिध्य तो मिला ही, श्रीमती गोस्वामी के हाथ का भोजन भी मिलने लगा।
वह समय बिना किसी औपचारिकता के बीतता था—जैसे नौकरी और पद के बीच की सारी दीवारें गिर गयी हों।


रिटायरमेंट होम का नौकर सेंटर टेबल पर चाय रख गया। सैर पर जाने से पहले की चाय। साथ में दो मेरी बिस्कुट।
नीलकंठ तो चालीस साल पहले की यादों में खोया था।

उसे याद आया—श्रीमती गोस्वामी सवेरे चाय के साथ रात की बची रोटी के टुकड़े प्लेट में रखती थीं। रोटियाँ—जो ओवरनाइट फरमेंट हो जाती होंगी। वे उन पर हल्का नमक और घी लगाकर तवे पर गरम कर देती थीं। उनका स्वाद नीलकंठ की स्मृति में आज भी ताज़ा था।
वह स्वाद सिर्फ़ भोजन का नहीं था—वह अपनत्व का था।

पता नहीं अब गोस्वामी दंपति कहाँ होंगे। होंगे भी या नहीं। चालीस साल हो गये। गोस्वामी जी ज़िंदा होंगे तो अट्ठानवे के होंगे। होंगे क्या?

नीलकंठ को याद आया—जब वह पहली बार गोस्वामी जी से मिला था, तो वे उसे “सर” कह कर संबोधित करते थे। वह “सर” कितनी जल्दी “बेटा” में बदल गया—उसे पता ही नहीं चला।

गोस्वामी जी, चीफ ट्रेन कंट्रोलर
गोस्वामी जी, चीफ ट्रेन कंट्रोलर । चित्र चैट जीपीटी द्वारा

जूते बाँधते समय अगर कमर में दर्द न हुआ होता, तो चीफ कंट्रोलर की मेज पर बैठे गोस्वामी जी का झुक कर ज़मीन पर गिरी पेन की कैप उठाना, और उसी बहाने पूरी स्मृति का यूँ उभर आना—शायद न होता।

चाय के साथ मेरी बिस्कुट खाते हुए नीलकंठ ने सोचा—
नौकर से वह कहेगा कि कल से वह बासी रोटी घी-नमक लगाकर दिया करे। मेरी बिस्कुट की जगह।

कुछ स्वाद उम्र के साथ लौट आते हैं।
और कुछ लोग—कभी जाते ही नहीं।

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नीलकंठ चिंतामणि मेरा वह रूप है जो यादें साझा करते समय पूरी लिबर्टी लेता है। यादें कभी धुंधली भी होने लगती हैं सो नीलकंठ उन्हें प्रस्तुत करता है – जीडी नहीं।

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